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Tuesday, October 2, 2018

रंक का नाम जापते भी राजा बन जाते-दीपक बापू कहिन (Rank ka naam jaapte bhi raja ban jate-DeepakBapuKahin)

रंक का नाम जापते भी राजा बन जाते, भलाई के दावे से ही मजे बन आते।
‘दीपकबापू’ जाने राम करें सबका भला, ठगों के महल भी मुफ्त में तन जाते।।
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रुपये से जुड़े हैं सबके दिल के धागे, जिसे जितना मिले वह उतना ही दूर भागे।
‘दीपकबापू’ भीड़ में करते ज्ञान की व्यर्थ बात, ध्यान खोया नींद में भी सब जागे।।
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संवेदना नहीं पर दर्द अपना बताते हैं, लोग हमदर्दी मांगते हुए यूं ही सताते हैं।
‘दीपकबापू’ धड़कते दिल के जज़्बात सुला बैठे, पाखंड से भरी आह जताते हैं।।
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जीवन रूप में अलग अलग रंग मिले हैं, नवरसों से दुःख-सुख के फल खिले हैं।
‘दीपकबापू’ उंगलियां कलम छोड़ कंप्यूटर पर नाचें, भले-बुरे शब्द पर्दे पर मिले हैं।।
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गुरु अपनी भक्ति करायें ज्ञान न स्वयं जाने, अंधविश्वासियों में पुजते कम पढे काने।
‘दीपकबापू’ आंखें रोज देखतीं धर्मग्रंथ सुख से ऊबा गम में डूबा दिल अर्थ न माने।।
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अपने मन की बात लोग जानते नहीं, घृणा लंबी खींचे प्रेम की डोर तानते नहीं।
‘दीपकबापू कूंऐं की मेंढक जैसी सोच पालते, बेकार रिश्तों को जीवंत मानते नहीं।।
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Monday, August 13, 2018

मन मैले तन पर धवल वस्त्र पहन लेते-दीपकबापूवाणी (man maile tan par dhawaltra pahane-DeepakBapuWani)

राह पर निकले पता नहीं कहां जायेंगे, छोड़ा एक घर दूसरा ठिकाना जरूर पायेंगे।
‘दीपकबापू’ बरसों गुजरती जिंदगी यूं ही, इधर नहीं गये तो उधर जरूर जायेंगे।।
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भावना के व्यापार में सब लोग हैं चंगे, दान में बेचें दया बड़े दौलतमंद दिखें नंगे।
‘दीपकबापू‘ विज्ञापन जाल में फंसे सदा, नारे सुनकर केशविहीन खरीद लेते कंगे।।
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चमके दवा से चेहरे कंधे हैं फूले, अंदर बीमारी का घर कैमरे के सामने पांव झूले।
‘दीपकबापू’ पर्दे पर गधे भी लगे सुंदर, देखकर तांगे में जुते घोड़े अपनी चाल भूले।।
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मन मैले तन पर धवल वस्त्र पहन लेते, खिड़की से डालें कूड़ा सफाई ज्ञान गहन देते।
‘दीपकबापू’ प्रवचन भाषण में माहिर बहुत, शब्दो में भरे दया के नारे सबसे धन लेते।।
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हाथ फैलाये आकाश में उम्मीद से झाकें, दो पांव पर खड़े आंखों से पत्थर ताकें।
‘दीपकबापू’ सड़कों पर लहराते हथियार, कत्ल कर लाश पर अपनी हमदर्दी टांकें।।
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दुःख की अनुभूति बताये सुख भाव, अंग अंग का मोल समझाते लगे देह पर घाव।
‘दीपकबापू’ कल्पना विमान में खूब उड़ते, सत्य की नदी में पतवार से ही चले नाव।।
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Saturday, June 9, 2018

अंतर्जाल पर बैठा है समाज, बांट रहा सरेआम अपने राज-दीपकबापूवाणी (Socity par Baitha samaj-DeepakBapuWani)


रात कों करें धनियों की गुलामी
दिन में राजा जैसे घूमते हैं।
कहें दीपकबापू कौन करे सवाल
वह प्रचारकों के चरण चूमते हैं।
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कैसे सच्चा माने पुराना इतिहास
रोज नया झूठा लिखते देख रहे हैं।
कहें दीपकबापू सेवा के नाम पर
सभी को मेवा खाते देख रहे हैं।
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अंतर्जाल पर बैठा है समाज,
बांट रहा सरेआम अपने राज।
कहें दीपकबापू बस यह आभास ही है
हमारा दर्द समझ रहा कोई आज।
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नीयत खराब तो अमृत क्या करेगा,
मृत भाव में सुख क्या प्राण भरेगा।
कहें दीपकबापू भक्ति रस
जिसने पिया वह किससे क्या डरेगा।
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इसानी मुख सब जगह दिखते हैं,
हाथों से दर्द लिखते हैं।
कहें दीपकबापू मरे जज़्बातों से
हमदर्द रोते दिखते हैं।

Saturday, April 21, 2018

लोहे पर रंग चढ़ना ही विकास नाम-दीपकबापूवाणी (Lohe par Rang chadhna viakas kia naam-DeepakBapuwani)

मधुरता से मिठास मिलना भी जरूरी है, रस भरी छाप में स्वादा भी जरूरी है।
‘दीपकबापू’ शब्दालंकार से सजाते रोज नये नारे, अर्थ से जिनकी बहुत दूरी है।।
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सब अपने दर्द पर भीड़ में रोते हैं, फैला रहे कू्रड़ा बाहर घर ही अपना धोते हैं।
‘दीपकबापू’ आमंत्रण भेजते रोगों को, किताबों में लिखी दवायें बेबसी में ढोते हैं।।
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प्रचार के दलाल गरीब नाम से पले, नारियों की बेबसी से महंगे विज्ञापन चले।
‘दीपकबापू’ थाली में खाकर ढेर छेद करें, अयोग्यता छिपाते बनते सबसे भले।।
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अपनी पुरानी सोच पर सब अड़े हैं, पुराने बुतों की यादें ल्रेकर खड़े हैं।
‘दीपकबापू’ अंग्रेजी पढ़े नये गंवार, पुरानी सभ्यता की नयी जंग लड़े हैं।।
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लोहे पर रंग चढ़ना ही विकास नाम, मनुष्य का अब भाव से नहीं रहा काम।
‘दीपकबापू’ शेर छवि पर चाल भेड़ जैसी, मकान खाली पड़े सड़क पर है जाम।।
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Sunday, March 11, 2018

पत्थरों के टूटने पर क्यों रोते हो-दीपकबापूवाणी-(Pattharon ki tootne par kyon rote ho-DeepakBapuWani)

लोभ लालच के मन में बोते बीज,
देह बना रहे राजरोग की मरीज।
कहें दीपकबापू सोच बना ली राख,
तब चिंता निवारण पर मत खीज।
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सोना चमके पर अनाज नहीं है।
सुर लगे बेसुर क्योंकि साज नहीं है।
कहें दीपकबापू महल तो रौशन
राजा भी दिखे पर राज नहीं है।
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खबर से पहले घटना तय होती,
विज्ञापन से बहस में लय होती।
कहें दीपकबापू फिक्स हर खेल
जज़्बात से सजी हर शय होती।
------
पत्थरों के टूटने पर क्यों रोते हो,
 दृष्टिदोष मन में क्यो बोते हो।
कहें दीपकबापू नश्वर संसार में
विध्वंस पर आपा क्यों खोते हो।।
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बेरहमों ने बहुत कमा लिया,
बंदरों के हाथ उस्तरा थमा दिया।
कहें दीपकबापू मत बन हमदर्द
दर्द ने अपना बाजार ज़मा लिया।
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तन मन की हवस एक समान,
लालच के जाल में फंसा हर इंसान।
कहें दीपकबापू धर्म कर्म से जो रहित,
सौदागर देते सस्ते ग्राहक का मान।
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एक दूसरे में लोग ढूंढते कमी।
आपस में नही किसी की जमी।
कहें दीपकबापू दर्द बंटता है तभी
जब कहीं शादी हो या गमी।
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Friday, May 20, 2016

सोफे पर चिंत्तन-हिन्दी कविता (Thoughts on Sofa-Hindi Poem)

धूप की तपिश से दूर
जिन्होंने बैठक पायी
पानी की प्यास नहीं जाने।

सोफे पर पांव पसारे
करते हैं चिंत्तन
गरीबी दूर करने की ठाने।

कहें दीपकबापू भीड़ में
भाषण करने की कला
सभी को नहीं आती
हो गये जो महारथी
शब्द तीर की तरह बरसाते
भाषा का धनुष ताने।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Tuesday, April 19, 2016

धर्म का खेल-हिन्दी कविता (Play Of Religion-HindiPoem)

धर्म को खेल समझें
गेंद की तरह
लोग बदल देते हैं।

एक इष्ट से न मिले फल
दिल में जगह
उसकी बदल देते हैं।

कहें दीपकबापू न लें साथ
उनका जिनकी नीयत में
बदलने की आदत शामिल है
काम क्रोध व लोभ की आंच में
वह जनक जननी भी बदल देते हैं।
----------- 

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Saturday, April 9, 2016

बिकने की शय-हिन्दी कविता (Bikne ki Shay-Hindi Kavita)

जिंदा रहने की शर्तें
हम स्वयं ही
दिल में तय कर देते हैं।

जिंदगी के खेल में
जीत की चिंता
हार का भय भर देते हैं।

कहें दीपकबापू सद्भावना से
जीने की चाहत सभी की होती
मगर अहंकार के बाज़ार में
बिकने की शय कर देते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Saturday, February 20, 2016

पतझड़ की नयी सुगंध-हिन्दी कविता (Patjhad ki nayi sugandh-Hindi Kavita)

उपवन में फूल के साथ कांटे
कमल के साथ कीचड़ भी है
दोनों का नाता देख
अपनी जिंदगी के 
हसीन पलों से जुड़े
गम के दर्द का
अहसास कम हो जाता है
बसंत के पीछे
पतझड़ यूं ही नहीं आता
ऋतु परिवर्तन से
नयी सुगंध भी साथ लाता है।
--------------
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Monday, January 18, 2016

घृणा की राह प्रेम की चाह-हिन्दी कविता-(Grana ki rah prem ki chah-Hindi Kavita)

घृणा की राह पर
बिना प्रयास चलना
एकदम सहज होता है।

प्रेम की चाह पर
जब परीक्षा का समय आता
त्याग असहज होता है।

कहें दीपकबापू हृदय के भाव में
बहता हुआ आदमी
कुछ तय नहीं कर पाता
खुशी या हादसा
नतीजा महज होता है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Thursday, December 31, 2015

खरीखोटी नीयत-हिन्दी कविता(KhariKhoti Neeyat-Hindi Kavita)

ज़माने के हालात वही रहे
तारीख बदल जाती है।

वादे सुनते हुए
निकाल दी जिंदगी
जुबान देने वाली
सूरतें बदल जाती हैं।

कहें दीपकबापू विश्वास से
नाता टूटे बरसों बीते
खरे सिक्कों की नीयत भी
खोट में बदल जाती है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Tuesday, December 22, 2015

अभिव्यक्ति-हिन्दी शायरी(AbhiVyakti-HindiShayari)

हम पर निगाह रखते
हाथ से इशारा
कभी करते नहीं।

हृदय में सद्भाव
सामने आकर
कभी शब्द भरते नहीं ।

कहें दीपकबापू अपनी चाहत से
स्वयं ही तुम छिपते रहो
मगर हम अपनी
अभिव्यक्ति से डरते नहीं।
------------
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Saturday, December 12, 2015

प्रकाशपुंज-हिन्दी कविता(Prakashpunj-Hindi Kavita)

सफलता का उत्सव
मनाने का प्रचलन
समाज में चला है।

खाने के लोभ में
उठता नहीं सवाल
किस तेल में तला है।

कहें दीपकबापू अंधेरे में
सोते लोग नहीं देखते
राजभवनों में
प्रकाशपुंज कैसे जला है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Friday, December 4, 2015

सुंदर लगे जब तक बोले नहीं-दीपकबापूवाणी (Sundar lage jab tak bole nahin- DeepakBapuWani)


चाहें तो शब्द लिखें चाहे बोलें, सौदागरों से बाज़ार में दाम तोलें।
‘दीपकबापू’ बेच रहे रचना बाज़ार में, अमृत की जगह विष घोलें।।
-------------------
महिला अधिकारों की बात करें, शोषण के रंगों से अपनी रात भरें।
‘दीपकबापू’ शोहदे बना देते प्रहरी, इज्जत पर जो हमेशा घात करें।।
-------------------
सुंदर लगे जब तक बोले नहीं, मधुर लगे जब तक मुंह खोेले नहीं।
‘दीपकबापू’ सूरत पर हैं फिदा, वहम रहे जब तक सीरत तोले नहीं।।
------------------
सहिष्णुता बाज़ार में बिकने की शय, दाम घटने बढ़ने की चली लय।
‘दीपकबापू’ मनोरंजन के व्यापारी भी, हृदय के भाव करने लगे तय।।
.....................
आंसुओं का भी हो रहा व्यापाार, लाभ मिले लोग रोते बिना मार।
‘दीपकबापू’ हंसी के बड़े सौदागर, रुपये लेकर बने कातिलों का यार।।
----------------
ज़माने में खौफ का माहौल बताकर, अमन में अपना घर बसा रहे।
‘दीपकबापू’ सोचें हम पायें चैन, बाकी ज़माना झगड़ों में फसा रहेे।।
---------------
आदमी कभी देवता नहीं होता, प्रचार कराये अलग बात है।
दीपकबापू पालें ताकत का भ्रम, घबड़ाते जब आती रात है।।
.................................
साधु राजा की जात न होय, जो सर्वजन के साथ बंधु वही होय।
‘दीपकबापू बयान बतायें ऊंचे, बहीखाते में एक परमार्थ न होय।।

नरनारी की प्रेमकथा दिखायें, आस्था में अंधविश्वास करना सिखायें।
दीपकबापू रुपये को इष्ट माने, रुपहले पर्दे पर देव जैसा रुप दिखायें।।
--------------------

स्वांग रचकर जो अमीर होये, पसारे पांव वहीं जहां ज़मीर सोये।
दीपकबापू नकली तलवार हाथ में, चित्र के नायक कहां वीर होये।।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Monday, November 16, 2015

गम कभी छांटे नहीं जाते-हिन्दी शायरी (Gum kabhi chhante nahin jaate-Hindi shayri)

जिंदगी के हसीन पल
ताश के पत्तों की तरह
कभी बांटे नहीं जाते।

गुलाब के फूल
चढ़ते मंदिर में
साथ कभी कांटे नहीं जाते।

कहें दीपकबापू खुश रहने के लिये
हृदय को साधना जरूरी
चाहे साथ हो कितनी मजबूरी
गम कभी छांटे नहीं जाते।
-----------
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Friday, November 6, 2015

सच बाज़ार में चलता नहीं-हिन्दी कविता(Sach Bazar mein chalta nahin-Hindi Poem)

निंदा व स्तुति का भी
अब होता व्यापार
सम्मान का दाम होता है।

भलाई के नाटक में
सफल अभिनय से
बड़ा नाम होता है।

मिलती प्रसिद्धि उसे भी
जो दर्द पैदा कर
बदनाम होता है।

कहें दीपकबापू सच के पांव होते
मगर बाज़ार में चलता नहीं
बिकना पाखंड का काम होता है।
---------
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Thursday, October 29, 2015

संसार का सच-हिन्दी व्यंग्य कविता(Sansar ka Such-HindiSatirePoem)


स्वार्थ के संबंध
लंबे समय तक
रह पाते हैं।

अर्थ का रस सूखते ही
कच्ची दीवारों की तरह
ढह जाते हैं।

कहें दीपकबापू रोना बेकार
मिलने वालों का बिछड़ना तय
निस्वार्थ भाव में नहीं होती लय
विरले होते जो संसार का सच
सह पाते हैं।
-----------
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Sunday, October 18, 2015

नज़र और नज़रिये का खेल-हिन्दी कविता(Nazar aur Nazariye ka Khel-Hindi Kavita)

देखते हैं चेहरा
जब आईने में
हंसी नज़र नहीं आती।

देखते हैं आंखें झुकाकर
 पांव की एड़ियां
साफ नज़र नहीं आती।

कहें दीपकबापू नज़रिये का खेल
सभी समझ नहीं पाते
पर्दे के खेल पर ही
अपना मन रमाते
सामने नाचते पुतलों की
डोर थामने वाली उंगलियां
सभी की नज़र नहीं जाती।
-------------
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Wednesday, October 7, 2015

पर्दे पर तस्वीर-हिन्दी कविता(Parde par Taswir)


नहाकर कर से निकलो
धुले कपड़ों पर हवा
धूल डाल ही जाती है।

कीचड़ को देखें
कितना भी घृणा से
कभी कमलमय हो ही जाती है।

कहें दीपकबापू अच्छाई से
बुराई का तुलना क्या करें
यहां तो आंखों के पर्दे पर
चल रही तस्वीर
पल भर में खो ही जाती है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com


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Friday, October 2, 2015

दीपकबापूवाणी(DeepakBapuWani New type poem)


नया ज़माने में मौत भी बिकती, बदले में विज्ञापन लाती है।
दीपकबापूमस्ती से देख पर्दा, जहां खबरें धन बरसाती हैं।।
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यहां लाश की पहचान है धर्म, कातिल भी जात वाला होता है।
दीपकबापूजिंदा बुतों के खेल में, हर दिल घात वाला होता है।।
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कतरा कतरा कचड़ा बना पहाड़, तू उठ खड़ा हो उसे झाड़।
दीपकबापूबीमार बनने से पहले, उसका कलेजा तू फाड़।।
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कोई मांस खाये या घास चर जाये, अक्लमंद परेशान क्यों हैं।
दीपकबापू देव असुर की बस्ती यहां, झगड़े से हैरान क्यों हैं।।
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मुफ्त की रोटी खाने वाले इंसान, शांत वातावरण से ऊब जाते हैं।
दीपकबापूबाग में लगाकर आग,माली मन बहलाने में डूब जाते हैं।।
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आईना चेहरे का सच दिखाता, टूटा तो पांव में चुभ जायेगा।
दीपकबापूनीयत से न खेलो, बढ़िया सोच से शुभ आयेगा।।
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शत्रू मारते वीर सामने से, मित्र पीठ पीछे से झाड़े जाते हैं।
दीपकबापू फूल तोड़ते उंगली से, कांटे नीचे से फाड़े जाते हैं।।
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कर्मफल से घी  मिल जाये, वरना कोई भूखा कोई खाये रूखा।
दीपकबापू कब हंसें या रोयें, कहीं आनंद शब्द बहे कहीं सूखा।।
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दिन में आतंक का डर दिखायें, रात में मित्रता उससे निभायें।
दीपकबापू विकास के झंडाबरदार, विनाश का पाठ भी सिखायें।।
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नया ज़माने में मौत भी बिकती, बदले में विज्ञापन लाती है।
दीपकबापूमस्ती से देख पर्दा, जहां खबरें धन बरसाती हैं।।
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यहां लाश की पहचान है धर्म, कातिल भी जात वाला होता है।
दीपकबापूजिंदा बुतों के खेल में, हर दिल घात वाला होता है।।
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कतरा कतरा कचड़ा बना पहाड़, तू उठ खड़ा हो उसे झाड़।
दीपकबापूबीमार बनने से पहले, उसका कलेजा तू फाड़।।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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