Monday, January 5, 2009

टूटेगा तो आम आदमी-व्यंग्य कविता


गरीब का मान क्या, सम्मान क्या
उसके लिये तो रोटी से पेट भरने में ही
रोज मजा आता है
आत्मसम्मान और कौम के ईमान की
बात करते हैं वह सौदागर
जंग का मैदान हो या
अमन का रास्ता
दौलत का हर कतरा
जिनके ठिकाने की तरफ बढ़ता नजर आता है
.......................................
असली जंग का शंखनाद बड़े लोगों के भौंपू
रोज बजा रहे है
शायद मंदी से हैरान हैं
आम आदमी नहीं खरीद सकता रोज चीज
न देता हर विज्ञापन पर ध्यान
इसलिये सौदागर परेशान है
उनका नया और ताजा माल
कबाड़ बनता जा रहा है
पूंजी पर मंदी की मार हो गयी है ज्यादा
शायद जंग से तेजी लाने का है इरादा
मुनाफाखोरी और जमाखोरी के आदी
साहूकारों को जंग से क्या वास्ता
शांति में भी नहीं उनकी आस्था
दुनियां की दौलत का रथ
उनके दरवाजे तक ही जाता है
गरीब का क्या
वह तो उनके लिये भीड बन जाता है
इधर लड़े या उधर मरे
टूटेगा तो आम आदमी इसलिये
बड़े लोग भविष्य में हो न हो
फिलहाल जंग का बिगुल बजा रहे हैं

.......................................

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1 comment:

विनय said...

समाज का ताज़ा हाल बयाँ करती है यह कविता नहीं शब्दचित्र है



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