Wednesday, June 24, 2009

वैश्विक काल में हिंदी भाषा का सृजन-आलेख (future of hindi in the world-hindi lekh)

वह बहस बहुत अच्छी थी। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के सृजन को किसी लेखक ने-उसका नाम इस लेखक ने उसी ब्लाग के पाठ में पढ़ा हालांकि बताया जा रहा था कि वह कोई प्रसिद्ध हिंदी आलोचक हैं-ने दो कौड़ी का बता दिया। विद्वान टिप्पणीकारों ने उस पर तमाम टिप्पणियां लिखी। कुछ अप्रवासी हिंदी लेखक उनके बयान से दुःखी थे। हां, उस पाठ में जिस आलोचक का नाम था उसके बारे में पहली इस लेखक ने सुना पर टिप्पणीकर्ताओं का नाम वह जानता है। इस लेखक के मध्यप्रदेश के ही एक प्रसिद्ध ब्लाग लेखक ने भी टिप्पणी लिख कर उस जोरदार बहस पर हैरानी जाहिर की। आशय यह है कि हमारे प्रदेश पाठक और लेखक के इस तरह की साहित्यक बहसों से घबड़ाते हैं जिसमें कहानी, कवितायें या अन्य साहित्यक विद्या की खास रचना की बजाय भाषा के लिखने पर बहस हो रही हो। एक दूसरी भी मुश्किल है कि अंतर्जाल पर अन्य प्रदेशों के ब्लाग लेखक कई ऐसी प्रसिद्ध साहित्य हस्तियों का नाम बताते हैं जिनका नाम तक इस प्रदेश में पैदा लोग नहीं जानते।

बहरहाल उस आलोचक महाशय के अनुसार विदेश में रह रहे लेखक बस अपने को पत्रकार या लेखक साबित करने के लिये लिखते हैं वरना उनका लिखा दो कौड़ी का है। बात इस लेखक के सिर के ऊपर से निकल गयी। पहली बात तो किसी का लिखा दो कौड़ी का नहीं होता। अगर कोई मूर्धन्य साहित्यकार भी आकर हमसे कहे कि अमुक आदमी ने दो कौड़ी का लिखा है तो हम उनकी साहित्यक रचनाओ की चिंदियां उनको दिखा सकते हैं कि वह इससे बेहतर हैं।
दूसरा सवाल यह है कि विदेश में रह रहे अप्रवासी भारतीय अपने आपको लेखक या पत्रकार साबित करने का प्रयास कर रहे हैं तो उसमें बुराई क्या है? आखिर आदमी लिखता क्यों है? अपनी बात दूसरे से कहने के लिये? दूसरा पढ़कर उसे लेखक मान ही लेता है। हिंदी में वह हर रचना साहित्य है जो सामाजिक और रचनात्मक सरोकारों से जोड़कर लिखी गयी है। इस लेखक के इस पाठ को कुछ लोग साहित्यक न माने पर यह प्रमाणपत्र देने वाले वह कौन? यह पाठ किसी को पत्र बनाकर नहीं लिखा जा रहा है। बल्कि इसे हिंदी भाषा से सरोकार रखने वाले विषय पर लिखा गया है। स्पष्टतः इससे कोई न कोई सामाजिक तथा रचनात्मक सरोकार जुड़ा है।
हिंदी में स्तरीय और गैरस्तरीय लेखन की बहुत चर्चा होती है। कई ऐसे सेमीनार होते हैं जिनमें शामिल होकर ऐसा लगता है कि हम कहां आकर फंसे। इससे अच्छा तो कोई घर पर बैठकर एक दो हास्य कविता लिखकर ही जी हल्का कर लेते। यह बात तय है कि हम अपने आपको एक लेखक और साहित्यकार ही समझते हैं और लगता नहीं कि इसके लिये किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता है।
सच बात तो यह है कि हम जिसे गैर स्तरीय साहित्य कहते हैं वह बाजार में हर जगह मिलता है और पाठक भी उसके बहुत हैं। अपराध और यौन से संबंधित साहित्य की बाजार में बिक्री बहुत है पर हममें से कई लेखक उसे गैरस्तरीय कहकर हिकारत से देखते हैं पर सच यह भी है कि कई इनको पढ़ते हुए ही लिखने के लिये प्रेरित हुए। हालांकि यह भी सच है कि लोग वाकई स्तरीय विषय पढ़ना चाहते हैं पर बाजार की समस्या यह है कि वह लेखक को लिपिक की तरह बनाये रखना चाहता है। इससे उसकी मौलिकता और स्वतंत्रता नष्ट होती है। यही कारण है कि हिंदी में बेहतर साहित्य प्रकाशित नहीं हो पाता-लिखा नहीं जाता यह कहना गलत है।
वैसे ही दूसरे की रचनाओं पर टीका टिप्पणियां करने वालों का लेखन कैसा है यह अलग से बहस का विषय है। अगर आप देखें तो हमारे यहां अनेक हास्य कवियों ने करोड़ो रुपये कमा लिये पर क्या उनकी रचनाओं में कहीं कोई सामाजिक संदेश है? हिंदी फिल्मों के कामेडियनों की तरह अदायें करते हुए अनेक कवि लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गये। अगर आप कथित रूप से स्तरीय पढ़ने वाले हैं तो क्या आप उसे साहित्य मानते हैं। शायद आप कहेंगे ‘नहीं’ पर वही कवि अगर आपके सामने आ जाये या अंतर्जाल पर टिप्पणी लिख दे तो अपने आपको धन्य कहने लगेंगे।

इधर अनेक लेखकों के चेले चपाटे अंतर्जाल पर सक्रिय हुए हैं और वह उनके कथित साक्षात्कार इस उद्देश्य से प्रकाशित करते हैं कि उनके प्रदेश या शहर से अधिक से अधिक टिप्पणियां आ जायेंगी। यह बुरा भी नहीं है पर जब अंतर्जाल पर लिखने वाले हिंदी लेखकों पर कटाक्ष होता है तब यह बताना पड़ता है कि यह अंतर्जाल पर लिखना कोई आसान काम नहीं है। बहुत कटु पर सत्य है कि एक लंबे अर्से से हिंदी के आकाश पर कोई ऐसा लेखक पैदा ही नहीं हुआ जो सदाबहार रचनायें दे सके। सभी ने बाजार और राज्य के तय ढांचे में ही अपनी रचनायें कर धन, पद और सम्मान पाया मगर हिंदी भाषा को समृद्ध करने वाले कितने लेखक हैं यह हम सभी जानते हैं।
आज के जो भी कथित बड़े लेखक हैं वह अंतर्जाल को न तो पढ़ते हैं न उनकी रुचि है। कंप्यूटर पर लिखना या पढ़ना कोई मुश्किल काम नहीं है पर इससे दूर रहकर अगर अपनी यथास्थिति रहती है तो इसे कौन सीखना चाहेगा? इस लेखक का तो हमेशा यही कहना है कि हां, हम तो लेखक कहलाने ही यहां आये हैं। क्या करें? हर जगह ढांचे और खांचे बने हुऐ हैं जिसमें हमारा लिखा फिट होगा या नहीं इस बात से अधिक इस बात का महत्व है कि हमारा व्यवहार-जिसमें चाटुकारिता, चंदा और चतुराई शामिल है-उनके अनुकूल है कि नहीं।
यहां प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अपने ऊपर छोड़े जा रहे व्यंग्यबाणों की इसलिये परवाह नहीं करते क्योंकि हमें अपने लेखक होने पर कोई संदेह नहीं है। साहित्य की हर विद्या पर लिखा-अच्छा या बुरा यह संकट पाठकों का है-और यह साबित करने का प्रयास किया कि ब्लाग भी पत्रिका की तरह उपयोग में लाया जा सकता है। यहां हमने पढ़ा भी और पाया कि समाज के आम लोगों के विचारों का जो प्रतिबिंब यहां दिखाई देता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अंतर्जाल पर लेखक टाईप स्वयं करते हैं इससे उनको छोटा समझना अपने आप में बेवकूफी है। अभी तक अनेक बड़े लेखक और पत्रकार यही मानते हैं कि टाईप करने का काम लिपिकीय है। इसके विपरीत यह लेखक तो दूसरी बात ही कहता है कि बेहतर लेखक वही है जो स्वयं एक बैठक में टाईप कर अंतर्जाल पर प्रस्तुत करता है। अधिकतर अंग्रेजी लेखक सीधे टाईप कर रचनायें लिखते रहे हैं-यह जानकारी पत्र पत्रिकाओं से मिलती रही है। हिंदी के कथित बड़े लेखक आत्ममुग्धता की स्थिति से उबर नही पाये और उन्हें यह सुनकर निराशा होगी कि हिंदी का असली लेखक तो अब हिंदी के वैश्विक काल की शुरुआत कर चुका है-उनका आधुनिक काल अब बीते समय की बात हो गया है। उनकी कहानियां और कवितायें अब अप्रासंगिक होने जा रही है। ऐसे में अंतर्जाल पर लिखने वाले लेखकों को यही सलाह है कि वह कुंठा छोड़कर अपनी रचनायें करें। यह अप्रवासी और प्रवासी हिंदी लेखक की चर्चा भी इसलिये भी करनी पड़ी क्योंकि अभी लोगों के मन में है पर अगर हम इस हिंदी के नवीन वैश्विक काल की बात करें तो वह अप्रासंगिक है क्योंकि आपने हिंदी में लिखा तो यह इस बात की पूरी संभावना है कि वह किसी अन्य भाषा में टूलों से स्वाभाविक रूप से अनुवाद कर पढ़ा जायेगा और इसके लिये मानवीय अनुवादक की जरूरत नहीं है। ऐसे में कुछ लेखक आगे इस तरह का प्रयास करेंगे कि वह जब भारतीय संदर्भ में अपनी रचना लिखें तो वह विश्व के डेढ़ सौ देशों के लोगों की समझ में आये। उनकी यह सोच निश्चित रूप से हिंदी को एतिहासिक रचनायें देगी। शेष फिर कभी।
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Monday, June 22, 2009

असमंजित समाज-त्रिपदम (hindi tripadam)

बड़े हादसे
प्रचार पा जाते हैं
बिना दाम के।

चमकते हैं
नकलची सितारे
बिना काम के।

कायरता में
ढूंढ रहे सुरक्षा
योद्धा काम के।

असलियत
छिपाते वार करें
छद्म नाम से।

भ्रष्टाचार
सम्मान पाता है
सीना तान के।

झूठी माया से
नकली मुद्रा भारी
खड़ी शान से ।

चाटुकारिता
सजती है गद्य में
तामझाम से।

असमंजित
पूरा ही समाज है
बिना ज्ञान के।

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Saturday, June 20, 2009

क्रिकेट प्रतियोगिता में हार का मनोविज्ञान और आर्थिक रूप से प्रभाव-आलेख (hindi editorial)

बीसीसीआई की क्रिकेट टीम बीस ओवरीय एक दिवसीय प्रतियोगिता में हार गयी और अब पता लगा कि उसमें पांच खिलाड़ी अनफिट थे। टीम जिस तरह अपने मैच खेल रही थी उससे लग तो नहीं रहा था कि वह कप जीत पायेगी पर इस कदर पिटेगी यह आभास भी नहीं था। इससे पहले एक क्लब स्तर की प्रतियोगिता हुई थी। उसमें बीसीसीआई के यह सभी खिलाड़ी बड़े शहरों के नाम पर बनी टीमों के लिये खेले।

कहने वाले तो शुरुआती दौर में ही कह रहे थे कि खिलाड़ी थक गये होंगे इसलिये शायद उनका प्रदर्शन प्रभावित होगा। हुआ भी यही पर इस दलील का विरोध करने वाले कहते हैं कि अन्य देशों के खिलाड़ी भी तो इसमें खेले थे फिर उनका प्रदर्शन प्रभावित क्यों नहीं हुआ? यानि हर तरह से इस हार को स्वाभाविक बताने का प्रयास किया जा रहा है। क्रिकेट अनिश्चताओं का खेल है पर इस आड़ में ऐसी हार के कारण छिप नहीं सकते। हारना एक अलग बात है और खराब खेलना अलग। यहां मुद्दा यह नहीं है कि बीसीसीआई की टीम बीस ओवरीय प्रतियोगता में हारी बल्कि उसका प्रदर्शन इतना खराब रहा कि लोग को रहे हैं कि भारत के किसी भी शहर से कोई टीम उठाकर भेज देते तो वह भी इनसे अच्छा खेलते। नये होने के कारण वह उत्साह से खेलते तो पता लगता कि बीस ओवरीय प्रतियोगता का विश्व कप ही जीत लाये। भारत में खिलाड़ियों की कमी नहीं है। फिर बीस ओवरीय प्रतियोगता तो ऐसी है जिसमें अनुभव वगैरह की तो जरूरत ही नहीं है-इसे तो केवल मनोबल के आधार पर ही जीता जा सकता है।
एक पुराने खिलाड़ी ने बढ़िया टिप्पणी की। उसने कहा कि हम भारतीयों में पैसा पचाने की क्षमता बहुत कम हैं। वर्तमान भारतीय खिलाड़ी इतना पैसा कमा चुके हैं कि वह फिर भूल गये कि वह इसी खेल की दम पर हैं।
वह खिलाड़ी चूंकि पेशवर है इसलिये अन्य सच नहीं कह पाया। जिन खिलाड़ियों को बीस ओवरीय मैचों का स्टार माना जाता था वह इस तरह खेले जैसे कि पचास ओवरों वाला मैच खेल रहे हैं। कहने को तो सभी कह रहे हैं कि हम चुस्त दुरस्त थे और क्लब स्तर की प्रतियोगिता में खेलने की वजह से हमारा खेल प्रभावित नहीं हुआ। दरअसल यह उसी क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के दोबारा आयोजन में बाधा न पड़े इसलिये ही कहा जा रहा है। फिर वह उसी प्रतियोगिता में अपनी सदस्यता बनाये रखना चाह रहे हैं। यह खिलाड़ी सभी तरह की गेंदें खेलने में माहिर हैं चाहे शार्टपिच हो या स्पिन पर अब बिचारे शार्टपिच गेंदों का तोड़ ढूंढ रहे हैं। सच बात तो यह है कि चाहे खेल कोई भी हो अगर खिलाड़ी का मन नहीं है तो विपक्षी के दांव पैंच उसके लिये पहाड़ हो जाते हैं। भारतीय खिलाड़ी इतना पैसा कमा चुके थे कि अब उनको अपने परिवारों के लिये समय चाहिये था। इंकार इसलिये नहीं कर सकते थे कि कहीं उनकी जगह शामिल नया खिलाड़ी उसमें छा गया तो इससे भी जायेंगे। खेलना है इसलिये खेले। कह सकते हैं कि हाजिरी देने के लिये खेले। जीतने की खुशी या हारने के गम से परे होकर वह निर्विकार भाव से खेलते दिख रहे थे। मगर यह कोई उच्च स्थिति नहीं थी बल्कि उनके चेहरे पर खेलने की बाध्यता के भाव भी थे जो इस बात को दर्शा रहे थे कि वह न खुश हैं न उत्साहित बल्कि टालू खेल दिखा रहे हैं।
अन्य देशों के खिलाड़ी क्लब स्तर में खेलने के बावजूद यहां भी खेले तो इसलिये कि उनको इतना पैसा नहीं मिलता जितना भारत के खिलाड़ियों को मिलता है। भारतीय खिलाड़ी विज्ञापनों और रैम्पों पर इतना पैसा कमा चुके हैं कि उनका बोझ उठाना अब संभव नहीं था। वह खेल की थकवाट से नहीं बल्कि अपनी आर्थिक परिलब्धियेां का उपयोग न कर पाने की गम का बोझ उठाये हुए थे। सच कहें तो ऐसा लगता है कि इस विश्व में शायद उनके लिये मिलने वाली धनराशि इतनी उपयोगी नहीं थी जितनी क्लब स्तर की प्रतियोगिता से मिली होगी। अन्य देशों के खिलाड़ियों के लिये यह रकम भी बहुत बड़ी होगी इसलिये खेल रहे हैं।
क्रिकेट से देश के लोगों ने अपने जज्बात ख्वामख्वाह जोड़ रखे हैं पर उसके लिये यहां कोई जवाबदेह नहीं है। हार गये तो क्या कर लोगे? हां, लोगों का गुस्सा कम करने के लिये तमाम तरह की सफाई दी जा रही है वह इसलिये कि कहीं वह लोग फिर विरक्त न हो जायें और क्रिकेट का व्यापार कहीं ठप न हो जाये।
अगर खिलाड़ी अनफिट हैं तो फिर अभी बाहर जाने वाली टीम के के लिये उनको कैसे चुन लिया गया। वही कप्तान वही खिलाड़ी!
प्रबंधन के मामले में हमारा देश अप्रतिभाशाली माना जाता है। यह हमारी कमजोरी है। कोई नया बदलाव कहीं करना ही नहीं चाहता। दरअसल क्रिकेट अब बाजार का खेल है-कम से कम भारत में तो यही लगता है। खिलाड़ियों ने विज्ञापन कर रखे होते हैं जो ऐसी प्रतियोगिताओं में समय अधिक दिखाई देते हैं। इसलिये उसमें अभिनय करने वाले खिलाड़ियों का होना जरूरी है अतः अप्रत्यक्ष रूप से कहीं न कहीं यह बात भी देखी जाती है कि बाजार का ध्यान अधिक रखा जाता है फोकटिया दर्शक का कम। एक खिलाड़ी इस टीम में शामिल नहीं हुआ तो वह दर्शक दीर्घा में अन्य खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने पहुंच गया। दरअसल उसके विज्ञापन भी दिख रहे थे और वह यकीनन उनकी वजह से ही अपनी सूरत दिखाने वहां पहुंचा होगा ताकि विज्ञापन दाता उससे खुश रहें। टीवी कैमरा हर मैच में उसका चेहरा अनेक बार दिखाता था। कितनी अच्छी बात लगती है यह बात सुनकर कि इतना बड़ा खिलाड़ी मनोबल बढ़ाने पहुंचा मगर इसके पीछे का सच कौन पढ़ पाता है। यह सब बुरा नहीं है क्योंकि सभी को कमाने का हक है पर आम लोगों को यही सच समझते हुए यह देखना चाहिये। क्रिकेट टीम का खेलना एक व्यवसाय है और उसे बाजार प्रभावित कर सकता है-इससे मान लेना चाहिये। किसी को क्या दोष देना? क्रिकेट वालों को पूरा पैसा मिल रहा है टीम हारे या जीते-तब उनसे यह आशा करना बेकार है कि वह नये और तरोताजा खिलाड़ी भेजकर प्रतियोगिता जीतने का प्रयास कर अपने प्रबंध कौशल का प्रमाण दें। अपने देश में पैसा कमाना महत्वपूर्ण है कि प्रबंध कौशल!
सो टीम हार गयी तो कोई बात नहीं। जिस कप्तान को सिर पर उठाये रखा है उसने कहा है कि कुछ महीने बाद फिर प्रतियोगिता है। उसमें दमखम दिखायेंगे। वहां यह आश्वासन देना ठीक है क्योंकि अगली बार तक लोग इंतजार कर अपना पैसा खर्च कर सकते हैं।
पिछली बीस ओवरीय प्रतियोगिता बीसीसीआई की टीम ने जीती थी। उससे पहले विश्व में हारने की वजह से पूरी टीम की जो किरकिरी हुई वह लोग भूल गये। बीस ओवरीय प्रतियोगिता में बीसीसीआई टीम की पिछली जीत की दो वजहें थी एक तो दूसरी टीमें गंभीरता से नहीं खेली दूसरा भारतीयों पर जीत का कोई दबाव नहीं था। कुछ लोग तो उस समय मान रहे थे कि इस आड़ में भारत में क्रिकेट को दोबारा प्रतिष्ठा दिलाने का योजनाबद्ध प्रयास किया गया है। यह योजना वैसे ही सफल हुई जैसे कि 1983 में एक दिवसीय विश्व क्रिकेट कप में बीसीसीआई की टीम के जीतने पर क्रिकेट का वह प्रारूप भारत में लोकप्रिय हो गया। मतलब पच्चीस साल तक बाजार उस जीत को भुनाता रहा। अब हमारे लिये यह देखने का विषय है कि पिछली बीस ओवरीय प्रतियोगता की जीत को बाजार कब तक भुनाता रहेगा। इस बात तो टीम पिट गयी इसलिये निश्चित रूप से क्रिकेट के इस व्यापर पर बुरा प्रभाव पड़ेगा-चाहे वह एक नंबर को हो या दो नंबर का। देखना है कि इस हार का मनौवैज्ञानिक और आर्थिक रूप से बाजार पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
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Friday, June 19, 2009

हारने पर चौगुना इनाम-हिन्दी हास्य व्यंग्य (harne par inam-a hindi stire)

आठवीं कक्षा ‘अ’ के छात्रों को उनके शिक्षक ने बताया कि उनका उसी विद्यालय की आठवीं की अन्य कक्षा ‘ब’ से एक दस ओवरीय मैच होगा और जीतने वाली टीम के सभी सदस्यों को प्लास्टिक का चीन में निर्मित एक खिलौना, पेन, और कापी के साथ एक स्टील का कप भी मिलेगा।
एक छात्र ने पूछ लिया कि ‘सर, आप हमें जीतने वाला नहीं हारने वाला इनाम बताईये। हमने सुना है कभी कभी हारने वाले को अधिक पुरस्कार मिलता है।’
शिक्षक ने समझा कि वह मजाक कर रहा है इसलिये कह दिया कि-‘कप को छोड़कर बाकी सब चौगुना मिलेगा।’
अगले दिन मैच हुआ और ‘अ’ वाले हार गये। जीतने वाली टीम को सभी के सामने बकायदा इनाम से नवाजा गया। पुरस्कार बांटे जाते समय हारने वाले छात्र भी तालियां बजा रहे थे। यह देखकर सातवीं कक्षा के एक छात्र-जो हारी टीम के सदस्यों के ठीक पीछे ही खड़ा हुआ था- को गुस्सा आ गया पर उसने प्रेम से बोलना सिखाने वाली एक गोली खाकर हारी हुई टीम के खिलाड़ी से कहा-‘तुम लोगों को शर्म नहीं आती। एक तो हार गये फिर जीतने वालों को पुरस्कार मिलने पर तालियां बजा रहे हो।’
उस मासूम परास्त योद्धा ने कहना चाहा-‘जीतने वाले से चौगुना.....’’
इससे पहले ही उसके साथी खिलाड़ी ने उसे कुहनी मारते हुए कहा-‘‘चुप! अपनी असलियत सभी को मत बता। यह अंदर की बात है। ऐसे तो तुम कभी तरक्की नहीं कर पाओगे।’’
परास्त योद्धा की बात पूरी नहीं हो पायी। इनाम वितरण कार्यक्रम समाप्त हो गया। थोड़ी देर बाद परास्त टीम के छात्र अपना गुप्त इनाम लेने कक्षा शिक्षक के पास पहुंचे और बोले-‘सर, हम बड़ी ईमानदारी से हारे। किसी को हवा तक नहीं लगने दी कि हारने के लिये खेल रहे हैं। अब लाईये हमारा चौगुना इनाम!’
कक्षा शिक्षक की आंखें फटी रह गयी और वह बोले-‘पागल हो गये हो!’ हारने वाली टीम को भी भला कभी इनाम मिलता है। अगर इसी तरह खेलों में हारने वाले को भी पुरस्कार मिलने लगे तो जीतने के लिये खेलेगा कौन?’
एक छात्र ने मासूमियत से जवाब दिया-‘जिसे चौगुना इनाम नहीं मिलेगा। वह जरूर खेलेगा। हमारे बाबा क्रिकेट के पुराने और पापा नये प्रेमी हैं। उन्होंने बताया था कि एक मैच ऐसा भी हुआ था जिसमें दोनों टीमें हारना चाहती थीं क्योंकि तब हारने पर अधिक इनाम मिलना था।’
कक्षा शिक्षक ने उनको झिड़क दिया। यह सोचकर कि बच्चे इस तरह मान जायेंगे। मगर ऐसा हुआ नहीं। उनमें से कुछ बच्चे अगले दिन अपने पालकों को ले आये। पालकों ने आकर कक्षा शिक्षक को घेर लिया।
एक पालक ने कहा-‘‘मेरा लड़का तूफानी बालर है। उसकी गेंद के आगे कोई नहीं टिक सकता। कल उसने चौगुने इनाम की लालच में ढीली और धीमी गेंद डाली। अपनी भद्द पिटवायी। अब उसका इनाम दो नहीं तो तुम्हारी खैर नहीं।’
दूसरे पालक ने कहा-‘‘मेरा लड़का क्रिकेट की गेंद को ऐसा मारता है जैसे कि वह उसको फुटबाल दिख रही हो। कल दो रन बनाकर आउट हो गया। उसके मन में चौगुना इनाम पाने का सपना था। अब तुम चाहे जैसे भी उसका इनाम भरो।’
कक्षा शिक्षक की हवाईयां उड़ रही थी। मामला प्रिंसिपल तक जा पहुंचा। वह भी घबड़ा गये। एक बार तो उनके मन में आया कि चौगुना इनाम देकर अपने विद्यालय की लाज बचायें पर दूसरे शिक्षक ने उनको बताया कि उससे तो वह और बर्बाद हो जायेगी।
तब एक बूढ़ा चपरासी उनकी मदद को आगे आया। उसने हारने वाले छात्रों से जिरह की।
चपरासी ने पूछा-‘क्या तुमने कक्षा ‘ब’ के छात्रों से पहले इस बारे में चर्चा की थी ताकि वह भी हारने का प्रयास करें?’
छात्रों ने कहा-‘नहीं।’
चपरासी ने कहा-‘क्या तुममें से कोई अनफिट था जो मैदान में उतर गया हो।’
छात्रों ने कहा-‘नहीं।’
चपरासी ने फिर पूछा-‘तुममें से किसी ने लंगड़ाते हुए गेंद डाली। क्या कोई रनआउट या हिट विकेट हुआ? क्या किसी ने रनआउट या कैच का अवसर मिलने पर उसे छोड़ा? जिससे लगे कि तुम हारने के लिये खेल रहे हो!
छात्रों ने एक स्वर से कहा-‘नहीं! हम बहुत सफाई से हारे हैं।’
चपरासी ने कहा-‘एक भी तो सबूत तुम्हारे पास नहीं है। कैसे मान लिया जाये कि तुम हारने के लिये खेले? बेईमानी के भी कुछ उसूल होते हैं। तुम्हारे शिक्षक ने मजाक किया तो तुमने सच मान लिया। यह भी तो सोचो कि इस विद्यालय के लिये दोनों कक्षायें एक समान हैं इसलिये यह कैसे हो सकता है कि तुम्हारी कक्षा को तो यह बताया जाये कि हारने पर चौगुना इनाम मिलेगा पर दूसरी टीम के छात्रों को अंधेरे में रखा जाये। इसलिये अब भूल जाओ।’
पालकों के बात समझ में आ गयी। छात्र भी कोई सबूत छोड़ने में विफल रहे थे इसलिये चुप्पी साधने में ही अपनी भलाई समझी। सभी चले गये। कक्षा शिक्षक ने चैन की सांस ली और चपरासी ने कहा-‘बच गया।’
चपरासी ने कहा-‘महाशय बच कैसे गये। मेरा हिस्सा भी तो दो। हारने पर ग्यारह छात्रों को जो इनाम दिया जाना था वह क्या पूरा डकार जाओगे। मेरा कमीशन भी तो दो।’
कक्षा शिक्षक ने कहा-‘अरे यार, तुम भी बच्चों जैसे बातें करने लगे। अरे, भई यह तो प्रिंसिपल साहब जानते हैं कि ऐसा कोई इनाम नहीं दिया जाने वाला था। अगर मुझ पर विश्वास न हो तो उनसे जाकर पूछ लो।’
चपरासी ने कहा-‘अब क्या आपसे जिरह करूं! मुझे मालुम होता तो कभी उन लोगों से आपको नहीं बचाता। मैंने सोचा कि कुछ मिल जायेगा। अब सब माल आप और प्रिंसिपल साहब हड़पना चाहते हो तो अलग बात है।’

कक्षा शिक्षक अपने बाल नौचते हुए बोले-‘अरे, तुम क्या बात कर रहे हो? भला हारने पर भी किसी खेल में इनाम मिलता है?’
चपरासी कंधे उचकाते हुए बोला-‘मुझे नहीं पता? पर सुना तो है। इस दुनियां में सब चलता है साहब!’
चपरासी कुटिलता से कक्षा शिक्षक की तरफ देखता हुआ चला गया। कक्षा शिक्षक आकाश की तरफ देखते हुए बोला-‘हे, सर्वशक्तिमान! क्या ऐसा भी होता है?’
नोट यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है पर अगर किसी की कारिस्तानी इससे मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।
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Saturday, June 13, 2009

सामूहिक ठगी से उजागर बौद्धिक खोखलेपन का डरावना रूप-आलेख

एक के बाद एक सामूहिक ठगी की तीन वारदातें टीवी चैनलों और समाचार पत्रों की सुर्खियां बन गयी हैं। आप यह कहेंगे कि ठगी की हजारों वारदातें इस देश में ं होती हैं इसमें खास क्या है? याद रखिये यह सामूहिक ठगी की वारदातें हैं और कोई एक व्यक्ति को ठग कर भागने का मामला नहीं है। उन ठगों की आम ठग से तुलना करना उनका अपमान करना है। आम ठग अपनी ठगी के लिये बहुत बुद्धिमानी के साथ दूसरे के पास पहुंचकर ठगी करता है जबकि इन ठगों ने केवल दूसरों की मजबूरियों का फायदा उठाने के इरादे से विज्ञापन का जाल बिछाया बल्कि बाकायदा अपना एजेंट नियुक्त किये। शिकार खुद वह खुद उनके जाल में आया और वह भी उनके वातानुकूलित दफ्तरों में अपने पांव या वाहन पर चलकर।
यह एकल ठगी का मामला नहीं है। हर विषय पर अपना बौद्धिक ज्ञान बघारने वाले बुद्धिमान लोगों के लिये इसमें कुछ नहीं है जिस पर हायतौबा कर अपनी चर्चाओं को रंगीन बना सकें। इनमें समाजों का आपस द्वंद्व नहीं है बल्कि समाजों की छत्र छाया तले रहने वाले परिवारों और व्यक्तियों के अंतद्वंद्वों का वह दुष्परिणाम है जो कभी भी बुद्धिमान लोगों की दृष्टि के केंद्र बिंदु में नहीं आते। जो बुद्धिमान लोग इस पर ध्यान भी दे रहे हैं तो उनका ध्यान केवल घटना के कानूनी और व्यक्तिगत पक्ष पर केंद्रित है। आप सवाल पूछेंगे कि आखिर इसमें ऐसा क्या है जो कोई नहीं देख रहा?

जो लोग ठगे गये हैं वह केवल यही कह रहे हैं कि उन्होंने अपने पैसे अपनी बच्चियों की शादी के लिये रखे थे। यह सोचकर कि पैसा दुगुना या तिगुना हो जायेगा तो वह उनकी शादी अच्छी तरह कर सकेंगे। समाज पर चलती तमाम बहसों में दहेज प्रथा की चर्चा होती है पर उसकी वजह से समाज किस तरह टूट रहे हैं इस पर कोई दृष्टि नहीं डालता। पूरा भारतीय समाज अब अपना ध्यान केवल धनर्जान पर केंद्रित कर रहा है और अध्यात्मिक ज्ञान या सत्संग उसके लिये वैसे ही जैसे मनोरंजन प्राप्त करना। पैसा दूना या चैगुना होना चाहिए। किसलिये चाहिये? बेटे की उच्च शिक्षा और बेटी की अच्छी शादी करने के लिये। सारा समाज इसी पर केंद्रित हो गया है। आखिर आदमी ऐसा क्यों चाहता है? केवल इसलिये कि समाज में वह सीना तानकर वह सके कि उसने अपने सांसरिक कर्तव्यों को पूरा कर लिया और वह एक जिम्मेदारी आदमी है।
कुछ लोगों के बच्चे संस्कार, भाग्य, परिश्रम या किसी दूसरे की सहायता उच्च स्थान पर पहुंच जाते हैं तो उनके विवाह कार्यक्रम भी बहुत आकर्षक ढंग से संपन्न होते हैं जो किसी भी भारतीय नर नारी का बरसों से संजोया एक सपना होता है’-इसी सपने को पूरा करने के लिये वह जिंदगी गुजारते हैं।
जिनके बच्चे शैक्षिक और बौद्धिक क्षमता की दृष्टि से औसत स्तर के हैं उनके लिये यह समस्या गंभीर हो जाती है कि वह किस तरह उनके लिये भविष्य बनायें ताकि वह स्वयं को समाज में एक ‘जिम्मेदार व्यक्ति’ साबित कर सकें। इसके लिये चाहिए धन। आम मध्यम वर्गीय परिवार के लिये यह एक बहुत बड़ी समस्या है। अगर हम उसके जीवन का आर्थिक चक्र देखें तो वह हमेशा ही बाजार के दामों में पिछड़ता है। जब प्लाट की कीमत डेढ़ सौ रुपया फुट थी तब वह पचास खर्च कर सकता था। जब वह डेढ़ सौ खर्च करने लायक हुआ तो प्लाट की कीमत तीन सौ रुपया प्रति फुट हो गयी। जब वह तीन सौ रुपये लायक हुआ तो वह पांच सौ रुपया हो गयी। जब वह पांच सौ रुपया लायक हुआ तो पता लगा कि डेढ़ हजार रुपये प्रतिफुट हो गयी।
इस चक्र में पिछड़ता आम मध्यम और निम्न वर्ग दोगुना और चैगुना धन की लालच में भटक ही जाता है। आज के आधुनिक ठग ऐसे तो हैं नहीं कि बाजार या घर में मिलते हों जो उन पर विश्वास न किया जाये। उनके तो बकायदा वातानुकूलित दफ्तर हैं। उनके ऐजेंट हैं। एकाध बार वह धन दोगुना भी कर देते हैं ताकि लोगों का विश्वास बना रहे। ऐसे में उनका शिकार बने लोग दो तरफ से संकट बुलाते हैं। पहला तो उनकी पूरी पूंजी चली जाती है दूसरा परिवार के सभी सदस्यों का मनोबल गिर जाता है जिससे संकट अधिक बढ़ता है। बहरहाल नारी स्वातंत्र्य समर्थकों के लिये इस घटना में भले ही अधिक कुछ नहीं है पर जो लोग वाकई छोटे शहरों में बैठकर समाज को पास से देखते हैं उन्हें इन घटनाओं के समाज पर दूरगामी परिणाम दिखाई देते हैं जो अंततः नारियों को सर्वाधिक कष्ट में डालते हैं।

कन्या भ्रुण की हत्या रोकने के लिये कितने समय से प्रयास चल रहा है पर समाज विशेषज्ञ लगातार बता रहे हैं कि यह दौर अभी बंद नहीं हुआ। हालांकि अनेक लोग उन माताओं की ममता को भी दोष देते हैं जो कन्या भ्रुण हत्या के लिये तैयार हो जाती हैं पर कोई इसको नहीं मानते। शायद वह मातायें यह अनुभव करती हैं कि अगर वह लड़की पैदा हो गयी तो उसके प्रति ममता जाग्रत हो जायेगी फिर पता नहीं उसके जन्म के बाद उसके विवाह तक का दायित्व उसका पति और वह स्वयं निभा पायेंगी कि नहीं। इसमें हम समाज का दोष नहीं देखते। इतने सारे सामाजिक आंदोलन होते हैं पर बुद्धिजीवी इस दहेज प्रथा को रोकने और शादी को सादगी से करने का कोई आंदोलन नहीं चला सके। उल्टे शादी समारोहों के आकर्षण को अपनी रचनाओं में प्रकाशित करते हैं।
समस्या केवल ठगी के शिकार लोगों की नहीं है बल्कि इन ठगों की भी है। इन ठगों के अनुसार उन्होंने अपना पैसा शेयर बाजार और सट्टे में-पक्का तो पता नहीं है पर जरूर सट्टा क्रिकेट से जुड़ा हो सकता है क्योंकि आजकल के आधुनिक लोग उसी पर ही दांव खेलते हैं-लगाया होगा। अधिकतर टीवी चैनलों और अखबारों में सट्टे से बर्बाद होने वाले लोगों की खबरें आती है पर उसका स्त्रोत छिपाया जाता है ताकि लोग कहीं उसे शक से न देखने लगें। वैसे हमने यह देखा है कि सट्टा खेलने वाले-खिलाने वाले नहीं- ठगने में उस्ताद होते हैं। सच तो यह है कि वह दया के पात्र ही हैं क्योंकि वह मनुष्य होते हुए भी कीड़े मकौड़े जैसे जीवन गुजारते हैं। वह तो बस पैसा देखते हैं। किसी से लूटकर या ठगकर अपने पास रखें तो भी उन पर क्रोध करें मगर वह तो उनको कोई अन्य व्यक्ति ठगकर ले जाता है। ऐसे लोग गैरों को क्या अपनों को ही नहीं छोड़ते। बाकी की तो छोड़िये अपनी बीवी को बख्श दें तो भी उसे थोड़ा बुद्धिमान ठग मानकर उस पर क्रोध किया जा सकता है।

कई तो ऐसे सट्टा लगाने वाले हैं जो लाखों की बात करते हैं पर जेब में कौड़ी नहीं होती। अगर आ जाये तो पहुंच जाते हैं दांव लगाने।
मुख्य बात यही है कि क्रिकेट के सट्टे का समाज पर बहुत विपरीत प्रभाव है पर कितने बुद्धिमान इसे देख पा रहे हैं? इससे देश की अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव भले ही नहीं पड़ता हो पर इतने व्यक्तियों और परिवारों ने तबाही को गले लगाया है कि उनकी अनदेखी करना अपने आप में मूर्खता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ठगी की इन घटनाओं के कानूनी पक्ष के अलावा कुछ ऐसे भी विषय हैं जो समाज पर बुरा प्रभाव डाल रहे हैं पर कितने बुद्धिजीवी इस पर लिख या सोच पाते हैं इस आलेख को पढ़ने वाले इस पर दृष्टिपात अवश्य करें। हालांकि यह भी बुरा होगा क्योंकि तब उनको जो इस देश मेें बौद्धिक खोखलापन दिखाई देगा वह भी कम डरावना नहीं होगा। यह बौद्धिक खोखलापन ठग के साथ उनके शिकार पर ही बल्कि इन घटनाओं पर विचार करने वालों में साफ दिखाई देगा।
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Friday, June 5, 2009

वफा और भरोसे की कद्र कौन करेगा-हिंदी शायरी (vafa aur bharose ki kadra-hindi shayri)


सभी इंसान
वादा कर निभाने लगे
तो भरोसे की कद्र कौन करेगा।
सभी साथ निभाने लगे
तो वफा की कद्र कौन करेगा।
सभी मुस्करायेंगे खुशियों में
तो गमों के गीतों में लफ्ज कौन भरेगा।
दुनियां में फरिश्तों की बसती होने का
एक ख्वाब है
अगर सच हो गया
तो सर्वशक्तिमान की इबातद कौन करेगा।
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भरोसा और वफा
बाजार में दाम देकर मिल जाती है
हर इंसान सौदागर है यहां
सच कहने में शर्म क्यों आती है।
खरीदता है कोई
तो वफा और भरोसे के साथ बिक जाना
पर जब खरीददार होकर
जाओ बाजार
वफा और भरोसे समेत
इंसान मिल जायेगा
यह उम्मीद छोड़कर जाना
अपने अंदर ही ईमान हो
उस पर जरूर यकीन करना
पर दूसरे के दिल की नीयत
दिख जाये सामने
ऐसी तरकीब कहीं नहीं मिल पाती है।

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Thursday, June 4, 2009

समाज का वैचारिक रूप से असमंजस में रहना ठीक नहीं-आलेख

एक नहीं ऐसी सौ घटनायें भी हों तो उसे पूरे समाज से जोड़ना अज्ञान और संकीर्ण मानसिकता का प्रमाण होगी। एक लड़की के द्वारा अपने प्रेमी से मिलकर मां की हत्या की वह घटना अगर दिल्ली में नहीं होती तो शायद इतना चर्चा का विषय नहीं बनती। ऐसी अनेक घटनायें हो चुकी हैं जिनकी चर्चा अनेक बार अखबारों में छप चुकी है। वैसे भी यह देश इतना विविधताओं से भरा पड़ा है कि किसी एक घटना को पूरे समाज से देखना अपने आप में संकीर्णता का परिचायक है। हमारे देश के बड़े शहरों और छोटे शहरों के समाजों में बहुत बड़ा अंतर है पर खबरें देने और उनके विश्लेषण करने वाले हमेशा बड़े शहरों को लेकर ही बहस करते हैं शायद इसलिये ही छोटे शहरों की खबरें उनके लिये चर्चा का विषय नहीं बनती।
एक समय कहा जाता था कि भारत का असली समाज तो गांवों में बसता है और इस बात ने समाज विज्ञानियों को इतना बेफिक्र कर दिया कि वह छोटे शहरों, गांवों और कसबों के समाज की आम गतिविधियों के सहारे अपनी संस्कृति और संस्कार बचने की चिंता से मुक्त होकर केवल बड़े शहरों के विषयों पर बहस करते रहे और उन्हें शायद इस बात का आभास नहीं है कि पाश्चात्य सुविधाओं के उपयोग तथा संचार माध्यमों की पहुंच ने भारतीय संस्कृति की जड़े पूरी तरह से खोद दी हैं। यहां यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि अंदर से खोखले होते जा रहे समाज मेें बेटी द्वारा अपने प्रेमी से मिलकर अपने ही परिवार पर आक्रमण करने की घटना भले ही पूरे देश के समूचे लोगों से जोड़ना ठीक नहीं हो पर उसे अब एक सहज अपराध माने लगा है जो कि एक चिंता का विषय है।
आखिर मुश्किल कहां है? समाज को पूरी तरह खुला रखना है या शर्तों पर उसे आजादी देना है-यह बात देश के विद्वान अभी तक तय नहीं कर पाये। एक तरफ उनको अपनी संस्कृति और संस्कार को अक्षुण्ण बनाये रखने की चिंता होती है और दूसरी तरफ औरतों की आजादी पश्चिम के समक्ष बनाये रखने का अभियान भी जारी रखना चाहते हैं। उनका यही असमंजस समाज का संकट बन रहा है। समाज में माता पिता अपनी बेटियों को आजाद दिखाकर अपने को आधुनिक तो साबित करना चाहते हैं पर उसके साथ ऊंच नीच होने पर बदनामी का कथित भय भी उनको सताता है। उनका यह असमंजस अनेक घरों में हिंसक परिणति का रूप लेता है-इससे अधिक संख्या उन घरों की है जहां मामला दबा रहता है या फिर समय के साथ ठंडा पड़ जाता है।
दहेज प्रथा का प्रकोप उससे अधिक है जितना दिखाई देता है। सभ्रांत समाज केवल दहेज ले-देकर संतुष्ट नहीं होता बल्कि वह विवाह कार्यक्रम का उपयोग अपनी शक्ति दिखाने के लिये अधिक व्यय के साथ करता है। शादियों में शराब पीना अब शान हो गयी है जोकि कभी नफरत का प्रतीक थी। इस देश में कई ऐसे लोग अब भी मिल जायेंगे जिन्होंने केवल फिल्म की आदत होने पर किसी लड़के को लड़की के अयोग्य मान लेने की प्रवृत्ति समाज में देखी होगी। शराबी के बेटे-बेटी के साथ भी लोग रिश्ता नहीं करना चाहते थे।
मगर अब क्या हुआ? हमारा जो वर्तमान समाज है उसके नियम निर्माताओं पर औरत को गुलाम बनाये रखने का आरोप लगता है। हो सकता है यह सही हो पर सच बात तो यह है कि उनकी नीयत औरत को गुलाम बनाये रखने की बजाय उसको दैहिक और आर्थिक रूप से सुरक्षित रखने की थी। समय के साथ ऐसा लगता हो कि वह संकीर्ण विचारों के जनक हों पर उस पर बहस किये बिना केवल नारों के आधार पर ही उन्हें गलत नहीं ठहराया जा सकता है।
कुछ पुराने विद्वान यह कहते हैं कि ‘बेटी की कमाई नहीं खाना चाहिए।’
वर्तमान में अनेक लोग इस दकियानूसी विचार कहेंगे मगर ऐसे लोगों ने इस समाज की प्रवृत्ति को नहीं समझा। लड़कियां नौकरियां करती हैं। अनेक लड़के भी नौकरीशुदा लड़कियां जीवनसंगिनी के रूप में चाहते हैं। कितनी सुखद कल्पना लगती है न देश की! मगर ऐसी अनेक लड़कियां हैं जिनको ससुराल में विवाह के बाद केवल इस आधार पर प्रताड़ना मिलती है कि विवाह के पूर्व उन्होंने जो कमाया वह कहां गया?
उस समय लड़की को यह कहकर सास, ननद, और पति ताने देते हैं कि ‘इसका बाप कन्या की कमाई खा गया।’
ऐसा कहने वाली सास या ननद अगर अनपढ़ हो तो मान लें कि ठीक है पर अगर वह पढ़ी लिख हो तो क्या कहेंगे?
आजकल सभ्रांत वर्ग ऐसी जगह बेटियों की शादी करना चाहता है जहां काम करने वाली नौकरानियां हों-यहां तक कि बेटी को खाना भी न बनाना पड़े। कहा जाता है कि खाना बनाना ही औरत की सबसे बड़ी उपलब्धि है जिससे वह पूरे परिवार पर नियंत्रण करती है-अगर नारी स्वातंत्र्य समर्थक इसे पुरातनपंथी माने तो चलेगा-मगर उसी हथियार के बिना औरत का अपने पति और ससुराल पर नियंत्रण कैसे होगा? यह कौन बता सकता है? स्थिति यह है कि नारी स्वातंत्र्य समर्थक नारियां भी कई बार ऐसी बातें कहती हैं जिससे लगता है कि घर का काम नारी द्वारा किया जाना उसकी गुलामी का प्रतीक है। अब सवाल यह है कि क्या पुरुष घर का काम करने लगे तभी नारी की आजादी का अभियान पूरा माना जायेगा क्या? एक बात तय है कि खाना तो बनेगा क्योंकि उसके बिना परिवार का चलना कठिन है। नारी स्वातंत्र्य समर्थकों को उसकी आजादी की बात तो दिखाई देता है पर खाना बनाना, कपड़े धोना, बच्चे पालना, और सफाई आदि के काम करने की जिम्मेदारी नहीं दिखती जो कि पश्चिमी विचाराधारा के अनुसार आर्थिक दृष्टि से अधिक महंगे हैं। एक अमेरिकी अर्थशास्त्री के अनुसार अगर मुद्रा में भारत की घरेलू स्त्रियों द्वारा किये गये कार्यों का आंकलन किया जाये तो वह पुरुषों से अधिक कमाती हैं। इसे हम इस तरह भी कह सकते हैं कि जो स्त्रियां बाहर कमा रही हैं-चंद समृद्ध और उच्च पदस्थ महिलाओं की बात यहां छोड़ देते हैं जो सामान्य नौकरी वाली औरतों से गुणात्मक रूप से अधिक आय अर्जित करती हैं-वह अपने आसपास की घरेलू महिलाओं के मुकाबले प्रत्यक्ष रूप से धन कमाने की वजह से श्रेष्ठ दिख सकती हैं पर जहां तक वास्तविक कमाई का प्रश्न है तो वह पीछे हैं।
तात्पर्य यह है कि हमारा समाज असमंजस में पड़ा है। न तो वह खुलकर पाश्चात्य संस्कृति की तरफ जा रहा है और न पूरी तरह अपने संस्कार छोड़ पा रहा है। हमारा मानना यह है कि जिन लोगों को पाश्चात्य सभ्यता अपनाना है तब उनको इस बात की परवाह नहीं करना चाहिए कि समाज क्या कहेगा? जिनको अपनी संस्कृति अपनानी होगा उनको पूरी तरह से नहीं तो आंशिक रूप से पाश्चात्य संस्कृति से परे रहना होगा -अधिक से अधिक वह पहनावे तक ही सीमित रहें पर वैलंटाईन डे, शुभेच्छु दिवस, प्रेम दिवस तथा अन्य ऐसे त्यौहारों से परे रहे जो कामनायें बढ़ाने के लिये प्रेरित करें। इस मामलें में कानून की भी समीक्षा करनी होगी जिससे कि पाश्चात्य संस्कृति अपनाने वालों के लिये कोई बाधा न खड़ी हो। समाज का इस तरह विचारों की दृष्टि से असमंजस में पड़े रहना ठीक नहीं है।
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Thursday, May 28, 2009

सात पुश्तों के लिये रोटी का जुगाड़-व्यंग्य कविता (sat pidhiyon ke roti-hindi hasya vyangya kavita)


वादे और इरादे
बाजार में बिक जाते हैं
सच देखने तक भला
कितने लोग जिंदा रह पाते हैं।

धरती पर बने जुहन्नम में जीते लोग
जन्नत की ख्वाहिश में
अपनी जिंदगी घिसते चले जाते हैं
वहां जगह मिली कि नहीं
भला मुर्दे कभी बताने आते हैं।

गरीबी मिटाने
भूख भगाने और
सम्मान दिलाने के वादे
करते रहो
ना शब्द से करना परहेज
बस हां कहो
समझदार इसलिये वही कहलाते
जो भले ही एक टुकड़ागुड़ का न दें
बात और वादे तो गुड़ जैसे जरूर करते
सात पुश्तों के लिये
रोटी का जुगाड़ इसी तरह किये जाते हैं।

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Sunday, May 24, 2009

ब्लाग जब्त होना चिंता की बात नहीं-आलेख

दूसरे का मामला हो तो दिलचस्प हो जाता है पर जब स्वयं उससे जुड़े हों तो चिंताजनक लगता है। यही इस लेखक के साथ भी हुआ जब गुगल ने दो ब्लाग अमृत संदेश पत्रिका और सिंधु पत्रिका को डेशबोर्ड से हटा दिया। दो ब्लाग हटा दिये या किसी तकनीकी गड़बड़े मे फंस गये यह एक अलग विषय था। चिंता थी तो इस बात की ब्लाग स्पाट के अन्य ब्लाग भी कभी इस तरह के संकट में फंस सकते हैं। ब्लाग स्पाट के ब्लाग दिखने में आकर्षक हैं पर उनमें ऐसा कुछ नहीं है जिसकी चिंता की जाये। गूगल भी एक बहुत बहुत बड़ा संगठन है पर उसके सहारे ही अंतर्जाल पर लेखन यात्रा चलेगी यह जरूरी नहीं है, मगर उसके दो ब्लाग पर ढाई सौ पाठ हों और वह उसे जब्त कर ले तो उसे बर्दाश्त भी तो नहीं किया जा सकता।

अगर गूगल कोई आदमी होता तो हम उससे कहने कि‘यार, किसी बात पर नाराज है तो अपने ब्लाग ले जा हमारे पाठ तो फैंक जा! हमने वह कितनी मेहनत से लिखें हैं। हम उनको जाकर वर्डप्रेस की अलमारी में सजायेंगे।’

मगर अंतर्जाल पर आदमी सारा खेल कीबोर्ड पर ही करता है और उससे संपर्क करना कठिन काम है। कहने को गूगल एक संगठन हैं पर काम तो आदमी ही करते हैं। सो किस आदमी ने इस लेखक के दो ब्लाग उड़ा दिये उसकी तलाश करना जरूरी था पर वह एक ही था यह कहना भी कठिन है।
कल अपना पाठ लिखते हुए लेखक ने इस बात की सावधानी बरती थी कि कोई आक्षेप किसी पर न लगायें क्योंकि इन दो ब्लाग को लेकर ही हमें कुछ संदेह थे और लग रहा था कि कोई ऐसा कारण जरूर है कि यह फंसने ही थे। यह फंसे हमारी लापरवाही और सुस्ती से।
इसे भाग्य भी कह सकते हैं कि कोई अदृश्य शक्ति है जो काम करती है वरना इस लेखक के सारे ब्लाग गूगल के कैदखाने में होते-यह कहना कठिन है कि वर्डप्रेस के ब्लाग वह पकड़ पाता की नहीं। शिकायत तो इस बात की है कि उसने ऐसा करने में डेढ़ साल क्यों लिया? उसने वह वेबसाईट एक वर्ष पूर्व अपने सर्च इंजिन से कैसे निकलने दी जिसे आज वह खराब बता रहा है।

शायद दिसंबर 2007 की बात होगी। लेखक इस ब प्रयास में था कि ब्लाग स्पाट पर आने वाले पाठकों की संख्या कैसे पता लगे। हिंदी के एक ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरम से बाहर के पाठकों की संख्या का अनुमान नहीं हो पाता था। उस पर एक आलेख लिखा गया। आलेख के प्रकाशन के एक माह बाद एक मासूम ब्लाग लेखक ने अपनी टिप्पणी में एक वेबसाईट का पता दिया जिसका नाम था‘गुड कांउटर’। उस ब्लाग लेखक के लिये मासूम शब्द मजाक में नहीं लिखा। वह अतिसक्रिय ब्लाग लेखक है और गाहे बगाहे किसी निराश और परेशान ब्लाग लेखक का मार्गदर्शन करने पहुंच ही जाता है। कभी कभी गंभीर पाठ पर ऐसे सवाल भी उठा देता है जिसका जवाब देते नहीं बनता या देने के लिये एक अन्य पाठ लिखने का मन नहीं करता।
उसकी टिप्पणी से ही उस वेबसाईट का पता लिया और उस समय अपने ब्लाग स्पाट के सभी आठ ब्लाग पर गुड कांउटर लगा दिया। उसकी सूचनायें लुभावनी लगी और उससे यह पता लगता था कि किस शहर से कब ब्लाग देखा गया। उसके आकर्षण की वजह से उसे वर्डप्रेस पर भी लगाया। लगभग उसी समय किसी अन्य ब्लाग लेखक ने स्टेट काउंटर का पता अपने पाठ पर लगाया और चिट्ठकारों की चर्चा में भी उसका नाम आया। इस लेखक ने उसे भी अपने एक दो ब्लाग पर लगाया। कोई गड़बड़ी नहीं थी पर गुड कांउटर के पीछे दूसरा सच भी था जो बाद में दिखाई दिया। अगर कोई पाठक वहां क्लिक करे तो उसे घोड़ों की रेस पर दांव लगाने का अवसर मिल सकता था। यह देखकर ं थोड़ी परेशानी हुई। यह जुआ देखना पसंद नहीं था। पाठकों की जानकारी की वजह से उसे लगाया था पर फिर उसे हटा दिया क्योंकि उसकी जगह स्टेट कांउटर भी अच्छा काम रहा था। उसमें कोई गड़बड़झाला नहीं था। फिर एक एक कर गुड कांउटर सभी जगह से हटा दिया मगर जो ब्लाग जब्त हुए हैं वह इतने सक्रिय नहीं थे इसलिये वहां से हटाने की तरफ ध्यान नहीं गया।
बाद में उन ब्लाग का पता बदलकर उसे सक्रिय किया। पाठक संख्या कोई अधिक नहीं थी इसलिये कोई चिंता वाली बात नहीं थी। एक दो बार गुड काउंटर पर नजर गयी पर यह सोचकर कि अभी हटाते हैं पर नहीं हटाया। वैसे भी चूंकि उनका पता बदला गया था इसलिये वह निष्क्रिय लगता था।
मुख्यधारा में लाने से पूर्व भी ब्लाग पर कोई पाठक नहीं आता था यह बात स्टेट कांउटर से पता लगती थी। गुड कांउटर से तो कभी देखने का प्रयास भी नहीं किया। जब्त होने के तीन चार दिन पहले वहां चार पांच ऐसे पाठकों की आवक देखी गयी जो ब्लाग के पते से उसे खोलते थे। हो सकता है कोई एक पाठक रहा हो। बहरहाल कोई अधिक आवक नहीं थी। सिंधु पत्रिका पर अंतिम दिन नौ पाठ पढ़े गये और उसमें कोई भी उसका पता लगाकर ढूंढता हुआ नहीं आया।
हिंदी के पाठक तो वैसे भी कम हैं और ब्लाग स्पाट पर तो और भी कम है। वैसे इन ब्लाग पर पिछले तीन दिनों में अमेरिका से पाठक संख्या अधिक थी और शक यही है कि उस वेबसाईट को वहीं के कुछ लोग देख रहे होंगे। अंतर्जाल पर एक समस्या यह है कि आप अगर किसी वेबसाईट को लिंक करते हैं और अगर उसे कहीं सर्च किया जाये तो आपका ब्लाग भी वहां चला जायेगा। ऐसा लगता है कि गुड कांउटर को ढूंढ रहे किसी एक या दो आदमी को इस लेखक के एक या दोनों ही ब्लाग हाथ लग गये होंगे। उन्होंने सोचा होगा कि हमें इससे क्या मतलब कि ब्लाग किस भाषा में है मतलब तो गुड कांउटर से घुडदौड़ के समाचार देखने से है-यह कहना कठिन है कि उस पर आन लाईन सट्टा भी हो सकता था या नहीं क्योंकि उसे खोलकर देखे ही लेखक को करीब सवा साल हो गया है बहरहाल उस काउंटर से दोनों ब्लाग पर कोई ऐसी सक्रियता नहीं देखी गयी पर उसका लिंक होना उनके लिये परेशानी का सबब बना। ऐसा लगता है कि हाल ही में उस गुड कांउटर वाली साईट को प्रतिबंधित घोषित किया गया होगा क्योंकि इससे पहले डेढ़ वर्ष तक गूगल का आटोमैटिक सिस्टम उसे नहीं पकड़ रहा था।
उस मासूम ब्लाग लेखक के नाम का जिक्र हमने इसलिये नहीं किया क्योंकि वह भी तो हमारी तरह ही है जिसे बहुत सारी बातें बाद में पता चली होंगी। हो सकता है कि वह स्वयं भी भूल गया हों उसने अतिउत्साह में उस गुड कांउटर का पता बताया और हमने भी लगभग उसी मासूमियत से लगाया। अब समस्या आ रही है उन दोनों ब्लाग को वापस लाने की। गूगल के वेबमास्टर टूल पर अपना प्रयास किया है और तकनीकी ज्ञान की कमी के चलते यह कहना कठिन है कि हम अभी सफल हुए हैं या नहीं। यह तय बात है कि पहले उसे ब्लाग की सैटिंग मेें जाकर तृतीय पक्ष की क्षमता वाली जगह पर जाकर वहां से गुड कांउटर हटाना पड़ेगा। अब गूगल से वह कब वापस मिलेगा। हम अपनी प्रविष्टी सही जगह पर कर रहे हैं या नहीं इसका दावा करना कठिन है। वह दिन हमें आज भी याद है कि इन दोनों में किसी एक ब्लाग पर महीना भर पहले उस अनावश्यक और निष्क्रिय काउंटर का हटाने के लिये हमने माउस उठाया था कि लाईट चली गयी। उस समय पता नहीं था कि वह साथ में ब्लाग भी ले जाने वाली है। वह हटाते तो भी दूसरे ब्लाग को तो जाना ही था क्योंकि हमें तो पता ही नहीं था कि वह दो पर है।
बस एक बात का संतोष है कि किसी अन्य ब्लाग को कोई खतरा नहीं है जिसकी आंशका बनी हुई थी। इस लेखक की चिंता सबसे अधिक ‘शब्द लेख सारथी' की होती है जो पाठकों में ब्लाग स्पाट का सबसे अधिक पसंद किया जाने वाला ब्लाग है। सबसे बड़ी बात यह कि गूगल की विश्वसनीयता को लेकर कोई सवाल उठाना ठीक नहीं है। वैसे यह प्रतिबंध साईट द्वारा प्रदत्त सामग्री से अधिक गूगल के साथ उसकी कोई व्यापारिक संधि न होने के कारण लगा-ऐसा लगता है। जहां तक अश्लील और आन लाईन सट्टेबाजी की साईटों का सवाल है तो कौन गूगल भी पीछे है। पर इससे हमें क्या? हमारे सात्विक लिखने और पढ़ने में बाधा नहीं आना चाहिए। गूगल ने अगर गुड काउंटर को गलत समझा तो ठीक है हम भी उससे सहमत हैं। बस अफसोस इस बात है कि डेढ़ साल पहले उसने ऐसा क्यों नहीं किया। दूसरा जिन अन्य ब्लाग लेखकों के ब्लाग जब्त हुए हैं वह भी याद करें कि कहीं उन्होंने इस तरह की साईटें तो नहीं लगायी थी। हिंदी ब्लाग जगत के लेखक होने के नाते पश्चिमी तौर तरीकों और दाव पैंचों को अधिक नहीं जानते इसलिये इस तरह के धोखे में फंस जाना कोई बड़ी बात नहीं है। बहरहाल जो ब्लाग मित्र या पाठक हैं उन्हें चिंतित होने की बात नहीं है। प्रयास करने पर दोनों ब्लाग वापस मिलते हैं तो ठीक वरना कोई बात नहीं। अन्य ब्लाग कोई खतरा नहीं है इससे संतुष्ट होना ठीक है।
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Saturday, May 23, 2009

गूगल ने दो ब्लाग जब्त किये-आलेख

गुगल ने इस लेखक के दो ब्लाग को बिना किसी पूर्व चेतावनी और सूचना के हटा दिया है। यह दो ब्लाग हैं सिंधु केसरी पत्रिका http://anant-sindhu.blogspot.com और अमृत संदेश पत्रिका http://amrut-sandesh.blogspot.com। इस संबंध में गूगल ग्रुप के सहायता केंद्र पर सूचित किया गया पर अभी तक कोई सूचना नहीं मिली है।
अब यह कहना कठिन है कि यह गलती से हुआ या जानबूझकर किया गया है। जहां तक इस लेखक द्वारा आपत्तिजनक लिखने का प्रश्न है तो अधिकतर ब्लाग लेखक पाठ पढ़ते रहते हैं और कोई ऐसी बात अपने ब्लाग/पत्रिका पर नहीं लिखता जिसे किसी को परेशानी हो। फिर आखिर इन ब्लाग को बिना किसी पूर्व सूचना या चेतावनी के आखिर क्यों हटा दिया गया।
कल चिट्ठाकारों की चर्चा में एक अन्य ब्लाग लेखक ने भी इस तरह की कार्यवाही का जिक्र किया गया तब उसे एक वरिष्ठ ब्लाग लेखक ने बताया कि उसके ब्लाग पर तीसरे पक्ष की कार्यक्षमता में कोई ऐसा लिंक जुड़ गया होगा जो आपत्ति जनक होगा। साथ ही उसे यह भी कहा गया कि वह गूगल को लिखे तो उसे ब्लाग वापस मिल जायेगा। अब गूगल ग्रुप के सहायता केंद्र के अलावा भी कोई ऐसी जगह हो जहां लिखा जाना है तो कृपया सुधि ब्लाग लेखक बतायें। जहां तक लेखक की जानकारी है तो तीसरे पक्ष की कार्यक्षमता में इन दोनों ब्लाग पर जो लिंक हैं वह अन्य ब्लाग पर भी हैं तो इसका आशय यह है कि बाकी ब्लाग भी हटाये जा सकते हैं। वैसे कोई ऐसे लिंक नहीं हैं जो आपत्तिजनक हों पर अगर हैं तो वह बताया जाना चाहिए न कि इस तरह प्रतिबंध लगाया जाये।

जिस तरह इन ब्लाग को हटाया गया है और लिखने के सात घंटे बाद भी न तो उनकी वापसी नहीं हुई है और न कोई सूचना मिली है वह अनेक प्रकार की आशंकाओं को तो जन्म देने के साथ ही इन वेबसाईट की विश्वसनीयता पर भी संदेह पैदा करती है। आखिर कोई आदमी कितनी मेहनत से लिखता है और फिर उसका ब्लाग आप बिना किसी सूचना के जब्त करें तो इसे तो विश्वासघात ही कहा जायेगा। याद रखने वाली बात यह है कि उदारीकरण के इस युग में निजी वेबसाईटों को विश्वास के सहारे ही चलना है।
इससे पहले एक बार ऐसा हुआ था जब पूरा ब्लाग स्पाट ही गलती का शिकार हुआ था। तब यही संदेश आ रहा था कि यह वेबसाईट आपके कंप्यूटर के लिये खतरनाक है। अब यह केवल इन दो ब्लाग पर ही आ रहा है और बाकी काम कर रहे हैं। अभी तक तो यह मानकर ही चलना चाहिये कि यह किसी त्रुटि का परिणाम है पर अगर यह सोद्देश्य किया गया है तो इसकी खोजबीन की जायेगी। बहरहाल कुछ अन्य ब्लाग लेखक भी हो सकते हैं जो इसका शिकार हुए होंगे। ऐसे में तकनीकी जानकार ब्लाग लेखकों से यह अपेक्षा है कि वह इन ब्लाग के संबंध में कोई कार्यवाही हो सकती है तो बतायें। यह आग्रह भी है कि अगर स्वयं कहीं सूचना दे सकते हैं तो भेज दें-उनकी अति क्रृपा होगी।
जिन ब्लाग को हटाया गया है वह इस प्रकार हैं
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Monday, May 18, 2009

खुशहाली के वादे-हिंदी शायरी (khushi ke vade-hindi shayri)


समाज के बदलते दौर में
चेहरे बदल जाते
मगर इंसानी बुतों की
बोल और अदायें एक ही
तरह सामने आते।

आकाश जैसा चमकीला
बनाने का वादा तो सभी कर जाते
इसलिये धरती पर
कृत्रिम सितारे सजाते।
भुगतते हैं सभी अपने कारनामों के अंजाम
औकात के हिसाब से मिलते
इंसान को काम और दाम
अपने कर्ज चुकाने हैं खुद सभी को
दिखाने के लिये हमदर्द सभी बनते
साथी वही बनते, हमसफर हों जो
ऐसे में बहुत अच्छा लगता है
सारे संसार में खुशहाली के वादे
जो हकीकत से परे होते भी प्यारे नजर आते।

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Sunday, May 17, 2009

ताज का राज -व्यंग्य कविता (taj ka raj-hindi vyangya kavita)

सूरत देखकर ही
लोग सिर पर ताज पहनाते हैं
किसकी सीरत कौन देखेगा
अपने काम पर लोग खुद ही शर्माते हैं.

कहैं दीपक बापू
"बीच बाज़ार में
कागज पर लिखकर हों
या उसके बने नोटों में बिककर हों
सामने सबके सौदा होने से पहले
कमरे के अन्दर अकेले में तय किये जाते हैं.
किसने पहना
और किसने पहनाया ताज
इसमें भले नहीं दिखता कोई राज
पर भूमिका और पात्र कहीं अन्यत्र
तय किये जाते हैं.

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Tuesday, May 12, 2009

गरीब की भूख के कद्रदान-हिंदी शायरी (garib ki bhookh ke kadradan-hindi vyangya kavita)

हक की बात करते हैं लोग सभी
फर्ज पर बहस नहीं करते कभी।।

अपने फायदे के लिये बनाये कायदे
वह भी मौका पड़े, याद आते हैं तभी।।

दिखाने के लिये लोग अहसान करते हैं
नाम मदद, पर कीमत मांगते हैं सभी।।

रोटियों का ढेर भले भरा हो जिनके गले तक
उनकी भूख का शेर पिंजरे में नहीं जाता कभी।।

नारों से पेट भरता तो यहां भूख कौन होता
दिखाते हैं सब, पेट में नहीं डालता कोई कभी।।

गरीब के साथ जलना जरूरी है, भूख की आग का
उसके कद्रदानों की रोटी पक सकती है तभी।।

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Sunday, May 10, 2009

मुखौटों के पीछे मुख हैं-व्यंग्य कविता (mukhauton ke pichhe mukh-vyangya hindi shayri)

कभी करते हैं वैश्वीकरण का नारा जोर से बुलंद .
कभी हो जाती है उनकी सोच, अपने दायरों में बंद ..
बाजार ने सजाये हैं मुखौटे, जो सोचते दिखते हैं
मगर होते हैं सौदागरों के इशारों पर चलने के पाबन्द ..
बाज़ार भाव के उतार चढाव देखना जरूरी है
मुखौटों की भंगिमा कभी चमकती है,कभी होती मंद
खुले बाज़ार में सब खुला रखने की हिमायत पहले करते
सौदागरों का इशारा हो जाये तो सब हो जाता बंद..
सारे जहां का जिम्मा है इसलिए सोचते दिखना जरूरी है
सौदागर का खेल चलता, मुस्कराता हैं वह मंद मंद..
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बाज़ार उनको नचाता है
या वह बाज़ार को चलाते हैं
यह कहना कठिन है.
मुखौटों के पीछे मुख हैं
जो लिखते हैं संवाद
और वह होंठ हिलाते नजर आते हैं
लोग तो बस विषयों के साथ
शब्दों को मिलाते हैं
परदे के पीछे का खेल कौन
देख पाता है
सामने के दृश्य से ही
सभी का मन भर जाता है
वैसे भी कुछ बेकार है कहना
बस! बाज़ार के खेल में
जज्बातों के साथ मत बहना
चाहे भले ही कोई
रात को बताता दिन है..

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Wednesday, May 6, 2009

जंग से अच्छा अमन है-व्यंग्य कविता (zang se achchha aman hai-vyangya kavita)

लुटता रहा पूरा शहर
मगर लोग देखते रहे।
‘खराब ज़माना आ गया है’
एक दूसरे से बस यही कहते रहे।

‘बचाने के लिये जंग कर
जान गंवाने या
शरीर पर जख्म लेने से
अच्छा अमन है’
यही सोचकर आपस में हंसते रहे।

फिर भी
आसमान की तरफ देखकर
वहां से किसी फरिश्ते के जमीन पर आकर
खुद को बचाने की उम्मीद में
इंसान खामोशी से जमीन पर कटते रहे।।

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हिंदी साहित्य,मनोरंजन,हिंदी शायरी,शेर,समाज
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Saturday, May 2, 2009

आदमी का दिल कहार नहीं बन सकता-हिन्दी शायरी (admi ka dil kahar nahin hai-hindi shayri)

जिंदगी के इस सफ़र में
बिछडे साथियों का पता
किससे पूछें
सभी ढूंढ रहे हैं
अपने यार जो खो गए.

मगर फिर भी पूछते हैं
क्योंकि बात से बात निकलते ही
वही हमारे यार हो गये.

हर आदमी का दिल कहार नहीं बन सकता
जो यादों की डोली लाद कर चलता रहे
बिछडों की याद में हाथ मलता रहे
हमदर्दी लेकर दर्द बाटने वाले
जो लोग मिले, वही दिलदार हो गए..

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Thursday, April 23, 2009

रौशनी का वास्ता कब तक दिलाओगे-हिंदी शायरी (roshni ka vasata-hindi shayri)

तख्तियों पर लिखे शीर्षकों के तले
खड़े लोगों की भीड़ को
कब तक बहलाओगे।
इंसान की आदतों को
कब तक भीड़ में छिपाओगे।
टकराते हैं जब लोगों मे मतलब आपस में
तब जंग भी होती है
इंसान अपने लिये जागता है
पर भीड़ तो हमेशा सोती है
लोगों की भीड़ में ढूंढते हो
आदमी-औरत, गरीब-अमीर
और शोषक-शोषित
बांटकर उनको
तरक्की के रास्ते पहुंचाने का
दिखावा कब तब कर पाओगे।
बरसों से यही हाल है
जो आज दिख रहा है
जमाने ने देखा है तुम्हारा दौर भी
जब तुूम्हारे हाथ में था अलादीन का चिराग
तब भी तुमने कोई जादू नहीं किया
इस बात पर करना जरूरी है गौर भी
वादे करना और कसमें खाना
तुम्हारी पुरानी आदत है
पर जमाने को कब तक
खाली भरोसे पर बहलाओगे
अंधेरे में गुजारते हुए बरसों हो गये
खाली चिराग सजाकर
कब तब रौशनी का वास्ता दिलाओगे।

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Wednesday, April 15, 2009

खूबसूरत हमसफर भी लगते हैं बदसूरत-हिन्दी शायरी

शोला कहो या शबनम
मोहब्बत के जज्बातों के
इजहार में हर लफ्ज़ है कम।
मगर जिदंगी में सफर में
खूबसूरत हमसफर भी
लगते हैं बदसूरत
जब होते है सामने गम।
चैहरे को कब तक बनावटी सामान से
कितना चमकाओगे
उम्र के साथ फीके होते जाओगे
जला सके ताउम्र खूबसूरत कोई चिराग
जिस्म की मोहब्बत में नहीं है इतना दम।
.........................
रंगबिरंगे कागज पर शायरी लिखने से
रंगीन नहीं हो जाएगी
शब्द को शोर करते हुए लिखने से
संगीन नहीं हो जाएगी।
रोते हुए उसके जज़्बातों से
वह गमगीन नहीं हो जाएगी।
ओ शायर!
जब तेरे अल््फ़ाजों में
तुझे तेरा अक्स दिखने लगे
तू हो जाये बेहोश
तेरे जज़्बात खुद लिखने लगे
तभी समझना कि तेरी शायरी
जमाने में रौशन हो जायेगी।

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Friday, April 10, 2009

जब तक अपनी नई सोच को खुद रौशन नहीं करोगे-हिन्दी शायरी

वहम और दिखावे से कैसे जंग लड़ोगे
इंसानी दिमाग की फितरत है
अच्छी हो या बुरी
किसी सोच की गुलामी करना
तुम खाली जुबां से कैसे जीतोगे
उस अंधेरे से
जब तक अल्फाजों की नई रौशनी नहीं भरोगे।

आदमी का दिल कितना भी दरिया हो
ख्यालों के दायरे उसके बहुत तंग हैं
चलते हैं उधार की सोच पर सभी
अपने अल्फाज़ नहीं तय करते वह कभी
दोस्त हो या दुश्मन
जो दिखाये सपने, होते उसी के संग हैं
रौशनी के चिराग बुझ जाते हैं
कितना भी बचो, अंधेरे फिर भी आते हैं
मंजिल का पता नहीं
रास्ते सभी भटके हैं
फिर भी उम्मीद पर
किताबी कीड़ों के घर पर लटके हैं
शायद वह कोई अल्फाज़ों से निकालकर
मंजिल का पता बता दे
कैसे बताओगे उनको
सही मंजिल और रास्ते का पता
जब तक तुम अपनी सोच को
खुद ही रौशन नहीं करोगे

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Monday, April 6, 2009

यादें और अहसास-हिंदी शायरी

उनके लिये
हमारे दिल में जगह खाली है
किसी कोने में।
उनकी यादें करती है अठखेलियां वहां
कोई अंतर नहीं पड़ता उनके पास न होने में।
अलग नजरिये ने कर दिये
दोनों के अलग अलग रास्ते
हमने दिल में बसा रखी उनकी तस्वीर
भले ही पराये हो गये उनके वास्ते
उनको परवाह हो न हो
इसकी फिक्र नहीं है
पर उनकी यादों को संजोये
रखने में एक अलग ही मजा है
भले ही यह बिछड़ना एक अनचाही सजा है
दिल में रखी
उनकी तस्वीर और यादों के मोल के आगे
तराशा गया हीरा पत्थर लगता है
लोहे का अहसास होता है सोने में।

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