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Tuesday, July 26, 2011

शांति संदेश और दर्द-हिन्दी कवितायें shanti sandesh aur dard-hindi kavitaen)

आसमान के उड़ते कबूतरों के झुंड को देखकर
ख्याल आया कि
इन शांति दूतों की हलचल पर
अब क्यों नहीं लोग नज़र डालते,
फिर जमीन पर देखा घूमते हुए
लोगों ने मिट्टी, लोहे और प्लास्टिक के बने
कबूतर सजा दिये हैं अल्मारी में
दूसरों को दिखाने के लिये
शोर मचाते हुए वह
अपने पक्षीपेमी होने का
सबूत देते हैं,
मगर छत पर दाना चुगते हुए
शांति संदेश के संवाहक कबूतरों को देखकर
मौन होकर कोई देखे
वह तभी जान पायेगा शांति की तलाश
बाहर नहीं अंदर होती है।
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रोते, चिल्लाते और धमकाते
थक गये हम
किसी दूसरे का क्या
अपना दर्द भी अब नहीं सताता
नहीं रुला पाते अपने गम।
जिनके हाथ में खंजर है
वह कत्ल किये बिना नहीं रहेंगे,
जिनके पास दौलत है
वह गरीब का भला नहीं सहेंगे,
शौहरत का हिमालय पा लिया जिन्होंने
लोग उन शैतानों को फरिश्ता समझेंगे,
क्या कहें हम बेदर्द जमाने के
अपने ही दर्द पर अपनी आंखें नहीं होती नम।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Saturday, October 3, 2009

दूर उठती लहरें देखकर-हिंदी कविता (zindagi aur samandar-hindi poem)

जिंदगी की इस धारा में
किस किसकी नाव पार लगाओगे।
समंदर से गहरी है इसकी धारा
लहरे इतनी ऊंची कि
आकाश का भी तोड़ दे तारा
अपनी सोच को इस किनारे से
उस किनारे तक ले जाते हुए
स्वयं ही ख्यालों में डूब जाओगे।
दूसरे को मझधार से तभी तो निकाल सकते हो
जब पहले अपनी नाव संभाल पाओगे।
दूर उठती लहरें देखकर
खेलने का मन करता है
पर उनकी ताकत तभी समझ आयेगी
जब उनसे लड़ने जाओगे।

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, September 4, 2009

नजरें फेरते ही-हिंदी कविता (nazaren-hindi poem)

सच बोलना कभी कभी
ठीक नहीं लगता
कड़वा जो होता।
सोचता भी नहीं
कोई दिमाग की हलचल को
सुन न ले
दीवारों के भी कान होता।
हां, लाचार हूं
एकदम बेबस हूं
निगाहों के सामने हैं दोस्त बहुत
नजरें फेरते ही
हर कोई मेरी शिकायतें लिये
कोई दुश्मन ढूंढ रहा होता।
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Sunday, August 9, 2009

चमड़ी हो या दमड़ी-हास्य कविता (chamdi ho damdi-hasya kavita)

स्वाईन फ्लू की बीमारी ने आते ही देश में प्रसिद्धि आई।
इतने इंतजार के बाद, आखिर शिकार ढूंढते विदेश से आई।।
ढेर सारी देसी बीमारियां पंक्तिबद्ध खड़ी होकर खड़ी थी
पर तब भी विदेश में बीमारी के नृत्य की खबरें यहां पर छाई।
देसी कुत्ता हो या बीमारी उसकी चर्चा में मजा नहीं आता
देसी खाने और दवा के स्वाद से नहीं होती उनको कमाई।।
महीनों से लेते रहे स्वाईन फ्लू का नाम बड़ी शिद्दत से
उससे तो फरिश्ता भी प्रकट हो जाता, यह तो बीमारी है भाई।।
करने लगे हैं लोग, देसी बीमारी का देसी दवा से इलाज
बड़ी मुश्किल से कोई बीमारी धंधा कराने विदेश से आई।।
कहैं दीपक बापू मजाक भी कितनी गंभीरता से होता है
चमड़ी हो या दमड़ी, सम्मान वही पायेगी जो विदेश से आई।।

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Sunday, August 2, 2009

शिकायतों का पुलिंदा-हिंदी मुक्त कविता (shikayat ka pulinda-hindi mukt kavita)

यादों में जो बसता है
उसका नाम जुबां से बयां कहां होता है।

दिलबर नजर से हो कितना भी दूर
उसके पास होने का हमेशा अहसास होता है

आंखों में बसा दिखता है यह पूरा जमाना
पर ख्याल में जो बसा, वही दिल के पास होता है।
..........................
तंगदिल साथी के साथ
जिंदगी का यह सफर
तन्हाई में गुजरता जाता है।

शिकायतों का पुलिंदा ढोते हैं साथ
उम्मीद नहीं है, चाहे पास है उसका हाथ
शिकायतों का बोझ दिल में लिये
कारवां राह पर, खामोशी से गुजरता जाता है।

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Wednesday, July 1, 2009

सच का संकट-हास्य व्यंग्य कविता (trouble of truth-hindi hasya poem)

उन्होंने निजी और सरकारी सेवकों का
एक ‘भ्रष्टाचार विरोधी’ सम्मेलन बुलाया
जब पहुंचे उस जगह तो
वहां कोई नहीं आया।
अपने आमंत्रितों को फोन कर
उन्होंने कारण पता लगाया
किसी ने एक तो किसी ने
न आने का दूसरा बहाना बताया।
‘’यार, तुम भी कैसे समाज सेवक हो
किस विषय पर यह सम्मेलन बुलाया
सच यह है कि आज छुट्टी का दिन है
भूलना चाहते हैं वह सब
जो पूरे हफ्ते बिताया
दफ्तरों में गुजारे पलों को
तुम याद क्यों दिलाना चाहते हो
अपनी ऊपरी कमाई सभी को पवित्र लगती है
दूसरे की भ्रष्टाचार
सभी दौलत के पीछे हैं
ईमानदार का तो बस नकाब लगाया।
फिर वहां बरसेंगी भ्रष्टाचारियों पर गालियां
सभी की बीबी बच्चे बचायेंगे तालियां
आखिर सच कुरेदेगा लोगों का दिमाग
जिसकी अगले हफते पड़ेगी छाया
इसलिये सभी ने इस सच के संकट से
स्वयं को बचाया।’
एक हमदर्द ने उनको बताया।

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Friday, June 5, 2009

वफा और भरोसे की कद्र कौन करेगा-हिंदी शायरी (vafa aur bharose ki kadra-hindi shayri)


सभी इंसान
वादा कर निभाने लगे
तो भरोसे की कद्र कौन करेगा।
सभी साथ निभाने लगे
तो वफा की कद्र कौन करेगा।
सभी मुस्करायेंगे खुशियों में
तो गमों के गीतों में लफ्ज कौन भरेगा।
दुनियां में फरिश्तों की बसती होने का
एक ख्वाब है
अगर सच हो गया
तो सर्वशक्तिमान की इबातद कौन करेगा।
.....................................
भरोसा और वफा
बाजार में दाम देकर मिल जाती है
हर इंसान सौदागर है यहां
सच कहने में शर्म क्यों आती है।
खरीदता है कोई
तो वफा और भरोसे के साथ बिक जाना
पर जब खरीददार होकर
जाओ बाजार
वफा और भरोसे समेत
इंसान मिल जायेगा
यह उम्मीद छोड़कर जाना
अपने अंदर ही ईमान हो
उस पर जरूर यकीन करना
पर दूसरे के दिल की नीयत
दिख जाये सामने
ऐसी तरकीब कहीं नहीं मिल पाती है।

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Tuesday, May 12, 2009

गरीब की भूख के कद्रदान-हिंदी शायरी (garib ki bhookh ke kadradan-hindi vyangya kavita)

हक की बात करते हैं लोग सभी
फर्ज पर बहस नहीं करते कभी।।

अपने फायदे के लिये बनाये कायदे
वह भी मौका पड़े, याद आते हैं तभी।।

दिखाने के लिये लोग अहसान करते हैं
नाम मदद, पर कीमत मांगते हैं सभी।।

रोटियों का ढेर भले भरा हो जिनके गले तक
उनकी भूख का शेर पिंजरे में नहीं जाता कभी।।

नारों से पेट भरता तो यहां भूख कौन होता
दिखाते हैं सब, पेट में नहीं डालता कोई कभी।।

गरीब के साथ जलना जरूरी है, भूख की आग का
उसके कद्रदानों की रोटी पक सकती है तभी।।

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Sunday, May 10, 2009

मुखौटों के पीछे मुख हैं-व्यंग्य कविता (mukhauton ke pichhe mukh-vyangya hindi shayri)

कभी करते हैं वैश्वीकरण का नारा जोर से बुलंद .
कभी हो जाती है उनकी सोच, अपने दायरों में बंद ..
बाजार ने सजाये हैं मुखौटे, जो सोचते दिखते हैं
मगर होते हैं सौदागरों के इशारों पर चलने के पाबन्द ..
बाज़ार भाव के उतार चढाव देखना जरूरी है
मुखौटों की भंगिमा कभी चमकती है,कभी होती मंद
खुले बाज़ार में सब खुला रखने की हिमायत पहले करते
सौदागरों का इशारा हो जाये तो सब हो जाता बंद..
सारे जहां का जिम्मा है इसलिए सोचते दिखना जरूरी है
सौदागर का खेल चलता, मुस्कराता हैं वह मंद मंद..
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बाज़ार उनको नचाता है
या वह बाज़ार को चलाते हैं
यह कहना कठिन है.
मुखौटों के पीछे मुख हैं
जो लिखते हैं संवाद
और वह होंठ हिलाते नजर आते हैं
लोग तो बस विषयों के साथ
शब्दों को मिलाते हैं
परदे के पीछे का खेल कौन
देख पाता है
सामने के दृश्य से ही
सभी का मन भर जाता है
वैसे भी कुछ बेकार है कहना
बस! बाज़ार के खेल में
जज्बातों के साथ मत बहना
चाहे भले ही कोई
रात को बताता दिन है..

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Thursday, April 23, 2009

रौशनी का वास्ता कब तक दिलाओगे-हिंदी शायरी (roshni ka vasata-hindi shayri)

तख्तियों पर लिखे शीर्षकों के तले
खड़े लोगों की भीड़ को
कब तक बहलाओगे।
इंसान की आदतों को
कब तक भीड़ में छिपाओगे।
टकराते हैं जब लोगों मे मतलब आपस में
तब जंग भी होती है
इंसान अपने लिये जागता है
पर भीड़ तो हमेशा सोती है
लोगों की भीड़ में ढूंढते हो
आदमी-औरत, गरीब-अमीर
और शोषक-शोषित
बांटकर उनको
तरक्की के रास्ते पहुंचाने का
दिखावा कब तब कर पाओगे।
बरसों से यही हाल है
जो आज दिख रहा है
जमाने ने देखा है तुम्हारा दौर भी
जब तुूम्हारे हाथ में था अलादीन का चिराग
तब भी तुमने कोई जादू नहीं किया
इस बात पर करना जरूरी है गौर भी
वादे करना और कसमें खाना
तुम्हारी पुरानी आदत है
पर जमाने को कब तक
खाली भरोसे पर बहलाओगे
अंधेरे में गुजारते हुए बरसों हो गये
खाली चिराग सजाकर
कब तब रौशनी का वास्ता दिलाओगे।

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Monday, September 8, 2008

कविता से शायरी शब्द में वजन है-हास्य कविता

लड़के ने लड़की को प्रभावित करने के लिये
पहले प्रेमपत्र में लिखी कविता और
अपना नाम लिखा प्रेमी
लड़की के लिये प्रिया का संबोधन लगाया
लड़की ने पत्र बिना उत्तर के वापस लौटाया
दूसरे में उसने लिखी शायरी
अपने नाम के साथ आशिक शब्द लगाया
लड़की को आशुका बताया
वहां से प्यार की मंजूरी का पैगाम पाया

पहली मुलाकात में
आशिक ने माशुका से इसका कारण पूछा
तो उसने बताया
‘कविता शब्द से बोरियत लगती है
शायरी में वजन कुछ ज्यादा है
कवियों की कविता तो कोई पढ़ता नहीं
शायरी के फैन सबसे ज्यादा हैं
फिल्मों में शायरों को ही हीरो बनाते हैं
शायरियों को ही बढि़या बताते हैं
कवियों और कवियों का मजाक बनाते हैं
वैसे तो मुझे कविता और शायरी
दोनों की की समझ नहीं है
पर फिल्मों की रीति ही जमाने में हर कहीं है
पहले पत्र में तुम्हारा काव्य संदेश, प्रेमी और
प्रिया शब्द में पुरानापन लगा
दूसरे पत्र में प्यार और शायरी का पैगाम
तुम्हारा आशिक होना और
मुझे माशुका कहने में नयापन जगा
तुम कवि नहीं शायर हो इससे मेरा दिल खुश हुआ
इसलिये मुझे दूसरा प्रेम पत्र भाया
मैंने भी तुम्हें मंजूरी का पैगाम भिजवाया
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Sunday, August 31, 2008

हौंसला दें वही दोस्त कहलाते-हिन्दी कविता

दूर भी हों पर उनके होने के
अहसास जब पास ही होते
वही दोस्त कहलाते हैं
यूं तो पास रहते हैं बहुत लोग
बहुत सारी बातें बतियाते
पर सभी दोस्त नहीं हो जाते हैं
जिनकी आवाज न पहुंचती हो
पर शब्द कागज की नाव पर
चलकर पास आते हैं
और दिल को छू जाते हैं
ऐसे दोस्त दिल में ही जगह पाते हैं

यूं तो जमाना दोस्त बन जाता है
पर परेशान हाल में छोड़ जाता है
जिनके दो शब्द भी देते हों
इस जिंदगी की जंग में लड़ने का हौंसला
वही दोस्त दूर होते भी
पास हो जाते हैं




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Wednesday, August 6, 2008

जिन्दगी चलते है ऐसे ही-हिन्दी शायरी

जीवन के उतार चढाव के साथ
चलता हुआ आदमी
कभी बेबस तो कभी दबंग हो जाता
सब कुछ जानने का भ्रम
उसमें जब जा जाता तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

दुख पहाड़ लगते
सुख लगता सिंहासन
खुली आँखों से देखता जीवन
मन की उथल-पुथल के साथ
उठता-बैठता
पर जीवन का सच समझ नहीं पाता
जब अपने से हटा लेता अपनी नजर तब
अपने आप से दूर हो जाता आदमी

मेलों में तलाशता अमन
सर्वशक्तिमान के द्वार पर
ढूँढता दिल के लिए अमन
दौलत के ढेर पर
सवारी करता शौहरत के शेर पर
अपने इर्द-गिर्द ढूँढता वफादार
अपने विश्वास का महल खडा करता
उन लोगों के सहारे
जिनका कोई नहीं होता आधार तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

जमीन से ऊपर अपने को देखता
अपनी असलियत से मुहँ फेरता
लाचार के लिए जिसके मन में दर्द नहीं
किसी को धोखा देने में कोई हर्ज नहीं
अपने काम के लिए किसी भी
राह पर चलने को तैयार होता है तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी
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