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Saturday, July 27, 2013

कहानी और अदायें-हिन्दी कविता (kahai aur adaaen-hindi kavita)



शहर में सजती  महफिलों में हम बस यूं ही जाते रहे,
खुद रहे उदास हमेशा, लोगो का दिल  बहलाते रहे।
जिंदगी से टूटे इंसान अपनी जोड़ी दौलत दिखलाते
खुशी नहीं पायी कभी, काले बालों में सफेदी लाते रहे।
अपनी हंसी दूसरों के दर्द से बहते आंसुओं में ढूंढते
अपने दिल के दर्द की क्या दवा पाते, उसे छिपाते रहे।
कहें दीपक बापू जिंदगी की कहानी सभी की एक जैसी
चेहरे बदलते देखकर  अदाओं मे यूं ही  नयापन पाते रहे।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Saturday, March 9, 2013

महिला दिवस पर संपादकीय-एक पहिया आगे तो दूसरा पीछे लगना ही है (edtorial on women day-man and woman two wheel of life)

       हमारे देश में आजकल रोज एक दिवस मनता दिखता है।  वैसे तो भारत को वैसे भी त्यौहारों का ही देश कहा जाता है पर वह सप्ताह या माह के अंतराल बाद ही आते हैं। पूर्णमासी तथा अमावस्या हर महीने ही आती हैं।  कैलेंडर में देखें तो रोज कोई न कोई खास दिन होता है। इधर पश्चात्य संस्कृति ने अपने पांव पसारे हैं तो लगता है कि हर दिन ही त्यौहार है। मित्र दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस और नया वर्ष जैसे दिन तो बहुत सुनते हैं। कभी एड्स विरोधी दिवस तो कभी कैंसर निरोधी दिवस भी सुनाई देता हैं  इधर हाल ही में महिला दिवस मना। व्यवसायिक बुद्धिमानों ने जहां अपनी वाणी और चेहरे से टीवी चैनलों के साथ ही रेडियों पर अपने भाषण झाड़े वही आमजनों में अपना रुतवा रखने वाले महानुभावों ने नारी शक्ति अनौपचारिक बैठकों में  बखान किया।
      हमने देखा है कि पुरुष दिवस कभी नहीं मनता। इसका सीधा मतलब यह है कि यह मान लिया गया है कि यह संसार पुरुषों की संपत्ति है जिसमें महिलायें उनकी अनुकंपा से जी रही हैं।  हमारे देश के जनवादी और प्रगतिशील  बुद्धिमान हमेशा ही जाति, वर्ण, भाषा तथा क्षेत्र के आधार पर भेदभाव का आरोप लगाते हैं पर नारी विषय पर उनका रुख बदल जाता है।  वहां वह पुरुष को एक तरह से राक्षसी वृत्ति का मान लेते हैं यह अलग बात है कि वह स्वयं भी पुरुष ही होते हैं। उनके तर्कों पर हम हंसते हैं।  कहते हैं कि समाज में पुरुषवादी मानसिकता है।  हम पूछते हैं कि जब आप नारी अनाचार के विरुद्ध विषवमन करते हो तब क्या कभी यह देखा है कि वास्तव में उनका शत्रु कौन होता है?
    कुछ नारीवादी बुद्धिमान तो नारी के लिये विवाह बंधन ही खतरनाक मानते हैं यह अलग बात है कि उनमें अविवाहित या ब्रह्चारी कोई नहीं होता।  आयुवर्ग में भी वह युवा न होकर उस अवस्था में होते हैं जब देह में रोमांस का असर काम हो जाता है।  अपनी बात वह युवाओं पर तब लादते दिखते हैं जब उनका खुद का समय बीत गया होता है। अपने युवा दिनों की मटरगस्ती को वह भूल जाते हैं।  कहा जाता है कि विवाह का लड्डू जो खाये वह भी दुःखी जो न खाये वह भी दुःखी।  जिन्होंने स्वयं खा लिया है वह दूसरों को न खाने की सलाह देते हैं।  मजे की बात यह कि भारतीय पारिवारिक संस्कारों के साथ जीने वाले लोग उसका मजाक बनाते हैं पर स्वयं के लिये उनका नियम पुराना ही होता है। वह विद्रोह का झंडा दूसरों के हाथ में देकर स्वयं आराम से सामाजिक फिल्म देखना चाहते हैं ताकि उसकी समीक्षायें लिखी और सुनाईं जा सकें।  समस्या यह है कि वह इस बात नियम को नहीं मानते कि नारी के लिये पुरुष कम नारियां ही अधिक समस्या खड़ी करती हैं।  भारतीय रिश्तों में नहीं वरन् पूरे विश्व में ही ननद-भाभी, सास-बहु, देवरानी-जेठानी तथा अन्य बहन जैसे रिश्तों में तनाव की बात सामने आती है।  अपवाद स्वरूप ही देवर-भाभी, ससुर-बहु, नन्दोही-सलहज और साली बहनोई के रिश्ते में खटास वाली घटनायें होती हैं।  सामाजिक विशेषज्ञों का अनुभव तो यह भी कहता है कि पर्दे के पीछे नारियों के विवाद होते हैं पर समाज के सामने फंसता पुरुष ही है क्योंकि परिवार उसके नाम पर जाना जाता है।  हमारे यहां घरेलु नारियों की रक्षा के नाम पर जितने भी प्रयास हुए हैं उनमें जड़ में नारियों का आपसी विवाद होता है पर परेशान पुरुष ही होता है।  इन मामलों में यह देखा गया है कि मामलों को बाहर सुलझाने के लिये घर से बाहर ले जाने जो प्रयास होते हैं उनमें से अधिकतर शिकायतें गलत आधार पर गलत व्यक्ति के खिलाफ होती है।  दहेज विरोधी कानून का जमकर दुरुपयोग हुआ।  अनेक सामाजिक विशेषज्ञ तो यह कहते हैं कि इस कानून का दुरुपयोग करने का यह परिणाम हुआ है कि ऐसे अनेक दंपत्ति जो एक साथ समझाने पर रह सकते थे वह मामला बाहर आने में मन में  बढ़ी हुई  खटास के कारण अलग हो गये।  अनेक लोगों की कथा तो इसलिये भी दर्दनाक रही है कि वह उस शादी में एक समय का भोजन करना उन्हें महंगा लगा जिसका भांडा चौराहे पर फूटा और उन पर भी घाव हुए। स्थिति इतनी खराब है कि कहीं नवदंपत्ति का विवाद होने  पर निकटस्थ रिश्तेदार बीच में आकर सुलझाना ही नहीं चाहते क्योंकि उनको लगता है कि कहीं उनका नाम चौराहे पर न घसीट लिया जाये।  विवाह एक सामाजिक मामला है और उसे उसके नियमों के दायरे में ही रखना चाहिये न कि उसमें राजकीय हस्तक्षेप हो।  राजकीय हस्तक्षेप से समाज के सुधार का प्रयास पाश्चात्य विचाराधारा से उपजा है जो निहायत अव्यवाहारिक है।  ऐसे प्रयासों से भारतीय समाज बिखरा है। दूसरी बात यह कि जिस तरह सारे पुरुष देवता नहीं है तो राक्षस भी नहीं है उसी तरह नारियों का भी हमेशा सकारात्म स्वरूप रहता है यह माना नहीं माना जा सकता।  अगर समाज में नारियों के विरुद्ध अपराध बढ़े हैं तो उसमें शामिल नारियों की संख्या भी बढ़ी है।
     अब मुश्किल यह है कि जनवादियों और प्रगतिवादियों ने देश के अभिव्यक्ति के साधनों पर इस कदर कब्जा कर लिया है कि उनके प्रतिकूल सर प्रथक  किसी बात कहने पर किसी पर प्रभाव नहीं होता।  समाज में आयु, वर्ण, जाति, भाषा, धर्म और लिंग के आधार पर कल्याण के दावे हो रहे हैं पर खुश कोई नहीं है।  वजह साफ है कि  समाज को एक इकाई मानते हुए देश में सभी शहरों के साथ गांवों में भी सड़कों का जाल बिछा होना चाहिये।   सभी जगह शुद्ध पेयजल प्रदाय की सहज व्यवस्था हो।  इसके साथ ही बिजली हर घर में पहुंचना चाहिये।  यह मूलभूत सुविधायें हैं अगर यह देश के किसी हिस्से में नहीं है तो हम अपने पूर्ण विकास का दावा नहीं कर सकते।  इसके विपरीत देश के बुद्धिमान किश्तों में अलग अलग समाज को भागों में बांटकर विकास देखना चाहते हैं।  हमारे देश में गरीब परिवारों जो स्थिति है उसमें नारी दयनीय जीवन जीती है पर यकीनन पुरुष भी कोई खुशहाल नहीं होता।   अपने पिता, पति और पुत्र को जूझते देखकर नारी स्वयं की दयनीय स्थिति से समझौता कर लेती है।  सीधी बात कहें तो नारी और पुरुष के बिना मानवीय संसार नहीं चल सकता।  दोनों परिवार के पहिये हैं।  एक पहिया पीछे तो एक आगे चलता है।  आगे का पहिया पुरुष है और अगर नारीवादी चाहते हैं कि नारी आगे पहिये के रूप में चले तो ठीक है।  उनके प्रयास बुरे नहीं है पर उन्हें यह समझना होगा कि तब पुरुष को पिछला पहिया बनना होगा। एक पहिया आगे तो एक पीछे रखना ही होगा। हालांकि तब इन नारीवादियों को तब पुरुषवादी बनना पड़ेगा।
  दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'

Gwalior, Madhya Pradesh
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Friday, February 1, 2013

जिंदगी का मजा-हिन्दी शायरी (zindagi ka maza-hindi shayri)

खुशियां का फल
किसी पेड़ पर नहीं उगता
जिसे तोड़कर अपने दिल में लगाते,
जिंदगी का दौर चलता रहे
खुशी का मौका हो या गम का
चेहरे पर यूं ही हंसी लाते।
कहें दीपक बापू
चेहरे पर फरिश्ते का लगाकर मुखौटा
चाल चलते हैं लोग शैताने जैसी,
सौदे में मिलती है दाम पर हमदर्दी
दर्द की दवा बनेगी कैसी,
शोर मचा देते है वह लोग
जिन्हें अपनी बदहाली सुनाओ,
सहते रहें तन्हाई में अपने हाल
अच्छा है मन में मौन बुलाओ,
अपने अंदाज के साथ
जिंदगी में मजा यूं ही लाते।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'

Gwalior, Madhya Pradesh
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Wednesday, January 23, 2013

भूत का भय-हिन्दी कविता (bhay ka bhoot-hindi kavita


मरे इंसान का नाम लेने से भी
वह घबड़ाते हैं
डर है उसके साथ  हमदर्दी करते हुए
ज़माना बह न जाये
जो कह न सके  कीमती जिंदा लोग
उसका भूत वह बात न कह जाये
इसलिये अमुक नाम से बुलाते हैं।
कहें दीपक बापू
बाज़ार के सौदागरों के
प्रचार माध्यम भौंपू हैं
खड़े करते हैं दाम देकर मशहूर लोग,
समझ न हो पर भी बोलने का हो जिनको रोग,
कत्ल किया गया जिसका जिस्म
जलकर वह राख हो गया,
जिंदा कौड़ी का था
मरकर उसका दाम टके से लाख हो गया,
चलने लगे न उसके नाम का सिक्का
छिपाया इसलिये
अपने खोटे सिक्कों को पिटने से बचाते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, January 12, 2013

भारत में अमन के लिये पाकिस्तान को मिटना ही होगा-हिन्दी लेख (bharat mein aman ke liye pakistan ko mitna hoga-hindi article

         पाकिस्तानी सेना ने दो भारतीय सैनिकों की बेरहमी से हत्या कर उनके सिर कलम कर दिये। इस घटना की भारत में कड़ी प्रतिक्रिया हुई है।  कुछ लोगों का मानना है कि पाकिस्तान के साथ मधुर संबंध बनाने का प्रयास व्यर्थ है तो कुछ मानते हैं कि इस घटना पर युद्ध जैसी खतरनाक कोशिश से बचना चाहिए।  पाकिस्तान के साथ भारत के अनेक बार युद्ध हो चुका है पर कोई युद्ध कश्मीर समस्या के लिये निर्णायक नहीं हुआ।  हैरानी की बात है कि युद्ध के बाद हुए समझौतों में पाकिस्तान को इस मुद्दे से हटने का दबाव क्यों नहीं डाला गया? पाकिस्तान हर युद्ध में हारा है पर फिर भी कश्मीर का मुद्दा नहीं छोड़ता। यह बात संशय पैदा करने वाली है।
        दरअसल भारत में रणनीतिकारों का एक शक्तिशाली वर्ग मानता है कि पाकिस्तान का अस्तित्व बना रहे यह भारत के हित में है और कश्मीर मुद्दा छोड़ने से वह खत्म हो जायेगा।  लगता है इसी कारण  उसे भारत के प्रति नफरत बनाये रखने के लिये यह मुद्दा उसके पास बने रहने दिया गया।  ऐसा लगता है कि भारत में अनेक बुद्धिमानों के एक समूह को पाकिस्तान के लोगों के बारे में जानकारी नहीं है।  वहां भारत और यहां के धर्मों के प्रति वहां भारी वैमनस्य है।  मुख्य बात यह है कि वहां की र्शैक्षणिक किताबों में भारत तथा यहां पैदा हुए धर्मों के प्रति अनादर वाली सामग्री है।  भारतीय रणनीतिकार शुतुरमुर्ग की तरह यह राग अलापते हैं कि भारत का विभाजन धर्म की वजह से नहीं हुआ पर पाकिस्तान की अवाम में यह बात अब पैठ कर गयी है कि धर्म ही विभाजन का कारण है।  हम समझते हैं कि वह हमें राष्ट्र की तरह ललकार रहे हैं जबकि वह अपनी धार्मिक पहचान के साथ हम पर हमला करते हैं।  वह कश्मीर पर अपना दावा भौगोलिक परिस्थितियों के कारण नहीं वरन् अपने धर्म के कारण करते हैं।
         पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों,कलाकारों और शायरों का भारत निरंतर  आने से अपेक्षा करना मूर्खतापूर्ण है कि उससे कोई स्थाई मित्रता बनेगी।  वैसे पाकिस्तान एक सार्वभौमिक राष्ट्र है यह कभी अनेक लोगों को नहीं लगता है ।  हम भारत में रह रहे  पाकिस्तान के सहधर्मियों  को देखकर वहां के लोगों की मनस्थिति का अनुमान करते है जो कि गलत है। वहां सिंध, बलुचिस्तान और पश्चिमी प्रांत के लोग यह मानते हैं कि पंजाब के लोगों ने उन पर कब्जा कर रखा है।  खासतौर से सिंध में तो पाकिस्तान के प्रति अत्यंत नाखुशी  का भाव है।  इसका कारण यह है कि सारे पाकिस्तान में वहां के पंजाब प्रांत के  लोगों ने ही दबदबा बनाये रखा है।  क्रिकेट से लेकर फिल्म तक उनका ही वर्चस्व है।  इतना ही नहीं पाकिस्तान की अनेक फिल्मों में सन्यासियों को खलपात्र के रूप में चित्रित किया गया।  यही कारण है कि पाकिस्तान में बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू या तो पलायन कर गये या फिर धर्म बदलने के लिये बाध्य हुए।  वहां अक्सर मंदिरों पर हमले होते रहते हैं। इतना ही नहीं पुराने हिन्दू प्रतीकों को लगभग मिटा दिया गया है।  हालांकि वहां कुछ मंदिरों के पुनरोद्धार की बात की जाती है पर वह भारत से पर्यटकों को लुभाने का प्रयास लगता है।  इससे यह नहीं समझना चाहिये कि पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं को कोई सम्मान मिलने वाला है।  पाकिस्तान आज विश्व में अपनी पहचान बना चुका है पर यह सफलता उसे धार्मिक उन्माद में योगदान की वजह से मिली है। कहने का अभिप्राय यह है कि हम भले ही अपनी अक्ल के पर्दे बंद किये रहें पर पाकिस्तानी अपनी धार्मिक पहचान को श्रेष्ठ मानते हैं और अन्य धर्म उनकी दृष्टि में कमतर हैं।  किसी भारतीय-चाहे वह किसी भी धर्म का हो-का मरना उनकी नज़र में कोई  महत्व नहीं रखता क्योंकि वह उनके सहधर्मी राष्ट्र का नहीं है।  यह अंतिम सत्य है और अगर कोई मुगालते हैं तो उसे समझाना कठिन है।
          भारत के लिये पाकिस्तान को निपटाना कोई कठिन काम नहीं है।  भारतीय सेना एक व्यवसायिक सेना है  जबकि पाकिस्तान की सेना अब धर्मांध होकर ऐसी राह पर चल पड़ी है जहां अब सिवाय आंतक फैलाने के उसके पास कोई मार्ग नहीं है।  यह सच है कि युद्ध में बहुत हानि होती है पर इतिहास गवाह है कि अपना प्रभाव बनाये रखने के लिये अंततः ताकतवर लोगों को युद्ध करने ही पड़ते हैं।  मनुष्य हमेशा ही योगी बनकर ध्यान में नहीं लगा रह सकता।  कभी कभी उसे योद्धा बनकर लड़ना भी पड़ता है।  इस संसार में दैवीय तथा आसुरी दो प्रकृति के लोग होते हैं।  देवताओं केा अनेक बार असुरों से युद्ध करना पड़ा है।  पाकिस्तान और उसके सहयोगी देश आसुरी प्रवृत्ति के हैं और उनसे यह अपेक्षा करना निरर्थक है कि वह दैवीय प्रकृति के लोगों को आराम से रहने देंगे।  हम यहां रावण का उल्लेख भी करना चाहेंगे जिसका तत्कालीन सभ्यता में उन लोगों से बैर था जो उसकी निज धार्मिक पंरपरा से प्रथक थे। वह  ऋषि, मुनियों और तपस्वियों का इसलिये बैरी था क्योंकि वह उसकी धार्मिक पंरपरा मानने वाले नहीं थे।  सच बात तो यह है कि रावण सीता हरण अगर वह नहीं भी करता तो भी उसका भगवान श्रीराम के साथ युद्ध अवश्यंभावी था क्योंकि वह उन्हीं ऋषि, मुनियों, तपस्वियों की रक्षा के लिये प्रयासरत थे।
         हमारा मानना है कि प्रत्यक्ष रूप से युद्ध न भी करें तो अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान को तोड़ देना चाहिये।  भारत के प्रति नफरत वहां पंजाब प्रांत के वर्चस्व के कारण ही फैली है क्योंकि वही अपना प्रभाव बनाये रखना चाहते हैं।  पाकिस्तान मध्य एशिया के देशों के सहारे धर्म के नाम पर एक रखे हुए है और एक बार वहां क्षेत्रीयता को बढ़ावा मिला तो ऐसा संकट बढ़ेगा कि पाकिस्तान मिट जायेगा।  वहां के शिखर पुरुष यह कहते हैं कि हम स्वयं ही आतंकवाद की चपेट में है पर यह दिखावा है।  वैसे  भी इस तरह का छुटपुट आतंकवाद पाकिस्तान को मिटा नहीं पायेगा।  एक बार पाकिस्तान की सेना ध्वस्त हो गयी तो पाकिस्तान मिट जायेगा।  कुछ लोगों को मानना है क भारत को अगर अमन चैन से रहना है तो उसे हर हालत में पाकिस्तान को मिटाना ही होगा।
       यह भी न करना है तो पाकिस्तान से अब बेहतर संबंधों के लिये यह भी शर्त रखनी होगी कि वह अपनी शैक्षणिक किताबों से भारत तथा यहां के धर्मों के विरुद्ध अनादर वाली सामग्री हटाये।  अगर वह ऐसा नहीं करता तो उससे राजनीतिक संबंध भी खत्म करना चहिये।  यह एक तरह का सभ्य प्रयास है और आसुरी प्रवृत्ति से युक्त पाकिस्तान इसे मानेगा यह कठिन है पर जब हमारे रणनीतिकार यह मानते हैं कि हम उससे ज्यादा ताकतवर है तो दबाव काम आ सकता है।  हालांकि यह कदम भी पाकिस्तान के लिये आत्मघाती होगा क्योंकि भारत के प्रति नफरत के बाद उसे वैसे ही संकट का सामना करना पड़ेगा जो कश्मीर मुद्दा छोड़ने पर हो सकता है। इसके लिये मानसिक दृढ़ता का परिचय देना होगा।

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Sunday, December 30, 2012

कन्या भ्रूण हत्या पर 11 फ़रवरी पर लिखा गया लेख आज भी प्रासंगिक-हिंदी सम्पादकीय (kanya bhrun hatya par likha gaya lekh aaj bhee prangik-hindi article and thought)

       इस लेखक के इन्टरनेट पर लिखे गए लेखों में एक है कन्या भ्रुण हत्या से मध्ययुगीन स्थिति की तरफ बढ़ता समाज-हिन्दी लेख। 11 फ़रवरी 2011 को लिखे गए इस लेख पर आज तक भी टिप्पणियाँ आती हैं।  इस पर कुछ टिप्पणीकारों ने यह भी लिखा कि  आपकी बात हमारे समझ में नहीं आयी तो  अनेक लोगों ने अपनी  व्यथा कथा भी कही है।  लिखने का अपना अपना तरीका होते है।  जब किसी विषय पर  गंभीरता से  लिखते हुए कोई डूब जाये तो भाषा सौंदर्य दूर हो जाता है और अगर शब्दों की चिंता करें तो दिमाग सतह पर आ जाता है।  हम जैसे हिंदी के गैर पेशेवर लेखकों के लिया यही मुश्किल है कि पाठक हमारे लेखों में भाषा सौन्दर्य न देखकर यह मान लेते हैं इनकी बात तो आम भाषा में लिखी गयी है इसलिए यह कोई मशहूर लेखक नहीं बन पाए।  बाज़ार के सहारे  मशहूर लेखकों को  पढ़कर भी  पाठक  निराश होते हैं की उन्होंने कोई नयी बात नहीं कही।  कन्या भ्रूण हत्या पर लिखे गए इस लेख में समाज की आंतरिक और बाह्य सत्यता का वर्णन किया गया था।  इसके लिए किसी खास घटना पर आंसू नहीं बहाए गए थे।   एक पेशेवर लेखक की तरह पाठकों का ध्यान सामयिक रूप से अपनी तरफ आकर्षित करने का यह कोई प्रयास नहीं था।
       आज मन में आया कि  भारतीय नारियों के प्रति अपराध पर कुछ नया लिखा जाए पर पता चला की पाठकों की नज़र आज भी इस पर पड़ी  हुई है तब लगा कि  इसे पुन: प्रस्तुत किया जाए।  पूरे लेख को हमें पढ़ा तो लगा कि  यह अब भी प्रासंगिक है।  11 फरवरी 2011 तथा 29 दिसंबर 2012 में करीब 23 महीने का अंतर है।  नारियों के प्रति बढ़ते अपराधों के लिए अनेक कारण है।  दरअसल कुछ ऐसे भी हैं जो सभीके सामने हैं, लोग जानते हैं, मानते भी हैं मगर बाहरी रूप से कोई स्वीकार नहीं करना चाहता है।  पुरुष ही नहीं नारियां भी शुतुर्मुर्गीय अंदाज़ में  बहस कर रहे हैं।  अभी हाल ही में दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की घटना हुई।  इस पर इतने प्रदर्शन हुए। अख़बारों में सम्पाकीय छपे। टीवी चैनलों पर बहसें  हुई।  सब कुछ प्रायोजित लगा।  हमें लगा कि  11 फरवरी 2011 को लिखा गया यह लेख अभी भी सीना तनकर खड़ा है और पेशेवर लेखकों को ललकार रहा हो ऐसा बोलकर और लिखकर दिखाओ।
 जिन्होंने बहस की उन्होंने कुछ न कुछ पाया होगा। चैनलों ने पांच मिनट  की बहस की तो पच्चीस  मिनट का विज्ञापन चलाया।  मगर सच कोई नहीं बोला।  वैसे तो .धनपतियों के हाथ में पूरी दुनिया है पर समाज उनके हाथ में पूरी तरह नहीं रहा था। उनके सहारे चल रहे प्रचार माध्यमों  ने यह काम भी कर दिखाया। उदारीकरण के चलते सार्वजानिक क्षेत्र कम हुआ है। सीधी बात कहें तो समाज की राज्य से अधिक निजी क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ गयी है।  मान सम्मान की रक्षा, सुरक्षित सेवाओं का प्रबंध तथा प्रजा हित को सर्वोपरि मानते हुए अपना काम जितना राज्य कर सकता है, निजी क्षेत्र के लिए यह संभव नहीं है।  राज्य के लिए अपने लोग महत्वपूर्ण होते हैं निजी क्षेत्र के लिए अपनी कमाई सर्वोपरि होती है।
                इससे भी अधिक  बात यह है की राज्य का जिम्मा अपने प्रजा को संभालना भी होता है और निजी क्षेत्र कभी इसे महत्व नहीं देता।
  निजी क्षेत्र कभी राज्य का प्रतीक  नहीं हो सकते।   जब निजी क्षेत्र अपने साथ राज्य के प्रतीक के रूप में अपनी ताकत दिखाते हैं तो कुछ ऐसी समस्याएँ उठ सकती हैं जिनकी कल्पना कुछ लोगों ने की भी होगी।  इस पर किसी ने  प्रकाश नहीं डाला। इसी अपेक्षा भी नहीं थी। कारण की बाज़ार के सौदागरों और प्रचार प्रबंधकों का या सिद्धान्त है की बहसें खूब हों पर इतनी कि  लोग बुद्धिमान न हो जाएँ।  इसलिए नारे लगाने तथा रुदन करने वाले बुद्धिजीवियों को आमंत्रित करते हैं।  इनमें कुछ एक हद तक व्यवस्था तो कुछ समाज की आलोचना करने की खानापूरी करते हैं।  इस विषय पर बहुत कुछ लिखने का मन है पर क्या करें अपने पास समय की सीमायें हैं।  पेशेवर बुद्धिजीवियों के मुकाबले हम जैसे आम लेखकों को समाज अधिक महत्व भी नहीं देता।  इसलिए जब समाज मिलता है अपनी बात कह जाते हैं। 
पहले लिखा गया लेख पढना चाहें तो पढ़ सकते हैं।
              हो सकता है कि कुछ लोग हमारी बुद्धि पर ही संशय करें, पर इतना तय है कि जब देश के बुद्धिजीवी किसी समस्या को लेकर चीखते हैं तब उसे हम समस्या नहीं बल्कि समस्याओं या सामाजिक विकारों का परिणाम मानते हैं। टीवी और समाचार पत्रों के समाचारों में लड़कियों के विरुद्ध अपराधों की बाढ़ आ गयी है और कुछ बुद्धिमान लोग इसे समस्या मानकर इसे रोकने के लिये सरकार की नाकामी मानकर हो हल्ला मचाते हैं। उन लोगों से हमारी बहस की गुंजायश यूं भी कम हो जाती हैं क्योंकि हम तो इसे कन्या भ्रुण हत्या के फैशन के चलते समाज में लिंग असंतुलन की समस्या से उपजा परिणाम मानते है। लड़की की एकतरफ प्यार में हत्या हो या बलात्कार कर उसे तबाह करने की घटना, समाज में लड़कियों की खतरनाक होती जा रही स्थिति को दर्शाती हैं। इस पर चिंता करने वाले कन्या भ्रूण हत्या के परिणामों को अनदेखा करते हैं।
        इस देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का फैशन करीब बीस-तीस साल पुराना हो गया है। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ जब देश के गर्भ में भ्रुण की पहचान कर सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य लोगों पेट के दोषों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। भारत के भी निजी चिकित्सकालयों में भी यही उद्देश्य कहते हुए इस मशीन की स्थापना की गयी। यह बुरा नहीं था पर जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्या भ्रुण हत्या का फैशन प्रारंभ हुआ उसने समाज में लिंग अनुपात की  स्थिति को बहुत बिगाड़ दिया। फैशन शब्द से शायद कुछ लोगों को आपत्ति हो पर सच यह है कि हम अपने धर्म और संस्कृति में माता, पिता तथा संतानों के मधुर रिश्तों की बात भले ही करें पर कहीं न कहीं भौतिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की वजह से उनमें जो कृत्रिमता है उसे भी देखा जाना चाहिए। अनेक ज्ञानी लोग तो अपने समाज के बारे में साफ कहते हैं कि लोग अपने बच्चों को हथियार की तरह उपयोग करना चाहते हैं जैसे कि स्वयं अपने माता पिता के हाथों हुए। मतलब दैहिक रिश्तों में धर्म या संस्कृति का तत्व देखना अपने आपको धोखा देना है। जिन लोगों को इसमें आपत्ति हो वह पहले कन्या भ्रुण हत्या के लिये तर्कसंगत विचार प्रस्तुत करते हुए उस उचित ठहरायें वरना यह स्वीकार करें कि कहीं न कहीं अपने समाज के लेकर हम आत्ममुग्धता की स्थिति में जी रहे हैं।
           जब कन्या भ्रुण हत्या का फैशन की शुरुआत हुई तब समाज के विशेषज्ञों ने चेताया था कि अंततः यह नारी के प्रति अपराध बढ़ाने वाला साबित होगा क्योंकि समाज में लड़कियों की संख्या कम हो जायेगी तो उनके दावेदार लड़कों की संख्या अधिक होगी नतीजे में न केवल लड़कियों के प्रति बल्कि लड़कों में आपसी विवाद में हिंसा होगी। इस चेतावनी की अनदेखी की गयी। दरअसल हमारे देश में व्याप्त दहेज प्रथा की वजह से लोग परेशान रहे हैं। कुछ आम लोग तो बड़े आशावादी ढंग से कह रहे थे कि ‘लड़कियों की संख्या कम होगी तो दहेज प्रथा स्वतः समाप्त हो जायेगी।’
                  कुछ लोगों के यहां पहले लड़की हुई तो वह यह सोचकर बेफिक्र हो गये कि कोई बात नहीं तब तक कन्या भ्रुण हत्या की वजह से दहेज प्रथा कम हो जायेगी। अलबत्ता वही दूसरे गर्भ में परीक्षण के दौरान लड़की होने का पता चलता तो उसे नष्ट करा देते थे। कथित सभ्य तथा मध्यम वर्गीय समाज में कितनी कन्या भ्रुण हत्यायें हुईं इसकी कोई जानकारी नहीं दे सकता। सब दंपतियों के बारे में तो यह बात नहीं कहा जाना चाहिए पर जिनको पहली संतान के रूप में लड़की है और दूसरी के रूप में लड़का और दोनों के जन्म के बीच अंतर अधिक है तो समझ लीजिये कि कहीं न कहंी कन्या भ्रुण हत्या हुई है-ऐसा एक सामाजिक विशेषज्ञ ने अपने लेख में लिखा था। अब तो कई लड़किया जवान भी हो गयी होंगी जो पहली संतान के रूप में उस दौर में जन्मी थी जब कन्या भ्रुण हत्या के चलते दहेज प्रथा कम होने की आशा की जा रही थी। मतलब यह कि यह पच्चीस से तीस साल पूर्व से प्रारंभ  सिलसिला है और दहेज प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। हम दहेज प्रथा समाप्ति की आशा भी कुछ इस तरह कर रहे थे कि शादी का संस्कार बाज़ार के नियम पर आधारित है यानि धर्म और संस्कार की बात एक दिखावे के लिये करते हैं। अगर लड़कियां कम होंगी तो अपने आप यह प्रथा कम हो जायेगी, पर यह हुआ नहीं। 
            इसका कारण यह है कि देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। मध्यम वर्ग के लोग अब निम्न मध्यम वर्ग में और निम्न मध्यम वर्ग के गरीब वर्ग में आ गये हैं पर सच कोई स्वीकार नहीं कर रहा। इस कारण लड़कों से रोजगार के अवसरों में भी आकर्षण शब्द गायब हो गया है। लड़कियों के लिये वर ढूंढना इसलिये भी कठिन है क्योंकि रोजगार के आकर्षक स्तर में कमी आई है। अपनी बेटी के लिये आकर्षक जीवन की तलाश करते पिता को अब भी भारी दहेज प्रथा में कोई राहत नहीं है। उल्टे शराब, अश्लील नृत्य तथा विवाहों में बिना मतलब के व्यय ने लड़कियों की शादी कराना एक मुसीबत बना दिया है। इसलिये योग्य वर और वधु का मेल कराना मुश्किल हो रहा है।
           फिर पहले किसी क्षेत्र में लड़कियां अधिक होती थी तो दीवाने लड़के एक नहीं  तो दूसरी को देखकर दिल बहला लेते थे। दूसरी नहीं तो तीसरी भी चल जाती। अब स्थिति यह है कि एक लड़की है तो दूसरी दिखती नहीं, सो मनचले और दीवाने लड़कों की नज़र उस पर लगी रहती है और कभी न कभी सब्र का बांध टूट जाता है और पुरुषत्व का अहंकार उनको हिंसक बना देता है। लड़कियों के प्रति बढ़ते अपराध कानून व्यवस्था या सरकार की नाकामी मानना एक सुविधाजनक स्थिति है और समाज के अपराध को दरकिनार करना एक गंभीर बहस से बचने का सरल उपाय भी है।
              हम जब स्त्री को अपने परिवार के पुरुष सदस्य से संरक्षित होकर राह पर चलने की बात करते हैं तो नारीवादी बुद्धिमान लोग उखड़ जाते हैं। उनको लगता है कि अकेली घूमना नारी का जन्मसिद्ध अधिकार है और राज्य व्यवस्था उसको हर कदम पर सुरक्षा दे तो यह एक काल्पनिक स्वर्ग की स्थिति है। यह नारीवादी बुद्धिमान नारियों पर हमले होने पर रो सकते हैं पर समाज का सच वह नहीं देखना चाहते। हकीकत यह है कि समाज अब नारियों के मामले में मध्ययुगीन स्थिति में पहुंच रहा है। हम भी चुप नहीं  बैठ सकते क्योंकि जब नारियों के प्रति अपराध होता है तो मन द्रवित हो उठता है और लगता है कि समाज अपना अस्तित्व खोने को आतुर है।

दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior,madhya Pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Saturday, December 8, 2012

विदुर नीति-बड़ो का आदर करने से प्राण स्थिर होते है(vidur neeti-badon ka aadar karne se pran sthir hote hain)

       हमारे भारतीय दर्शन में जिन संस्कारों को मनुष्य समाज के लिये आवश्यक बनाया गया है उनका कोई न कोई वैज्ञानिक आधार है।  अक्सर हमारे यहां कहा जाता है कि बुजुर्गों का सम्मान होना चाहिए।  इसके पीछे वजह यह है कि उनकी सामने उपस्थिति होने पर आयु तके  छोटे मनुष्य की मनस्थिति पर कुछ न कुछ ऐसा तीव्र हलचल के साथ  तीक्ष्ण प्रभाव पड़ता है जिसकी समझ होना जरूरी है।  दरअसल जब बड़ी आयु का आदमी सामने खड़ा हो तब किसी भी युवक के हृदय में ऐसा प्रभाव होता है कि उसके प्राण ऊपर आ जाते हैं। आंखों में आदर के भाव प्रकट होने के लिये तत्पर होते हैं।  उस समय अगर कोई ढीठता वश सीना तानकर खड़ा रहे तो यकीनन वह अपने हृदय और मस्तिष्क की नासिकाओं के लिये दुष्प्रभाव वाले कीटाणुओं का सृजन करता है। हालांकि अधिकतर युवक युवतियां स्वाभाविक रूप से मर्यादा का पालन करते हैं और इससे हम उनको संस्कारवान माने पर सच यह है कि बड़ो का आदमी करना छोटों का स्वाभाविक गुण होता है।  जिनके मन मे ढीठता का भाव है वह भले ही ऐसा न करें पर कहीं न कहीं वही अपने प्राणों को स्थिर  असुविधा के साथ विलंब  से कर पाते हैं।
विदुर महाराज की नीति के अनुसार
-------------------------
ऊधर्व प्राणा ह्युत्क्रामति पुनः स्थावरः आयति।
प्रत्युथानाभिवादाभ्यां पुनस्तान। प्रतिपद्यते।।
      हिन्दी में भावार्थ-किसी  माननीय बुजुर्ग पुरुष के निकट आने पर पर नवयुवक के प्राण ऊपर गले तक आ जाते हैं फिर जब वह स्वागत में खड़ा होकर प्रणाम करता है तब उसके प्राणः पुनः पूर्ववत स्थापित होते हैं।

पीठं दत्त्वा साधवेऽभ्यागताय आनींयामः परिनिर्णिज्य पापौ।
सुख पृष्टवा प्रतिवेद्यात्मासंस्था ततो दद्यादन्नमवेक्ष्य धीरः।।
      हिन्दी में भावार्थ-धीर पुरुष को चाहिए कि वह अपने यहां सज्जन व्यक्ति के आने पर उसे उचित आसन प्रदान करने के साथ ही जल से उसके चरण पखारने के बाद उसकी कुशल क्षेम जानने के बाद अपनी बात कहे और फिर भोजन कराये।
     मनुष्य गुणों का ऐसा पुतला है जिसका इंद्रियां स्वाभाविक रूप से होता है।  सच बात तो यह है कि किसी को अधिक ज्ञान देना उसे भ्रमित कर सकता है। उसी तरह ज्यादा ज्ञान प्राप्त करने से भी अनेक तरह के विरोधाभास सामने आते हैं। बेहतर यह है कि अपनी दिलचर्या को सहज रखा जाये।  जब कोई दृश्य सामने आये या फिर कहीं हमें अपनी सक्रियता दिखानी हो वहां मन में सहज भाव रखना चाहिए तब स्वाभाविक रूप से हमारी इंद्रियां अंगों को संचालित करती हैं।  अपने घर आये सज्जन लोगों का आदर करना चाहिए पर जहां अपना सम्मान न हो और हमारे स्वाभाविक गुणों के अनुसार कार्य की स्थितियां न हों वहां न जाना ही बेहतर है। भारतीय दर्शन इसलिये भी वैज्ञानिक आधारों वाला माना जाता है क्योंकि वह स्वाभाविक रूप से सहज कर्म में मनुष्य को लिप्त रहने की प्रेरणा  देता है।
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Sunday, November 11, 2012

आज धनतेरस है-हिन्दी लेख और चिंत्तन (today dhanteras-hindi article and thought)

                धनतेरस को खरीददारी करना शुभ माना जाता है।  जिसके पास जितना पैसा है उतना ही वह सामान खरीदता है।  बरसों से ऐसे अनेक त्यौहार चले आ रहे हैं।  भारतीय समाज  हमेशा ही महाधनी, धनी और अल्पधनी वर्ग में बंटा रहा है और सभी लोग अपने अपने स्तर के अनुसार त्यौहार मनाते हैं। हमने बरसों से देखा है कि शांति से पर्व मना लिये  जाते हैं पर जब से पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार और अर्थव्यवस्था का उदारीकरण हुआ है शोर बहुत होने लगा है।  यह शायद इसलिये किया जाता है ताकि आमजन अपना विवेक खोकर पैसा खर्च करने लगें।  लोग बदहवास होकर खरीददारी करते हैं।  खरीदने के लिये यह बदहवासी समाज की प्राणशक्ति क्षीण होने का प्रमाण है।  भौतिकतावाद की यह नयी प्रवृत्ति है पर जो प्राचीन संस्कृति और पर्वों में घूल मिल गयी है। 
            ऐसे में कुछ हास्याप्रद घटनायें होती हैं जिन पर व्यंग्य लिखना वक्त खराब करना लगता है।  हम जैसे अनाम लेखकों के  बड़े  व्यंग्य इंटरनेट पर आजकल कौन पढ़ता है क्योंकि लोगों को लगता है कि इंटरनेट पर लिखना केवल बड़े लोगों का काम है।  प्रचार माध्यम ट्विटर पर बड़े लोगों की एक दो पंक्तियां को ही इस तरह उछलते हैं कि दूसरों की क्या कहें  हम भी अब भ्रमित हो गये हैं। ब्लॉग और फेसबुक पर यह सोचकर लिखते हैं गोया कि डायरी में लिख रहे हैं। कोई पढ़ नहीं रहा है।  ऐसे में धनतेरस के पर्व   को अध्यात्मिक विषय मानकर लिखना मुश्किल है।  धन तो माया का सर्वोत्तम रूप है और अध्यात्मिक ज्ञान में धन प्राप्ति के लिये कोई खास उपाय नहीं बताया गया है।  जिनके पास अध्यात्मिक ज्ञान नहंी है धन उनका वास्तविक भगवान है।  इस भाव में हम जैसा ज्ञानसाधक दोष नहीं देखता। दिल लगाने के लिये कोई बहाना मिलना चाहिए।  अगर आप कोई काम नहीं करेंगे तो जल्दी बुढ़ा जायेंगे।  अगर कोई काम करना चाहेंगे तो पहले मन में यह सवाल आयेगा कि हमें मिलेगा क्या? यह प्रश्न मनुष्य और मनुष्य में भेद करता है।  कहते हैं कि मनुष्य का स्वामी उसका मन है।  वही उसको चलाता है। ज्ञानी और साधक अपनी देह को नियमित संचालित करने के लिये हमेशा ही धन पर दृष्टि नहीं रखते क्योंकि उनकी दृष्टि में धन भी देह से जुड़े सांसरिक कार्य  का विस्तार भर  ही है। इधर से धन आया उधर गया।  अज्ञानी लोगों के पास ढेर सारा धन हो पर वह केवल इसलिये अकर्मणता का शिकार हो जाता है क्योंकि उसे कोई ऐसा काम नहीं मिलता जिसमें धन मिले।
      धनतेरस का संबंध धर्म से है और धर्म का संबंध कर्मकांड से है। कर्मकांड मनुष्य मन को तसल्ली देते हैं कि उन्होंने सर्वशक्तिमान को प्रसन्न किया अब उसका फल धन, पद और यश के रूप में मिलेगा।
       दीपक बापू रविवार को अध्यात्मिक दिवस मनाते हैं।  मंदिरों में जाकर ध्यान करना उनको अत्यंत प्रसन्नता प्रदान करता है।  मंदिरों के अंदर बाहर भीड़ थी।  दीपक बापू ने बाहर आकर देखा एक सज्जन अपने परिवार के साथ कार में जा रहे थे।  एक आदमी - जो गेरुए वस्त्र पहने था-  उनके अगले पहियों पर तिलक लगा रहा था। एक दो मिनट लगा होगा। कार मालिक ने अपनी जेब से कुछ पैसा निकाला उसको देने के साथ ही  मंदिर की तरफ मुंह कर हाथ जोड़े और चल पड़ा ।  तब तक सड़क पर  आवागमन बाधित रहा।  ऐसा लगता था कि पहले ही मोबाइल पर सूचना का आदान प्रदान हुआ होगा वरना वह आदमी दूसरी कारों पर ही ऐसा करता।
      सबसे ज्यादा मनोरंजन सांईं बाबा के मंदिरों में जाने पर मिलता  है।  जिनका  मन भगवान के परंपरागत रूपों से ऊब गया है उनके लिये सांईं बाबा का नाम  अब एक श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम बन गया है।  सांईं बाबा ने संसार की कई ऐसी वस्तुओं को देखा तक नहीं होगा जो उनके भक्त  अब उनके मंदिरों पर लेकर पहुंच रहे हैं।  उनकी दरबार के बाहर नये वाहनो की भीड़ लगी रहती है।  मंदिर के पुजारी भी उन वाहनों की पूजा करते हैं।  हैरानी होती है!  कहां सांई बाबा की वंदना और यह कहां लोहे लंगर की अर्चना।  दीपक बापू जैसे योग साधक तथा अध्यात्मिक ज्ञान के पाठक होने के साथ ही व्यंग्यकार होने की वजह से ऐसी घटनायें रोचक होती हैं।
                असल बात तो रहे जा रही थी।  मंदिर के बाहर सड़क पर कार के पहियों पर टीका लगते देखकर दीपक बापू ने अपने मित्र फंदेबाज  से कहा-‘‘अरे, यह चार चक्रवाहिनी के चक्रों पर ध्यान करने की बजाय अपनी देह के आठ चकों पर ध्यान करता रहे तो बेहतर है।  अगर आदमी की  देह के आठ चकों में से कोई भी एक काम करना बंद कर दे तो यह रबड़ के चक्र उसे कहीं कहीं नहीं जा सकते और अगर देह चक्र बढ़िया काम  करें  तो फिर इन चक्रों की परवाह कौन करता है?’’
       फंदेबाज ने दीपक बापू लगभग फुफकारते हुए पूछा-‘‘तुम्हारे पास कार है?’’
     दीपक बापू ने न में सिर हिलाया।
     फंदेबाज ने कहा-‘‘जब खरीद लो तब बात करना! यह रबड़ के चक्र तुम्हें ढो लेंगे पर उनका खर्चा तुम नहीं ढो पाओगे।’’
     दीपक बापू ने फंदेबाज से कहा-‘‘ जब इस तरह की घटनायें देखते हैं तो धनतेरस पर इतना व्यंग्य तो चलता ही था।’’
     फंदेबाज ने कहा-‘इससे बेहतर है कि तुम घर पर जाकर घ्यान लगाते हुए मुफ्त का आनंद लो वरना इतनी सारी घटनायें एक दिन में देखने को मिलेंगी तुम्हारी बची उम्र व्यंग्य लिखते हुए बीत जायेगी।  इस समय जो कर रहे हो वह सब छूट जायेगा।’’
        दीपक बापू ने फंदेबाज से कहा-‘‘वैसे तो तुम्हें झाड़ने का मेरा दिन रहता है क्योंकि तुम पर अध्यात्मिक ज्ञान बघारता हूं। आज तुम्हारा रहा क्योंकि धन का दिन है।’’
       इस धन तेरस पर फोकट में लिखा गया यह लेख हमने बिना किसी योजना के लिखा है।   इस अवसर पर हम अपने पाठकों और मित्रों से यही कह सकते हैं कि धन की औकात जेब तक ही है उसे सिर पर चढ़कर नहीं बोलने देना चाहिए।  साथ ही यह भी बताना चाहेंगे कि धन का अपव्यय नहीं करें तो अच्छा है क्योंकि धन सब कुछ नहीं है पर आत्मविश्वास का एक बहुत बड़ा स्त्रोत है।  इस अवसर पर सभी पाठक और मित्रों को बधाई।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Sunday, October 21, 2012

दिल यूं ही गुनगुनाता है-हिंदी कविता

भीड़ में जाकर
अपना दर्द कहना
अब  हमें नहीं सुहाता है,
अपने गमों से हारे
चीखते चिल्लाते लोग
कानों से सुनते नहीं
अपनी जुबां से
उनको अपना हाल  बयान करना ही  आता है।
कहें दीपक बापू
सर्वशक्तिमान का शुक्रिया
अपने दर्द और खुशी पर
कविता या गीत लिखने की
कला दी है
दिल हर नजारे पर
यूं ही कुछ लफ्ज गुनागुनाता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, madhya pradesh
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Monday, August 13, 2012

जिंदगी में मजे कुछ यूं लिये-हिन्दी कविता (aindagi ke majre hamane yoon liye-hindi kavita or poem)

चंद पल की खुशी की खातिर
हमने जिंदगी के कई साल बरबाद किये,
जब पढ़ते हैं हम अपनी कहानी
तब पता लगता है कि
अमृत से ज्यादा जहर के प्याले पिये।
कहें दीपक बापू
जुबान से निकले अपने बहुत से बोल
बाहर आते ही जमीन पर गिरते देखे
खामोशी में हम खुशी से जिये,
बहुत से दृश्यों में आंखों फोड़ी
शोर सुनकर कान भी बहरे किये,
मगर मजे से रहे तभी
जब लोग दौड़े सुख के वहम में दुखों की तरफ
हम खड़े रहे बांधे हाथ पीछे किये।
........................................
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ग्वालियर
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Tuesday, July 31, 2012

जितना बिजली चलाये-हिन्दी हास्य व्यंग्य कविता (jitna bijzli chalaye-hindi hasya vyangya kavita)

कवि सम्मेलन में
बिजली गुल हो गयी
एकदम सन्नाटा छा गया
कवियों की हो गयी बोलती बंद,
सब श्रोता चिल्लाने लगे
नहीं रहे थे वह अब शांति के पाबंद,
एक श्रोता बोला
‘‘कवि भाईयों
इस बिजली गुल होने पर
कोई कविता सुनाओ,
अंधेरे पर कुछ गुनगुनाओ,
देशभक्ति पर बाद में
अपने गीत और गज़लें सुनाना,
मौका है तुम्हारे पास
चाहो तो तरक्की का मखौल उड़ाना,
हमारे अंदर का दर्द बाहर आ जाये,
आप में से कोई ऐसा गीत गाये।
सुनकर एक कवि बोला
‘‘अंधेरा मेरा गुरु है
जिससे प्रेरित होकर मैंने शब्द शास्त्र चुना
उसका मखौल मैं उड़ा नहीं सकता,
बिजली की राह भी अब नहीं तकता,
आ जाये तो कुछ लिख पाता हूं,
नहीं आती तो सो जाता हूं,
इस देश में अंधेरा बसता है
यह बिजली ने आकर ही बताया,
हैरानी है यह देख कर
अंधेरे ने पुराने लोगों को नहीं सताया,
हंसी यही सोचकर आती है
बिजली की रौशनी के हम गुलाम हो गये,
सूरज का प्रकाश अब मायने नहीं रखता
तरक्की में इंसानी जज़्बात कहीं खो गये,
इस अंधेरे में
मैं बोल सकता हूं
तुम सुन सकते हो
मगर इस कमरे में
अपनी आदतों से मजबूर हम
लाचार साये हो गये,
ओढ़ ली है बेबसी हमने खुद
उतना ही चलते हैं जितना बिजली चलाये,
कुदरत ने इंसान बनाया
मगर हम रोबोट बन गये,
यह अलग बात है कि
बिजली से चलने वाले रोबोट हमने बनाये,
वह हमारे काम आते हैं,
पर हम खुद कभी किसी के काम न आये।
---------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Sunday, June 3, 2012

घायल होने का दर्द-हिन्दी साहित्य (Ghyal hone ka dard-hindi kavita or poem)

रास्ते में मिलने वाले
सभी लोगों से हम कभी
अपना दिल नहीं मिलाते,
पता है कि जिनका ठिकाना आ गया पहले
वह हमें छोड़ जायेंगे,
मंजिल आयी पहले अगर हमारी
हम उन्हें आगे घकियाएंगे,
ऐसे में जिस हमराह के यादगार पल हों साथ
वह दिल का दर्द दिखाते।
कहें दीपक बापू
लोग हालतों से मजबूर होकर
अपना चेहरा बदल देते हैं,
मतलब निकलते ही दूर होकर
अपना नाम भी बदल देते हैं,
हवा में उड़ने की चाहत में
लोग जोड़ते हैं तूफानों से नाता,
गिरना तय था
घायल होने पर ही हर कोई समझ पाता,
इसलिये दूसरों को नहीं
खुद को ही जमीन पर पांव
रखकर चलना सिखाते।
-------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Monday, April 2, 2012

अध्यात्म ज्ञान क्रय विक्रय की वस्तु नहीं-हिन्दी संपादकीय (adhyatma gyan [kharid frokhta ki cheej nahin-hindi editorial, article or lekh)

             योग और ध्यान की कला बाज़ार में बिकने वाली चीज नहीं है जिसे खरीदकर कोई सिद्ध बन जाये। इसके अलावा जो सिद्ध हैं वह अपनी सिद्धियां बाज़ार में ब नहीं जाते। सच बात तो यह है कि साधना एकांत में सक्रिय रहकर की जा सकती है। ऐसे में चौराहों पर आकर अगर कोई यह दावा करता है कि वह योग और ध्यान में सिद्ध है और अपने चेले चपाटे इस प्रचार में लगा देता है कि उसके धार्मिक संसार का विस्तार हो तो समझ लीजिये कि वह गुरु अध्यात्म ज्ञान से स्वतः वंचित है। अध्यात्म और धर्म में अंतर है। धर्म बाह्य रूप से निर्वाह किया जाता है और अध्यात्म अंतर ज्योति में प्रकाशित होता है अतः उसका ज्ञान होने पर आदमी अंतर्मुखी होता है।
               आज हम देख रहे हैं कि सारे देश में धर्म के नाम पर तमाम तरह के प्रचारक हैं पर उनमें अध्यात्म ज्ञानी कितने हैं, यह शोध का विषय है। एक बात तय रही कि धन लेने और देने वाले कभी भी अध्यात्म ज्ञान में पारंगत नहीं हो सकते। अध्यात्म स्वचिंतन के लिये प्रेरित करता है और ऐसे में आदमी अपनी इंद्रियों को अंतर में सक्रियता रखता है। जब आदमी की इंद्रियां जैसे कान, नाक, हाथ, और आंख बाहरी रूप से सक्रिय हैं तब वह अध्यात्म से परे हो जाती हैं। ऐसे में अच्छा सुने या देखें वह प्रभाव अंदर तक नहीं जाता। उनका प्रभाव तभी अच्छी तरह अंदर जा सकता है जब इंद्रियों को अंतर में ले जाया जाये। यह कला ध्यानी और ज्ञानी जानते हैं और वह कभी आत्म प्रचार के लिये चेले चपाटे नहीं जुटाते।
              इस समय हमारे देश में योग का जिस तरह बाज़ार सजाया जा रहा है उसे देखकर अनेक लोग यह समझते हैं कि यह विधा बहुत सरल है और इसे चंद समय में कोई भी सिखा सकता है। इतना ही नहीं अनेक लोग तो ऐसे हैं जिन्होंने कहीं से दस पंद्रह दिन का योगासन और प्राणायाम का प्रशिक्षण लिया और अब स्वयं शिक्षक बन गये हैं। बहुत कम लोग इस बात को समझते हैं कि पंतजलि योग सूत्र और श्रीमद्भागवत गीता के संदेश केवल श्रद्धा से ही पढ़ने वाली सामग्री नहंी है वरन इनका अध्ययन भी कक्षा दर कक्षा में पढ़कर किया जा सकता है। मतलब यह कि इनके पाठों का अध्ययन करने में वैसी ही बुद्धि की आवश्यकता होती है जिसे गणित, विज्ञान और भूगोल की पुस्तकों को पढ़ने के लिये उपयोग में लायी जाती है। अंतर इतना है कि योग साहित्य और श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन से नौकरी नहीं मिलती दूसरा यह भी कि इनको श्रद्धा से पढ़ने पर ही समझा जा सकता है। थोड़ा बहुत अध्ययन कर शिक्षक बने लोग केवल धार्मिक व्यवसायी बन जाते हैं।
            पतंजलि योग साहित्य के आठ भाग हैं। यह एक तरह से अध्यात्मिक विज्ञान है जिसकी तुलना किसी अन्य किताब या ग्रंथ से नहीं है। यह अलग बात है कि पश्चिमी विज्ञानिकों की दृष्टि से अध्यात्म का कोई विज्ञान नहीं होता। इसी कारण इसके अध्ययन की उपेक्षा हमारे देश में हुई है जिसका लाभ अब वह लोग उठा रहे है जिन्होंने बस इतना सीखा है कि इससे अपनी रोजी रोटी कैसे चलायी जाये। हमें उनकी क्रिया पर कोई आपत्ति नहंी है पर लोगों का यह समझना चाहिए कि पतंजलि योग विज्ञान तथा श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान में वही पारंगत हो सकता है जिसने इनका विशद अध्ययन किया हो। अंत में यह भी बता दें कि जिन्होंने दोनों में अपना महारथ प्राप्त किया है वह कभी प्रचार के मैदान में नहीं दिखाई देंगे। वह दवाई, कैलेंडर और पेन बेचते नहीं दिखाई देंगे। यह भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का प्रभाव कहें कि उनका ज्ञान कभी अर्थ पर आधारित न होने से वह स्वाभाविक रूप से क्रय विक्रय की वस्तु नहीं बन पाया। अगर कोई इसे क्रय और विक्रय की वस्तु समझता है तो वह यकीनन घोर अज्ञानी है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Sunday, January 1, 2012

नीम की कड़वाहट, चंदन की खुशबु-हिन्दी व्यंग्य शायरियां (neem ki kadvahat, chandan ki khusbu-hindi vyangya shayariyan)

नीम के पेड़ पर चंदन की खुशबु कभी आ नहीं सकती,
चंदन के पेड़ पर भी कोई दवा भी नहीं मिल सकती।
कहें दीपक बापू सुगंध और मिठाई की दीवानी दुनियां
झूठ के आदी लोग कड़वी सच्चाई कभी पच नहीं सकती।
-----------
खाली दिमाग शैतान का घर होता है,
दिल बहलाने के लिये भी
उसके पास हैवान का दर होता है।
कहें दीपक बापू एक आदमी की बात होती तो ठीक
जहां तो सारा जहान ही जागते हुए सोता है।
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Saturday, December 24, 2011

गर्मी से बचकर, बरसात से हटकर और सर्दी से डटकर लड़ा जा सकता है-हिन्दी लेख (grami se bachakar,barsat se hatkar aur sardi se datkar bachen-hindi lekh or article)

             ठंड बढ़ रही है, और ऐसा लगता है उन इलाकों से गुजरने पर भी आसपास बर्फ जमे होने का अहसास होता है जो भीषण गर्मी की वजह से जाने जाते हैं। हम भारतीय लोग ठंड, बरसात और गर्मी का सामना करने के आदी माने जाते हैं पर लगता है आधुनिक जीवन शैली ने भारतीय समाज में ढेर सारे विभाजन कर दिये हैं जिसकी वजह से आज हम अपनी कोई बात या अपना सिद्धांत समस्त लोगों पर लागू नहीं कर सकते। मूल बात यह है कि गर्मी का सामना बचकर, बरसात का सामना हटकर और सर्दी का सामना डटकर ही हो सकता है। जब गर्मी में सूर्य की तेज किरणें धरती पर बरस रही हों तब आदमी पेट में पानी भरने के साथ ही पांव में ऐसे जूते पहनकर निकले जिनसे वह जले नहीं। जब बरसात हो रही हो तब जहां तक हो सके अपना सिर भीगने से बचाये ताकि सिर पर पानी पड़ने से स्वास्थ्य की हानि न हो। उसी तरह सर्दी का मुकाबला भले ही रात में बिस्तर में दुबककर हो सकता है पर दिन में जहां तक हो सके अपने शरीर को चलाईये जिससे उसमें अग्नि प्रज्जवलित रहे।
          टीवी पर एक कार्यक्रम में बताया गया कि दिल्ली में बढ़ती सर्दी के बावजूद लोगों के दिमाग में गर्म भरी हुई है। रास्ते चलते हुए वाहन टकराने पर झगड़े और कत्ल हो रहे हैं। इस पर तमाम तरह के सवाल जवाब हो सकते हैं पर मूल बात यह है कि हम मानव के बाह्य रूप के विज्ञान को जानते हैं। संभव है कि कोई मनोविज्ञानिक होने का दावा कर यह बताये कि वह मनुष्य की दिमागी गतिविधियों पर अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत कर कसते हैं। मगर प्रकृति और निवृत्ति के विज्ञान का सही ज्ञान केवल गीता साधकों को ही हो सकता है। इसके सूत्र बहुत हो सकते हैं पर उनका विस्तार करने से असली बात रह जायेगी। मुख्य बात यह है कि मनुष्य शरीर को एक आत्मा धारण करता है जिसके बिना इस जीवन की कल्पना करना मुश्किल है। यह अलग बात है कि इस देह का संचालन मनुष्य स्वाभाविक रूप से मन, बुद्धि तथा अहंकार के वश होने देता है। यह केवल ज्ञानियों के लिये ही संभव है कि इन तीनों प्रकृतियों के प्रभाव से निवृत होना जानते हैं। इसके अलावा पंच तत्वों से बनी देह में जल, अग्नि, आकाश, वायु तथा प्रथ्वी पर जो समयानुसार प्रतिक्रिया होती है उसका भी मनुष्य की मनस्थिति पर प्रभाव पड़ता है। जैसा खाये अन्न वैसा हो मन। जैसा पाये धन वैसा हो जाये तन! हम अगर अधिक ज्ञान की बात करेंगे तो शायद समाज का ऐसा भयानक रूप दिखने लगेगा जिससे अंततः स्वयं को ही असहजता अनुभव होगी मगर सत्य तो सत्य है! हमेशा ज्ञानी बने रहना एकाकी बना देता है।
           अभी तक अधिकतर लोगों का हृदय असहज था तब तक चलता रहा पर अब तो लोगों के मस्तिष्क भी असंवेदनशील हो गये हैं जो कि आने वाले खतरों का संकेत है। उनकी प्राणशक्ति अत्यंत क्षीण है जो उनको असहनशील बना रही है। हमारे देश में विकास का पर्याय भौतिक साधनों के अधिक उपभोग से आंकी जा रही है। चीन से हमारे यहां कंप्युटर कम हैं, वहां के मुकाबले कारें कम चल रही हैं, वहां के मुकाबले हमारे यहां टीवी कम चल रहे तथा वहां के मुकाबले यहां इंटरनेट प्रयोक्ता कम है इसलिये हम उससे पीछे हैं, यह बात देश के हितचिंतक बड़े दुःख से कहते हैं। उपभोक्ता बाजार को बढ़ाया जा रहा है। यही कारण है कि कारें और बाईक की तो संख्या में बढ़ रही है पर सड़के चौडी होने की बजाय अतिक्रमण का शिकार हो गयी हैं। फिर आजकल का खानपान ऐसा है कि लोगों की शक्ति कम हो रही है। जैसा कि कहा जाता है कि जो चीज आदमी के पास नहीं होती वह उसके होने का अहसास करना चाहता है। शक्ति है नहीं पर वह दिखाना चाहता है। इसलिये रास्ते पर जरा जरा सी बात झगड़ा। कहीं कहीं कत्ल हो जाता हैं। कहीं सड़क दुर्घटना पर जाम लग जाता है। हमें तो ऐसा लगता है कि अनेक ऐसे लोगों के पास कार या बाइक आ गयी है जो उसके लायक नहीं है पर मगर यह बात उनसे कहना जान आफत में डालना है। बंदर के हाथ में उस्तरा कहें या गंजे को भगवान ने नाखून दे दिये यह कहें। हमारा समाज यह मानता है कि जिसके पास पैसा है उसके पास सब कुछ है। अक्ल तो भगवान उसे वैसे ही दे देता है। हमारा अनुभव इसका उल्टा है। सबसे ज्यादा नकारा धनवान हो गये है यही कारण है कि समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा राजरोगों की चपेट में है। यह रोग उनकी मनस्थिति को खतरनाक न बनायें यह संभव नहीं है।
          अन्ना हजारे ने समाज में चेतना लायी यह कहते हुए बहुत लोग थकते नहीं है पर इसका मतलब यह है कि हमारे यहां लोग सुप्तावस्था में थे। प्रचार माध्यमों को देखकर भले ही लोग समाज में चेतना का दंभ भर रहे हैं पर यह एक भ्रम है। अनेक मनोविशेषज्ञ लगतार यह कह रहे हैं कि भारत में मनोरोगी इतनी बड़ी संख्या में है कि कईयों को इसका आभास तक नहीं कि वह इसका शिकार हैं। मानसिक रूप से रुग्ण समाज अगर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर तालियां बजा रहा है तो उसके नायक के अभिनय को श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता है। प्रश्न तो दर्शक दीर्घा में उपस्थित लोगों की योग्यता पर भी संदेह है। भीड़ प्रसिद्ध का प्रमाण है पर प्रतिभा के लिये किसी भी आदमी की योग्यता के भौतिक सत्यापन से ही संभव है जो कि अपने लिये काम करने से नहीं वरन् समाज को कुछ देने से मिल सकता है। आदमी अकेले जीने का आदी है। वह सड़क पर भी अकेले चलने की अनुभूति चाहता है। ऐसे में कोई   वाहन से टक्कर मारत है तो वह उसमें थोड़ी टूट फूट से बिफर जाता है। घबड़ाता है कि घर पर लोग कहीं यह ताना न दें कि वाहन नहीं चलाना आता। इसलिये वह लड़कर अपनी भड़ासं निकालना चाहता है। पैसा वसूलना चाहता है। सर्दी, गर्मी और बरसात अब उसकी देह को प्रभावित करती है मस्तिष्क को नहीं जो कि असंवेदशील हो चुका है।
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Wednesday, December 14, 2011

मोहब्बत और सोहबत-हिन्दी शायरी (mohbbat aur sohbat-hindi shayari)

कुछ लोगों ने ज़िंदगी में
हमेशा ज़ंग की
कुछ ने किया अपनों को
गैर बनाने का गुनाह
कभी समझी नहीं मोहब्बत।
कहें दीपक बापू
उनके अंजाम पर क्या रोना
जिन्होने दौलत में तस्वीर देखी जन्नत
मगर कर ली लुटिया डुबोने वाले
शैतानो से सोहबत।
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Monday, November 28, 2011

आम आदमी कार्टून में खड़ा रहेगा-हिन्दी हास्य व्यंग्य कवितायें (comman man, cortton and corttunist-hindi satire comedy poem's)

बहुत मुद्दो पर बहस
टीवी चैनलों पर चलती है,
अखबारों में समाचारों के साथ
संपादकीय भी लिखे जाते हैं,
बरसों से मसले वहीं के वहीं हैं,
बस, चर्चाकार बदल जाते हैं।
लगता है आम आदमी इसी तरह
बेबस होकर कार्टूनों में खड़ा रहेगा
जिसकी समस्याओं के हल के लिये
रोज रोज बनती हैं नीतियां
कभी कार्यक्रमा भी बनाये जाते हैं।
-------------
एक कार्टूनिस्ट से आम आदमी ने पूछा
‘‘यार,
आप जोरदार कार्टून बनाते हो,
हमारे दर्द को खूबसूरती बयान कर जाते हैं,
मगर समझ में नहीं आता
देश के मसले कब हल होंगे
हमारा उद्धार कब हो जायेगा।’’
सुनकर कार्टूनिस्ट ने कहा
‘‘सुबह सुबह शुभ बोलो,
जब यह देश का हर आदमी
दर्द से निकल जायेगा,
मेरे कार्टून के विषय हो जायेंगे लापता
नाम पर भी लगेेगा बट्टा
मगर भगवान की कृपा है
तुम जैसे लोग खड़े रहेंगे
मेरे कटघरे में इसी तरह
भले ही तुम अपनी जंग खुद लड़ते रहो
मगर तुम्हारे भले के लिये
कोई न कोई रोज नया आदमी खड़ा होगा,
अभिनय कर देवता बन जायेंगे
उनके नाटक पर
मेरे लिये रोज एक कार्टून तैयार हो जायेगा।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, November 19, 2011

धोखे के पीछे सच सो रहा चादर तान-हिन्दी शायरियां (dhokhe ke peechhe sach so raha hai-hindi shayariyan)

इस धरती पर भी बहुत सारे तारे चलते हैं,
जहां को रौशन करने वाले चिराग भी जलते हैं।
जिन्होंने अपने चेहरे सजाये सौंदर्य प्रसाधनों से
उम्र के साथ वह भी डूबते सूरज की तरह ढलते हैं,
लूट लिया पसीने से कमाया खजाना उन्होंने
मेहनतकशों की दरियादिली पर जो रोज पलते हैं।
कहें दीपक बापू उखड़ जाती है जिनकी जल्दी सासें
लोग उनके आसरे अपनी जिंदगी रखकर मचलते हैं।
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गद्दार बता रहे हैं वफा की पहचान,
लुटेरे पा रहे हैं इस जहां में सम्मान।
सौंदर्य सज गया है नकली सोने से
क्या करेंगे जौहरी, सच लेंगे जो जान,
कहें दीपक बापू, जहां में अक्ल चर रही घास
धोखे की पीछे सच सो रहा है चादर तान।
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Tuesday, October 25, 2011

कन्या भ्रुण हत्याओं का परिणाम और कॉमेडी-हिन्दी व्यंग्य लेख

              यह कहना कठिन है कि यह कन्या भ्रुण हत्याओं की वजह से देश में लड़कियों की संख्या कम होने का परिणाम है या छोटे पर्दे लेखकों की संकीर्ण रचनात्मकता का प्रभाव कि हास्य-व्यंग्य पर आधारित कार्यक्रम यानि कॉमेडी के लिये पुरुष पात्रों से महिलाओं का अभिनय कराया जा रहा है। इतना तय है कि इस कारण हास्य व्यंग्य पर आधारित धारावाहिक अपना महत्व आम जनमानस में खो रहे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि हास्य व्यंग्य पर आधारित एक चैनल भी अब अपनी कहानियों में पुरुष अभिनेताओं को महिलाओं के पात्र निभाने के लिये प्रेरित कर रहा है। एक कार्यक्रम कॉमेडी सर्कस ने तो हद ही कर दी है। उसमें पुरुष जोड़ी को महिला युगल पात्रों का अभिनय कराया तो महिला से पुरुष और पुरुष से महिला पात्र कराने अभिनय भी प्रस्तुत किया।
             हम यहां कोई आपत्ति नहीं कर रहे हैं न कोई बंदिश आदि की मांग कर रहे हैं। बस एक बात हास्य व्यंग्य लेखक और पाठक होने के नाते जानते हैं कि ऐसी मूर्खतापूर्ण प्रस्तुतियों से हंसी तो कतई नहीं आती है। फिर आज की युवा पीढ़ी से यह आशा करना तो बेकार ही है कि वह ऐसे हास्य व्यंग्य को समझ पायेगी जो कि विशुद्ध रूप से विपरीत लिंगी यौन आकर्षण के कारण भी इनको देखती है। अगर कहीं महिला पात्र का निर्वाह कोई पुरुष करता है तो वह युवकों में कोई यौन आकर्षण पैदा नहीं करता। वास्तव में जो हास्य व्यंग्य देखते हैं उनके लिये भी यह निराशाजनक होता है। सब जानते हैं कि विपरीत लिंगी योन आकर्षण भी पर्दे की प्रस्तुतियों को सफल बनाने में योग देता है और यह देश अभी समलैंगिक व्यवहार के लिये तैयार नहीं है जैसा कि कुछ बुद्धिजीवी चाहे हैं। इस तरह के अभिनय अव्यवसायिक रुख का परिणाम लगता है भले ही चैनल वालों को इसकी परवाह नहीं क्योंकि वहां कंपनी राज्य चलता है जिनके उत्पाद बिकने हैं चाहें विज्ञापन दें या नहीं। विज्ञापन तो उनके लिये प्रचार माध्यमों को नियंत्रित करनो का जरिया मात्र है।
             हमें लगता है कि यह शायद इसलिये हो रहा है कि इन पर्दे के व्यवसायियों को महिला पात्र मिल नहीं पा रही हैं या फिर आजकल की लड़कियां भी जागरुक हो गयी हैं और -जैसा कि हम सुनते हैं कि कला की दुनियां दैहिक यानि कास्टिंग काउच शोषण होता है-वह कम संख्या में ही मिल रही हैं। यह सही है कि पर्दे की रुपहली दुनियां के सभी प्रशंसक हैं पर कास्टिंग काउच जैसे समाचारों की वजह से अब आम लड़कियां नायिका बनने के सपने अधिक मात्रा में नहीं देखती। संभव है कि लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है जिस कारण उसका प्रभाव हो या फिर बढ़ती जनसंख्या के बावजूद पर्दे पर अभिनय करने वाली लड़कियों की संख्या कार्यक्रम निर्माताओं की संख्या के अनुपात में न बढ़ी हो। इसलिये संतुलन न बन पा रहा हो। जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे देश का धनपति तथा बाहुबली वर्ग सारी बातें मंजूर कर सकता है पर काम देने के मामले में अपनी शर्तें थोपने की प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाते। इसलिये जिनको अभिनय के लिये लड़कियां अपनी शर्तों पर मिलती हैं वह कार्यक्रम बना लेते हैं जिनको नहीं मिलती वह पुरुषों से महिला पात्रों का अभिनय कराने वाली पटकथा लिखवाते हैं। प्रचार प्रबंधकों की मनमानी का ही यह परिणाम है कि क्रिकेट की तरह छोटे पर्दे के कथित वास्तविक प्रसारण यानि रियल्टी शो भी फिक्सिंग के आरोपो से घिरे रहते हैं। अभी हाल ही में बिग बॉस-5 को हिट करने के लिये भी क्षेत्रीयता का मुद्दा उठाया गया। लोगों ने साफ माना कि यह केवल प्रचार बढ़ाने के लिये हैं।
            बहरहाल एक बात तय है कि हिन्दी से कमाने को सभी लालायित हैं पर शुद्ध लेखकों से लिखवाने के लिये कोई तैयार नहीं है। यही कारण कि विदेशी धारावहिकों से अनुवाद कर लिखवाया जाता है। क्लर्कों को कथा पटकथा लेखक कहा जाता है। विदेशी कार्यक्रमों की की हुबहु नकल पर कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते हैं। देश के संस्कारों की समझ किसी को नहीं है न उनको जरूरत है। यहां आम आदमी को तो एक निबुद्धि इंसान माना जाता है। कॉमेडी के नाम पर इसलिये फूहड़ कार्यक्रम प्रस्तुत किये जा रहे हैं।
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