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Friday, April 10, 2009

जब तक अपनी नई सोच को खुद रौशन नहीं करोगे-हिन्दी शायरी

वहम और दिखावे से कैसे जंग लड़ोगे
इंसानी दिमाग की फितरत है
अच्छी हो या बुरी
किसी सोच की गुलामी करना
तुम खाली जुबां से कैसे जीतोगे
उस अंधेरे से
जब तक अल्फाजों की नई रौशनी नहीं भरोगे।

आदमी का दिल कितना भी दरिया हो
ख्यालों के दायरे उसके बहुत तंग हैं
चलते हैं उधार की सोच पर सभी
अपने अल्फाज़ नहीं तय करते वह कभी
दोस्त हो या दुश्मन
जो दिखाये सपने, होते उसी के संग हैं
रौशनी के चिराग बुझ जाते हैं
कितना भी बचो, अंधेरे फिर भी आते हैं
मंजिल का पता नहीं
रास्ते सभी भटके हैं
फिर भी उम्मीद पर
किताबी कीड़ों के घर पर लटके हैं
शायद वह कोई अल्फाज़ों से निकालकर
मंजिल का पता बता दे
कैसे बताओगे उनको
सही मंजिल और रास्ते का पता
जब तक तुम अपनी सोच को
खुद ही रौशन नहीं करोगे

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Monday, December 1, 2008

अंधेरा और चिराग-हिंदी शायरी

अंधेरे ने चिराग से कहा
‘तू क्यों उस इंसान के लिये
हमारे से लड़ता है
जो सुबह आकाश में आफताब के आते ही
अपने से दूर करता है’
कहा चिराग ने
‘कुदरत ने बनाया है
मुझे तुमसे रात में लड़ने के लिये
सब जगह तुम्हें हटा नहीं सकता
जहां तक है मेरी रोशनी
तेरा घर वहां बन नहीं सकता
जैसे छोटा हूं उतनी ही है मेरी दुनियां
पर अपने कर्तव्य पालन के कारण
बहुत बड़े आफताब के बाद
तुमसे लड़ने में मेरा नाम ही चलता
इस धरती पर कई जगह
आफताब की रोशनी नहीं पहुंचती
वहां भी तेरे साथ मेरी होती जंग
फिर भी तुम्हारे लिये मेरे मन में द्वेष नहीं है
तुम्हारा होना मेरे लिये क्लेश नहीं है
तुम हो इसलिये इंसान को मेरी जरूरत है
आफताब का सहारा कुदरत है
पर तुम नहीं होते तो
हम दोनों का कोई हमारा मोल नहीं समझता
तराजू के एक पलड़ में कोई
चीज तोल नहीं सकता
हमारी रौशनी की पहचान
तुम्हारा अस्तित्व है
लोग भले ही कहें तुम्हारा दुश्मन
पर मैं तो तुम्हें अपना ही दोस्त कहता

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