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Sunday, November 14, 2010

बैचेन रहने की आदत ऐसे नहीं जायेगी-हिन्दी व्यंग्य (bachain rahne ki aadat aise nahin jayegi -hindi vyangya)

लिखना तथा एक तिवारी जी नामक हिन्दी पटकथा लेखक पर संयोग ऐसा बन गया कि हमें अपना नाम जोड़कर भी इस लेख को लिखना पड़ रहा है क्योंकि इंतजार है उस ब्लाग लेखक के उत्तर का जिसने बिना कांट छांट किये हमारी एक कविता को अपने ब्लाग पर बिना नाम के छाप दिया और हमने उस पर अपनी टिप्पणी लिख कर मामले के निपटारे की मांग की है।
हिन्दी में रचनाकार नहीं है, यह नारा बहुत दिनों से सुन रहे हैं-इस नारे में बाज़ार, राज्य तथा प्रचार व्यवसाय के जुड़े लोगों के जो वह बुद्धिजीवी लगाते हैं जो केवल आलेख लिखते हैं वह भी प्रायोजन मिलने पर। इधर राखी का इंसाफ धारावाहिक विवाद में फंसा तो एक राखी का स्वयंवर धारावाहिक का एक पटकथा लेखक सामने आया जिसने यह दावा किया है कि वह उसकी चुराई हुई है। स्थिति यह है कि उसने आत्महत्या करने की धमकी दे डाली है जैसे कि राखी के इंसाफ में ताने से प्रेरित होकर झांसी के एक लक्ष्मण युवक ने कर ली है।
तिवारी नाम धारी उसे लेखक का दावा था कि जब उसने अपनी पटकथा का होने का दावा किया तो उसे धमकाया गया और कहा गया कि ‘इसकी नायिका एक तरह से पूरे मीडिया की बेटी है। इसलिये उससे पंगा मत लो।’
हमें उस तिवारी नामधारी लेखक से सहानुभूति है। ऐसा लगता है कि वह सच बोल रहा होगा क्योंकि फिल्मों के बारे में मिली यह पहली शिकायत नहीं है। हमारे एक चौरसिया नाम के एक मित्र कहानीकार हैं। उन्होंने कम से कम पच्चीस वर्ष पूर्व एक कलात्मक फिल्म में अपनी कहानी चोरी होने की बात कही थी। तब हंसी आयी थी पर इसमें कोई शक नहीं था चौरसिया जी उच्च दर्जे के कहानीकार हैं। इधर हमने यह भी देखा कि एक अखबार हमारे ही चिंतनों को जस का तस छापता रहा है। जब नाम छापने को कहते हैं कि तो जवाब मिलता है कि ब्लाग का नाम छापने की परंपरा नहीं है। नाम छापने को कहा गया तो जवाब मिला कि अपने संपादक से कहेंगे कि आपकी रचनायें नहीं ले।
कितनी तुच्छ मानसिकता है उन लोगों की जो हिन्दी की खा रहे हैं। हिन्दी लेखक उनकी नज़र में है क्या? क्या खौफ है कि नाम छापेंगे तो लेखक अमिताभ बच्चन बन जायेगा और उसे साबुन, क्रीम या मोटरसाइकिल के विज्ञापन मिलने लगेंगे। मजे की बात है कि नामा न देने की बात स्वीकार तो हिन्दी लेखक कर ही लेते हैं कि क्योंकि उनको पता है कि हिन्दी लेखन और पूंजीपतियों के बीच जो दलाल हैं वह अपना ही पेट मुश्किल से भर पाते हैं पर नाम न देने की बात हमारे समझ में नहीं आयी। स्थिति यह हो गयी है कि समाचार पत्र पत्रिकाओं के पास अब साफ सुथरी हिन्दी लिखने वाले ही नहीं बचे। महंगाई बढ़ रही है कि हिन्दी के अखबार की कीमत आज भी दो ढाई रुपये से अधिक नहीं है। अब तो ऐसा लगता है कि प्रचार माध्यमों के लिये पाठक और दर्शक एक तरह से गूंगी फौज हो गयी है जिसके सहारे वह उच्च स्तर पर अपनी ताकत दिखा रहे हैं वरना आम आदमी में उनकी कोई पकड़ नहीं है। आजकल तो हर आदमी टीवी की तरह मुंह किये बैठा है। इसलिये ही स्थानीय स्तर पर टीवी चैनलों ने अपने पंाव फैला दिये हैं। अखबार छपने की संख्या और उसे पढ़ने वालों की संख्या में बहुत अंतर है। उससे भी अधिक अंतर तो पढ़ने वाले और उस अखबार से हमदर्दी रखने और पढ़ने वालों के बीच है। मतलब यह कि पहले लोग न केवल अखबार पढ़ते थे बल्कि उसे मानसिक हमदर्दी भी रखते थे। यह अब नहंी है।
हिन्दी ब्लाग पर लिखना और लिखवाना आसान नहीं है। अगर किसी लेखक से लिखने को कहो तो वह कहता है कि रचना चोरी हो जायेगी। मतलब यह कि लिखने को तैयार नहीं है और जो लिख रहे हैं वह चोरी का शिकार हो रहे हैं। लोग झूठ कहते हैं कि हिन्दी के ब्लाग केवल ब्लाग लेखक ही पढ़ रहे हैं और अच्छा नहीं लिखा जा रहा है। जबकि इस लेखक के गांधी और ओबामा पर लिखे पाठों के अनेक एक स्तंभकार ने चोरी किये जो कि इसका प्रमाण है कि कथित बुद्धिजीवी भी अब अंतर्जाल पर अपनी सामग्री टटोल रहे हैं। यह शायद मजाक लगता हो पर सच यही है कि कुछ ब्लाग लेखकों का नाम बाहर नहीं लिया जा रहा पर सच यही है कि उनके पाठ दूरगामी मार वाले हैं और बुद्धिजीवी उनसे प्रभावित हैं। हिन्दी ब्लाग पर कूड़ा लिखा जा रहा है तो बताईये बाहर कौनसा सदाबाहर साहित्य लिखा पढ़ने को मिल रहा है। इस ब्लाग लेखक के ब्लागों पर पाठकों की टिप्पणियां इस तरह की आती हैं कि ‘गजब! आप ऐसा भी सोच और लिख सकते हैं।’
लोगों के पास चिंतन नहीं है, दावा चाहे कितने भी करें। नारों पर लिखते हैं और वाद सजाते हैं। फिर उसमें किसी न किसी की तारीफ या निंदा का बिगुल बजाते हैं। फिल्म वालों के पास तो काल्पनिकता और यथार्थ का समन्वय करने की कभी शक्ति ही नहीं दिखी है क्योंकि वहां के निर्माता और निर्देशक हिन्दी लेखकों को स्वतंत्रता न देकर लिपिक बना लेते हैं। समाचार पत्र पत्रिकाओं में लेखकों को लिपिक की तरह ही देखा जाता है। स्थिति यह है कि अधिकतर हिन्दी अखबार अब अंग्रेजी शब्दों के मोह में फंस गये हैं। प्रबंधन करना नहीं आया तो अब मैनेजमेंट करने लगे हैं। क्या खाक करेंगे? प्रबंधन हो या मैनेजमेंट बिना चिंतन और मनन के नहीं होते। हिन्दी का खाकर उसे मिटाने की योजना या साजिश रची गयी है। कहते हैं कि हिन्दी को विश्व स्तर पर पहुंचाना है। क्या खाक पहुंचायेंगे खुद को आती नहीं है। फिर दावा कि हम भाषाविद हैं? क्या खाक हैं एक ढंग की कविता नहीं लिख सकते। हम जैसी कि चुराने का मन हो? कुछ गुस्सा और कुछ हंसी! इस भाव से हम यह लेख लिख रहे हैं क्योंकि चोरी का सदमा है तो खुशी इस बात की है कि हम अच्छा लिख रहे हैं।
आईये पहले उस ब्लाग का नाम देखें। उससे पहले देखकर आयें कि उसने हमारी टिप्पणी का क्या किया? उसने न टिप्पणी प्रकाशित की और न ही जवाब दिया। हम भी उसका नाम नहीं लिख रहे। उसकी बेवसाईट का पता रख लिया है। ऐसा लगता है कि बिचारा रोमन में हिन्दी लिखता है और यह उसकी पहली ऐसी रचना है जो देवानगारी में है। हम उसे बदनाम नहीं करना चाहते पर उम्मीद है कि भाई लोग इसे पढ़कर उसे समझायेंगे। वैसे वह  हमारी टिप्पणियाँ नहीं छाप रहा पर रोमन लिपि में अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर रहा  है । हम यह सब  इसलिए रहे हैं क्योंकि बैचेन रहने की आदत ऐसे नहीं जाएगी। यहाँ यह भी बता दें हमारी रचना छापने का दाम पूछकर एक हज़ार और न पूछना पर दो हज़ार है और हम इसकी विधिवत माग करेंगे। इस लेख का लिखने का दंड अलग से वसूल करेंगे।  
हमारी   रचना यह है 
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बैचेन रहने की  आदत 
लोगों की हमेशा बेचैन रहने की
आदत ऐसी हो गयी है कि
जरा से सुकून मिलने पर भी
डर जाते हैं,
कहीं कम न हो जाये
दूसरों के मुकाबले
सामान जुटाने की हवस
अभ्यास बना रहे लालच का
इसलिये एक चीज़ मिलने पर
दूसरी के लिये दौड़ जाते हैं
। 
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हमारा लिंक यह हैं
http://rajdpk.wordpress.com/2010/10/31/baichen-ki-aadta-hindi-poem/

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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Wednesday, June 24, 2009

वैश्विक काल में हिंदी भाषा का सृजन-आलेख (future of hindi in the world-hindi lekh)

वह बहस बहुत अच्छी थी। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के सृजन को किसी लेखक ने-उसका नाम इस लेखक ने उसी ब्लाग के पाठ में पढ़ा हालांकि बताया जा रहा था कि वह कोई प्रसिद्ध हिंदी आलोचक हैं-ने दो कौड़ी का बता दिया। विद्वान टिप्पणीकारों ने उस पर तमाम टिप्पणियां लिखी। कुछ अप्रवासी हिंदी लेखक उनके बयान से दुःखी थे। हां, उस पाठ में जिस आलोचक का नाम था उसके बारे में पहली इस लेखक ने सुना पर टिप्पणीकर्ताओं का नाम वह जानता है। इस लेखक के मध्यप्रदेश के ही एक प्रसिद्ध ब्लाग लेखक ने भी टिप्पणी लिख कर उस जोरदार बहस पर हैरानी जाहिर की। आशय यह है कि हमारे प्रदेश पाठक और लेखक के इस तरह की साहित्यक बहसों से घबड़ाते हैं जिसमें कहानी, कवितायें या अन्य साहित्यक विद्या की खास रचना की बजाय भाषा के लिखने पर बहस हो रही हो। एक दूसरी भी मुश्किल है कि अंतर्जाल पर अन्य प्रदेशों के ब्लाग लेखक कई ऐसी प्रसिद्ध साहित्य हस्तियों का नाम बताते हैं जिनका नाम तक इस प्रदेश में पैदा लोग नहीं जानते।

बहरहाल उस आलोचक महाशय के अनुसार विदेश में रह रहे लेखक बस अपने को पत्रकार या लेखक साबित करने के लिये लिखते हैं वरना उनका लिखा दो कौड़ी का है। बात इस लेखक के सिर के ऊपर से निकल गयी। पहली बात तो किसी का लिखा दो कौड़ी का नहीं होता। अगर कोई मूर्धन्य साहित्यकार भी आकर हमसे कहे कि अमुक आदमी ने दो कौड़ी का लिखा है तो हम उनकी साहित्यक रचनाओ की चिंदियां उनको दिखा सकते हैं कि वह इससे बेहतर हैं।
दूसरा सवाल यह है कि विदेश में रह रहे अप्रवासी भारतीय अपने आपको लेखक या पत्रकार साबित करने का प्रयास कर रहे हैं तो उसमें बुराई क्या है? आखिर आदमी लिखता क्यों है? अपनी बात दूसरे से कहने के लिये? दूसरा पढ़कर उसे लेखक मान ही लेता है। हिंदी में वह हर रचना साहित्य है जो सामाजिक और रचनात्मक सरोकारों से जोड़कर लिखी गयी है। इस लेखक के इस पाठ को कुछ लोग साहित्यक न माने पर यह प्रमाणपत्र देने वाले वह कौन? यह पाठ किसी को पत्र बनाकर नहीं लिखा जा रहा है। बल्कि इसे हिंदी भाषा से सरोकार रखने वाले विषय पर लिखा गया है। स्पष्टतः इससे कोई न कोई सामाजिक तथा रचनात्मक सरोकार जुड़ा है।
हिंदी में स्तरीय और गैरस्तरीय लेखन की बहुत चर्चा होती है। कई ऐसे सेमीनार होते हैं जिनमें शामिल होकर ऐसा लगता है कि हम कहां आकर फंसे। इससे अच्छा तो कोई घर पर बैठकर एक दो हास्य कविता लिखकर ही जी हल्का कर लेते। यह बात तय है कि हम अपने आपको एक लेखक और साहित्यकार ही समझते हैं और लगता नहीं कि इसके लिये किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता है।
सच बात तो यह है कि हम जिसे गैर स्तरीय साहित्य कहते हैं वह बाजार में हर जगह मिलता है और पाठक भी उसके बहुत हैं। अपराध और यौन से संबंधित साहित्य की बाजार में बिक्री बहुत है पर हममें से कई लेखक उसे गैरस्तरीय कहकर हिकारत से देखते हैं पर सच यह भी है कि कई इनको पढ़ते हुए ही लिखने के लिये प्रेरित हुए। हालांकि यह भी सच है कि लोग वाकई स्तरीय विषय पढ़ना चाहते हैं पर बाजार की समस्या यह है कि वह लेखक को लिपिक की तरह बनाये रखना चाहता है। इससे उसकी मौलिकता और स्वतंत्रता नष्ट होती है। यही कारण है कि हिंदी में बेहतर साहित्य प्रकाशित नहीं हो पाता-लिखा नहीं जाता यह कहना गलत है।
वैसे ही दूसरे की रचनाओं पर टीका टिप्पणियां करने वालों का लेखन कैसा है यह अलग से बहस का विषय है। अगर आप देखें तो हमारे यहां अनेक हास्य कवियों ने करोड़ो रुपये कमा लिये पर क्या उनकी रचनाओं में कहीं कोई सामाजिक संदेश है? हिंदी फिल्मों के कामेडियनों की तरह अदायें करते हुए अनेक कवि लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गये। अगर आप कथित रूप से स्तरीय पढ़ने वाले हैं तो क्या आप उसे साहित्य मानते हैं। शायद आप कहेंगे ‘नहीं’ पर वही कवि अगर आपके सामने आ जाये या अंतर्जाल पर टिप्पणी लिख दे तो अपने आपको धन्य कहने लगेंगे।

इधर अनेक लेखकों के चेले चपाटे अंतर्जाल पर सक्रिय हुए हैं और वह उनके कथित साक्षात्कार इस उद्देश्य से प्रकाशित करते हैं कि उनके प्रदेश या शहर से अधिक से अधिक टिप्पणियां आ जायेंगी। यह बुरा भी नहीं है पर जब अंतर्जाल पर लिखने वाले हिंदी लेखकों पर कटाक्ष होता है तब यह बताना पड़ता है कि यह अंतर्जाल पर लिखना कोई आसान काम नहीं है। बहुत कटु पर सत्य है कि एक लंबे अर्से से हिंदी के आकाश पर कोई ऐसा लेखक पैदा ही नहीं हुआ जो सदाबहार रचनायें दे सके। सभी ने बाजार और राज्य के तय ढांचे में ही अपनी रचनायें कर धन, पद और सम्मान पाया मगर हिंदी भाषा को समृद्ध करने वाले कितने लेखक हैं यह हम सभी जानते हैं।
आज के जो भी कथित बड़े लेखक हैं वह अंतर्जाल को न तो पढ़ते हैं न उनकी रुचि है। कंप्यूटर पर लिखना या पढ़ना कोई मुश्किल काम नहीं है पर इससे दूर रहकर अगर अपनी यथास्थिति रहती है तो इसे कौन सीखना चाहेगा? इस लेखक का तो हमेशा यही कहना है कि हां, हम तो लेखक कहलाने ही यहां आये हैं। क्या करें? हर जगह ढांचे और खांचे बने हुऐ हैं जिसमें हमारा लिखा फिट होगा या नहीं इस बात से अधिक इस बात का महत्व है कि हमारा व्यवहार-जिसमें चाटुकारिता, चंदा और चतुराई शामिल है-उनके अनुकूल है कि नहीं।
यहां प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अपने ऊपर छोड़े जा रहे व्यंग्यबाणों की इसलिये परवाह नहीं करते क्योंकि हमें अपने लेखक होने पर कोई संदेह नहीं है। साहित्य की हर विद्या पर लिखा-अच्छा या बुरा यह संकट पाठकों का है-और यह साबित करने का प्रयास किया कि ब्लाग भी पत्रिका की तरह उपयोग में लाया जा सकता है। यहां हमने पढ़ा भी और पाया कि समाज के आम लोगों के विचारों का जो प्रतिबिंब यहां दिखाई देता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अंतर्जाल पर लेखक टाईप स्वयं करते हैं इससे उनको छोटा समझना अपने आप में बेवकूफी है। अभी तक अनेक बड़े लेखक और पत्रकार यही मानते हैं कि टाईप करने का काम लिपिकीय है। इसके विपरीत यह लेखक तो दूसरी बात ही कहता है कि बेहतर लेखक वही है जो स्वयं एक बैठक में टाईप कर अंतर्जाल पर प्रस्तुत करता है। अधिकतर अंग्रेजी लेखक सीधे टाईप कर रचनायें लिखते रहे हैं-यह जानकारी पत्र पत्रिकाओं से मिलती रही है। हिंदी के कथित बड़े लेखक आत्ममुग्धता की स्थिति से उबर नही पाये और उन्हें यह सुनकर निराशा होगी कि हिंदी का असली लेखक तो अब हिंदी के वैश्विक काल की शुरुआत कर चुका है-उनका आधुनिक काल अब बीते समय की बात हो गया है। उनकी कहानियां और कवितायें अब अप्रासंगिक होने जा रही है। ऐसे में अंतर्जाल पर लिखने वाले लेखकों को यही सलाह है कि वह कुंठा छोड़कर अपनी रचनायें करें। यह अप्रवासी और प्रवासी हिंदी लेखक की चर्चा भी इसलिये भी करनी पड़ी क्योंकि अभी लोगों के मन में है पर अगर हम इस हिंदी के नवीन वैश्विक काल की बात करें तो वह अप्रासंगिक है क्योंकि आपने हिंदी में लिखा तो यह इस बात की पूरी संभावना है कि वह किसी अन्य भाषा में टूलों से स्वाभाविक रूप से अनुवाद कर पढ़ा जायेगा और इसके लिये मानवीय अनुवादक की जरूरत नहीं है। ऐसे में कुछ लेखक आगे इस तरह का प्रयास करेंगे कि वह जब भारतीय संदर्भ में अपनी रचना लिखें तो वह विश्व के डेढ़ सौ देशों के लोगों की समझ में आये। उनकी यह सोच निश्चित रूप से हिंदी को एतिहासिक रचनायें देगी। शेष फिर कभी।
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Monday, March 23, 2009

व्यंग्य सामग्री के लिये आड़ की क्या जरूरत-आलेख

यह कोई आग्रह नहीं है यह कोई चेतावनी भी नहीं है। यह कोई फतवा भी नहीं है और न ही यह अपने विचार को किसी पर लादने का प्रयास है। यह एक सामान्य चर्चा है और इसे पढ़कर इतना चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। हां, अगर मस्तिष्क में अगर चिंतन के तंतु हों तो उनको सक्रिय किया जा सकता है। किसी भी लेखक को किसी धर्म से प्रतिबद्ध नहीं होना चाहिये पर उसे इस कारण यह छूट भी नहीं लेना चाहिये कि वह अपने ही धार्मिक पुस्तकों या प्रतीकों की आड़ में व्यंग्य सामग्री (गद्य,पद्य और रेखाचित्र) की रचना कर वाह वाही लूटने का विचार करे।
यह विचित्र बात है कि जो लोग अपनी संस्कृति और संस्कार से प्रतिबद्धता जताते हैंे वही ऐसी व्यंग्य सामग्रियों के साथ संबद्ध(अंतर्जाल पर लेखक और टिप्पणीकार के रूप में) हो जाते हैं जो उनके धार्मिक प्रतीकों के केंद्र बिंदु में होती है।
यह लेखक योगसाधक होने के साथ श्रीगीता का अध्ययनकर्ता भी है-इसका आशय कोई सिद्ध होना नहीं है। श्रीगीता और भगवान श्रीकृष्ण की आड़ लेकर रची गयी व्यंग्य सामग्री देखकर हमें कोई पीड़ा नहीं हुई न मन विचलित हुआ। अगर अपनी इष्ट पुस्तक और देवता के आड़ लेकर रची गयी व्यंग्य सामग्री देखकर परेशानी नहीं हुई तो उसका श्रेय भी उनके संदेशों की प्रेरणा को ही जाता है।
यह कोई आक्षेप नहीं है। हम यहां यह चर्चा इसलिये कर रहे हैं कि कम से कम अंतर्जाल पर सक्रिय लेखक इससे बाहर चल रही पुरानी परंपरागत शैली से हटकर नहीं लिखेंगे तो यहां उनकी कोई पूछ परख नहीं होने वाली है। अंतर्जाल से पूर्व के लेखकों ने यही किया और प्रसिद्धि भी बहुत पायी पर आज भी उन्हें इस बात के लिये फिक्रमंद देखा जा सकता है कि वह कहीं गुमनामी के अंधेरे में न खो जायें।
स्वतंत्रता से पूर्व ही भारत के हिंदी लेखकों का एक वर्ग सक्रिय हो गया था जो भारतीय अध्यात्म की पुस्तकों को पढ़ न पाने के कारण उसमें स्थित संदेशों को नहीं समझ पाया इसलिये उसने विदेशों से विचारधारायें उधार ली और यह साबित करने का प्रयास किया कि वह आधुनिक भारत बनाना चाहते हैं। उन्होंने अपने को विकासवादी कहा तो उनके सामने खड़े हुए परंपरावादियों ने अपना मोर्चा जमाया यह कहकर कि वह अपनी संस्कृति और संस्कारों के पोषक हैं। यह लोग भी कर्मकांडों से आगे का ज्ञान नहीं जानते थे। बहरहाल इन्हीं दो वर्गों में प्रतिबद्ध ढंग से लिखकर ही लोगों ने नाम कमाया बाकी तो संघर्ष करते रहे। अब अंतर्जाल पर यह अवसर मिला है कि विचाराधाराओं से हटकर लिखें और अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचायें।
पर यह क्या? अगर विदेशी विचाराधाराओं के प्रवर्तक लेखक भगवान श्रीकृष्ण या श्रीगीता की आड़ में व्यंग्य लिखें तो समझा जा सकता है और उस पर उत्तेजित होने की जरूरत नहीं है। निष्काम कर्म, निष्प्रयोजन दया और ज्ञान-विज्ञान में अभिरुचि रखने का संदेश देने वाली श्रीगीता का नितांत श्रद्धापूर्वक अध्ययन किया जाये तो वह इतना दृढ़ बना देती है कि आप उसकी मजाक उड़ाने पर भी विचलित नहीं होंगे बल्कि ऐसा करने वाले पर तरस खायेंगे।
अगर श्रीगीता और भगवान श्रीकृष्ण में विश्वास करने वाले होते तो कोई बात नहीं पर ऐसा करने वाले कुछ लेखक विकासवादी विचाराधारा के नहीं लगे इसलिये यह लिखना पड़ रहा है कि अगर ऐसे ही व्यंग्य कोई अन्य व्यक्ति करता तो क्या वह सहन कर जाते? नहीं! तब वह यही कहते कि हमारे प्रतीकों का मजाक उड़ाकर हमारा अपमान किया जा रहा है। यकीनन श्रीगीता में उनकी श्रद्धा होगी और कुछ सुना होगा तो कुछ ज्ञान भी होगा मगर उसे धारण किया कि पता नहीं। श्रीगीता का ज्ञान धारण करने वाला कभी उत्तेजित नहीं होता और न ही कभी अपनी साहित्य रचनाओं के लिये उनकी आड़ लेता है।
सच बात तो यह है कि पिछले कुछ दिनों से योगसाधना और श्रीगीता की आड़ लेकर अनेक जगह व्यंग्य सामग्री देखने,पढ़ने और सुनने को मिल रही है। एक पत्रिका में तो योगसाधना को लेकर ऐसा व्यंग्य किया गया था जिसमें केवल आशंकायें ही अधिक थी। ऐसी रचनायें देखकर तो यही कहा जा सकता है कि योगसाधना और व्यंग्य पर वही लोग लिख रहे हैं जिन्होंने स्वयं न तो अध्ययन किया है और न उसे समझा है। टीवी पर अनेक दृश्यों में योगसाधना पर व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति देखकर इस बात का आभास तो हो गया है कि यहां गंभीर लेखन की मांग नहीं बल्कि चाटुकारिता की चाहत है। लोगों को योग साधना करते हुए हादसे में हुई एक दो मौत की चर्चा करना तो याद रहता है पर अस्पतालों में रोज सैंकड़ों लोग इलाज के दौरान मरते हैं उसकी याद नहीं आती।
देह को स्वस्थ रखने के लिये योगसाधना करना आवश्यक है पर जीवन शांति और प्रसन्नता से गुजारने के लिये श्रीगीता का ज्ञान भी बहुत महत्वपूर्ण है। इस धरती पर मनुष्य के चलने के लिये दो ही रास्ते हैं। मनुष्य को चलाता है उसका मन और वह श्रीगीता के सत्य मार्ग पर चलेगा या दूसरे माया के पथ पर। दोनों ही रास्तों का अपना महत्व है। मगर आजकल एक तीसरा पथ भी दिखता है वह दोनों से अलग है। माया के रास्ते पर चले रहे हैं पर वह उस विशाल रूप में साथ नहीं होती जो वह मायावी कहला सकें। तब बीच बीच में श्रीगीता या रामायण का गुणगान कर अनेक लोग अपने मन को तसल्ली देते हैं कि हम धर्म तो कर ही रहे हैं। यह स्थिति तीसरे मार्ग पर चलने वालों की है जिसे कहा जा सकता है कि न धन साथ है न धर्म।
अगर आप व्यंग्य सामग्री लिखने की मौलिक क्षमता रखते हैं तो फिर प्राचीन धर्म ग्रंथों या देवताओं की आड़ लेना कायरता है। अगर हमें किसी पर व्यंग्य रचना करनी है तो कोई भी पात्र गढ़ा जा सकता है उसके लिये पवित्र पुस्तकों और भगवान के स्वरूपों की आड़ लेने का आशय यह है कि आपकी सोच की सीमित क्षमतायें है। जो मौलिक लेखक हैं वह अध्यात्म पर भी खूब लिखते हैं तो साहित्य व्यंग्य रचनायें भी उनके हाथ से निकल कर आती हैं पर कभी भी वह इधर उधर से बात को नहीं मिलाते। अगर किसी अध्यात्म पुरुष पर लिखते हैं फिर उसे कभी अपने व्यंग्य में नहीं लाते।
अरे इतने सारे पात्र व्यंग्य के लिये बिखरे पड़े हैं। जरूरी नहीं है कि किसी का नाम दें। अगर आप चाहें तो रोज एक व्यंग्य लिख सकते हैं इसके लिये पवित्र पुस्तकों यह देवताओं के नाम की आड़ लेने की क्या आवश्यकता है? वैसे भी जब अब किसी का नाम लेकर रचना करते हैं और वह सीधे उसकी तरफ इंगित होती है तो वह व्यंजना विधा नहीं है इसलिये व्यंग्य तो हो ही नहीं सकती।
यह पाठ किसी प्रकार का विवाद करने के लिये नहीं लिखा गया है। हम तो यह कहते हैं कि दूसरा अगर हमारी पुस्तकों या देवताओं की मजाक उड़ाता है तो उस पर चर्चा ही नहीं करो। यहां यह भी बता दें कुछ लोग ऐसे है जो जानबूझकर अपने आपको धार्मिक प्रदर्शित करने के लिये अपने ही देवताओं और पुस्तकों पर रची गयी विवादास्पद सामग्री को सामने लाते हैं ताकि अपने आपको धार्मिक प्रदर्शित कर सकें। उनकी उपेक्षा कर दो। ऐसा लगता है कि कुछ लोग वाकई सात्विक प्रवृत्ति के हैं पर अनजाने में या उत्साह में ऐसी रचनायें कर जाते हैं। उनका यह समझाना भर है कि जब हम अपनी पवित्र पुस्तकों या देवताओं की आड़ में कोई व्यंग्य सामग्री लिखेंगे- भले ही उसमें उनके लिये कोई बुरा या मजाकिया शब्द नहीं है-तो फिर किसी ऐसे व्यक्ति को समझाइश कैसे दे सकते हैं जो बुराई और मजाक दोनों ही करता है। याद रहे समझाईश! विरोध नहीं क्योंकि ज्ञानी लोग या तो समझाते हैं या उपेक्षा कर देते हैं। यह भी समझाया अपने को जाता है गैर की तो उपेक्षा ही की जानी चाहिये। हालांकि जिन सामग्रियों को देखकर यह पाठ लिखा गया है उनमें श्रीगीता और भगवान श्रीकृष्ण के लिये कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं थी पर सवाल यह है कि वह व्यंग्यात्मक सामग्रियों में उनका नाम लिखने की आवश्यकता क्या है? साथ ही यह भी कि अगर कोई इस विचार से असहमत है तो भी उस पर कोई आक्षेप नहीं किया जाना चाहिये। सबकी अपनी मर्जी है और अपने रास्ते पर चलने से कोई किसी को नहीं रोक सकता, पर चर्चायें तो होती रहेंगी सो हमने भी कर ली।
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