Showing posts with label शेर. Show all posts
Showing posts with label शेर. Show all posts

Tuesday, August 10, 2010

अपने से अज़नबी हो गया आदमी-हिन्दी कविता (apne se azanabi ho gaya aadmi-hindi poem

लोगों की संवेदनाऐं मर गयी हैं
इसलिये किसी को दूसरे का दर्द
तड़पने के लिये मजबूर नहीं कर पाता है।

निगाहों ने खो दी है अच्छे बुरे की पहचान
अपने दुष्कर्म पर भी हर कोई
खुद को साफ सुथरा नज़र आता है।

उदारता हाथ ने खो दी है इसलिये
किसी के पीठ में खंजर घौंपते हुए नहीं कांपता,
ढेर सारे कत्ल करता कोई
पर खुद को कातिल नहीं पाता है।

जीभ ने खो दिया है पवित्र स्वाद,
इसलिये बेईमानी के विषैले स्वाद में भी
लोगों में अमृत का अहसास आता है।

किससे किसकी शिकायत करें
अपने से ही अज़नबी हो गया है आदमी
हाथों से कसूर करते हुए
खुद को ही गैर पाता है।
------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Saturday, July 10, 2010

बेवफाओं की भीड़-हिन्दी व्यंग्य कविता (bevfaon ki bheed-hindi vyangya kavita)

दूसरों में वफा की तलाश करते हुए
गुजार देते हैं लोग पूरी जिंदगी
फिर निराश हो जाते हैं।
पर कोई भी इंसान
अपने अंदर बैठे गद्दार को
मार नहीं पाया
सभी ज़माने में वफादार ढूंढते हुए
बेवफाओं की भीड़ में खो जाते हैं।
------------
एक तरफ दौलत, शौहरत और ताकत के
सिंहासन पर आका खड़े हैं
दूसरी तरफ चमचे उनकी दरबार में जड़े हैं।
बाकी इंसान तो भेड़ों की तरह चल रहे
जिनके सपने अपनी औकात से बड़े हैं।
----------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Saturday, May 22, 2010

सम्मेलन-हिन्दी व्यंग्य कविता (sammelan-hindi vyangya kavita)

सम्मेलन में
कुछ रूठे इस उम्मीद में गये कि
कोई उन्हें मना लेगा
कुछ टूटे दिलों ने आसरा किया कि
कोई उन्हें फिर बना लेगा,
मगर वहां जमी महफिल में
सभी चीख रहे थे
गुर्राने के नये नये तरीके सीख रहे थे,
सद्भाव के नाम संघर्ष दिखने लगा।
सभी ने अपनी अपनी कही,
दूसरे की सलाह भी सही,
तय किया ज़माने में नश्तर चुभोने का,
अपने को छोड़कर सभी को डुबोने का,
फिर कोई अगले सम्मेलन की तारीख लिखने लगा।

------------------------
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Wednesday, May 12, 2010

पुराने नायक, नये खलनायक-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (purane nayak, naye khalnayak-hindi vyangya kaivtaen)

राजशाही लुट गयी
लुटेरे बन गये
ज़माने के खैरख्वाह।
उठाये थे पहले भी गरीब
साहुकारों का बोझ
भले ही भरकर रह जाते थे आह,
अब भी कहर बरपा रहे
लुटेरे तमंचों के जोर पर रोज
फिर भी बोलना पड़ता है वाह वाह।
---------
इतिहास क्यों पुराना सुनाते हो,
यहां घट रहा है रोज नया घटनाक्रम
तुम पुरानी कथा क्यों सुनाते हो।
पढ़ लिखकर किताबें क्यों ढूंढ रहे हो
जमाने को दिखाने का रास्ता,
अपनी खुद की सोच बयान करो
मत दो रद्दी हो चुके ख्यालों का वास्ता,
पुराने समय के नायकों की याद में
नये खलनायकों की चुनौती क्यों भुलाते हो।
----------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Sunday, May 2, 2010

समाज सेवा और अपराध-हिन्दी क्षणिकायें (social service and crime-hindi short poem)

समाज सेवा शुरु करने से पहले
कोई न कोई अपराध करना जरूरी है,
लोग देते हैं डर कर चंदा
कभी नहीं पड़ता धंधे में मंदा,
घी निकालने के लिये टेढी उंगली की तरह
चलना आजकल की मजबूरी है।
----------
नैतिकता की बातें करते वह लोग,
दौलत पाने की चाहत का लगा जिनको रोग।
सिमट गया है शिखर पुरुषों का दायरा
वाद और नारों के इर्दगिर्द,
खुद हो गये हैं सफेदपोश
काले करनामों अंजाम दे रहे उनके शागिर्द,
लोगों को त्याग करने की क्या प्रेरणा देंगे
अपने लिये जुटा रहे ढेर सारे भोग।
--------
दुःख इस बात का नहीं कि
वह अपने वादे से मुकर गये,
तकलीफ इस बात ये हुई,
वह अपना यकीन हमारे यहां खो गये।
चेहरे पर नकाब पहनकर धोखा देते तो
कोई बात नहीं थी,
पर हमारे अरमान का कत्ल कर
वह झूमकर नाचे
जैसे खुद शहंशाह हो गये।
----------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Monday, March 29, 2010

शब्द और गणित-हिन्दी व्यंग्य कविता (word and mathmatics-hindi vyangya kavita)

उपदेश देते हुए उनकी
जुबान बहुत सुहाती हैं,
और बंद कमरे में उनकी हर उंगली
चढ़ावे के हिसाब में लग जाती है।
किताबों में लिखे शब्द उन्होंने पढ़े हैं बहुत
सुनाते हैं जमाने को कहानी की तरह
पर अकेले में करते दौलत का गणित से हिसाब
लिखने में कलम केवल गुणा भाग में चल पाती है।
----------
अपनी भाषा छोड़कर
कब तक कहां जाओगे,
किसी कौम या देश का अस्त्तिव
कभी भी मिट सकता है
परायी भाषा के सहारे
कहां कहां पांव जमाओगे।
दूसरों के घर में रोटी पाने के लिये
वैसी ही भाषा बोलने की चाहत बुरी नहीं है
दूसरा घर अकाल या तबाही में जाल में फंसा
तो फिर तुम कहां जाओगे।
अपनी भाषा तो नहीं आयेगी तब भी जुबां पर
फिर दूसरे घर की तलाश में कैसे जाओगे।
-------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Thursday, March 25, 2010

लुटेरे पहरेदार बनाये जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता (lutere aur paharedar-hindi satire poem)

अब तो पत्थर भी तराश कर
हीरे बनाये जाते हैं,
पर्दे पर चल रहे खेल में
कैमरे की तेज रोशनी में
बुरे चेहरे भी सुंदरता से सजाये जाते हैं।
ख्वाब और सपनों के खेल को
कभी हकीकत न समझना,
खूबसूरत लफ्ज़ों की बुरी नीयत पर न बहलना,
पर्दे सजे है अब घर घर में
उनके पीछे झांकना भी मुश्किल है
क्योंकि दृश्य हवाओं से पहुंचाये जाते हैं।
--------------
कायरों की सेना क्या युद्ध लड़ेगी
नायक सबसे अधिक कायर बनाये जाते हैं।
कुछ खो जाने के भय से सहमे खड़े है
भीड़ में भेड़ों की तरह लोग,
चिंता है कि छिन न जायें
तोहफे में मिले मुफ्त के भोग,
इसलिये लुटेरे पहरेदार बनाये जाते हैं।
------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Sunday, March 14, 2010

वह सिकंदर कहलायेगा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (vah sikandar kahlayega-hindi satire poem)

खतरा है जिनसे जमाने को
उनके घर सुरक्षा के पहरे लगे हैं,
लोगों के दिन का चैन
और रात की नींद हराम हो जाती जिनके नाम से
उनके घर के दरवाजे पर पहरेदार, चैबीस घंटे सजे हैं।
कसूरवारों को सजा देने की मांग कौन करेगा
लोग बेकसूर ही सजा होने से डरने लगे हैं।
-----------
बाजार में जो महंगे भाव बिक जायेगा,
वही जमाने में नायक कहलायेगा।
जब तक खुल न जाये राज
कसूरवार कोई नहीं कहलाता,
छिपायेगा जो अपनी गल्तियां
वही सूरमा कहलायेगा।
----------
इंसान कितना भी काला हो चेहरा
पर उस पर मेअकप की चमक हो,
चरित्र पर कितनी भी कालिख हो
पर उसके साथ दौलत की महक हो,
वह शौहरत के पहाड़ पर चढ़ जायेगा।
बाजार में बिकता हो बुत की तरह जो इंसान
लाचार हो अपनी आजाद सोच से भले
पर वह सिकंदर कहलायेगा।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Sunday, February 28, 2010

होली या दिवाली-आलेख और व्यंग्य क्षणिकायें (holi ho ya diwali-hindi article and satire poem)

होली हमारे देश का एक परंपरागत त्यौहार है जो उल्लास से मनाया जाता रहा है। यह अलग बात है कि इसे मनाने का ढंग अब लोगों का अलग अलग हो गया है। कोई रंग खेलने मित्रों के घर पर जाता है तो कोई घर पर ही बैठकर खापीकर मनोरंजन करते हुए समय बिताता है। इसका मुख्य कारण यह है कि जब तक हमारे देश में संचार और प्रचार क्रांति नहीं हुई थी तब तक इस त्यौहार को मस्ती के भाव से मनाया जरूर जाता था पर अनेक लोगों ने इस अवसर पर दूसरे को अपमानित और बदनाम करने के लिये भी अपना प्रयास कर दिखाया। केवल शब्दिक नहीं बल्कि सचमुच में नाली से कीचड़ उठाकर फैंकने की भी घटनायें हुईं। अनेक लोगों ने तो इस अवसर पर अपने दुश्मन पर तेजाब वगैरह डालकर उनको इतनी हानि पहुंचाई कि उसे देख सुनकर लोगों का मन ही इस त्यौहार से वितृष्णा से भर गया। तब होली उल्लास कम चिंता का विषय बनती जा रही थी।
शराब पीकर हुड़दंग करने वालों ने लंबे समय तक शहरों में आतंक का वातावरण भी निर्मित किया। समय के साथ सरकारें भी चेतीं और जब कानून का डंडा चला तो फिर हुडदंगबाजों की हालत भी खराब हुई। हर बरस सरकारें और प्रशासन होली पर बहुत सतर्कता बरतता है। इस बीच हुआ यह कि शहरी क्षेत्रों में अनेक लोग होली से बाहर निकलने से कतराने लगे। एक तरह से यह उनकी आदत बन गयी। अब तो ऐसे अनेक लोग हैं जो इस त्यौहार को घर पर बैठकर ही बिताते हैं।
जब सरकारों का ध्यान इस तरफ ध्यान नहीं था और पुलिस प्रशासन इसे सामान्य त्यौहारों की तरह ही लेता था तब हुड़दंगी राह चलते हुए किसी भी आदमी को नाली में पटक देते। उस पर कीचड़ उछालते। शहरों में तो यह संभव ही नहीं था कि कोई पुरुष अपने घर की स्त्री को साथ ले जाने की सोचे। जब पूरे देश में होली के अवसर पर सुरक्षा व्यवस्था का प्रचनल शुरु हुआ तब ऐसी घटनायें कम हो गयी हैं। इधर टीवी, वीडियो, कंप्यूटर तथा अन्य भौतिक साधनों की प्रचुरता ने लोगों को दायरे में कैद कर दिया और अब घर से बाहर जाकर होली खेलने वालों की संख्या कम ही हो गयी है। अब तो यह स्थिति है कि कोई भी आदमी शायद ही अनजाने आदमी पर रंग डालता हो। फिर महंगाई और रंगों की मिलावट ने भी इसका मजा बिगाड़ा।
महंगाई की बात पर याद आया। आज सुबह एक मित्र के घर जाना हुआ। उसी समय उसके मोहल्ले में होली जलाने के चंदा मांगने वाले कुछ युवक आये। हमने मित्र से हाथ मिलाया और अंदर चले गये। उधर उनकी पत्नी पचास रुपये लेकर आयी और लड़कों को सौंपते हुए बोली-‘इससे ज्यादा मत मांगना।’
एक युवक ने कहा-‘नहीं, हमें अब सौ रुपये चाहिये। महंगाई बढ़ गयी है।’
मित्र की पत्नी ने कहा-‘अरे वाह! तुम्हारे लिये महंगाई बढ़ी है और हमारे लिये क्या कम हो गयी? इससे ज्यादा नहीं दूंगी।’
लड़के धनिया, चीनी, आलू, और प्याज के भाव बताकर चंदे की राशि बढ़ाकर देने की मांग करने लगे।
मित्र ने अपनी पत्नी से कहा-‘दे दो सौ रुपया, नहीं तो यह बहुत सारी चीजों के दाम बताने लगेंगे। उनको सुनने से अच्छा है इनकी बात मान लो।’
गृहस्वामिनी ने सौ रुपये दे दिये। युवकों ने जाते हुए कहा-‘अंकल और अंाटी, आप रात को जरूर आईये। यह मोहल्ले की होली है, चंदा देने से ही काम नहीं चलेगा। आना भी जरूर है।’
मित्र ने बताया कि किसी समय उन्होंने ही स्वयं इस होली की शुरुआत की थी। उस समय लड़कों के बाप स्वयं चंदा देकर होली का आयोजन करते थे अब यह जिम्मेदारी लड़कों पर है।’
कहने का अभिप्राय यह है कि इस सामूहिक त्यौहार को सामूहिकता से मनाने की एक बेहतर परंपरा जारी है। जबकि पहले जोर जबरदस्ती सामान उठाकर ले जाकर या चंदा ऐंठकर होली मनाने का गंदा प्रचलन अब बिदा हो गया है। जहां नहीं हुआ वह उसे रोकना चाहिये। सच बात तो यह है कि अनेक बेवकूफ लोगों ने अपने कुकृत्यों से इसे बदनाम कर दिया। यह खुशी की बात है कि समय के साथ अब उल्लास और शांति से यह त्यौहार मनाया जाता है।
इस अवसर पर कुछ क्षणिकायें 
--------------------------------------
रंगों में मिलावट
खोऐ में मिलावट
व्यवहार में दिखावट
होली कैसे मनायें।
कच्चे रंग नहीं चढ़ता
अब इस बेरंग मन पर
दिखावटी प्यार कैसे जतायें।
---------
रंगों के संग
खेलते हुए उन्होंने होली
कुछ इस तरह मनाई,
नोटों के झूंड में बैठकर
इठलाते रहे
इसलिये उनकी पूरी काया
रंगीन नज़र आयी।
---------
अगर रुपयों का रंग चढ़ा गया तो
फिर कौनसे रंग में
बेरंग इंसान नहायेगा,
आंख पर कोई रंग असर नहीं करता
होली हो या दिवाली
उसे बस मुद्रा में ही रंग नज़र आयेगा।



कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Thursday, February 18, 2010

शब्द और अनुभूति-हिन्दी कविता (shabd aur anubhuti-hindi poem)

कब तक तस्वीरों को देखकर
अपना दिल बहलायें,
चेहरों की आखों से पढ़कर
शब्द अपनी समझ से तय कर
दिमाग में सजायें।
इससे तो अच्छा है कि किताबों में
शब्द पढ़कर तस्वीरों के अहसास पायें।
तस्वीरें कितना बोलेंगी,
आंखें कैसे शब्दों को तोलेंगी,
चेहरे स्तब्ध करते हैं
आंखों में आश्चर्य भरते हैं,
दिल की गहराई तक तो
शब्द ही अनभूति पहुंचायें।
इसलिये फुरसत में अपने आगे
किताबों की ही सजायें।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Sunday, February 7, 2010

इंसानी दिल-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (heart of man-hindi satire poem)

मतलब के लिए इंसान

अपना दिल इस तरह बदल जाते

कि आखें होती तो

बेपैंदी के लोटे भी देखकर शर्माते।

जुबान होती तो

एक दूसरे पर इंसान होने का शक जताते।

----------

नब्बे फीसदी सांप

जहरीले नहीं होते

यह विशेषज्ञ ने बताया।

तब से इंसानों की सांप से

तुलना करना बंद कर दिया हमने

क्योंकि सांप के डसने से

कई लोगों को बचते देखा

पर इंसानों के धोखे से बचता

कोई नज़र नहीं आया।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Wednesday, February 3, 2010

नजरिया-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (nazariya-hindi comic poems)

जिंदगी का सच कटु होता जितना

इंसान का सपना उतना ही रंगीन हो जाता है।

रंगीले इंसानों के लिये

जिंदगी की  कड़वाहट में है मनोरंजन

इसलिये सोच से बने अफसानों में

हर रंग सराबोर हो जाता है।

----------

अमीर के बच्चे ने

गरीबों के दर्द पर

तो गरीब के बच्चे ने अमीरी के ख्वाब पर लिखा।

किन हालातों पर रोयें, किन पर हंसे

इंसानों के नजरिये में ही फर्क दिखा।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Saturday, January 30, 2010

मत बहको ऊंचे ठाठ देखकर-हिन्दी शायरी (amiron ke thath dekhakr-hindi comic poem)

दौलत की रौशनी से अमीर, अपनी महफिलें सजाते हैं,

गरीबों के दिल में लगे आग, इसलिये  चिराग जलाते हैं।

मत बहको ऊंचे उनके ठाठ देखकर, हमेशा धोखा खाओगे,

बेचने वाली शयों के, सौदागर ही पहले ग्राहक बन जाते हैं।

दरियादिल दिख रहे है, पर सारा सामान मुफ्त का सजा है

कहीं से चीज का मिला तोहफा, कहीं से पैसा जुटाते हैं।

घी से भरा उनका घर, मिलावटी तेल के कनस्तर बेचकर

मौत के मुख में भेजने पहले, जिंदगी का रास्ता बताते हैं।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Wednesday, January 27, 2010

प्यार, नफरत और दिल-हिन्दी व्यंग्य कविताएं (pyar,nafarat aur dil-hindi vyangya kavitaen)

राज रखकर ही राज

चलाये जाते हैं

सामने कर दुश्मनी के सौदे

बंद कमरे में दोस्तों में

बांटे जाते हैं।

जज़्बात मर गये हैं लोगों के

प्यार हो नफरत

दिल के अदंर तक नहीं पहुंचती

केवल जमाने को दिखाये जाते हैं।

--------

दिन भर दिखाते रहे

अपनी दुश्मनी जमाने को,

रात को चले दोस्ती निभाने को।

विज्ञापन का युग है

तारीफों पर अब लोग नहीं बहलते

इसलिये लोग चल पड़ते हैं

दोस्त के ही हाथ से अपने लिये गालियां लिखाने को।


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Sunday, January 24, 2010

उनके लिये देशभक्ति एक शय-हिन्दी शायरी (hindi shayri on deshbhakti)

स्वयं की है दौलत में आसक्ति,

वही सिखा रहे हैं सभी को करना

देश की भक्ति।



न आसमान गिर रहा है

न जमीन धंसक रही है

आम इंसान उनके रंगीन दृश्यों पर

कभी दृष्टि न डाले,

अपने अंदर खास होने के

कभी ख्याल न पाले,

इसलिसे उसे कभी सपने बेचकर बहलाते,

कभी सामने पर्दे पर

खौफ के मंजर भेजकर डराते,

रात की रौशनी से रोमांस करने वाले

दिन में पूरे जमाने को 

भरमाने में लगाते अपनी शक्ति।



जिनके लिये जज़्बात हैं, खाने का कबाब ,

उनके लिये पैसा ही है शराब,

असली खून पर उठाकर लाते बेचने आंसु,

नकली कामयाबी पर जश्न बेचते धांसु,

नारों को सोच बताकर बहस करते,

खाली वादों में ही

बड़े इंसानों की दरियादिली की हवस भरते,

ढेर सारे सामान लुटा लिये

फिर भी नहीं होती उनको विरक्ति,

जब नहीं होता सामान दुकान में

बेचने लगते हैं बाजार में देशभक्ति।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Tuesday, January 19, 2010

चाहत और राहत-हिन्दी व्यंग्य कविता (chahat aur rahat-hindi vyangya kavita)

असुंदर को सुंदरता की,

भूखे को रोटी की,

और उदास इंसान को

मनोरंजन की होती है चाहत।

इसलिये सुंदर को

असुंदरता का अपमान देखकर,

अमीर को भूख के दर्द से

शाब्दिक हमदर्दी दिखाकर,

और मनोरंजन से थके इंसान को

उदासी की बातों से मिलती है राहत।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Thursday, January 7, 2010

शहंशाह-हिन्दी शायरी (shanshah-hindi shayri)

जिसके सिर पर ताज का बोझ नहीं है,

काम करने का जिम्मा रोज नहीं है,

कान नहीं खड़े होते हमेशा

किसी का हुक्म सुनने के लिये,

जिसके हाथ नहीं मोहताज

किसी का जुर्म बुनने के लिये,

जिसकी आंखें नहीं ताकती

मदद के लिये किसी दूसरे की राह,

खुशदिल आदमी बोले हर समय ‘वाह’।

वही है असली शहंशाह।

-----------

झुकते हैं वही सिर

जिन पर होता है ताज,

तलवार का वार झेलती  वही गर्दन

जो अकड़ जाती हैं करते राज

सफेल मलमल के सिंहासन के पीछे

डर और अहंकार का रंग है काला स्याह।

दौलत कमाने वाले नटों के

हाथ में डोर है

पुतले राज करते हुए कहलाते शहंशाह।



कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Tuesday, December 29, 2009

धोखे की कहानी-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (dhokhe ki kahani-hindi vyangya kavitaen)

यह पेज
------------------
उन्होंने धोखा दिया

इस पर क्यों अब आसू बहाते हो?

अपनों से ही होता है धोखा

दुनियां का यह कायदा क्यों भूल जाते हो।

उनके वादे पर रख दिया

अपना सारा सामान उनके घर,

कोई सबूत नहीं था

उनकी ईमानदारी का

यकीन किया तुमने उन पर मगर,

अपने बेबुनियाद विश्वास को छिपाकर

उनके धोखे की कहानी

पूरे जमाने को क्यों सुनाते हो।

----------

उनको महल में पहुंचा दिया

इस विश्वास पर कि

वह हमारी झौंपड़ी सजा देंगे।

यह नहीं सोचा

वह भी इंसान है हमारी तरह

याद्दाश्त उनकी भी कमजोर है

वहां मुद्दत बाद  मिले सुख में

अपने भी भूल जायेंगे दुःख के दिन

हमारे कैसे याद करेंगे।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Wednesday, December 23, 2009

गुलामों पर राज-हिन्दी शायरी (gulam raj-hindi shayri)

हांड़मांस के बुत हैं

इंसान भी कहलाते हैं,

चेहरे तो उनके अपने ही है

पर दूसरे का मुखौटा बनकर

सामने आते हैं।

आजादी के नाम पर

उनके हाथ पांव में जंजीर नहीं है

पर अक्ल पर

दूसरे के इशारों के बंधन

दिखाई दे जाते हैं।

नाम के मालिक हैं वह गुलाम

गुलामों पर ही राज चलाये जाते हैं।


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Saturday, December 19, 2009

खूबसूरती और ताकत-हिन्दी साहित्य कवितायें (khubsurti aur takat-hindi sahitya kavita)

सुंदरता अब सड़क पर नहीं

बस पर्दे पर दिखती है

जुबां की ताकत अब खून में नहीं

केवल जर्दे में दिखती है।

सौंदर्य प्रसाधन पर पड़ती

जैसे ही पसीने की बूंद

सुंदरता बह जाती,

तंबाकू का तेज घटते ही

जुबां खामोश रह जाती,

झूम रहा है वहम के नशे में सारा जहां

औरत की आंखें देखती

दौलत का तमाशा

तो आदमी की नजर बस

कृत्रिम खूबसूरती पर टिकती है।

 


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकाऐं

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर