Thursday, July 19, 2007

हिन्दी सम्मेलन-हिन्दी कन्वेंशन

दूरदराज कहीं होता है
विश्व हिन्दी सम्मेलन
कहीं पास ही होता है
ब्लोगर ऑफ़ हिन्दी कन्वेंशन
चहूं ओर फैली रोशनी
राह में बिछे कालीन
बजती हैं अंगरेजी धुन
हिन्दी के मसीहा
चलते बिल्कुल अटेंशन
कुछ हिन्दी के शब्द
कुछ अंगरेजी के वर्ड
अच्छी पर बोलें थैंक्स
खराब पर बोलें नो मेशन

हिन्दी-हिन्दी कर कई
लोग हिट हो जाते हैं
फिर हिन्दी को ही
गरीबों की भाषा बताते हैं
अंग्रेजी के फ्लॉप को भी
हिन्दी के हिट से बेहतर जताते हैं
हिन्दी में अंगरेजी के शब्द जोड़कर
जताते हैं लोगों में इम्प्रेशन

हिन्दी को असहाय भाषा बताने वाले
रोटी कि जुगत में ही
हिन्दी के विकास के लिए
अंगरेजी के शब्द जोडे जाते हैं
अंग्रेज चले गये
पर अंग्रेजियत छोड़ गये
हिन्दी के तथाकथित सेवक
अभी भी अंगरेजी के गुन गाये जाते हैं
करते हैं उनके घर सम्मेलन

कहैं दीपक बापू हम हैं
असली हिन्दी वाले
कहते कुछ नहीं समझ सब जाते हैं
हिन्दी में लिखते बरसों हो गये
अपनी खाने और शराब के लिए
कई लोगों को हिन्दी प्रेम ओढ़ते देखा है
सम्मेलनों के लिए
असली हिन्दी लेखकों को
भ्रमित कर भीड़ में झोंकते देखा है
पहुंच का देख बोर्ड पर लिखा
मिलता है
हिन्दी कन्वेंशन
वह मुस्कराते हैं
यह सोचकर कि
देखो कैसा उल्लू बनाया
हम खुश होते हैं कि
कैसे एक व्यंग्य जुटाया
पहला देता सम्मान
दूसरा लेता ससम्मान
फिर दूसरा यही करता
पहले वाले के लिए
फिर व्यक्त होता के लिए
शब्दों में एक दुसरे के लिए अभिमान

कार्यक्रम के रंगीन फोटो
छप जाते हैं अखबार में
हम पढ़-पढ़ कर मुस्कराते हैं
यही है हिन्दी कन्वेंशन
हिन्दी हम गरीबों की भाषा है
पर बन रही हैं कई लोगों की
बन गयी है रोटी कमाने की भाषा
उसका विकास करना बन गया है फेशन

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