Saturday, October 18, 2014

सफेद हाथी-हिन्दी कविता(safed hathi-hindi kavita, white elphant-hindi poem's)

सहज संबंध
बनाती है प्रकृति
लोग तो स्वार्थ से
साथी बन जाते हैं।

निकल जाता है काम
वही लोग फिर सामने
सफेद हाथी की तरह तन जाते हैं।

कहें दीपक बापू वफादारी अनमोल है
मगर बाज़ार में मिल जाती हैं,
निभाने वाले की औकात के हिसाब से
कीमत भी दिलाती है,
झूठ सस्ती शय है
उसके ग्राहक बहुत हैं,
ढोने वाले पाखंडी वाहक भी बहुत हैं,
सत्य का नाम लेकर
भ्रम बेचने के लिये
बाज़ार में सौदागर जम जाते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Monday, October 6, 2014

योग साधना में तपने से व्यथित इंद्रियों में सिद्धि आती है-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(yoga sadhna mein tapane se vyathit indriyon mein siddhi aatee hai-A Hindi hindu religion thought article based on patanjali yoga vigyan)




            विश्व में पर्यावरण प्रदूषण के प्रभाव से गर्मी का प्रभाव बढ़ रहा है। इससे मनुष्य ही नहीं वरन् पक्षु पक्षियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव देखा जा सकता है।  सामान्य लोग प्रत्यक्ष दैहिक दुप्प्रभाव देख सकते हैं मगर इस प्रदूषण से पैदा होने वाले  अप्रत्यक्ष मानसिक तथा वैचारिक दोषों को केवल मानसिक और सामाजिक विशेषज्ञ ही समझ पाते हैं। पर्यावरण प्रदूषण, आधुनिक साधनों का दिनचर्या में निरंतर उपयोग तथा असंतुलित सामाजिक व्यवहार से लोगों की मनस्थिति अत्यंत क्षीण होंती जा रही है।
            भारतीय योग साधना का नियमित अभ्यास करने के बाद ही हम इस बात का अनुभव कर सकते हैं कि एक सामान्य और योगाभ्यासी मनुष्य में क्या अंतर है? कुछ वर्ष पूर्व योगाभ्यास प्रारंभ करने वाले एक योग साधक ने इस लेखक को बताया  अनेक बार कुछ व्यक्ति कुछ बरसों के बाद मिले तो उनके व्यवहार में अनेपक्षित परिवर्तन का अनुभव हुआ।  पहले लगा कि यह उम्र या परिवार की वजह से हो सकता है पर धीमे धीमे लगा कि कहीं न कहीं पर्यावरण प्रदूषण तथा अन्य कारण भी कि उनके असंतुलित व्यवहार के लिये जिम्मेदार है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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कायेन्द्रियसिद्धिशुद्धिखयत्तपसः।
            हिन्दी में भावार्थ-तप के प्रभाव से जब विकार नष्ट होने के बाद प्राप्त शुद्धि से शरीर और इंद्रियों में सिद्धि प्राप्त होती है।
            हम यह नहीं कहते कि सभी लोग मानसिक रूप से मनोरोगी होते जा रहे हैं पर सामाजिक तथा स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात को मान रहे हैं कि समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग दैहिक रोगों का शिकार हो रहा है जिससे विकृत या बीमार मानसिकता का दायर बढ़ता रहा है।  भारतीय योग विधा का प्रभाव इसलिये बढ़ रहा है क्योंकि पूरे विश्व के स्वास्थ्य विशेषज्ञ मान रहे हैं है कि इसके अलावा कोई अन्य उपाय नहीं है। भारतीय योग साधना में आसन, प्राणायाम, धारण और ध्यान की ऐसी प्रक्रियायें हैं जिनमें तपने से साधक में गुणत्मक परिवर्तन आते हैं।  इसके लिये हमारे देश में अनेक निष्काम योग शिक्षक हैं जिनसे प्रशिक्षण प्राप्त किया सकता है। इस संबंध में भारतीय योग संस्थान के अनेक निशुल्क शिविर चलते हैं जिनमें जाकर सीखा जा सकता है।


लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Wednesday, October 1, 2014

झाड़ू से बाह्य तथा योग से आंतरिक स्वच्छता का उदय होता है-2 अक्टूबर महात्मा गांधी जयंती पर प्रारंभ भारत स्वच्छता अभियान पर विशेष हिन्दी लेख/नया पाठ (jhadu se bahari tatha yoga se aantrik swachchhata ka uday hota hai-2 october mahatma gandhi jayanti par prarambh swachchhata abhiyay par special hindi new post, article or editorial)




            प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान वहां के राष्ट्रपति बराक ओबामा को महात्मा गांधी रचित श्रीगीता प्रदान की।  हम जैसे योग तथा अध्यात्मिक साधकों के लिये श्री नरेंद्र मोदी की अध्यात्म तथा योग के प्रति जो लगाव है वह अत्यंत रुचिकर विषय है।  इसका कारण यह है कि सामान्य जीवन बिताने वाले साधक की अध्यात्मिक क्षमता पर अन्य लोग सहजता से विश्वास नहीं करते क्योंकि बिना बड़ी भौतिक उपलब्धि के किसी को हमारा समाज ज्ञानी नहीं मानता।  यह मानवीय गुण है  वह शक्तिशाली, उच्च पदस्थ और धनिक के आचरण का सभी  लोग अनुसरण करते हैं।  भगवान श्रीकृष्ण ने मद्भागवत गीता में इस बात का उल्लेख भी किया है कि श्रेष्ठ व्यक्ति का पूरा समाज अनुसरण करता है। उन्होंने स्वयं ही महाभारत युद्ध में श्रीअर्जुन का सारथि बनना इसलिये भी स्वीकार किया ताकि उन्हें शस्त्र भी न उठाना पड़े और कर्म से विमुख होने का आरोप भी न लगे।  श्रीमोदी भी योग तथा अध्यात्मिक दर्शन में रुचि रखने के बाद भी भारत का सर्वोच्च राजसी पद धारण किये हुए हैं इससे उनकी साधना से मिली सिद्धि का परिणाम भी माना जा सकता है। यही कारण है कि आजकल पूरे विश्व में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन तथा योग साधना की चर्चा भी खूब हो रही है।
            श्रीमोदी ने सत्ता संभालने के पद निंरतर सक्रियता दिखाई दी है।  उन्होंने 2 अक्टुबर को महात्मा गांधी जयंती पर भारत में स्वच्छता अभियान प्रारंभ करने की घोषणा करने के साथ ही संयुक्त राष्ट्रसंघ में योग दिवस मनाने का प्रस्ताव देकर भारत के अध्यात्मिक प्रेमियों को जहां प्रसन्न किया वहीं शेष विश्व को भी चकित कर दिया है।  जहां बाहरी स्वच्छता से देह की इंद्रियां सुख ग्रहण करती हैं वहीं योग से अंदर भी ऐसी स्वच्छता का भाव पैदा होता है जिससे यही धरती स्वर्ग जैसी लगती है।  भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार उनको ज्ञानी भक्त प्रिय है। ज्ञानी भक्त की पहचान यह दी गयी है कि जो स्थिर, स्वच्छ तथा पवित्र स्थान पर त्रिस्तरीय आसन बिछाकर प्राणायाम तथा ध्यान करे।  इसका सीधा आशय यही है कि पहली स्वच्छता बाहर ही होना चाहिये क्योंकि उसका प्रत्यक्ष संबंध देह से है।  देह हमेशा ही प्रथमतः बाह्य वातावरण से प्रभावित होती है।  अगर वह वातावरण सकारात्मक है तो फिर बुद्धि, मन और विचारों की स्वच्छता के लिये योग साधना सहजता से की जा सकती है। इस तरह आंतरिक तथा बाह्य स्चच्छता जीवन में ऐसा आत्मविश्वास पैदा करती है कि मनुष्य जिन संासरिक विषयों में बड़ी उपलब्धि पाने के लिये लालायित रहता है वह उसे सहजता से प्राप्त कर लेता है। योग साधना के अभाव में  दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक रुगणता होने से जहां  मनुष्य एक साधक की अपेक्षा अधिक सांसरिक विषयों में उपलब्धि करने के लिय उत्सुक रहता है वहीं शक्ति के अभाव में हारता भी जल्द है।
            2 अक्टुबर 2014 महात्मा गांधी की जयंती का दिन पिछले अन्य वर्षों की अपेक्षा अधिक चर्चा का विषय इसलिये ही बना है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी न केवल राजनीतिक विषय बल्कि आर्थिक, सामाजिक तथा अध्यात्मिक विषयों में भी नये प्रकार का स्फूर्तिदायक संदेश दे रहे हैं।  हमारी तो यही कामना है कि वह सफल हों।  हम जैसे सामान्य, स्वतंत्र तथा मौलिक विचार लेखकों की अपनी कोई महत्वांकाक्षा नही होती पर यह कामना तो होती है कि अपने आसपास के लोग भी प्रसन्न रहे।  योग साधना, गीता अध्ययन तथा सात्विक कर्म से ही यह जीवन सहजता से जिया जा सकता है। हमारे ब्लॉग पाठकों की संख्या अधिक नहीं है और न ही ऐसे संपर्क सूत्र है कि किसी प्रधानमंत्री तक अपनी बात पहुंचा सके।  इसलिये अपने पाठकों से ही अपनी बात कहकर दिल खुश करते हैं।  योग तथा श्रीगीता पर किस भी व्यक्ति की सक्रियता हमें प्रसन्न करती है इसलिये ही यह लेख भी लिखा है। हम आशा करते हैं कि प्रधानमंत्री अपने नियमित कर्म में सफल रहकर देश एक नया अध्यात्मिक मार्ग का निर्माण करेंगंे।
        

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Saturday, September 27, 2014

बीमारी में ज़माना रोज जिये-हिन्दी कविता(bimari mein zamana roj jiye-hindi poem)



अपने लिये ढूंढते हैं
फुर्सत के क्षण
ताकि दिल बहला सकें।

जिंदगी की जंग में
रोज होते लोग घायल
नहीं मिलता समय किसी को
ताकि दोस्तों के जख्म पर
हाथ फिराकर सहला सकें।

कहें दीपक बापू ढूंढ रहे दवा
सभी अपनी बीमारी के
इलाज के लिये,
मधुमेह, वायुविकार और
उच्च रक्तचाप के चंगुल में
ज़माना रोज जिये,
कोई नहीं मिलता
जिसकी मस्तिष्क की
धमनियों मे बचा हो
ताजेपन का अहसास
ताकि उसे उद्यानों में टहला सकें।
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Sunday, September 21, 2014

ज्ञान किताबें और सत्य-हिन्दी कविता(gyan ke kitaben aur satya-hindi vyangya kavita)




उनके घर में
ज्ञान की बड़ी बड़ी किताबें
कीमती सामान की तरह पड़ी हैं।

भक्त का चोला ओढ़ा कभी
अब उनकी तस्वीर
शिष्यों के घर में दीवारों पर जड़ी हैं।

कभी वह स्वयं झुकाते थे
सर्वशक्तिमान के दरबार में
अब उनके दरवाजे पर
भक्तों की भीड़ खड़ी है।

कहें दीपक बापू अप्रकट ब्रह्म
अपने भक्त के हृदय में ही
प्रकट हो जाता है,
छद्म भक्ति में लगे पाखंडियों को
स्वयं ही सर्वशक्तिमान का
अवतार होने का मोह हो जाता है,
सत्य की दिखाते रूप
जपाते अपना सभी से
घर में माया बड़े रूप में
हमेशा उनके साथ
सहचरिणी की तरह खड़ी है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Sunday, September 14, 2014

हिन्दी ब्लॉगर की छवि-14 सितम्बर हिन्दी दिवस पर हास्य कविता(hindi Blogger ki Chhavi-A hindi comedy poem on 14 september hindi day, hindi diwas,hindi diwas)



रास्ते में तेजी से चलता
मिल गया फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू तुम्हारे पास ही आ रहा था
सुना है दस सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग लेखक
सम्मान पाने वाले हैं,
ऐसा लगता है हिन्दी के अंतर्जाल पर भी
अच्छे दिन आने वाले हैं,
हो सकता है तुमको भी
कहीं से सम्मान मिल जाये,
हमारा छोटा शहर भी
ऐसी किसी खबर से हिल जाये,
आठ साल अंतर्जाल पर हो गये लिखते,
पहल दिन से आज तक
तुम फ्लाप कवि ही दिखते,
मिल जाये तो मुझे जरूर याद करना
मैंने ही तुम्हारे अंदर हमेशा
उम्मीद जगाई,
सबसे पहले दूंगा आकर बधाई।

सुनकर हंसे दीपक बापू और बोले
‘‘अंतर्जाल पर लिखते हुए अध्यात्म विषय
हम भी हम निष्काम हो गये हैं,
कोई गलतफहमी मत रखना
हमसे बेहतर लिखने वाले
बहुत से नाम हो गये हैं,
हमारी मजबूरी है अंतर्जाल पर
हिन्दी में लिखते रहना,
शब्द हमारी सासें हैं
चलाते हैं जीवन रुक जाये वरना,
मना रहे हैं जिस तरह
टीवी चैनल हिन्दी दिवस
उससे ही हमने प्रसन्नता पाई,
नहीं मिलेगा हमें यह तय है
फिर भी देंगे
सम्मानीय ब्लॉग लेखको को हार्दिक बधाई,
हम तो इसी से ही प्रसन्न हैं
हिन्दी ब्लॉग लेखक शब्द
अब प्रचलन में आयेगा,
अपना परिचय देना
हमारे लिये सरल हो जायेगा,
सम्मान का बोझ
नहीं उठा सकते हम,
उंगलियां चलाते ज्यादा
कंधे उठाते कम,
इसी से संतुष्ट हैं कि
अंतर्जाल पर हिन्दी लिखकर
हमने अपने ब्लॉग लेखक होने की छवि
अपनी ही आंखों में बनाई।
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Monday, September 8, 2014

नहीं होता अनुमान-हिन्दी कवितायें(nahin hota anuman-(poem;s in hindi on hindi diwas)



सभी चेहरों पर
लगा रंगबिरंगा नकाब है।

नहीं होता अनुमान
 कौन अच्छा देखने में
कौन खराब है।

कहें दीपक बापू पीने का मजा
ले रहे लोग हाथ में
लेकर ग्लास
नहीं होता अनुमान
शर्बत पीकर नाच रहे
या बहका रही शराब है।
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हमारे जिस्मे से
निकल गया पसीना
मगर अमीरों को मजा नहीं आया।

घी पीने में लग रहे वह
हमारी सूखी रोटी खाना भी
उनको रास न आया।

कहें दीपक बापू मजे में
हम जीते रहे
अपनी टुकड़ों टुकड़ों में बंटी जिंदगी
छिपाये अपने गम
मगर हमारी खुशी ने भी
उनकी आंखों को बहुत सताया।
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Tuesday, September 2, 2014

यथास्थितिवादी-हिन्दी व्यंग्य कविता(yathasthititiwadi-hindi satire poem)



कभी कॉफी की चुस्कियों के साथ
देश की स्थिति पर
वह चर्चा करते थे।

अब बार में शराब के जाम
उनकी बहस रोचक बनाते
जो खाली बैठे आहें भरते थे।

कहें दीपक बापू विद्वानों की सेना
भारतीय आकाश में चिंत्तन के साथ
विचरण करती है,
यथास्थिति से प्रसन्न होती
परिवर्तन की हवा के झौंके से
उनकी हर सांस डरती है,
उन लोगों ने जुटा ली
उपाधियां बड़े नाम वाली े
प्रतिष्ठा और प्रचार के लिये
दौलतमंदों और ऊंचे ओहदे वालों के
सम्मान में लिखते हुए
चाटुकारिता की घास चरते थे।
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Monday, August 25, 2014

आशिक की बंधुआ माशुका-हिन्दी व्यंग्य कविता(ashiq ki bandhua mashuqa-hindi satire poem)



इश्क के किस्से में
तब मोड़ आता है
जब उसकी चर्चा
चौराहे पर हो जाती है।

माशुका चलती आशिक की राह
तब तक ठीक रहता
मुश्किल होती जब
वह दोराहे पर खो जाती है।

कहें दीपक बापू इश्क में
परंपराओं के रास्ते बदलने का
ख्वाब देख रहे हैं नयी सोच वाले
शादी के पुरानी प्रथा से जुड़कर,
हमेश बंधन में रहे माशुका आशिक के
देखे न पीछे मुड़कर,
इस सच से मुंह छिपाते
हर माशुका आखिर
आशिक की बंधुआ हो जाती है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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