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Wednesday, August 14, 2013

१५ अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर विशेष हिंदी लेख-राजसी प्रकृति के लोगों को दृढतापूर्वक राजसी कर्म करना चाहिए (special hindi article on 15 august independay day of india-rajsi prakriti ke logon ko hee drudhtapurvak rajsi karma karna chahiye)



        भारत 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की राजनीतिक दासता से मुक्त हुआ था। जब हम राजनीतिक विषय की बात बरते हैं तो उसका संबंध सीधे मनुष्य की राजस प्रकृति और कर्म से होता है।  जैसा कि हम जानते हैं कि मनुष्य की तीन प्रवृत्तियां होती हैं। सात्विक, राजस और तामस, इसी क्रम में उसके कर्म भी होते हैं।  मनुष्य समाज में राजस भाव के लोगों की प्रधानता होती है और सच बात यह है कि संसार के समुचित संचालन में उनका ही योगदान होता है पर यह यहां स्पष्ट कर दें कि सब कुछ वही नहीं होते। तामसी प्रवृत्ति वाले लोगों का संसार संचालन में अपनी उपस्थिति के अलावा
अन्य कोई योगदान नहीं होता। सात्विक प्रकृत्ति के लोग येनकेन प्रकरेण राजसी प्रकृत्ति के लोगों के प्रति सद्भाव तो रखते हैं पर उनकी प्रकृति और कर्म का अनुकरण नहीं करते।  अगर मदद मांगी जाये तो वह राजसी प्रकृति के मनुष्य की सहायता करने को तैयार भी हो जाते हैं पर उनका अपने लाभ को लेकर कोई लोभ नहीं होता। राजसी प्रकृत्ति वाले कभी कोई काम बिना लाभ के नहीं करते। अपने पद, पैसे और प्रतिष्ठा का उनमें अहंकार भी रहता है। तामस प्रकृत्ति के लोगों का वह सहजता से उपयेाग करते हैं पर अर्थ सिद्ध न करें तो सात्विक मनुष्य की तरफ उदासीनता का भााव दिखाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि राजसी प्रकृति का जैसा स्वभाव है वैसा ही उसे धारण करने वाले का कर्म भी होता है। राजसी व्यक्ति कभी निष्कर्म भाव से सक्रिय नहीं रहता।
            अगर हम इस संसार में संचालन की तरफ देखें तो उसका भौतिक संचालन राजस भाव से ही संभव है। यहां तक कि सात्विक भाव वाले भी कभी न कभी राजस भाव धारण कर कार्य करते हैं।  इन तीनों से परे कर्मयोगी होते हैं जो कर्म की प्रकृति देखकर उसे करने के लिये वैसा ही भाव अपनाते हैं।  वह चाहे जो भी काम करें निष्कर्म भाव से करते हैं।  तय बात है कि ऐसे लोग  विरले ही होते हैं।  हां, यह जरूर है कि कुछ सात्विक प्रकृत्ति के लोग कभी कभी राजस कर्म की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इनमें एक नाम आता है महात्मा गांधी।  देखा जाये तो महात्मा गांधी सात्विक प्रकृत्ति के थे।  दक्षिण अफ्रीका में जब उनको भारतीय होने के कारण रेल के उस डिब्बे से निकाला गया जो केवल गोरे लागों के लिये सुरक्षित था तब उनके मन में आक्रोश का भाव पैदा हुआ। वहीं से उनकी अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोला तो उसकी चरम परिणति  15 अगस्त 1947  को भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के रूप में हुई।  सात्विक प्रकृत्ति के महात्मा गांधी ने राजसी भाव से जिस तरह अपना लक्ष्य प्राप्त किया वह पूरी दुनियां के लिये अनुकरणीय है।
        इसके बावजूद कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर सहजता से नहीं मिल पाता। पहला प्रश्न तो यह कि गांधीजी ने स्वतंत्रता तो दिलाई पर सत्ता से दूर रहे।  कुछ लोग इसे उनका त्याग मानते हैं पर ज्ञान साधक उनके इस भाव को स्वीकार नहीं करते। जब अंग्रेज भारत छोड़ रहे तो महात्मा गांधी यहां की व्यवस्था से प्रथक क्यों हुए? क्या सत्ता केवल भोग  के लिये है जिससे दूर रहना एक पुण्यकर्म है? यदि हम यह माने कि यह त्याग है तो इसका मतलब हम मानते हैं कि राज्य की व्यवस्था तो भगवान के भरोसे ही चलती है और राजा या राज्य प्रमुख तो केवल सुख भोगी होता है।  उस पर प्रजा की भलाई के लिये कोई जिम्मा नहीं होता और उसके लिये चतुराई के साथ उदारता की आवश्यकता भी नहीं होती।  सच तो यह है कि सात्विक प्रकृत्ति के महात्मा गांधी राजसी भाव में एक सीमा तक ही लिप्त हो सकते थे।  कहीं न कहीं अंग्रजों के प्रति उनके मन में नाराजगी का भाव था जो कि विशुद्ध रूप से राजसी भाव का प्रतीक था। जिनकी सात्विक प्रकृति होती है वह राजसी कर्म में निरंतर लिप्त नहीं रह पाते। किसी भी आंदोलन में व्यक्ति की सक्रियता नियमित नहीं होती है इसलिये उसका ठीक से आंकलन नहीं होता। दूसरी बात यह कि आंदोलन चाहे हिंसक हो या अहिंसक कही  न कहीं किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति के विध्वंस का भाव लिये होते हैं।  महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को भारत से बाहर किया पर जब उसके बाद नये भारत क निर्माण का प्रश्न आया तो वह त्यागी हो गये।  अब सवाल आता है कि निर्माण तो किसी भी व्यक्ति की रचनात्मकता की प्रकृति से ही संभव है।  महात्मा गांधी ने सरकार में कोई पद नहीं लिया इसे क्या समझा जाना चाहिये?  हमारा मानना है कि किसी समूह को आंदोलन सफल होने के बाद अभियान चलाना भी आना चाहिये।  आंदोलन से विध्वंस के बाद रचना का अभियान न चलाया जाये तो यह मानना चाहिये कि नेतृत्व में क्षमता का अभाव है।
      महात्मा गांधी के इस कथित त्याग ने देश में तत्कालीन ही नहीं वरन् भविष्य की राजनीतिक पीढ़ी को भी गलत संदेश दिया। आज भी राजनीति में सक्रिय लोगों से जब प्रधानमंत्री या  मुख्यमंत्री पर पर बैठने की इच्छा के बारे में तो वह हृदय में लालसा होते हुए भी मना करने का स्वांग रचते हैं। क्या वह यह साबित नहीं करते कि उच्च पद जिम्मेदारी की बजाय भोग के लिये होता है? दूसरी बात यह कि राजनीति को समाज सेवा के लिये अपनाने का ढोंग कई तरह के विरोधाभासों को उत्पन्न करता है। राज्य प्रमुख  को दृढ केवल न होना चाहिये वरन् दिखना भी चाहिये।  इससे प्रजा तथा शत्रु राष्ट्र डरे रहते हैं।  अगर उच्च पदों पर मन में कुछ और जुबान पर कुछ होने वाले बैठेंगे तो यकीनन राज्य में प्रजा की प्रसन्नता की आशा नहीं करना चाहिये।  सच तो यह है कि राजनीति समाज सेवा का नहीं वरन् राज्य को साधने के लिये करना चाहिये।  सभी को साथ लेकर चलने का स्वांग करने की बजाय सभी को साधने का निश्चय उच्च पद पर बैठे व्यक्ति को धारण करना चाहिये।  गांधी जी ने अंग्रेजों के राज्य का विध्वंस करने वाले आंदोलन के प्रेरक तो बने पर देश की व्यवस्था को नया रूप देने के लिये किसी अभियान को कैसे चलायें, यह संदेश नहीं दे पाये।  कोई पद लेकर वह शासन चलाने की तरीका सिखाते तो यकीनन उनका दर्जा महात्मा  की बजाय देवता का होता।  यही कारण है कि उनके अनेक अनुयायी यदकदा उनके नाम का जाप करते हुए दूसरी आजादी का आंदोलन करते हैं। कोई कहता है कि हमें अधूरी आजादी मिली।  हम देख रहे हैं कि भारत अभी भी राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक रूप से अस्थिर मनस्थिति में फंसा है।  गांधी के ढेर सारे कथन हैं पर उनसे आंदोलन ही चल सकता है।  उनका संदेश या दर्शन किसी अभियान में सहायक हो सकता है, इसके लिये गांधी जी ने कोई उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया।
      बहरहाल 15 अगस्त 1947 को भारत ने राजनीतिक आजादी पायी। इससे अधिक इसका कोई महत्व नहीं है। इससे पूर्व जो भारत था उसके अब तक तीन भाग हो चुके  हैं। एक पाकिस्तान तथा बंग्लादेश तो तीसरा भारत।  दोनों ही देश दुश्मन बने हुए हैं।  मतलब यह कि इस दिन हमने एक दुश्मन पाया जिसके हमने ही दो टुकड़े किये पर दोनों का रवैया एक जैसा है।  पहले अंग्रेजों से लड़ते थे आज इन दोनों टुकड़ों से लड़ना पड़ रहा है।  जहां देश की व्यवस्था का प्रश्न है तो वह अंग्रेजों ने जो बनायी वही चल रही है। इतना ही नहीं हम दावा करते हैं कि अब हमारे अपने कानून हैं पर ताज्जुब हैं उनमें से अधिकतर अंग्रेजों के बने हुए है।  इनमें से कई कानून ऐसे हैं जो अनेक उन कामों को गलत मानते हैं जिनको अंग्रेजी समाज आज भी नहीं मानता।  यही कारण है कि अनेक वि़द्वान अभी भी पूर्ण आजादी के लिये वैचारिक युद्ध मे व्यस्त रहते हुए बहसें करते हैं।  जिनके पास शिखर पर पद हैं पता नहीं वह उनका कितना आनंद उठाते हैं, पर एक बात तय है कि अंग्रेजों की व्यवस्था चल रही है सो चल रही है। वैसे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ कहते हैं कि ‘‘लोकतंत्र में लिपिक शासन चलाते हैं।’’
       एडमस्मिथ ने कभी भारत का दौरा किया यह तो पता नहीं पर उसने यह उस पश्चिमी व्यवस्था को देखकर ही कहा होगा जिसका अनुकरण हम कर रहे हैं।  हमारे देश में जो व्यवस्था है उसे कौन चला रहा है यह पता नहीं चलता।  खासतौर से उच्च पदों पर विराजमान शिखर पुरुष भी कभी कभी अपने अधीनस्थ अधिकारियों की-लगता है एडमस्मिथ उनको ही क्लर्क मानते होंगे-शिकायत करते हैं कि वह उनकी सुनते ही नहीं है तब यह कहना ही  पड़ता है कि यह देश भगवान भरोसे ही चल रहा है। इस स्वतत्रता दिवस पर हम इतना ही कह सकते हैं कि अभी देश के राजसी प्रवृत्ति के लोगों को सीखने की आवश्यकता है इसके लिये उन्हें कम से कम सात्विक होने का पाखंड छोड़कर राजसी कर्म के प्रति राजसी भाव से दृढ़ता पूर्वक लिप्त होना चाहिये। 
       सभी ब्लॉग लेखक मित्रों और पाठकों इस स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर हार्दिक बधाई।




  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Friday, April 26, 2013

देश की मानसिक स्थिति का भी अध्ययन जरूरी-हिन्दी लेख (desh ke manodasha ka adhyayan jaroori-hindi lekh or editorial)

        न्यायविदों, सामाजिक चिंत्तकों और सेवकों के लिये छोटी आयु की बच्चियों के साथ कुकर्म की बढ़ती घटनायें अत्यंत चिंता का विषय है।  अपराधियों का पकड़ा जाना अच्छी बात है पर ऐसे अप्राकृतिक कर्म की बढ़ती निरंतरता इसे महत्वहीन बना देती है। यही कारण है कि जब सुरक्षा करने वाली संस्थायें  यह कहती है कि वह ऐसे अपराधों को रोक नहीं सकती तो न्यायविदों का उससे यह कहना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वह इतना तो पता लगाये कि ऐसा क्यों हो रहा है।  न्यायविदों का यह पूछना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि क्या लोग पागल हो रहे हैं?
        आर्थिक विकास था भौतिक उत्थान की अंधी दौड़ प्रारंभ हुए पंद्रह वर्ष हो गये हैं।  आर्थिक उदारीकरण के चलते विश्व के सभी देशों में एक समान रूप वाली उपभोग संस्कृति विकसित हो रही है।  यह संस्कृति विश्व की प्राचीन संस्कृतियों के साथ ही मूल मानवीय संस्कारों का विलोपन करने वाली है।  बच्चियों के साथ अप्राकृतिक रूप से अनाचार तथा कुंठावश आत्महत्याओं की घटनायें संस्काहीनता के कारण ही बढ़ रही हैं।
      इसी कारण देश की आर्थिक विकास दर का प्रश्न अब गौण होता जा रहा है। पिछले अनेक वर्षों से स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी देते आ रहे हैं कि देश में दैहिक विकारों के साथ ही लोगों की बिगडती जा रही है़।  समाज में दैहिक रोगियों के साथ ही मानसिक विकारवान लोगों का संख्या भी बढ़ी है। हमारे देश में  आमतौर से मनोरोगी केवल विक्षिप्त व्यक्ति को ही  माना जाता है। जिसे कुछ भी भान न हो वही पागल केवल मनोचिकित्सा योग्य है, यह सोच आज भी बनी हुई है।  आधुनिक मनोविज्ञान की जानकारी आम लोगों को नहीं है।  उनको यह पता नहीं कि अस्थाई रूप से पागलपन के शिकार अनेक लोग हो रहे है।  कब किसका मस्तिष्क पर से नियंत्रण समाप्त हो सकता है इसका अंदाज किसी को नहीं है।  एक पत्रिका मे छपे एक लेख में हमने स्वास्थ्य विशेषज्ञों के आंकड़े पांच से छह वर्ष पूर्व पढ़े थे।  उसमें देश में मधुमेह से चालीस, उच्चरक्तचाप, से पचास तथा हृदय रोगों से पैतीस  प्रतिशत लोगों के पीड़ित होने की बात कही गयी थी।  उसमें मनोरोगियों की संख्या भी तीस प्रतिशत बताई गयी थी।  उसमें महत्वपूर्ण बात यह कही गयी थी कि समस्या यह  भी है कि अनेक रोगियों को अपने रोग के बारे में पता ही नहीं है।
           हम पिछले अनेक वर्षों से देख  रहे हैं कि मधुमेह, उच्चरक्तचाप तथा हृदय रोगों के परीक्षण के लिये निशुल्क शिविर लगते हैं-क्योंकि इससे चिकित्सकों को अपने मरीज ढूंढने का अवसर मिलता है- पर मनोरोगों के लिये कभी ऐसा कार्यक्रम नहीं होता। इसका कारण यह है कि यह माना जाता है कि मनोरोगी होना केवल पागल होना ही है।  यही कारण है कि कोई भी व्यक्ति मनोरोगों की जांच के लिये तैयार नहीं होगा।  लोग इस खौफ के साये में नहीं जीना चाहेगे कि किसी को उनके मनोरोगी होने का पता लगे। मनोचिकित्सा का कोई बड़ा बाज़ार भी इसी कारण नहीं बन पाया है क्योंकि सभी लोगों को यह लगता है कि वह मानसिक रूप से स्वस्थ हैं।   मधुमेह, उच्चरक्तचाप तथा हृदय रोग की जांच करने के पश्चात् कोई भी आदमी इलाज के लिये तैयार हो जाता है पर मनोरोगी होने की बात कोई भी आदमी बदनामी के भय से  स्वीकार नहीं करना चाहेगा।
       देश में मनोरोगों के बढ़ने की बात स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्वीकार भी करते हैं पर इसके निवारण का कोई बड़ा प्रयास हो भी नहीं रहा।  योग साधन का ज्ञान देने वाले अनेक आचार्य  अपने प्रचार में दैहिक स्वास्थ्य की बात तो करते हैं पर मानसिक रोगों से निजात पाने की बात कहने में उनकी हिचक साफ देखी जा सकती हैं।  उन्हें अपने सामने उपस्थित लोगों के सामने मनोरोगों के निवारण की बात कहते हुए शायद संकोच इसलिये होता है कि कहीं लोग उनसे नाराज न हो जायें।  हालांकि हम यह लेख योग साधना के प्रचार के लिये नहीं लिख रहे। साथ ही यह भी बता दें कि योग साधना से ही कोई ज्ञानी या मानसिक रूप से परिपक्व हो जाये यह जरूरी नहीं है।  हम जिन मनोरोगों की बात कर रहे हैं वह आधुनिक भौतिक साधनों के उपयोग से ही बढ़े है। खासतौर से कंप्यूटर और मोबाइल के उपयोग ने लोगों की दिमागी स्थिति को बिगाड़ दिया है।  कंप्यूटर और मोबाइल के उपयोग के खतरे पश्चिमी स्वास्थ्य विशेषज्ञ पहले ही बता चुके हैं।  कंप्यूटर जहां शहरी सभ्यता तक सीमित है वहीं मोबाइल फोन का जाल तो गांवों तक भी फैल चुका है। कंप्यूटर जहां सीमित रूप से शिक्षित तथा धनी लोगों में अपनी बीमारी फैला रहा है,  तो मोबाइल हर वर्ग में मनोविकार पैदा कर रहा है। इस पर विश्लेषण करना जरूरी है।  मोबाइल के बारे में स्पष्ट रूप से स्वास्थ्य विशेषज्ञ कह चुके हैं कि उसकी गर्मी मनुष्य के मस्तिष्क को विकृत तक कर सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि  देश में लोगों की मनोदशाओं का भी अध्ययन करना अब आवश्यक है। अप्राकृतिक रूप से किये जा रहे अपराधों से निपटने के लिये यह आवश्यक है।
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Saturday, March 9, 2013

महिला दिवस पर संपादकीय-एक पहिया आगे तो दूसरा पीछे लगना ही है (edtorial on women day-man and woman two wheel of life)

       हमारे देश में आजकल रोज एक दिवस मनता दिखता है।  वैसे तो भारत को वैसे भी त्यौहारों का ही देश कहा जाता है पर वह सप्ताह या माह के अंतराल बाद ही आते हैं। पूर्णमासी तथा अमावस्या हर महीने ही आती हैं।  कैलेंडर में देखें तो रोज कोई न कोई खास दिन होता है। इधर पश्चात्य संस्कृति ने अपने पांव पसारे हैं तो लगता है कि हर दिन ही त्यौहार है। मित्र दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस और नया वर्ष जैसे दिन तो बहुत सुनते हैं। कभी एड्स विरोधी दिवस तो कभी कैंसर निरोधी दिवस भी सुनाई देता हैं  इधर हाल ही में महिला दिवस मना। व्यवसायिक बुद्धिमानों ने जहां अपनी वाणी और चेहरे से टीवी चैनलों के साथ ही रेडियों पर अपने भाषण झाड़े वही आमजनों में अपना रुतवा रखने वाले महानुभावों ने नारी शक्ति अनौपचारिक बैठकों में  बखान किया।
      हमने देखा है कि पुरुष दिवस कभी नहीं मनता। इसका सीधा मतलब यह है कि यह मान लिया गया है कि यह संसार पुरुषों की संपत्ति है जिसमें महिलायें उनकी अनुकंपा से जी रही हैं।  हमारे देश के जनवादी और प्रगतिशील  बुद्धिमान हमेशा ही जाति, वर्ण, भाषा तथा क्षेत्र के आधार पर भेदभाव का आरोप लगाते हैं पर नारी विषय पर उनका रुख बदल जाता है।  वहां वह पुरुष को एक तरह से राक्षसी वृत्ति का मान लेते हैं यह अलग बात है कि वह स्वयं भी पुरुष ही होते हैं। उनके तर्कों पर हम हंसते हैं।  कहते हैं कि समाज में पुरुषवादी मानसिकता है।  हम पूछते हैं कि जब आप नारी अनाचार के विरुद्ध विषवमन करते हो तब क्या कभी यह देखा है कि वास्तव में उनका शत्रु कौन होता है?
    कुछ नारीवादी बुद्धिमान तो नारी के लिये विवाह बंधन ही खतरनाक मानते हैं यह अलग बात है कि उनमें अविवाहित या ब्रह्चारी कोई नहीं होता।  आयुवर्ग में भी वह युवा न होकर उस अवस्था में होते हैं जब देह में रोमांस का असर काम हो जाता है।  अपनी बात वह युवाओं पर तब लादते दिखते हैं जब उनका खुद का समय बीत गया होता है। अपने युवा दिनों की मटरगस्ती को वह भूल जाते हैं।  कहा जाता है कि विवाह का लड्डू जो खाये वह भी दुःखी जो न खाये वह भी दुःखी।  जिन्होंने स्वयं खा लिया है वह दूसरों को न खाने की सलाह देते हैं।  मजे की बात यह कि भारतीय पारिवारिक संस्कारों के साथ जीने वाले लोग उसका मजाक बनाते हैं पर स्वयं के लिये उनका नियम पुराना ही होता है। वह विद्रोह का झंडा दूसरों के हाथ में देकर स्वयं आराम से सामाजिक फिल्म देखना चाहते हैं ताकि उसकी समीक्षायें लिखी और सुनाईं जा सकें।  समस्या यह है कि वह इस बात नियम को नहीं मानते कि नारी के लिये पुरुष कम नारियां ही अधिक समस्या खड़ी करती हैं।  भारतीय रिश्तों में नहीं वरन् पूरे विश्व में ही ननद-भाभी, सास-बहु, देवरानी-जेठानी तथा अन्य बहन जैसे रिश्तों में तनाव की बात सामने आती है।  अपवाद स्वरूप ही देवर-भाभी, ससुर-बहु, नन्दोही-सलहज और साली बहनोई के रिश्ते में खटास वाली घटनायें होती हैं।  सामाजिक विशेषज्ञों का अनुभव तो यह भी कहता है कि पर्दे के पीछे नारियों के विवाद होते हैं पर समाज के सामने फंसता पुरुष ही है क्योंकि परिवार उसके नाम पर जाना जाता है।  हमारे यहां घरेलु नारियों की रक्षा के नाम पर जितने भी प्रयास हुए हैं उनमें जड़ में नारियों का आपसी विवाद होता है पर परेशान पुरुष ही होता है।  इन मामलों में यह देखा गया है कि मामलों को बाहर सुलझाने के लिये घर से बाहर ले जाने जो प्रयास होते हैं उनमें से अधिकतर शिकायतें गलत आधार पर गलत व्यक्ति के खिलाफ होती है।  दहेज विरोधी कानून का जमकर दुरुपयोग हुआ।  अनेक सामाजिक विशेषज्ञ तो यह कहते हैं कि इस कानून का दुरुपयोग करने का यह परिणाम हुआ है कि ऐसे अनेक दंपत्ति जो एक साथ समझाने पर रह सकते थे वह मामला बाहर आने में मन में  बढ़ी हुई  खटास के कारण अलग हो गये।  अनेक लोगों की कथा तो इसलिये भी दर्दनाक रही है कि वह उस शादी में एक समय का भोजन करना उन्हें महंगा लगा जिसका भांडा चौराहे पर फूटा और उन पर भी घाव हुए। स्थिति इतनी खराब है कि कहीं नवदंपत्ति का विवाद होने  पर निकटस्थ रिश्तेदार बीच में आकर सुलझाना ही नहीं चाहते क्योंकि उनको लगता है कि कहीं उनका नाम चौराहे पर न घसीट लिया जाये।  विवाह एक सामाजिक मामला है और उसे उसके नियमों के दायरे में ही रखना चाहिये न कि उसमें राजकीय हस्तक्षेप हो।  राजकीय हस्तक्षेप से समाज के सुधार का प्रयास पाश्चात्य विचाराधारा से उपजा है जो निहायत अव्यवाहारिक है।  ऐसे प्रयासों से भारतीय समाज बिखरा है। दूसरी बात यह कि जिस तरह सारे पुरुष देवता नहीं है तो राक्षस भी नहीं है उसी तरह नारियों का भी हमेशा सकारात्म स्वरूप रहता है यह माना नहीं माना जा सकता।  अगर समाज में नारियों के विरुद्ध अपराध बढ़े हैं तो उसमें शामिल नारियों की संख्या भी बढ़ी है।
     अब मुश्किल यह है कि जनवादियों और प्रगतिवादियों ने देश के अभिव्यक्ति के साधनों पर इस कदर कब्जा कर लिया है कि उनके प्रतिकूल सर प्रथक  किसी बात कहने पर किसी पर प्रभाव नहीं होता।  समाज में आयु, वर्ण, जाति, भाषा, धर्म और लिंग के आधार पर कल्याण के दावे हो रहे हैं पर खुश कोई नहीं है।  वजह साफ है कि  समाज को एक इकाई मानते हुए देश में सभी शहरों के साथ गांवों में भी सड़कों का जाल बिछा होना चाहिये।   सभी जगह शुद्ध पेयजल प्रदाय की सहज व्यवस्था हो।  इसके साथ ही बिजली हर घर में पहुंचना चाहिये।  यह मूलभूत सुविधायें हैं अगर यह देश के किसी हिस्से में नहीं है तो हम अपने पूर्ण विकास का दावा नहीं कर सकते।  इसके विपरीत देश के बुद्धिमान किश्तों में अलग अलग समाज को भागों में बांटकर विकास देखना चाहते हैं।  हमारे देश में गरीब परिवारों जो स्थिति है उसमें नारी दयनीय जीवन जीती है पर यकीनन पुरुष भी कोई खुशहाल नहीं होता।   अपने पिता, पति और पुत्र को जूझते देखकर नारी स्वयं की दयनीय स्थिति से समझौता कर लेती है।  सीधी बात कहें तो नारी और पुरुष के बिना मानवीय संसार नहीं चल सकता।  दोनों परिवार के पहिये हैं।  एक पहिया पीछे तो एक आगे चलता है।  आगे का पहिया पुरुष है और अगर नारीवादी चाहते हैं कि नारी आगे पहिये के रूप में चले तो ठीक है।  उनके प्रयास बुरे नहीं है पर उन्हें यह समझना होगा कि तब पुरुष को पिछला पहिया बनना होगा। एक पहिया आगे तो एक पीछे रखना ही होगा। हालांकि तब इन नारीवादियों को तब पुरुषवादी बनना पड़ेगा।
  दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'

Gwalior, Madhya Pradesh
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Saturday, January 12, 2013

भारत में अमन के लिये पाकिस्तान को मिटना ही होगा-हिन्दी लेख (bharat mein aman ke liye pakistan ko mitna hoga-hindi article

         पाकिस्तानी सेना ने दो भारतीय सैनिकों की बेरहमी से हत्या कर उनके सिर कलम कर दिये। इस घटना की भारत में कड़ी प्रतिक्रिया हुई है।  कुछ लोगों का मानना है कि पाकिस्तान के साथ मधुर संबंध बनाने का प्रयास व्यर्थ है तो कुछ मानते हैं कि इस घटना पर युद्ध जैसी खतरनाक कोशिश से बचना चाहिए।  पाकिस्तान के साथ भारत के अनेक बार युद्ध हो चुका है पर कोई युद्ध कश्मीर समस्या के लिये निर्णायक नहीं हुआ।  हैरानी की बात है कि युद्ध के बाद हुए समझौतों में पाकिस्तान को इस मुद्दे से हटने का दबाव क्यों नहीं डाला गया? पाकिस्तान हर युद्ध में हारा है पर फिर भी कश्मीर का मुद्दा नहीं छोड़ता। यह बात संशय पैदा करने वाली है।
        दरअसल भारत में रणनीतिकारों का एक शक्तिशाली वर्ग मानता है कि पाकिस्तान का अस्तित्व बना रहे यह भारत के हित में है और कश्मीर मुद्दा छोड़ने से वह खत्म हो जायेगा।  लगता है इसी कारण  उसे भारत के प्रति नफरत बनाये रखने के लिये यह मुद्दा उसके पास बने रहने दिया गया।  ऐसा लगता है कि भारत में अनेक बुद्धिमानों के एक समूह को पाकिस्तान के लोगों के बारे में जानकारी नहीं है।  वहां भारत और यहां के धर्मों के प्रति वहां भारी वैमनस्य है।  मुख्य बात यह है कि वहां की र्शैक्षणिक किताबों में भारत तथा यहां पैदा हुए धर्मों के प्रति अनादर वाली सामग्री है।  भारतीय रणनीतिकार शुतुरमुर्ग की तरह यह राग अलापते हैं कि भारत का विभाजन धर्म की वजह से नहीं हुआ पर पाकिस्तान की अवाम में यह बात अब पैठ कर गयी है कि धर्म ही विभाजन का कारण है।  हम समझते हैं कि वह हमें राष्ट्र की तरह ललकार रहे हैं जबकि वह अपनी धार्मिक पहचान के साथ हम पर हमला करते हैं।  वह कश्मीर पर अपना दावा भौगोलिक परिस्थितियों के कारण नहीं वरन् अपने धर्म के कारण करते हैं।
         पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों,कलाकारों और शायरों का भारत निरंतर  आने से अपेक्षा करना मूर्खतापूर्ण है कि उससे कोई स्थाई मित्रता बनेगी।  वैसे पाकिस्तान एक सार्वभौमिक राष्ट्र है यह कभी अनेक लोगों को नहीं लगता है ।  हम भारत में रह रहे  पाकिस्तान के सहधर्मियों  को देखकर वहां के लोगों की मनस्थिति का अनुमान करते है जो कि गलत है। वहां सिंध, बलुचिस्तान और पश्चिमी प्रांत के लोग यह मानते हैं कि पंजाब के लोगों ने उन पर कब्जा कर रखा है।  खासतौर से सिंध में तो पाकिस्तान के प्रति अत्यंत नाखुशी  का भाव है।  इसका कारण यह है कि सारे पाकिस्तान में वहां के पंजाब प्रांत के  लोगों ने ही दबदबा बनाये रखा है।  क्रिकेट से लेकर फिल्म तक उनका ही वर्चस्व है।  इतना ही नहीं पाकिस्तान की अनेक फिल्मों में सन्यासियों को खलपात्र के रूप में चित्रित किया गया।  यही कारण है कि पाकिस्तान में बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू या तो पलायन कर गये या फिर धर्म बदलने के लिये बाध्य हुए।  वहां अक्सर मंदिरों पर हमले होते रहते हैं। इतना ही नहीं पुराने हिन्दू प्रतीकों को लगभग मिटा दिया गया है।  हालांकि वहां कुछ मंदिरों के पुनरोद्धार की बात की जाती है पर वह भारत से पर्यटकों को लुभाने का प्रयास लगता है।  इससे यह नहीं समझना चाहिये कि पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं को कोई सम्मान मिलने वाला है।  पाकिस्तान आज विश्व में अपनी पहचान बना चुका है पर यह सफलता उसे धार्मिक उन्माद में योगदान की वजह से मिली है। कहने का अभिप्राय यह है कि हम भले ही अपनी अक्ल के पर्दे बंद किये रहें पर पाकिस्तानी अपनी धार्मिक पहचान को श्रेष्ठ मानते हैं और अन्य धर्म उनकी दृष्टि में कमतर हैं।  किसी भारतीय-चाहे वह किसी भी धर्म का हो-का मरना उनकी नज़र में कोई  महत्व नहीं रखता क्योंकि वह उनके सहधर्मी राष्ट्र का नहीं है।  यह अंतिम सत्य है और अगर कोई मुगालते हैं तो उसे समझाना कठिन है।
          भारत के लिये पाकिस्तान को निपटाना कोई कठिन काम नहीं है।  भारतीय सेना एक व्यवसायिक सेना है  जबकि पाकिस्तान की सेना अब धर्मांध होकर ऐसी राह पर चल पड़ी है जहां अब सिवाय आंतक फैलाने के उसके पास कोई मार्ग नहीं है।  यह सच है कि युद्ध में बहुत हानि होती है पर इतिहास गवाह है कि अपना प्रभाव बनाये रखने के लिये अंततः ताकतवर लोगों को युद्ध करने ही पड़ते हैं।  मनुष्य हमेशा ही योगी बनकर ध्यान में नहीं लगा रह सकता।  कभी कभी उसे योद्धा बनकर लड़ना भी पड़ता है।  इस संसार में दैवीय तथा आसुरी दो प्रकृति के लोग होते हैं।  देवताओं केा अनेक बार असुरों से युद्ध करना पड़ा है।  पाकिस्तान और उसके सहयोगी देश आसुरी प्रवृत्ति के हैं और उनसे यह अपेक्षा करना निरर्थक है कि वह दैवीय प्रकृति के लोगों को आराम से रहने देंगे।  हम यहां रावण का उल्लेख भी करना चाहेंगे जिसका तत्कालीन सभ्यता में उन लोगों से बैर था जो उसकी निज धार्मिक पंरपरा से प्रथक थे। वह  ऋषि, मुनियों और तपस्वियों का इसलिये बैरी था क्योंकि वह उसकी धार्मिक पंरपरा मानने वाले नहीं थे।  सच बात तो यह है कि रावण सीता हरण अगर वह नहीं भी करता तो भी उसका भगवान श्रीराम के साथ युद्ध अवश्यंभावी था क्योंकि वह उन्हीं ऋषि, मुनियों, तपस्वियों की रक्षा के लिये प्रयासरत थे।
         हमारा मानना है कि प्रत्यक्ष रूप से युद्ध न भी करें तो अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान को तोड़ देना चाहिये।  भारत के प्रति नफरत वहां पंजाब प्रांत के वर्चस्व के कारण ही फैली है क्योंकि वही अपना प्रभाव बनाये रखना चाहते हैं।  पाकिस्तान मध्य एशिया के देशों के सहारे धर्म के नाम पर एक रखे हुए है और एक बार वहां क्षेत्रीयता को बढ़ावा मिला तो ऐसा संकट बढ़ेगा कि पाकिस्तान मिट जायेगा।  वहां के शिखर पुरुष यह कहते हैं कि हम स्वयं ही आतंकवाद की चपेट में है पर यह दिखावा है।  वैसे  भी इस तरह का छुटपुट आतंकवाद पाकिस्तान को मिटा नहीं पायेगा।  एक बार पाकिस्तान की सेना ध्वस्त हो गयी तो पाकिस्तान मिट जायेगा।  कुछ लोगों को मानना है क भारत को अगर अमन चैन से रहना है तो उसे हर हालत में पाकिस्तान को मिटाना ही होगा।
       यह भी न करना है तो पाकिस्तान से अब बेहतर संबंधों के लिये यह भी शर्त रखनी होगी कि वह अपनी शैक्षणिक किताबों से भारत तथा यहां के धर्मों के विरुद्ध अनादर वाली सामग्री हटाये।  अगर वह ऐसा नहीं करता तो उससे राजनीतिक संबंध भी खत्म करना चहिये।  यह एक तरह का सभ्य प्रयास है और आसुरी प्रवृत्ति से युक्त पाकिस्तान इसे मानेगा यह कठिन है पर जब हमारे रणनीतिकार यह मानते हैं कि हम उससे ज्यादा ताकतवर है तो दबाव काम आ सकता है।  हालांकि यह कदम भी पाकिस्तान के लिये आत्मघाती होगा क्योंकि भारत के प्रति नफरत के बाद उसे वैसे ही संकट का सामना करना पड़ेगा जो कश्मीर मुद्दा छोड़ने पर हो सकता है। इसके लिये मानसिक दृढ़ता का परिचय देना होगा।

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Saturday, September 15, 2012

एक फिल्म किसी विचाराधारा को नष्ट नहीं कर सकती-हिन्दी लेख (on film not distroyed ane religion thought)


           एक सामान्य योग साधक तथा गीता पाठक होने के नाते इस लेखक का मानना है कि हर मनुष्य के लिये धर्म एक निजी विषय है।  यह धर्म उच्च आचरण का प्रतीक होने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान से जुड़ा होना चाहिए।  इतना ही नहीं एक  अध्यात्मिक ज्ञानी कभी अपने ज्ञान या इष्ट को लेकर सार्वजनिक चर्चा नहीं करेगा यह भी इस लेखक का मानना है।  ऐसे में जब कुछ अल्पज्ञानी या अज्ञानी जब अपने धार्मिक विषय को सार्वजनिक बनाते हैं तो यह उनके अहंकार का ही प्रमाण होता है।  सार्वजनिक रूप से अपनी बात कहने पर उसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया सहने की क्षमता उनमें नहीं होती।  अज्ञानी तथा अल्पज्ञानी स्वयं को श्रेष्ठ  धार्मिक व्यक्त्तिव का स्वामी  बताने के चक्कर में एक दूसरे पर पर आक्षेप करते हैं।  अगर सामने वाला भी उस जैसा हुआ तो फिर झगड़ा बढ़ता है।  श्रीमद्भागवत गीता साधक के लिये दोनों ही एक जैसे होते है-अहंकारी, अज्ञानी और अन्मयस्क।
       आधुनिक विश्व में कभी  अनेक ऐसे प्रसंग आते हैं जब कार्टून, लेखक, और भाषणों को लेकर अनेक धर्मभीरु लोग इसलिये उत्तेजित होते हैं क्योंकि उसमें उनके इष्ट और विचारधारा पर कटाक्ष किये होते हैं।  उस समय समर्थन और विरोध के शोर के बीच ज्ञानियों के सच पर कोई विचार नहीं करता। अपनी जीत और श्रेष्ठता प्रमाणित करने का यह दंभपूर्ण प्रयास विश्व समाज में तात्कालिक  रूप से अस्थिरता पैदा करता है।  अभी हाल ही में एक फिल्म को लेकर अमेरिका के विरुद्ध पूरे विश्व में वातावरण बन रहा है।  यह फिल्म एक धार्मिक विचाराधारा पर प्रहार करती है। तय बात है कि फिल्म निर्माण से जुड़े लोग कोई तत्वज्ञानी नहीं है इसलिये ही तो उन्होंने दूसरे की धार्मिक विचाराधारा पर प्रहार कर अपनी आसुरी प्रवृत्ति का परिचय दिया है।  अब इस विवाद में बौद्धिक समुदाय दो भागों में बंट गया हैं। एक तो लोगों की आस्थाओं को ठेस पहुंचाने पर आर्तनाद कर हिंसा कर रहा है तो दूसरा अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई दे रहा है। 
     हमारा मानना है कि ऐसी फिल्म नहीं बनना चाहिये थी यह बात ठीक है पर जिस तरह इसका विरोध हो रहा है वह भी संशय से भरा है।  अगर इस फिल्म का विरोध नहीं होता तो दुनियां के कई देशों में अनेक लोग  उसका नाम तक नहीं जान पाते।  भारतीय अध्यात्म दर्शन ऐसे विषयों में उपेक्षासन की बात कहता है।  अगर कथित धर्मभीरु लोग ज्ञान की शरण लें तो उन पर ऐसी फिल्मों या कार्टूनों का कोई प्रभाव नहीं होता। वैसे हमारा मानना है कि पूरे विश्व में अर्थव्यवस्था जिस जटिल दौर से गुजर रही है सभी विचाराधारा के लोगों के लिये रोजी रोटी कमाना ही कठिन हो गया है।  उनके लिये इस बात के लिये यह जानने का समय नहीं है कि कौन उनकी धार्मिक विचाराधारा पर क्या कह रहा है? मगर धर्म के ठेकेदारों को अपने समूहों पर नियंत्रण बनाये रखने के लिये ऐसे ही विवादास्पद विषय चाहिए।  फिल्म वालों को प्रचार चाहिए ताकि अधिक से अधिक दर्शक मिलें।  इसके लिये अनेक फिल्म वाले धन भी खर्च करते हैं।  संभव है कि कुछ धार्मिक ठेकेदारों ने  उनसे विरोध फिक्स किया हो।  खालीपीली प्रदर्शन से काम न चले इसलिये हिंसा भी कराई गयी हो।  इसका संदेह इसलिये उठेगा क्योंकि एक फिल्म या कार्टून से किसी पुरानी विचाराधारा का कुछ बिगड़ सकता है यह बात यकीन लायक नहीं है।  आस्था पर चोट का सवाल उठाता है तो फिर ज्ञान और अज्ञान की बात भी सामने आयेगी।  किसी भी समुदाय में सभी ज्ञानी हैं यह सोचना गलत है तो सभी अज्ञानी है यह मानना भी महान मूर्खता है। हम यह नहीं कहते कि यह सब प्रायोजित है पर जिस तरह मानव समुदायों को विभिन्न भागों के बांटकर उन पर पेशेवराना अंदाज में नियंत्रण करने की प्रवृत्ति आधुनिक समय में देखी जाती है  उसके चलते कुछ भी अनुमान किया जा सकता है।
            दूसरा भी एक पक्ष है। अगर हम अज्ञानता वश अपने मुख से अपने धर्म या इष्ट का बखान सार्वजनिक रूप से करते हैं तो संभव है कि ज्ञानी कुछ न कहें पर अपने जैसा अज्ञानी सामने आयेगा तो वह दस बातें कहेगा।  सार्वजनिक रूप से अपने इष्ट या विचारधारा की प्रशंसा करने पर उसकी निंदा सुनने को भी तैयार रहना चाहिए।  ऐसे में वाद विवाद से तनाव बढ़ता है।  ऐसे में एक ज्ञानी का मौन रहना बेहतर है।  ज्ञानी लोग अगर कोई जिज्ञासु मनुष्य उनके ज्ञान के बारे में जानना चाहे तो उसे अपने ज्ञान और अभ्यास के बारे में बतायें।  इतना ही नहीं अगर वह कोई प्रश्न पूछता है तो उसका जवाब दे।  जिज्ञासु से अपनी विचारा कहे पर दूसरे के ज्ञान या विचारधारा पर आक्षेप न करे।  दूसरे की निंदा या उस आक्षेप करने वाले कभी समाज में लोकप्रिय नहीं होते।  फिल्म  बनाकर या कार्टून बनाकर क्षणिक प्रतिष्ठा भले ही मिल जाये पर कालांतर में वह कष्टदायक होता है।  वैसे देखा जाये तो ज्ञानी हर समाज में हैं।  अगर ऐसा नहीं होता यह संसार अनेक बार अपनी ही आग से नष्ट हो चुका होता।  इसका मतलब यह है कि हर समुदाय का आम आदमी अपना निजी जीवन शांति से जीना चाहता है।  यही कारण है कि चंद स्थानों पर कुछ दिन ऐसे विषयों पर प्रायोजित हाहाकार बचने के बाद स्थिति सामान्य हो जाती है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, September 1, 2012

हिंदी दिवस पर लेख-यथार्थवाद के बाज़ार को फैसबुक से चुनौती (hindi diwas par lekh-yatharthawad ke bazar ko facebbok ki chunauti-article on hindi divas )

       हमारे देश में यथार्थवादी लेखकों तथा बुद्धिजीवियों को अनेक राजकीय सम्मान मिले हैं।  यह लेखक और बुद्धिजीवी स्वयं को समाज का बहुत बड़ा झंडाबरदार समझते रहे हैं।  स्थिति यह रही है कि इनके समर्थक इन्हें समाज का सच सामने लाने वाला ऐसा महान आदमी मानते हैं जो अगर पैदा नहीं होता तो शायद लोग अंधेरे में जीते। इन यथार्थवादियों को हिन्दी के प्रकाशन तथा प्रचार संगठनों का बहुत समर्थन मिला है। स्थिति यह रही है कि इनके यथार्थवाद ने समाज में कोई सुधार तो नहीं ला सका अलबत्ता इनकी सामग्री का प्रचार प्रसार होने पर अंतर्राष्ट्रीय पटल पर  देश की छवि हमेशा खराब ही रही।  इनको सांगठनिक प्रकाशन तथा प्रचार मिलने  से   समाज में अध्यात्म तथा साहित्यक क्षेत्र में निष्पक्ष लेखकों को कभी आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिला।
   इस यथार्थवाद में जिस कचड़े को प्रस्तुत किया जाता है दरअसल वह हमारे समाज में पहले से दिखता है।  समाज के कुछ सदस्य इसे भोगते हैं तो कुछ उनके हमदर्द बनकर सहारा भी देते हैं।  इन दोनों के लिये यथार्थवादी एक कल्पित क्रांतिकारी होता है।  एक अभिनेता ने अभी हाल में टीवी चैनल पर समाज के अनेक यथार्थों को प्रस्तुत किया तो वह लोकप्रिय हो गया।  सच बात तो यह है कि उसकी प्रस्तुति को आमजन में अधिक महत्व नहीं दिया क्योंकि समाज में वह सब पहले से ही देख रहा है।  समाज की अनेक दुखांत घटनाओं के समाचार भी हम देख रहे हैं।  यह अलग बात है कि हमारे प्रचार और प्रकाशन प्रबंधक मानते हैं कि भारतीय समाज सोया हुआ है और यथार्थ का चित्रण एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

           चाहे छोटे पर्दे का हो या बड़े पर्दे का अभिनेता  वह बाज़ार और प्रचार समूहों का एक ऐसा बुत होता है जो आमजन को मनोरंजन में इस तरह व्यस्त  रखने में सहायक होता है जिसका  उसका दिमाग कहीं गरीब और अमीर के बीच बढ़ते तनाव के विचलित न हो और देश बदलाव से दूर रहे।  इस यथार्थ में भले ही दोष आर्थिक, धाार्मिक, सामाजिक तथा राजनीति क्षेत्र के शिखर पुरुषों का हो पर उसके लिये समाज को दायी माना जाये। यह काम पहले लेखक करते थे अब अभिनेता भी करने लगे।  छोटे और बड़े पर्दे पर अभिनेता तथा अभिनेत्रियों का राज है और बाज़ार तथा प्रकाशन से जुड़े व्यवसायी उनका चेहरे के साथ नाम अपनी सामग्री बेचने के लिये उसी तरह कर रहे हैं जैसे कि पहले बुद्धिजीवियों के लिये सेमीनारों का आयोजन तथा लेखकों की किताबें प्रकाशित करते थे।
बहरहाल इन्हीं यथार्थवादियों के लिये अब फेसबुक एक चुनौती पेश कर रहा है। यहां अनेक लोग समाज का चित्र अपने कैमरे से कैद कर इस मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं। वह चित्र डराते हैं, हंसाते हैं और दिल को गुदगुदाते हैं।  उस दिन एक चित्र देखा उसमें एक गिलहरी प्लास्टिक की डंडी के सहारे ठंडेपेय की एक खाली बोतल में बची सामग्री अपने मुंह में खींचने की कोशिश कर रही थी। वैसे भी गिलहरियों की अदायें अनेक बार रोचक होती हैं। प्राकृतिक प्रेमियों के लिये उसकी चाल भी बड़ी रुचिकर होती है। 
      एक चित्र में दो बच्चों का चित्रण देखा जिसमें बड़ा बच्चा कचड़े से खाना उठाकर अपनी गोदी में बैठे बच्चे को खिला रहा था। हृदय को चुभोने वाला दृश्य यथार्थवादियों के ढेर सारे शब्दों या फिल्मों से अधिक प्रभावी था।   ऐसे बहुत चित्र देखने को मिलते हैं जिनकी प्रस्तृति लंबी खींचने या उन पर शब्दों का अपव्यय करना बेकार लगता है।  वह चित्र बहुत बड़ी कहानी कह देता है। हम जैसे आम लेखकों के लिये ब्लॉग और फेसबुक पर अधिक समर्थन नहीं होता न ही समाज में प्रचार मिलता है। इसका कारण यह है कि बाज़ार, प्रचार तथा प्रकाशन समूहों के शिखर पुरुष और उनके प्रबंधक अंतर्जाल  पर केवल प्रचारित लोगों की उपस्थिति ही दिखाते हैं।  
         आम लेखक का प्रचार करना इन  समाज पर कब्जा जमाये अपने संगठनों से प्रतिबद्ध लेखकों तथा बुद्धिजीवियों के लिये चुनौती पेश करने में उनको डर लगता है।  इसके बावजूद यह सच है कि फेसबुक ने इन सभी को चुनौती दी है।  इनके पेशेवर बुद्धिजीवियों और लेखकों से आज की पीढ़ी कट गयी है।
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लेखक एंव कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
Writer and poet-Deepak raj kureja "Bharatdeep"
Gwalior' Madhya Pradesh

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Saturday, December 10, 2011

ए.एम.आर.आई अस्पताल कलकत्ता के हादसे से सबक-हिन्दी लेख( lesson of terssdy of AMRi culcutta hospital-hindi article)

            कलकत्ता के ए.एम.आर.आई अस्पताल (AMRi culcutta hospital) में करीब 90 लोगों की मौत हो चुकी है। अगर प्रचार माध्यमों के इससे जुड़े समाचारों पर यकीन किया जाये तो कुछ लोग अभी भी अपने परिजनों को ढूंढ रहे है जिस कारण यह संख्या अधिक भी हो सकती है। हम इस हादसे में हताहत लोगों के प्रति संवेदना जताते हैं। इस दुर्घटना के बाद अनेक विचार दिमाग में आये। जिस सवाल ने यह सबसे ज्यादा परेशान किया कि यह एक निजी अस्पताल है और इससे क्या यह साबित नहीं होता हम अब निजी क्षेत्र की क्षमताओं पर पर प्रश्न उठायें? अभी तक हम मानकर चलते हैं कि सरकारी और अर्द्धसरकारी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार और कुप्रबंध है इस दुर्घटना के बाद अब निजी क्षेत्र के प्रबंधन पर भी सवाल उठेंगें।
             जिन महान बुद्धिमानों ने सरकारी क्षेत्र को एकदम निकम्मा मानकर निजी क्षेत्र की वकालत की थी उनकी राय पर तब भी आश्चर्य हुआ था और अब तो यह लगने लगा है कि निजी क्षेत्र भी उसी कुप्रबंध का शिकार हो रहा है जिसके लिये सरकारी क्षेत्र पर बदनाम माना जाता था। अर्थशास्त्री भारत में जिन समस्याओं को उसके विकास में संकट मानते हैं उसमें कुप्रबंध भी शामिल माना गया है। कुछ हद तक खेती में उसे माना गया है पर निजी क्षेत्र में इसे कभी नहीं देखा गया। दरअसल हम जैसे निष्पक्ष चिंतक और अल्पज्ञानी अर्थशास्त्री हमेशा ही यह मानते हैं कि प्रबंध कौशल के बारे में हमारा देश बहुत कमजोर रहा है। इसका कारण हमारी प्रवृत्ति और इच्छा शक्ति है। एक तरह से देखा जाये तो हमारे वणिक वर्ग का समाज-यह जाति सूचक शब्द नहंी है क्योंकि इसमें अनेक जातियों के सदस्य ऐसे भी हैं जिनके समाज के साथ वणिक सूचक संज्ञा नहीं जुड़ी होती जैसे सिंधी, पंजाबी, और गुजराती तथा अन्य स्थानीय समाज-कमाने के लिये योजना बनाता है पर प्रबंध कौशल में बहुत कम लोग सिद्धहस्त होते हैं। भाग्य, परिश्रम, बौद्धिक अथवा प्रतिद्वंद्वी के अभाव में अनेक लोग अपने व्यवसाय में महान सफलता प्राप्त करते है पर ऐसे विरले ही होते है जिनको विपरीत परिस्थतियों में केवल अपने प्रबंध कौशल से सफलता मिली हो। जब कुछ बुद्धिमान लोग सरकारी और अर्द्धसरकार क्षेत्रों में कुप्रबंध की बात करते हैं तो अपने अनुभव से सीखे हम जैसे लोग यह भी मानते हैं कि कम से कम हम भारतीयों का नजरिया अपने काम को लेकर कमाने का अवश्य होता है पर प्रबंध कौशल दिखाने की चिंता बिल्कुल नहीं होती। ऐसे बहुत कम लोग हैं जिनको प्रबंध कौशल में महारत है। उसके बाद कुछ लोग मध्यम प्रवृत्ति के होते है जो एक समय तक प्रबंध कौशल दिखाते हैं फिर आलसी हो जाते हैं। ऐसे में जब आर्थिक जगत में निजीकरण तेजी से हो रहा था तब बहुत कम लोगों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि प्रबंध कौशल एक कला है और उसमें महारत हासिल करने वालों को प्राथमिकता दी जाये। मुख्य बात यह है कि निजी क्षेत्र पर इतना विश्वास कैसे किया जा सकता है कि उसे अस्पताल, वायुसेवा, बस सेवा तथा अन्य जीवनोपयेागी की सेवाओं का पूरी तरह से जिम्मा सौंपा जाना चाहिए?
ए.एम.आर.आई अस्पताल (AMRi culcutta hospital) में हुई दुर्घटना चूंकि अत्यंत दर्दनाक है इसलिये इस पर चर्चा हुई पर निजी अस्पतालों में अनेक लोग गलत इलाज से मर जाते हैं तब वह एक अचर्चित खबर बनकर रह जाती है। इतना ही नहीं हम उन अन्य सेवाओं को भी देख रहे हैं जहां निजी क्षेत्र प्रभावी होता जा रहा है। वहां आम आदमी ग्राहक नहीं बल्कि एक शौषक और मजबूर प्रयोक्ता बन जाता है। उसके पास निजी क्षेत्र की सेवा के उपयोग करने के अलावा कोई मार्ग नहीं रह जाता।
              अब प्रचार माध्यमों की बात कर लें। अगर यह हादसा किसी सरकारी अस्पताल में हुआ होता तो प्रचार माध्यम कोई सरकारी आदमी शिकार के रूप में फंसते देखना चाहते। सारे राज्य के अस्पतालों की दुर्दशा को लेकर प्रशासन को कोसा जाता। निजी अस्पताल को लेकर ऐसा कोई विवाद नहीं उठा। यह ठीक है कि पश्चिम बंगाल ने अस्पताल के प्रशासन ने अस्पताल प्रबंधकों के खिलाफ कार्यवाही की है पर अगर यह सरकारी अस्पताल होता तो वही अपनी सफाई देने में लगा होता। हम यह दुर्घटना निजी क्षेत्र में अकुशल प्रबंधन के एक ऐसे प्रतीक के रूप में इसलिये देख रहे हैं क्योंकि वह प्रचार माध्यमों में चर्चित हुई वरना सच यह है कि अब तो अनेक सेवाओं में निजी क्षेत्र आम आदमी को लाचार बना रहा है।
           हम यहां यह बात नहीं कह रहे कि निजी क्षेत्र का प्रवेश पूंजीगत रूप से दखल कम होना चाहिए। जनोपयोगी सेवाओं में निजी क्षेत्र का योगदान तब भी था जब सरकारी क्षेत्र शक्तिशाली था। निजी क्षेत्र ने अनेक ऐसी सुविधायें भी जुटाई हैं जिससे आम मध्यम वर्ग को सुविधा हो रही है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि ऐसी सेवाओं से सरकारी प्रभाव को समाप्त होने की मांग मान ली जाये। हमारा मानना है कि हर क्षेत्र में सरकारी पूंजी को सक्रिय रहना चाहिए। किसी क्षेत्र में सरकारी प्रभाव इसलिये समाप्त नहीं होना चाहिए कि वहां अब निजी क्षेत्र काम कर रहा है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Sunday, November 13, 2011

अन्ना हजारे टीम के वरिष्ठ सदस्य अरविंद केजरीवाल के प्रचार माध्यम कर्मियों को टिप्स-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (anna hazare's core team member arvind kejariwal and media workers-hindi satire thought)

             अन्ना हजारे की कथित कोर टीम की सक्रियता अब हास्य व्यंग्य का विषय बन रही है। अरविंद केजरीवाल एक तरह से इस तरह व्यवहार कर रहे हैं कि जैसे कि वह स्वयं कोई प्रधानमंत्री हों और अन्ना हजारे राष्ट्रपति जो उनकी सलाह के अनुरूप काम कर रहे हैं। दरअसल अब अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पिछले अनेक महीनों से चलते हुए इतना लोकप्रिय हो गया है कि लगता है कि देश में कोई अन्य विषय ही लिखने या चर्चा करने के लिये नहीं बचा है। अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, और किरण बेदी ने अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़कर जो प्रतिष्ठा पाई है वह उनके लिये इससे पहले सपना थी। इधर जनप्रिय हो जाने से इन सभी ने अनेक तरह के भ्रम पाल लिये हैं। इतना भ्रम तो ब्रह्मज्ञानी भी नहीं पालते। इसका अंदाज इनको नहीं है कि इस देश में बुद्धिमान लोगों की कमी नहीं है जो उनकी गतिविधियों और बयानों पर नजर रखे हुए हैं। अन्ना टीम के सदस्यों ने इतिहास के अनेक महापुरुषों को अपना आदर्श बनाया होगा पर उनको यह नहीं भूलना चाहिए उस समय प्रचार माध्यम इतने शक्तिशाली और तीव्रगामी नहीं थे वरना उनकी महानता भी धरातल पर आ जाती।
          बात दरअसल यह है कि अन्ना हजारे टीम के एक सदस्य अरविंद केजरीवाल अब प्रचार कर्मियों को समझा रहे हैं कि वह अपना ध्यान जनलोकपाल बनवाने पर ही रखें। अन्य विवादास्पद मुद्दो पर ध्यान न दें।
केजरीवाल की प्रचार माध्यमों में बने रहने की इच्छा तो अन्ना के पूर्व ब्लागर राजू परुलेकर ने बता ही दी थी। ऐसे में किरण बेदी के यात्रा दौरों पर विवाद पर बोलने के लिये किसने अरविंद केजरीवाल को प्रेरित किया था? इस सवाल का जवाब कौन देगा?
            किरण बेदी हर विषय पर ऐसा बोलती हैं कि गोया कि उनको हर विषय का ज्ञान है। प्रशांत भूषण ने कश्मीर के विषय पर बयान क्यों दिया? विश्वास नाम के एक सदस्य अन्ना के पूर्व ब्लागर राजू परूलेकर से बहस करने क्यों टीवी चैनल पर आ गये?
         एक ब्लाग लेखक होने के नाते राजू परुलेकर से हमें सहानुभूति है। इस विषय पर लिखे गये एक लेख पर हमारे एक सम्मानीय पाठक ने आपत्ति दर्ज कराई थी। हम उनका आदर करते हुए यह कहना चाहते हैं कि कि अन्ना हजारे और उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को लेकर दुराग्रह नहीं है। इस आंदोलन को लेकर हमने संदेहास्पद बातें अंतर्जाल पर पढ़ी थी और हमें लगता है कि इसके कर्ताधर्ता अपनी गतिविधियों से दूर नहीं कर पाये है।
          अन्ना हजारे की प्रशंसा में अब हमें कोई प्रशंसात्मक शब्द भी नहीं कहना क्योंकि उनके दोनों अनशन केवल आश्वासन लेकर समाप्त हुए और इससे उन पर अनेक लोगों ने संदेह के टेग लगा दिये हैं। उनके साथ जुड़ी कथित सिविल सोसायटी के सदस्य भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से प्रचार पाकर अपने अन्य कार्यों के प्रचार में उसका लाभ उठा रहे हैं। कोई हल्का फुल्का लेखक होता तो उनको जोकर कहकर अपना जी हल्का कर लेता है पर हम जैसा चिंतक जानता है कि कहीं न कहीं इस आंदोलन  को जारी करने के पीछे जन असंतोष को भ्रमित करने का प्रायोजित भी हो सकता है। भ्रष्टाचार सहित अन्य समस्याओं से लोगों के असंतोष है। यह असंतोष की वीभत्स रूप न ले इसलिये उसके सामने काल्पनिक महानायक के रूप में अन्ना हजारे को प्रस्तुत किया गया लगता है क्योंकि उनका मार्गदर्शन करने वाली कथित कोर टीम में पेशेवर समाज सेवक हैं जो पहले ही अन्य विषयों पर चंदा लेकर अपनी सक्रियता दिखाते हैं। सीधी बात कहें कि बाज़ार अपना व्यवसाय चलाने के लिये समाज में धर्म, राजनीति, और फिल्म के अलावा सेवा के नाम पर भी संगठन प्रायोजित करता है ताकि लोग निराशा वादी हालतों में आशावाद के स्वप्न देखते हुए यथास्थिति के घेरे में बने रहें। माननीय टिप्पणीकार कहते हैं कि अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के के विरुद्ध समाज में चेतना जगायी पर उसका परिणाम क्या हुआ है? यह सवाल हम हर लेख में करते रहे हैं और इस जारी रखेंगे।
           अरविंद केजरीवाल प्रचार कर्मियों को सिखा रहे हैं कि अन्य विषयों से हटकर केवल भ्रष्टाचार पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें। अब उनसे कौन सवाल करे कि किरण बेदी की यात्राओं पर विवाद पर उन्होंने क्यों अपना बयान दिया? सीधी बात है कि वह अपने को अन्ना का उत्तराधिकारी साबित करना चाहते हैं। भ्रष्टाचार हटाने में उनकी दिलचस्पी कितनी है यह तो समय बतायेगा। जब अन्ना के अनशन का प्रचार चरम पर था तब यही केजरीवाल हर निर्णय का जिम्मा अन्ना पर सौंप देते थे। अब इन्हीं  प्रचार माध्यमों ने उनको इतना ज्ञानवान बना दिया है कि वह उनको सिखा रहे हैं कि अपना ध्यान केवल जनलोकपाल पर केंद्रित करें।
          प्रशांत भूषण से किसने कहा था कि कश्मीर पर बयान दो। इससे भी एक महत्वपूर्ण बात है कि केजरीवाल ने कहा था कि हमारे साथ जुड़े छोटे मोटे विवादों से बड़ी समस्या देश में व्याप्त भ्रष्टाचार है फिर क्यों अन्य विषयों पर जवाब देने आ जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि अन्ना हजारे की कोर टीम एक मुखौटा दिख रही है जिसकी डोर कहीं अन्यत्र केंद्रित है। अन्ना हजारे अनशन करने और आंदोलन चलाने में सिद्धहस्त हैं पर वह भी बिना पैसे नहीं चलते और यही पेशेवर समाज सेवक उनका खर्च उठाते हैं। ऐसे में यह संभव नहीं है कि अन्ना उनके बिना काम कर सकें। मूल बात यह है कि जब तक कोई परिणाम नहीं आता ऐसे सवाल उठते हैं। मूल बात यह है कि यह आंदोलन अभी नारों से आगे नहीं बढ़ पाया। इंटरनेट में फेसबुक के साथ ट्विटर पर इसका समर्थन बहुत दिखता है पर ब्लाग और वेबसाइटों पर अभी इसे परखा जा रहा है। फेसबुक और ट्विटर पर नारे लिखकर लोग काम चला लेते हैं इसलिये ‘अन्ना हम तुम्हारे साथ हैं, क्योंकि जनलोकपाल के पीछे तुम्हारे हाथ हैं’ के नारे लिखे जा सकते हैं पर ब्लाग और वेबसाईटों पर विस्तार से लिखने वाले पूरी बात लिखकर ही चैन पाते हैं। इसलिये अन्ना की कोर टीम को दूसरों से गंभीरता दिखाने की बजाय स्वयं गंभीर होना चाहिए।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Sunday, November 6, 2011

अन्ना हजारे टीम का ब्लॉगर से पंगा-हिन्दी व्यंग्य (anna hazare core team and his blogger-hindi satire or vyangya)

             अन्ना हजारे की टीम ने राजू परूलेकर नामक ब्लॉगर से पंगा लेकर अपने लिये बहुत बड़ी चुनौती बुला ली है। हमने परुलेकर को टीवी चैनलों पर देखा। अन्ना टीम का कोई सदस्य भी योग्यता में उनके मुकाबले कहीं नहीं टिकता। अब भले ही अन्ना हजारे ने अपनी टीम को बचाने के लिये उससे किनारा कर लिया है पर यह कहना कठिन है कि भविष्य में क्या करेंगे? अगर राजू परुलकर की बात को सही माने तो एक न एक दिन अन्ना का अपनी इसी कोर टीम से टकराव होगा।
             अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अब एक ऐसी बहुभाषी फिल्म लगने लगी है जिसकी पटकथा बाज़ार के सौदागरों के प्रबंधकों ने राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विषयों में पारंगत लेखकों से लिखवाया है तो इन्हीं क्षेत्रों में सक्रिय उनके प्रायोजित नायकों ने अभिनीत किया है। बाज़ार से पालित प्रचार माध्यम सामूहिक रूप से फिल्म को दिखा रहे हैं। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि जैसे किसी टीवी चैनल पर कोई कई कड़ियों का धारावाहिक प्रसारित हो रहा है। इसमें सब हैं। कॉमेडी, रोमांच, रहस्य, कलाबाजियां और गंभीर संवाद, सभी तरह का मसाला मिला हुआ है।
          अन्ना के ब्लॉगर राजू ने जिस तरह राजफाश किया उसके बाद अन्ना की गंभीर छवि से हमारा मोहभंग नहीं हुआ पर उनके आंदोलन की गंभीरता अब संदिग्ध दिख रही है। यहां हम पहले ही बता दें कि सरकार ने एक लोकपाल बनाने का फैसला किया था। उस समय तक अन्ना हजारे राष्ट्रीय परिदृश्य में कहीं नहीं दिखाई दे रहे थे। लोकपाल विधेयक के संसद में रखते ही अन्ना हजारे दिल्ली में अवतरित हो गये। उससे पहले बाबा रामदेव भी जमकर आंदोलन चलाते आ रहे थे। देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक वातावरण बन गया था जिसका लाभ उठाने के लिये चंद पेशेवर समाजसेवकों ने अन्ना हजारे के लिये दिल्ली में अनशन की व्यवस्था की। अन्ना रालेगण सिद्धि और महाराष्ट्र में भले ही अपने साथ कुछ सहयोगी रखते हों पर दिल्ली में उनके लिये यह संभव इसलिये नहीं रहा होगा क्योंकि उनका कार्यक्षेत्र अपने प्रदेश के इर्दगिर्द ही रहा है। इन्हीं पेशेवर समाज सेवकों ने प्रचार माध्यमों की सहायता से अण्णा हजारे को महानायक बना दिया। देश में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी तथा बीमारी से परेशान लोगों के लिये अण्णा हजारे एक ऐसी उम्मीद की किरण बन गये जिससे उनको रोशनी मिल सकती थी। प्रचार माध्यमों को एक ऐसी सामग्री मिल रही थी जिससे पाठक और दर्शक बांधे जा सकते थे ताकि उनके विज्ञापन का व्यवसाय चलता रहे।
        हालांकि अब अन्ना हजारे का जनलोकपाल बिल पास भी हो तो जनचर्चा का विषय नहीं बन पायेगा क्योंकि महंगाई का विषय इतना भयानक होता जा रहा है कि लोग अब यह मानने लगे हैं कि भ्रष्टाचार से ज्यादा संकट महंगाई का है जबकि अन्ना हजारे जनलोकपाल के नारे के साथ ही चलते जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि वह दूसरों को बनाये प्रारूप पर काम कर रहे हैं। स्पष्टतः यह जनलोकपाल उनके स्वयं का चिंत्तन का परिणाम नहीं है। गांधीजी की तरह उनकी गहन चिंत्तन की क्षमता प्रमाणिक नहीं मानी जा सकती। जहां तक उनके आंदोलनों और अनशन का सवाल है तो वह यह स्वयं कहते हैं कि उन्होंने कई मंत्री हटवायें हैं और सरकारें गिरायी हैं। ऐसे में यह पूछा जा सकता है कि उनके प्रयासों से रिक्त हुए स्थानों पर कौन लोग विराजमान हुए? क्या वह अपने पूर्ववर्तियों  की तरह से साफ सुथरे रह पाये? आम आदमी को उनसे क्या लाभ हुआ? सीधी बात कहें तों उनके अनशन या आंदोलन दीर्घ या स्थाई परिणाम वाले नहीं रहे। अगर उनका प्रस्तावित जनलोकपाल विधेयक यथारूप पारित भी होता है तो वह परिणाममूलक रहेगा यह तय नहीं है। ऐसे में उनका आंदोलन आम लोगों को अपनी परेशानियों से अलग हटाकर सपनों में व्यस्त व्यस्त रखने का प्रयास लगता है। जिस तरह फिल्मों के सपने बेचे जाते हैं उसी तरह अब जीवंत फिल्में समाचारों के रूप प्रसारित होती दिख रही हैं।
           अभी तक अन्ना को निर्विवाद माना जाता था पर राजू ब्लॉगर को हटाकर उन्होंने अपनी छवि को भारी हानि पहुंचाई है। राजू ब्लॉगर के अनुसार अन्ना चौकड़ी के दबाव में आ जाते हैं। इतना ही नहीं यह चौकड़ी उनका सम्मान नहीं करती। जिस तरह अन्ना ने पहले इस चौकड़ी से पीछा छुड़ाने की बात कही और दिल्ली आकर फिर उसके ही कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहे हैं उससे लगता है कि कहीं न कहंी न वह अपने अनशन और आंदोलन पर खर्च होने वाले पैसे के लिये उनके कृतज्ञ हैं। जब देश में पेट्रोल के दाम बढ़ने पर शोर मचा है तब अपने फोन टेपिंग का मामला प्रचार माध्यमों में उछाल रहे हैं। एक तरफ कहते हैं कि हमें इसकी चिंता नहीं है दूसरी तरफ अपने राष्ट्रभक्त होने का प्रमाणपत्र दिखा रहे हैं। सीधी बात कहें तो पेट्रोल की मूल्यवृद्धि से लाभान्वित पूंजीपतियों को प्रसन्न कर रहे हैं जो कहीं न कहीं इन पेशेवर समाजसेवकों के प्रायोजक हो सकते हैं।
        अब हमारी दिलचस्पी अन्ना हजारे से अधिक राजू ब्लॉगर में हैं। अन्ना ने दूसरा ब्लाग बनाकर दो सहायकों को रखने की बात कही है। राजू ब्लॉगर ने एक बात कही थी कि उनके ब्लॉग देखकर अन्ना टीम ने यह प्रतिबंध लगाया था कि उनसे पूछे बगैर उस पर कोई सामग्री नहीं रखी जाये। अन्ना ने इस पर सहमति भी दी थी। राजू ब्लॉगर ने उस पर अमल नहीं किया पर अब लगता है कि अन्ना के नये सहायक अब यही करेंगे। ऐसा भी लगता है कि उनकी नियुक्ति अन्ना टीम अपने खर्च पर ही करेगी। ऐसे में अन्ना हजारे पूरी तरह से प्रायोजक शक्तियों के हाथ में फंस गये लगते हैं। वह त्यागी होने का दावा भले करते हों पर रालेगण सिद्धि से दिल्ली और दिल्ली से रालेगण सिद्धि बिना पैसे के यात्रा नहंी होती। बिना पैसे के अनशन के लिये टैंट और लाउडस्पीकर भी नहीं लगते। अन्ना की टीम के चार पांच पेशेवर समाज सेवक पैसा लगाते हैं इसलिये पच्चीस सदस्यीय समिति में उनका ही रुतवा है। अभी तक अन्ना इस रुतवे में फंसे नहीं दिखते थे पर अगर राजू परुलेकर की बात मानी जाये तो अब वह स्वतंत्र नहीं दिखते। आखिरी बात यह है कि कहीं न कहीं अन्ना हजारे के मन में आत्मप्रचार की भूख है जिसे शांत रखने के लिये वह किसी की भी सहायता ले सकते हैं। राजू ब्लॉगर के अनुसार अन्ना ने अपनी टीम के सबसे ताकतवर सदस्य के बारे में कहा था कि ‘समय पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।’
          मतलब अन्ना जांगरुक और त्यागी हैं तो आत्मप्रचार पाने के इच्छुक होने के साथ ही चालाक भी हैं। इधर अन्ना टीम ने एक ऐसे ब्लॉगर से पंगा लिया है जो लिखने पढ़ने और जानकारी के विषय में उनसे कई गुना अधिक क्षमतावान है। अभी तक अन्ना विरोधी जो काम नहीं कर पाये यह ब्लॉगर वही कर सकता है। ऐसे में अगर वह अन्ना टीम प्रचार माध्यमों में भारी पड़ा तो अन्ना पुनः उसे बुला सकते हैं। बहरहाल आने वाला समय एक जीवंत फिल्म में नये उतार चढ़ाव का है। आखिर इस धारावाहिक या फिल्म में एक ब्लॉगर जो दृश्य में आ रहा है। यह अलग बात है कि फिल्म या धारावाहिकों में इस तरह का परिवर्तन नाटकीय लगता है पर अन्ना हजारे के आंदोलन के जीवंत प्रसारण में यह एकदम स्वाभाविक है। हम यह दावा नहीं करते कि यह आंदोलन प्रायोजित है पर अगर है तो पटकथाकारों को मानना पड़ेगा।
अन्न हज़ारे का ब्लॉग,अण्णा हजारे का ब्लॉग,anna hazare ka blog,anna hazare blog,anna hazare and his blogger
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Thursday, October 13, 2011

सिंध के विषय पर कुछ क्यों नहीं बोलते-हिन्दी लेख (disscussion on sindh state of pakistan and india-hindi article

             अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के लक्ष्यों को लेकर तो उनके विरोधी भी गलत नहीं मानते। इस देश में शायद ही कोई आदमी हो यह नहीं चाहता हो कि देश में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो। अन्ना हजारे ने जब पहली बार अनशन प्रारंभ किया तो उनको व्यापक समर्थन मिला। किसी आंदोलन या अभियान के लिये किसी संगठन का होना अनिवार्य है मगर अन्ना दिल्ली अकेले ही मैदान में उतर आये तो उनके साथ कुछ स्वयंसेवी संगठन साथ हो गये जिसमें सिविल सोसायटी प्रमुख रूप से थी। इस संगठन के सदस्य केवल समाज सेवा करते हैं ऐसा ही उनका दावा है। इसलिये कथित रूप से जहां समाज सुधार की जरूरत है वहां उनका दखल रहता है। समाज सुधार एक ऐसा विषय हैं जिसमें अनेक उपविषय स्वतः शामिल हो जाते हैं। इसलिये सिविल सोसायटी के सदस्य एक तरह से आलराउंडर बन गये हैं-ऐसा लगता है। यह अलग बात है कि अन्ना के आंदोलन से पहले उनकी कोई राष्ट्रीय छवि नहंी थी। अब अन्ना की छत्रछाया में उनको वह सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसकी कल्पना अनेक आम लोग करते हैं। इसलिये इसके सदस्य अब उस विषय पर बोलने लगे हैं जिससे वह जुड़े हैं। यह अलग बात है कि उनका चिंत्तन छोटे पर्दे पर चमकने तथा समाचार पत्रों में छपने वाले पेशेवर विद्वानों से अलग नहीं है जो हम सुनते हैं।
           बहरहाल बात शुरु करें अन्ना हजारे से जुुड़ी सिविल सोसायटी के सदस्य पर हमले से जो कि वास्तव में एक निंदनीय घटना है। कहा जा रहा है कि यह हमला अन्ना के सहयोगी के जम्मू कश्मीर में आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने पर दिया गया था जो कि विशुद्ध रूप से पाकिस्तान का ऐजंेडा है। दरअसल यह संयुक्त राष्ट्र में पारित उस प्रस्ताव का हिस्सा भी है जो अब धूल खा रहा है और भारत की सामरिक और आर्थिक शक्ति के चलते यह संभव नहीं है कि विश्व का कोई दूसरा देश इस पर अमल की बात करे। ऐसे में कुछ विदेशी प्रयास इस तरह के होना स्वाभाविक है कि भारतीय रणनीतिकारों को यह विषय गाहे बगाहे उठाकर परेशान किया जाये। अन्ना के जिस सहयोगी पर हमला किया गया उन्हें विदेशों से अनुदान मिलता है यह बात प्रचार माध्यमों से पता चलती रहती है। हम यह भी जानते हैं कि विदेशों से अनुदान लेने वाले स्वैच्छिक संगठन कहीं न कहीं अपने दानदाताओं का ऐजेंडा आगे बढ़ाते हैं।
           हमारे देश में लोकतंत्र है और हम इसका प्रतिकार हिंसा की बजाय तर्क से देने का समर्थन करते हैं। कुछ लोगों को यह लगता है कि मारपीट कर प्रतिकार करें तो वह कानून को चुनौती देते हैं। इस प्रसंग में कानून अपना काम करेगा इसमें भी कोई शक नहीं है।
           इधर अन्ना के सहयोगी पर हमले की निंदा का क्रम कुछ देर चला पर अब बात उनके बयान की हो रही है कि उसमें भी बहुत सारे दोष हैं। कहीं न कहीं हमला होने की बात पीछे छूटती जा रही है। एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हम अपनी बात कहें तो शायद कुछ लोगों को अजीब लगे। हमने अन्ना के सहयोगी के इस बयान को उन पर हमले के बाद ही सुना। इसका मतलब यह कि यह बयान आने के 15 दिन बाद ही घूल में पड़ा था। कुछ उत्तेजित युवकों ने मारपीट कर उस बयान को पुनः लोकप्रियता दिला दी। इतनी कि अब सारे टीवी चैनल उसे दिखाकर अपना विज्ञापनों का समय पास कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि कहीं यह उत्तेजित युवक यह बयान टीवी चैनलों पर दिखाने की कोई ऐसी योजना का अनजाने में हिस्सा तो नहीं बन गये। संभव है उस समय टीवी चैनल किसी अन्य समाचार में इतना व्यस्त हों जिससे यह बयान उनकी नजर से चूक गया हो। यह भी संभव है कि दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई बैंगलौर या अहमदाबाद जैसे महानगरों पर ही भारतीय प्रचार माध्यम ध्यान देते हैं इसलिये अन्य छोटे शहरों में दिये गये बयान उनकी नजर से चूक जाते हैं। इस बयान का बाद में जब उनका महत्व पता चलता है तो कोई विवाद खड़ा कर उसे सामने लाने की कोई योजना बनती हो। हमारे देश में अनेक युवक ऐसे हैं जो अनजाने में जोश के कारण उनकी योजना का हिस्सा बन जाते हैं। यह शायद इसी तरह का प्रकरण हो। हमला करने वाले युवकों ने हथियार के रूप में हाथों का ही उपयोग किया इसलिये लगता है कि उनका उद्देश्य अन्ना के सहयोगी को डराना ही रहा होगा। ऐसे में मारपीट कर उन्होंनें जो किया उसके लिये उनको अब अदालतों का सामना तो उनको करना ही होगा। हैरानी की बात यह है कि हमला करने वाले तीन आरोपियों में से दो मौके से फरार हो गये पर एक पकड़ा गया। जो पकड़ा गया वह अपने कृत्य पर शार्मिंदा नहीं था और जो फरार हो गये वह टीवी चैनलों पर अपने कृत्य का समर्थन कर रहे थे। हैरानी की बात यह कि उन्होंने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रति समर्थन देकर अपनी छवि बनाने का प्रयास किया। इसका सीधा मतलब यह था कि वह अन्ना की आड़ में उनके सहयोगी के अन्य ऐजेंडों से प्रतिबद्धता को उजागर करना चाहते थे। वह इसमें सफल रहे या नहीं यह कहना कठिन है पर एक बात तय है कि उन्होंने अन्ना के सहयोगी को ऐसे संकट में डाल दिया है जहां उनके अपने अन्य सहयोगियों के सामने अपनी छवि बचाने का बहुत प्रयास करना होगा। संभव है कि धीरे धीरे उनको आंदोलन की रणनीतिक भूमिका से प्रथक किया जाये। कोई खूनखराबा नहीं  हुआ यह बात अच्छी है पर अन्ना के सभी सहयोगियों के सामने अब यह समस्या आने वाली है कि उनकी आलराउंडर छवि उनके लिये संकट का विषय बन सकती है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन निर्विवाद है पर जम्मू कश्मीर, देश की शिक्षा नीति, हिन्दुत्ववाद, धर्मनिरपेक्षता तथा आतंकवाद जैसे संवेदनशील विषयों पर अपनी बात सोच समझकर रखना चाहिए। यह अलग बात है कि लोग चिंत्तन करने की बजाय तात्कालिक लोकप्रियता के लिये बयान देते हैं। यही अन्ना के सहयोगी ने किया। स्थिति यह है कि जिन संगठनों ने उन पर एक दिन पहले उन पर हमले की निंदा की दूसरे दिन अन्ना के सहयोगी के बयान से भी प्रथक होने की बात कह रहे हैं। अन्ना ने कुशल राजनीतिक होने का प्रमाण हमले की निंदा करने के साथ ही यह कहकर भी दिया कि मैं हमले की असली वजह के लिये अपने एक अन्य सहयेागी से पता कर ही आगे कुछ कहूंगा।
            आखिरी बात जम्मू कश्मीर के बारे में की जाये। भारत में रहकर पाकिस्तान के ऐजेंडे का समर्थन करने से संभव है विदेशों में लोकप्रिय मिल जाये। कुछ लोग गला फाड़कर चिल्लाते हुए रहें तो उसकी परवाह कौन करता है? मगर यह नाजुक विषय है। भारत का बंटवारा कर पाकिस्तान बना है। इधर पेशेवर बुद्धिजीवी विदेशी प्रायोजन के चलते मानवाधिकारों की आड़ में गाहे बगाहे जनमत संग्रह की बात करते हैं। कुछ ज्ञानी बुद्धिजीवी इस बात को जानते हैं कि यह सब केवल पैसे का खेल है इसलिये बोलते नहीं है। फिर बयान के बाद मामला दब जाता है। इसलिये क्या विवाद करना? अलबत्ता इन बुद्धिजीवियों को कथित स्वैच्छिक समाज सेवकों को यह बता दें कि विभाजन के समय सिंध और पंजाब से आये लोग हिन्दी नहीं जानते थे इसलिये अपनी बात न कह पाये न लिख पाये। उन्होंने अपनी पीड़ा अपनी पीढ़ी को सुनाई जो अब हिन्दी लिखती भी है और पढ़ती भी है। यह पेशेवर बुद्धिजीवी अपने उन बुजुर्गों की बतायी राह पर चल रहे हैं जिसका सामना बंटवारा झेलने वाली पीढ़ी से नहीं हुआ मगर इनका होगा। बंटवारे का सच क्या था? वहां रहते हुए और फिर यहां आकर शरणार्थी के रूप में कैसी पीढ़ा झेली इस सच का बयान अभी तक हुआ नहीं है। विभाजन से पूर्व पाकिस्तान में सिंध, बलूचिस्तान और सिंध प्रांतों में क्या जनमत कराया गया था? पाकिस्तान जम्मू कश्मीर का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार नहीं करता और जनमत संग्रह की मांग करने वाले खुले रूप से उससे हमदर्दी रखते हैं। ऐसे में जनमत संग्रह कराने का मतलब पूरा कश्मीर पाकिस्तान को देना ही है। कुछ राष्ट्रवादियों का यह प्रश्न इन कथित मानवाधिकारियों के सामने संकट खड़ा कर सकता है कि ‘सिंध किसके बाप का था जो पाकिस्तान को दे दिया या किसके बाप का है जो कहता है कि वह पाकिस्तान का हिस्सा है’। जम्मू कश्मीर को अपने साथ मिलाने का सपना पूरा तो तब हो जब वह पहले बलूचिस्तान, सीमा प्रांत और सिंध को आजाद करे जहां की आग उसे जलाये दे रही है। यह तीनों प्रांत केवल पंजाब की गुलामी झेल रहे हैं। इन संकीर्ण बुद्धिजीवियों की नज़र केवल उस नक्शे तक जाती है जो अंग्रेज थमा गये जबकि राष्ट्रवादी इस बात को नहीं भूलते कि यह धोखा था। संभव है कि यह सब पैसे से प्रायोजित होने की वजह से हो रहा हो। इसी कारण इतिहास, भूगोल तथा अपने पारंपरिक समाज से अनभिज्ञ होकर केवल विदेशियों से पैसा देकर कोई भी कैसा भी बयान दे सकता है। यह लोग जम्मू कश्मीर पर बोलते हैं पर उस सिंध पर कुछ नहीं बोलते जो हमारे राष्ट्रगीत में तो है पर नक्शे में नहीं है।
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Saturday, October 1, 2011

महात्मा गांधी का दर्शन और भारत की वर्तमान स्थिति-2 अक्टुबर गांधी जयंती पर विशेष हिन्दी लेख (mahatma gandhi ka darshan nirapad nahin tha-hindi lekh on 2 october gandhi jayanti)

         कल दो अक्टोबर देश में गांधी जयंती मनाई जायेगी। प्रसंगवश इस दिन भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री का भी जन्म दिन मनाया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इतिहास में किसी भी महापुरुष का नाम बिना किसी योग्यता, कठिन परिश्रम या त्याग के दर्ज नहीं होता पर यह भी सत्य है कि एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन समय समय पर अनेक लोग अपने ढंग से करते हैं। एतिहासिक पुरुषों के परमधाम गमन के तत्काल बाद सहानुभूति के चलते जहां उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन करने वाले अत्यंत सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाते हैं। उस समय कोई प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं करता पर समय के साथ ही एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व का प्रभाव क्षीण होने लगता है तब विचारवान लोग प्रतिकूल टिप्पणियां भले न करें पर कुछ प्रश्न उठाने ही लगते हैं।
          गांधीजी के दर्शन  पर भी अनेक सवाल उठते हैं तो श्रीलाल बहादुर शास्त्री के बारे में भी यह पूछा जाता है कि पाकिस्तान से युद्ध जीतने के बाद भी उन्होंने मास्को जाकर सोवियत संघ की मध्यस्थता स्वीकार कर हारने जैसा काम क्यों किया? बहुत समय तक यह सवाल किसी ने नहीं पूछा था पर जब कारगिल युद्ध के बंद होने के बाद यह बात उठी थी तब शास्त्री जी की भूमिका सामने आयी थी भले ही उस समय सीधे किसी ने उनका नाम लेकर आक्षेप नहीं किया गया। फिर यह सवाल चर्चा में अधिक नहीं आया पर विचारवान लोगों के लिये इतना ही बहुत था। पाकिस्तान को परास्त करने के बाद विजेता भारत के प्रधानमंत्री का इस तरह मास्को जाकर पाकिस्तान के हुक्मरानों से समझौता करना वाकई देश के लिये कोई सम्मान की बात नहीं थी-यह बात आज अनेक लोग मानते हैं। इस समझौते में पाकिस्तान की जमीन बिना कुछ लिये दिये वापस कर दी गयी थी।
            गांधीजी को विश्व में महान सम्मान प्राप्त हुआ है पर भारतीय जनमानस में अब उनकी छवि क्षीण हो रही है फिर अब फिल्म, क्रिकेट और अन्य प्रतिष्ठित क्षेत्रों में सक्रिय नये नये महापुरुषों का भी प्रचार हो रहा है। सरकारी और गैर सरकारी तौर पर गांधी जयंती के समय खूब प्रचार होने के साथ ही अनेक कार्यक्रम भी होते हैं पर लगता नहीं कि आज के कठिन समय का सामना कर रहा भारतीय जनमानस उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा लेता हो। गांधीजी को राजनीतक संत कहना उनके दर्शन को सीमित दायरे में रखना है। मूलतः गांधी जी एक सात्विक प्रवृत्ति के धार्मिक विचार वाले व्यक्ति थे। निच्छल हªदय और सहज स्वभाव की वजह से उनमें उच्च जीवन चरित्र निर्माण हुआ। एक बात तय है कि उन्होंने भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने का जब अभियान प्रारंभ किया होगा तब उनका लक्ष्य आत्मप्रचार पाना नहीं बल्कि देश के आम इंसान का उद्धार करना रहा होगा। अलबत्ता अपने आंदोलन के दौरान उन्होंने इस बात को अनुभव किया होगा कि उनके सभी सहयोग उनकी तरह निष्काम नहीं है। इसके बावजूद वह इस बात को लेकर आशावदी रहे होंगे कि समय के अनुसार बदलाव होगा और अपने ही देश के भले लोग राज्य अच्छी तरह चलायेंगे। कालांतर में जो हुआ वह हम सब जानते हैं। उनके सपनों का भारत कभी न बना न बनने की आशा है। स्थिति यह है कि अनेक अनुयायी अब दूसरे स्वाधीनता आंदोलन का बात करने लगे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि गांधी जी का सपना पूरा नहीं हुआ और जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन प्रारंभ किया वह पूरा नहीं हुआ। दूसरे शब्दों में 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी केवल एक ऐसा प्रतीक है जिसकी स्मृतियां केवल उस दिन मनाये जाये वाले कार्यक्रमों में ही मिलती है। जमीन पर अभी गांधीजी के सपनों का पूरा होना बाकी है।
        यहां हम गांधीजी के व्यक्तित्व और कृतित्व की आलोचना नहीं कर रहे क्योंकि हम जैसा मामूली शख्स भला उन पर क्या लिख सकता है? अलबत्ता देश के हालात देखकर वैचारिक रूप से गांधी दर्शन अब निरापद नहीं माना जा सकता है। सबसे पहला सवाल तो यह है कि भारत का स्वाधीनता आंदोलन अंततः एक राजनीतिक प्रयास था जिसमें राजकाज भारतीयों के हाथ में होने का लक्ष्य तय किया गया था। दूसरी बात यह कि गांधीजी ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध आंदोलन किया था जिस पर भारतीयों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने का आरोप था। इसके अलावा देश की समस्याओं के प्रति अंग्रेज सरकार की प्रतिबद्धता पर भी संदेह जताया गया था। इसका अर्थ सीधा है कि गांधीजी एक ऐसी सरकार चाहते थे जो देश के लोगों की होने के साथ ही जनहित का काम करे। ऐसे में राजकाज के पदों पर बैठने वाले महत्वपूर्ण लोगों की गतिविधियां महत्वपूर्ण होती हैं। तब गांधी जी ने राजकाज प्रत्यक्ष रूप से चलाने के लिये कोई पद लेने से इंकार क्यों किया? क्या वह इन पदों को भोग का विषय समझते थे या दायित्व निभाने के लिये अपने अंदर क्षमता का अभाव अनुभव करते थे। अगर यह दोनों बातें नहीं थी तो क्या उनको भरोसा था कि जो लोग राजकाज देखेंगे वह उनके रहते हुए अच्छा काम ही करेंगे? क्या उनको यकीन था कि जिन लोगों को वह राजकाज का जिम्म सौंपेंगे वह अच्छा ही काम करेंगे?
यकीनन सरकार का सैद्धांतिक रूप उनके सपनों में रहा हो पर व्यवहारिक  रूप से उनको इसका कोई अनुभव नहीं था। वह राजनीतिक के सैद्धांतिक पक्ष और व्यवहारिक स्थिति के अंतर को नहीं जानते थे। उन्होंने एक ऐसा राजनीतिक अभियान शुरु किया जो कालांतर में सीमित लक्ष्य प्राप्त कर समाप्त हो गया। आज उसी प्राप्त लक्ष्य को भी चुनौती मिल रही है। गांधी जी के अनुयायी और आज के महानायक अन्ना हजारे मानते हैं कि आज का शासन भी अंग्रेजों जैसा ही है। श्री अन्ना हजारे स्वयं भी कोई पद नहीं लेना चाहते पर देश के स्वच्छ और विकसित होने की का जिम्मा सरकार का ही मानते हैं। तब ऐसा लगता है कि एक राजनीति शास्त्र का ज्ञान न रखने वाला व्यक्ति भी राजनीति कर सकता है या राजकाज कोई पद संभाल सकता है। हमारा तो मानना है कि अंग्रेजों के विरुद्ध गांधीजी के आंदोलन के बारे में अब इतिहास पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं अन्ना जी का आंदोलन बता रहा है कि उस समय क्या क्या हुआ होगा?
        28 अगस्त को अन्ना साहिब का जनलोकपाल विधेयक लाने संबंधी आंदोलन समाप्त हुआ। हासिल कुछ नहीं हुआ पर उन्होंने कहा कि हमें आधी जीत मिली है। तब हम जैसे लोग सड़कों पर घूमते हुए उस आधी जीत को ढूंढते हुए सोच रहे थे कि 16 अगस्त को भी कोई हम जैसा शख्स रहा होगा जो उस आजादी को ढूंढ रहा होगा जिसका दावा उस समय किया जा रहा था। बहरहाल गांधीजी के आंदोलन के पीछे उस समय के धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, तथा आर्थिक शिखरों पर बैठे लोग रहे होंगे जो अपने हित साधन के लिये ही ऐसी आजादी चाहते होंगे ताकि वह देश के आम इंसान को गुलाम बनाये रख सके। पता नहीं गांधीजी यह देख पाये या नहीं पर इतना तय है कि वह जैसा भारत चाहते थे वैसा बन नहीं पाया। आखिरी बात यह है कि गांधीजी सात्विक प्रवृत्ति के थे और उनका आंदोलन राजस वृत्ति का था। बात अगर राजनीति की है तो उसमे सात्विक प्रवृत्ति की आशा करना व्यर्थ है। यह राजसी वृत्ति वाले लोगों का काम है। राजसी वृत्ति बुरी नहीं है बशर्त व्यक्ति अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिये उचित ढंग से कार्य करे। मुश्किल यह है कि तामसी वृत्ति वाले लोग अब राजकाज करने लगे हैं। भारत में दूसरी भी समस्या है। राजसी लोगों को स्वार्थी जानकर लोग हªदय से सम्मान नहीं करते जबकि सामूहिक नेतृत्व करना उन्हीं के बूते का होता है। सात्विक लोगों को समाज सम्मान देता है पर वह निष्काम होने के कारण राजकाज का काम नहीं करते। यही कारण है कि राजसी वृत्ति के लोग सात्विक लोगों को ढाल बनाकर आगे चलते हैं ताकि समाज उनका नेतृत्व और शासन स्वीकार करे। इसी कारण पूरे विश्व के राष्ट्राध्यक्ष अपने संपर्क धार्मिक नेताओं  से रखते हैं। गांधी को हमने देखा नहीं और अन्ना से कभी मिले नहीं पर प्रचार माध्यमों में देखकर हमने अनुभव किया वह लिख दिया। इस अवसर पर महात्मा गांधी जी और शास्त्री जी को हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि!




कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Thursday, August 11, 2011

आरक्षण फिल्म पर हायतौबा फिक्सिंग लगती है-सामाजिक लेख (a film movie on resevetion aarakshan and fix discussion and dissput-a hindi social article)

               एक बात तय है कि चाहे जितनी बहसें   और प्रदर्शन हो जायें फिल्म आरक्षण का प्रदर्शन रुकेगा या बाधित होगा ऐसा नहीं लगता। वजह साफ है कि बाज़ार और प्रचार का संयुक्त उपक्रम इस तरह है कि वह टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में विभिन्न मुद्दे उठाकर इसी तरह अपने उत्पाद, सेवायें तथा पठनीय या दर्शनीय सामग्री का विक्रय करता है। फिल्म आरक्षण के निर्माता का तो पता नहीं पर उसके सभी अभिनेता निश्चित रूप से बाज़ार और प्रचार के नायक हैं। उनके पास न केवल फिल्मों का ढेर है बल्कि अनेक वस्तुओं के विज्ञापनो में उनके चेहरे प्रतिदिन देखे जा सकते हैं। मतलब यह फिल्म भी बाज़ार और प्रचार के उपक्रमों का ही एक सृजन है। जिस तरह उदारीकरण के चलते बाज़ार और प्रचार उपक्रमों ने समूचे विश्व पर अधिकार कर लिया है उसे देखकर नहीं लगता कि ‘आरक्षण’ फिल्म का प्रदर्शन रुक जायेगा। बल्कि ऐसा लगता है कि इसे प्रचार दिलानें के लिये विवाद खड़ा किया गया है । पहले भी किसी फिल्म के गाने या दृश्यों पर पर आपत्तियों  का प्रचार किया गया पर बाद में कुछ हुआ नहीं। उल्टे फिल्मों को प्रारंभ में ही अच्छी बढ़ता मिली यह अलग बात है कि बाद के दिनों में उनका प्रभाव एकदम घट गया। सीधी बात कहें तो फिल्म ‘आरक्षण’ पर यह हायतौबा फिक्सिंग लगती है।
            यह फिल्म देश की नौकरियों में जाति के आधार पर आरक्षण नीति पर आधारित है। हम यहां इस पर बहस नहीं करना चाहते कि यह नीति गलत है या सही। वैसे भी फिल्म के निर्माता का कहना है कि यह फिल्म आरक्षण नीति पर कोई तर्कसंगत दृष्टिकोण रखने के लिये नहीं बनी। फिल्म में क्या है यह तो पता चल ही जायेगा पर जिस तरह इस फिल्म पर बहस हो रही है और जो तर्क आ रहे हैं वह अधिक चर्चा लायक नहीं है क्योंकि उनमें कुछ नया नहीं है। अलबत्ता अभिव्यक्ति की स्वततंत्रा का मुद्दा जरूर चर्चा का विषय है। पहली बात तो यह है कि बाज़ार और प्रचार के शिखर पुरुषों की ताकत इतनी बड़ी है कि लगता नहीं है कि उनकी यह फिल्म रुकेगी या बाधित होगी। दूसरी बात यह है कि अभिव्यक्ति अब केवल संगठित क्षेत्रों की सपंत्ति बन गयी है। टीवी चैनल और समाचार पत्रों के विद्वान बड़े शहरों में रहने वाले व्यवसायिक प्रचारक होते हैं। उनके वही रटे रटाये तर्क सामने आते हैंे जो बरसों से सुन रहे हैं। इसलिये आम इंसान की अभिव्यक्ति के मुखर होने का तो प्रश्न ही नहीं है।
            दरअसल हम अगर देश की ‘आरक्षण’ नीति पर बहस करेंगे तो ऐसे कई सवाल हैं जो नये ंसदर्भों के उठते हैं जिनपर कथित समर्थक प्रचारक कभी ध्यान नहीं देते तो विरोधियों का भी यही हाल है। आरक्षण समर्थकों में कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने संगठन बनाये बैठे हैं और दावा करते हैं कि वह अपनी समाजों के रक्षक हैं। वह अपने रटे रटाये तर्क लाते हैं। ‘आरक्षण’ का विरोध सार्वजनिक रूप से कोई करता नहीं है क्योंकि ऐसा करने वालों को व्यवस्था से प्रतिरोध का भय रहता है। अगर हम पूरे विश्व के देशों की व्यवस्थाओं का देखें तो सच यह लगता है कि तो आरक्षण हो या न हो इस पर बहस करना ही व्यर्थ है। अभी हाल ही में ब्रिटेन में हुए दंगों में अश्वेतों की उपेक्षा का परिणाम मान गया। इस लिहाज से तो आरक्षण होना भी बुरा नहीं है।
         मुख्य बात यह है कि हम अपनी व्यवस्थाओं का स्वरूप कैसे चाहते हैं? हम उनको जनोन्मुखी बनाना चाहते हैं या उसमें भागीदारी का स्वरूप देखना चाहते हैं। अगर जनोन्मुखी बनाना चाहते हैं तो पूरी तरह से व्यवसायिक कौशल वाले लोगों को आगे रखना होगा और व्यवस्था में भागीदारी दिखाना चाहते हैं तो फिर हमें यह स्वीकार करना होगा कि उसमें कुछ समझौते तो करने ही पड़ेंगे। समस्या यह है कि भागीदारी के स्वरूप में कार्यकर्ता अपने पदों के अधिकार समझते हैं कर्तव्य नहीं जबकि जनोन्मुखी होने पर उनका रुख दायित्व निभाने वाला रहता है।
         हम बार बार देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर व्यथित होने का दावा तो करते हैं पर व्यवस्था में पनपी अकुशलता को अनदेखा कर देते हैं जबकि सारे संकट का कारण वही है। जहां तक कुशल लोगों का सवाल है तो हर जाति, धर्म, भाषा और हर क्षेत्र में हैं पर क्या हमने सभी को अवसर दिया है? क्या देश के सभी कुशल प्रबंधक सम्मानजजनक पदों पर पहुंचे हैं। हमने पद पाना कौशल मान लिया पर उसके कर्तव्यों के निर्वहन की कुशलता पर कभी विचार नहीं किया। हम यहां जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर विचार तो यह बात साफ दिखाई देगा कि आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र में व्यवस्था इस तरह हो गयी है कि निजी चतुराई के सहारे अपने स्वार्थ सिद्ध करने वाले पद हथिया लेते हैं पर व्यवसायिक कौशल वाले लोगों को कहीं स्थान नहीं मिल पाया।
      आरक्षण समर्थक एक बुद्धिजीवी ने सवाल किया कि ‘क्या फिल्म को प्रमाण पत्र देने वाले सैंसर बोर्ड में एक भी हमारे समाज का है?’
         इसका जवाब कोई क्या देगा? दरअसल अगर उनसे कहा जाये कि इस मसले पर बहस के लिये अपने समाज से वह आदमी ले आओ जिसके पूरे खानदान में किसी ने आरक्षण का किसी भी तरह लाभ नहीं लिया हो। एक बात बता दें कि जिन समाजों को आरक्षण है उसमें कई ऐसे परिवार हैं जिनकी किसी पीढ़ी को इसका लाभ नहीं मिला। ऐसे लोग आरक्षण को लेकर इतने संवेदनशील भी नहीं होते पर जब भावना की बात आती है तो उनकी संख्या का सहारा लेकर ऐसे अनेक आरक्षण समर्थक विद्वान अपनी बात वजनदार होने का दावा करते हैं। देश के निम्न जातियों के गरीब लोगों की हालत बद से बदतर होती गयी है। आरक्षण की सुविधा लेकर सफेद छवि बनाने वाले लोगों ने अपने समाज के गरीब तबके से कितना वास्ता रखा है यह इस सुविधा से परे उनके लोगों से पूछकर देखा जा सकता है। फिर अब निजीकरण बढ़ रहा है ऐसे में आरक्षण का मुद्दा कितना सार्थक है यह भी विचारणीय बात है। फिल्म की कहानी आरक्षण की असलियत के कितना करीब होगी यह कहना कठिन है पर ऐसी फिल्मों को प्रचार दिलाने के लिये विवाद खड़े किये गये हैं यह देखा गया है।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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