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Wednesday, September 29, 2010

भक्तों के लिये भोले हैं राम-हिन्दी कविता (bhakton ke liye bhole hain ram-hindi poem)

दिल में नहीं था कहीं
पर जुबान से लेते रहे राम का नाम,
बनाते रहे अपने काम,
बरसती रही उन पर रोज़ माया,
फिर भी चैन नहीं आया,
कुछ लोग मतलब से पास आते हैं,
निकलते ही दूर चले जाते हैं,
राम का नाम बेचने में
उनको आता है मज़ा,
मगर मिलती है उनको भी बैचेनी की सज़ा,
भक्तों के लिये भोले हैं राम,
जरूरत से बनाते जाते काम
पर जो भक्तों को भुलाते हैं,
झूठे दर्द का वास्ता देकर रुलाते हैं,
नाम लेने से भर जाती उनकी भी झोली,
मगर हृदय में नहीं होते राम,
नहीं पाते इसलिये वह कभी आराम।
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Sunday, April 4, 2010

मोहब्बत के जज़्बात-हिन्दी शायरी (mohbbat ke jazbat-hindi shayri)

इश्क के चर्चे जमाने में बहुत हुए,
जो एक हुए दो बदन
लोगों ने बीता कल मान लिया।
जो उतरा हवस का भूत
तो घर का बोझ
दिमाग पर बढ़ने लगा
जिंदगी में फिर कभी इश्क का नाम न लिया।
----------
जो पत्नी को प्रियतमा न समझे
भटके हैं प्यार पाने के लिये इस दर से उस दर।
दिल में पल रहे जज़्बात
जमीन पर चलते नहीं देखे जाते,
इश्क है या हवस
इसकी पहचान नहीं कर पाते,
सर्वशक्तिमान समझे जो इंसानी जिस्म को
मोहब्बत नहीं टिकती कभी उनके घर।
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Monday, February 22, 2010

शब्द मंद हो गये हैं-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (real word is slow-hindi comic poem)

हर तरफ घूम रहे
हाथ में खंजर लिये लोग
किसी से हमदर्दी का उम्मीद करना
बेकार है
पहले कोई किसी के पीठ में
घौंपकर आयेगा,
फिर अपनी पीठ को बचायेगा।
भला कब किसी को
दर्द सहलाने का समय मिल पायेगा।
----------
दौलत, शौहरत और ताकत के
घोड़े पर सवार लोग
गिरोहबंद हो गये हैं।
हवा के एक झौंके से
सब कुछ छिन जाने का खौफ
उनके दिल में इस कदर है कि
आंखों से हमेशा उनके खून टपकता है,
आम आदमी की पीठ पर
हर पल बरसा रहे चाबुक
फिर भी वह कांटे की तरह
आंखों में खटकता है,
समाज की हालातों पर
सच लिखने वाले शब्द मंद हो गये हैं।

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Wednesday, January 27, 2010

प्यार, नफरत और दिल-हिन्दी व्यंग्य कविताएं (pyar,nafarat aur dil-hindi vyangya kavitaen)

राज रखकर ही राज

चलाये जाते हैं

सामने कर दुश्मनी के सौदे

बंद कमरे में दोस्तों में

बांटे जाते हैं।

जज़्बात मर गये हैं लोगों के

प्यार हो नफरत

दिल के अदंर तक नहीं पहुंचती

केवल जमाने को दिखाये जाते हैं।

--------

दिन भर दिखाते रहे

अपनी दुश्मनी जमाने को,

रात को चले दोस्ती निभाने को।

विज्ञापन का युग है

तारीफों पर अब लोग नहीं बहलते

इसलिये लोग चल पड़ते हैं

दोस्त के ही हाथ से अपने लिये गालियां लिखाने को।


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Sunday, November 22, 2009

धर्म बन गयी है शय-हिंदी व्यंग्य कविता (dharam ban gaye hai shay- vynayga kavita)

 
धर्म बन गयी है शय
बेचा जाता है इसे बाज़ार में,
सबसे बड़े सौदागर
पीर कहलाते हैं.
भूख, गरीबी, बेकारी और बीमारी को
सर्वशक्तिमान के  तोहफे बताकर
ज़माने को  भरमाते हैं.
मांगते हैं गरीब के  खाने के लिए पैसा
जिससे खुद खीर खाते हैं.
------------------------
धर्म का नाम लेते हुए
बढ़ता जा रहा है ज़माना,
मकसद है बस कमाना.
बेईमानी के राज में
ईमानदारी की सताती हैं याद
अपनी रूह करती है  फ़रियाद 
नहीं कर सकते दिल को साफ़ कभी 
हमाम में नंगे हैं सभी 
ओढ़ते हैं इसलिए धर्म का बाना.
फिर भी मुश्किल है अपने ही  पाप से बचाना..
 
 

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Monday, November 2, 2009

मनुष्यता-त्रिपदम (mansushyata-tripadam)

यह लघुता
चाहती है प्रभुता
छुरे के साथ।

वह क्रूरता
नाम रखे साधुता
खूनी हैं हाथ।

बड़ी शत्रुता
मांगती है मित्रता
सोच अनाथ।

मनुष्यता
बरतती पशुता
बनती नाथ।

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Tuesday, October 20, 2009

नया सामान और कबाड़-व्यंग्य कविता (naya saman aur kabad-hindi vyangya kavita)

सुनने और पढने वाला
जाल में फंस जाए
विज्ञापन ऐसे ही सजाये जाते हैं.
अगर उनमें सच होता तो
नहीं भर जाते घर उस कबाड़ के सामान से
जिनको खरीदा था कभी चाव से
बड़े महंगे भाव से
आये थे जो सामान नए बनकर ठेले से
वही कभी कबाड़ बनकर फिर उसमें लद जाते हैं.
---------------------
बाज़ार अब नगद ही नहीं
उधार पर भी चलते हैं.
चुकाते हुए रोते रहो
नहीं चुकाने पर
चीख पुकार भी मचती है
कभी उधार वाले
पहलवान बनकर गर्दन भी पकड़ते हैं.

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Friday, October 16, 2009

खुशियां और दर्द-हिंदी शायरी (khushiyan aur dard-hindi shayri)

बाहर जलती रौशनी देखकर भी
कब तक खुश रहा जा सकता है
अंदर का अंधेरा कभी न कभी
बाहर आकर दर्द देता
खुशियों का बोझ भी कब तक सहा जा सकता है
....................................
अपनी आवाज बुलंद होने का गुमान
कुछ इस तरह है उनको कि
कहीं मशहूर हम भी न हो जायें
वह अपने लबों सें नाम लेते भी डरते हैं।
हम भी कहां चाहते हैं
रौशनी करने की कीमत
क्योंकि ठहरे वह चिराग जो
अपने तले अंधेरा रखते हैं।


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Monday, October 12, 2009

छोटे ईमान के लोग बड़े बन जाते-हिंदी व्यंग्य कविता (chhote log-hindi vyangya kavita)

जब बहता था दरिया में पानी
तब भला कौन वादा करता था उसे लाने का।
कहीं बांध बनाये
कहीं रास्ता बदला
पानी को बनाकर बेचने की शय
जिन्होंने बिगाड़ दी प्रकृति की लय
अब वही करते हैं सभी जगह वादा
पानी का दरिया बहाने का।
छोटे ईमान के लोग
बड़े बन जाते हैं इस जमाने में
लेकर सहारा ऐसे ही अफसाने का।
.............................

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Saturday, October 3, 2009

दूर उठती लहरें देखकर-हिंदी कविता (zindagi aur samandar-hindi poem)

जिंदगी की इस धारा में
किस किसकी नाव पार लगाओगे।
समंदर से गहरी है इसकी धारा
लहरे इतनी ऊंची कि
आकाश का भी तोड़ दे तारा
अपनी सोच को इस किनारे से
उस किनारे तक ले जाते हुए
स्वयं ही ख्यालों में डूब जाओगे।
दूसरे को मझधार से तभी तो निकाल सकते हो
जब पहले अपनी नाव संभाल पाओगे।
दूर उठती लहरें देखकर
खेलने का मन करता है
पर उनकी ताकत तभी समझ आयेगी
जब उनसे लड़ने जाओगे।

...................................

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Tuesday, September 29, 2009

प्रायोजन की महिमा-व्यंग्य कवितायें

अपना दर्द यूं जमाने को न दिखाओ
दवा देकर इलाज करने वाले
हर जगह नहीं मिलते हैं।
जो अल्फाजों की जादूगरी से
जख्मों का बहता खून चूस लें
इस जहां में
जुबानी हमदर्दी के ऐसे सौदागर भी मिलते हैं।
..............................
चक्षुहीन करते प्रकृति सौंदर्य का बखान
बहरे सिर हिलाते, सुनकर कोई भी गान
पैसे से प्रायोजन की महिमा होती अपरंपार
गूंगे गाते कविता, मूर्ख बताते वेदों का ज्ञान।
...............................
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Saturday, September 19, 2009

मिस काल-हास्य व्यंग्य कविताएँ (miss call on mobile-hinde hasya kavitaen)

माशुका अब आशिक के लिये
हो गयी है मिस काल।
वह घंटी बजाकर बंद करती है
फिर करता है आशिक उसे काल।
वह भी क्या करे
आशिक ने जीवन भर सुनने के लिये
मोबाइल तो दिया
मगर अब नहीं भरवा कर दे रहा वार्तालाप समय
कोई पुरुष ‘मिस काल’ बनकर
इश्क की चोरी न कर ले
उसको भी लगता है भय
जब भी कहती है
वार्तालाप समय भरवाने को माशुका
मंदी का बहाने से आशिक देता है टाल।
.................................
सच मोबाइल से रिश्ते निभाने में
सभी को सुविधा हो गयी है
पर बेशर्म बन करें जो मिस काल
उनको कोई परवाह नहीं है
पर पानीदार को वापस करना ही पड़ता है काल
चाहे अनचाहे बात करना दुविधा हो गयी है।
..............................
मोबाइल से रिश्ते
अधिक प्रगाढ़ हो गये लगते
क्योंकि चाहे जब बात करो
दूर बैठे अपने, बहुत पास लगते।
जब तक मिस कालों का
जवाब देते रहो सभी को लगता है अच्छा
न करो तो
कंजूस कहकर इज्जत का नाश करते।
............................
एक दोस्त ने कहा
‘यार, देखो में कितना तुम्हें याद करता हूं
दिन में कितनी बार तो मिस काल करता हूं
एक तुम हो कि जवाब नहीं देते।’
दूसरे ने कहा
‘हां, मैं भी तुम्हें बहुत याद करता हूं
जब तुम्हारा मिस काल आता है
तुम्हारे लिये आहें भरता हूं
वार्ता समय नहीं मेरे मोबाइल में
वरना हम दोनों ही बात कर लेते।’

.............................
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Wednesday, September 16, 2009

जो बहते पानी की तरह जिये-हिंदी साहित्य कविता (bahata pani aur samaj-hindi sahityak kaviata)

जब तक प्राचीन स्तंभ खड़े रहेंगे
पहचान बताने के लिये
कोई नहीं जलायेगा नये ज्ञान दिये।
जल चुकी कपास की बाती
फिर नहीं रौशनी फैलायेगी
चाहे जितना भी तेल पिये।

सुगंधित फूलों के कितने भी पेड़
किनारे पर लगा लो
रुका पानी अपने अंदर समाये तालाब
गंदगी से लबालब हो ही जाता है
चलता रहे जो जिंदगी
बदलते ख्यालों के साथ
जिंदगी को वही समझ पाता है
जिंदा रहता है इतिहास उन्हीं समाजों का
जो बहते पानी की तरह जिये।

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Thursday, September 10, 2009

नोट पहले क्यों नहीं दिखाया-हास्य व्यंग्य कविता (rupya aur iman-hasya vyangya kavita)

आम आदमी उस कार्यालय पहुंचा तो
सभी के कानों में मोबाइल का तार लगा पाया।
सुन रहे थे सभी गाने
उसके समझ में कुछ नहीं आया।
वह बोलता रहा कुर्सी पर बैठे अधिकारी से
पर उसे अपनी तरफ नहीं देखता पाया।
आखिर उसने जेब से
पांच सौ का नोट दिखाकर उसे दिखाया।
उसे देखते ही अधिकारी ने कान से तार निकाली
और बोला
‘अरे, भई बताओ कौनसा काम है
यह नोट पहले क्यों नहीं दिखाया।’

....................................
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Tuesday, September 8, 2009

ईमान का दीपक-हिंदी कविता (iaman ka deepak-hindi sahityak kavita)

आजकल के जमाने में दुश्मन कम नहीं है.
किसकी सोचें, क्या और साथ गम नहीं हैं.
आसान है धोखा देना,इसलिए सब देते
वफादारी निभाने का सब में दम नहीं है.
गंदे अल्फाज़ बोलना, बन गया है रिवाज़
बोलकर दिखाते सब कि वह बेदम नहीं है.
उसूलों के दिखावे में माहिर हैं सब लोग
पैसा लूटना किसी से, अब सितम नहीं है.
उनको सलाम, रोशन करते ईमान का दीपक
जमाने को दिखाते कि सब जैसे हम नहीं है.
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Friday, September 4, 2009

नजरें फेरते ही-हिंदी कविता (nazaren-hindi poem)

सच बोलना कभी कभी
ठीक नहीं लगता
कड़वा जो होता।
सोचता भी नहीं
कोई दिमाग की हलचल को
सुन न ले
दीवारों के भी कान होता।
हां, लाचार हूं
एकदम बेबस हूं
निगाहों के सामने हैं दोस्त बहुत
नजरें फेरते ही
हर कोई मेरी शिकायतें लिये
कोई दुश्मन ढूंढ रहा होता।
....................................



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Tuesday, September 1, 2009

टीवी एंकर और कवि-हिंदी हास्य कविता (tv anchor and hindi poet-hindi hasya kavita)

कवि ने टीवी एंकर से कहा
‘यह मेरे साक्षात्कार का बेकार नाटक रचाया।
तुम सवाल करते हुए
जवाब भी बताकर
उसे दोहराने को मजबूर करती थी,
जब अपनी बात कहता तो
ब्रेक लगाकर दूर कर देती थी,
तुम्हारे सवाल मेरे जवाब से लंबे थे
मैं सवाल समझता तुम
जवाब वैसे ही भर देती थी,
यह कार्यक्रम देखकर लोग तुम्हें ही
याद रखेंगे,
मुझे भूल जायेंगे,
लोग इसे देखकर
मुझ पर हंसने लग जायेंगे
इस कार्यक्रम में तो तुमने
मुझे एक तरह से आइटम कवि बनाया।

यह सुनकर एंकर को गुस्सा आया।
वह बोली
‘काहे के कवि हो
पता है ब्लाग पर तुम्हारी
हास्य कविताऐं फ्लाप हो जाती है
मैंने भी पढ़ी
पर समझ में नहीं आती हैं।
आधी रात को प्रसारित होने वाले
इस कार्यक्रम के लिये
कोई आइटम नहीं मिल रहा था
इसलिये तुमको बड़ा कवि बताया।
यह चैनल कोई तुम्हारा मंच नहीं है
इस पर करोड़ों का खर्च आया।
फिर तुम्हें मालुम नहीं है कि
कमाई से ही होता है सम्मान
मैं अपने कार्यक्रम के लिये
इतना पैसा लेती हूं
तो प्रचार भी मुझे ही मिलेगा
तुम जैसे फोकट के कवि का चेहरा दिखाकर
हमारा नाम कार्यक्रमों की तुलनात्मक दौड़ में गिरेगा
कवि हो इतना भी नहीं जानते
महिलाओं से हिट्स होते हैं कार्यक्रम
तुम जैसे कवियों को लोग फालतू मानते
अब जाकर पी लेना
कैंटीन में काफी
वरना वह भी खत्म हो जायेगी
फिर न कहना पहले नहीं बताया।
तुम्हारे साक्षात्कार से
न तो कोई सनसनी फैलेगी,
न जमेगी हंसी की महफिल,
हमारी पब्लिक इसे कैसे झेलेगी,
पता करूंगी इस चैनल में
कौन उल्लू है
जो तुम्हें यहां ले आया।
......................................

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Saturday, August 29, 2009

कविता की शाम-हास्य कविता (evening of hindi poem-hasya kavita)

एक पुराने कवि ने
अपनी पहली कविता लिखने के दिवस को
साहित्यक पदार्पण दिवस के
रूप में मनाया।
ढेर सारे हिट और फ्लाप कवियों का
जमघट होटल में लगाया।
चला दौर जाम का
कविता के नाम का
सभी ने अपना ग्लास एक दूसरे से टकराया।

अकेले में एक फ्लाप कवि ने
उस कवि से पूछ लिया
‘आप तो पीते हो जाम
बातें करते हो आदर्श की सरेआम
भला या विरोधाभास कैसे दिख रहा है
लोग नहीं देखते यह सब
जबकि अपने नाम खूब कमाया।’

सुनकर वह पुराना कवि हंस पड़ा
और बोला-‘
‘अभी नये आये हो सब पता चल जायेगा
बिना पिये यह जाम
नहीं सज सकती कविता की शाम
जब तक हलक से न उतरे
देश में तरक्की की बात करने का
जज्बा नहीं आ सकता
एकता, अखंडता और जन कल्याण का
नारा कभी नहीं छा सकता
गला जब तर होता है तभी
ख्याल वहां पैदा होते हैं
आम लोग करते हैं वाह वाह
गहराई से चिंतन लिखने वाले
हमेशा ही असफल होकर रोते हैं
अंग्रेज अपनी संस्कृति के साथ
छोड़ गये यह बोतल भी यहां
आजादी की दीवानगी पर लिखने वाले भी
उनके गुलाम होकर विचरते यहां
पढ़ते लिखते नहीं धर्म की किताबें
उन भी हम बरस जाते
सारे धर्म छोड़कर इंसान धर्म मानने की
बात कहकर ऐसे ही नहीं हिट हो जाते
साथ में प्रगति के प्रतीक भी बन जाते
ओढ़े बैठे हैं जो धर्म की किताबों की चादर
उनको अंधविश्वासी बताकर जमाने से दूर हम हटाते
हमने जब भी बिताई अपनी शाम
कविता और साहित्य के नाम छलकाये
बस! इसी तरह जाम
कभी नहीं रखा धर्म से वास्ता
जाम से सराबोर नैतिकता का बनाया अपना ही रास्ता
ऐसे ही नहीं इतिहास में नाम दर्ज कराया।’

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hindi poem, hindi sher, shayri, vyangya kavita, मनोरंजन, शायरी, शेर, संदेश, हिंदी साहित्य

Tuesday, August 25, 2009

मजहब और बदलाव-हिंदी व्यंग्य कविता (dharm aur badlav-hindi shayri

बूढ़ी इमारतों की तरह खड़े हैं
उन्हें ढहाना जरूरी
लगता है
पर नया मजहब मत बनाओ।


प्यार और दया तो  इंसानी खून में होते हैं
तुम
अपने लफ्ज और लकीरें खींचकर
कोई नया पैगाम न लाओ।


भूख और प्यास कुदरत का
दिया तोहफा है
जो
इंसान को दुनियां घुमाता है
तुम उसे अपने कागज पर
तकलीफों की तरह न
सजाओ।


जरुरतों के गुलामों की जंजीरों को
सर्वशक्तिमान
नहीं तोड़ सकता
तुम भी ऐसा दावा न जताओ।


दूसरों से उधार लेकर सोच
तुम अपने ख्यालों के
चिराग जला रहे हो
जिंदगी एक बहता दरिया है
जिस पर कोई काबू नहीं कर
सकता
रास्ते बदल सको जमाने के
तुम अपनी ताकत ऐसी न बताओ।


गुस्से को सजाकर शायरी में सजाकर
वाह वाही
बटोरने वालों
जोश से कभी जिंदगी नहीं बदलती
भले ही दिल में बदलाव की चाहत
मचलती
नया मजहब लाकर
कोई दूसरा पैगाम सजाकर
दुनियां में बदला का ख्याल
अच्छा लगता है
पर हर सोच पर झगड़ा बढ़ता  है
जिदंगी को अपनी राह पर
अपनी गति
से चलने दो
सिखाओ लोगों को आंख से देखना
कान से सुनना
दिमाग से
सोचना
वरना तो सामने बैठे जो बैठे है
कुदरत के ऐसे बुत हैं
जो केवल वाह
वाही कर सकते हैं
या बजा सकते हैं तालियां
कुछ दे सकते हैं गालियां
पर
उनसे बदलाव की उम्मीद न लगाओ।
...........................



 


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Sunday, August 2, 2009

शिकायतों का पुलिंदा-हिंदी मुक्त कविता (shikayat ka pulinda-hindi mukt kavita)

यादों में जो बसता है
उसका नाम जुबां से बयां कहां होता है।

दिलबर नजर से हो कितना भी दूर
उसके पास होने का हमेशा अहसास होता है

आंखों में बसा दिखता है यह पूरा जमाना
पर ख्याल में जो बसा, वही दिल के पास होता है।
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तंगदिल साथी के साथ
जिंदगी का यह सफर
तन्हाई में गुजरता जाता है।

शिकायतों का पुलिंदा ढोते हैं साथ
उम्मीद नहीं है, चाहे पास है उसका हाथ
शिकायतों का बोझ दिल में लिये
कारवां राह पर, खामोशी से गुजरता जाता है।

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