Sunday, April 5, 2009

बादशाह बनने की चाहत-हिंदी शायरी (hindi shayri)

हीरे जवाहरात और रत्नों से सजा सिंहासन
और संगमरमर का महल देखकर
बादशाह बनने की चाहत मन में चली ही आती है।
पर जमीन पर बिछी चटाई के आसन
कोई क्या कम होता है
जिस पर बैठकर चैन की बंसी
बजाई जाती है।

देखने का अपना नजरिया है
चलने का अपना अपना अंदाज
पसीने में नहाकर भी मजे लेते रहते कुछ लोग
वह बैचेनी की कैद में टहलते हैं
जिनको मिला है राज
संतोष सबसे बड़ा धन है
यह बात किसी किसी को समझ में आती है।
लोहे, पत्थर और रंगीन कागज की मुद्रा में
अपने अरमान ढूंढने निकले आदमी को
उसकी ख्वाहिश ही बेचैन बनाती है।

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Wednesday, April 1, 2009

अप्रैल फूल की बधाई-लघु हास्य व्यंग्य

आज अप्रैल फूल दिवस है। यह भी पश्चिम से आयातित एक विचार है कि अप्रैल के पहले दिन एक दूसरे को मूर्ख बनाया जाये-इसी कारण लोग एक दूसरे का मजाक उड़ाते हैं। वैलंेटाइन डे, फ्रैंड्स डे, प्रेम दिवस और न जाने कौन कौन से दिवस यहां भारत में मनाये जाते हैं। कुछ दिवस तो इतने गंभीर होते हैं कि लोग उस दिन गहरे चिंतन और चिंतायें व्यक्त करते हैं। नारी,पुरुष,बालक,वृद्ध और न जाने कौनसे वर्गों के लिये अनेक प्रस्ताव और विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। मगर व्यंग्यकारों की आदत होती है हर विषय में अपने व्यंग्य प्रस्तुत करना। इसलिये हम भी बेतुकी हास्य कवितायें या व्यंग्य लिख देते हैं भले ही उनमें गंभीरता का भाव दिखाने के लिये डाल देते हैं ताकि लोगों को यह न लगे कि यह हर विषय को मजाक समझता है।
अन्य दिवसों की तरह अप्रैल फूल दिवस भी हमें नहीं जमता पर इसमें कहीं न कहीं मजाक का पुट लगता है इसलिये सोचा कि इस पर कुछ लिखा जाये। क्या लिखा जाये? तब हमने सोचा कि बाकी सभी लोग अन्य दिवस पर एक दूसरे को बधाई देते हैं-जैसे मित्रता दिवस, शुभेच्छू दिवस, प्रेम दिवस आदि-और हम मजाक बनाते हैं। आज मजाक का दिन है इसलिये थोड़ा गंभीर हो जायें। इसलिये सभी सहृदय मित्रों पाठकों और सम्मानीय लोगों को अप्रैल फूल की बधाई! वह इसी तरह पूरे साल हंसते रहे जैसे कि आज हंस रहे हैं। पूरे साल उनको ऐसे आइडिया मिलते रहे हैं कि उनके दिलो दिमाग में प्रसन्नता का भाव रहे।
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Monday, March 23, 2009

व्यंग्य सामग्री के लिये आड़ की क्या जरूरत-आलेख

यह कोई आग्रह नहीं है यह कोई चेतावनी भी नहीं है। यह कोई फतवा भी नहीं है और न ही यह अपने विचार को किसी पर लादने का प्रयास है। यह एक सामान्य चर्चा है और इसे पढ़कर इतना चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। हां, अगर मस्तिष्क में अगर चिंतन के तंतु हों तो उनको सक्रिय किया जा सकता है। किसी भी लेखक को किसी धर्म से प्रतिबद्ध नहीं होना चाहिये पर उसे इस कारण यह छूट भी नहीं लेना चाहिये कि वह अपने ही धार्मिक पुस्तकों या प्रतीकों की आड़ में व्यंग्य सामग्री (गद्य,पद्य और रेखाचित्र) की रचना कर वाह वाही लूटने का विचार करे।
यह विचित्र बात है कि जो लोग अपनी संस्कृति और संस्कार से प्रतिबद्धता जताते हैंे वही ऐसी व्यंग्य सामग्रियों के साथ संबद्ध(अंतर्जाल पर लेखक और टिप्पणीकार के रूप में) हो जाते हैं जो उनके धार्मिक प्रतीकों के केंद्र बिंदु में होती है।
यह लेखक योगसाधक होने के साथ श्रीगीता का अध्ययनकर्ता भी है-इसका आशय कोई सिद्ध होना नहीं है। श्रीगीता और भगवान श्रीकृष्ण की आड़ लेकर रची गयी व्यंग्य सामग्री देखकर हमें कोई पीड़ा नहीं हुई न मन विचलित हुआ। अगर अपनी इष्ट पुस्तक और देवता के आड़ लेकर रची गयी व्यंग्य सामग्री देखकर परेशानी नहीं हुई तो उसका श्रेय भी उनके संदेशों की प्रेरणा को ही जाता है।
यह कोई आक्षेप नहीं है। हम यहां यह चर्चा इसलिये कर रहे हैं कि कम से कम अंतर्जाल पर सक्रिय लेखक इससे बाहर चल रही पुरानी परंपरागत शैली से हटकर नहीं लिखेंगे तो यहां उनकी कोई पूछ परख नहीं होने वाली है। अंतर्जाल से पूर्व के लेखकों ने यही किया और प्रसिद्धि भी बहुत पायी पर आज भी उन्हें इस बात के लिये फिक्रमंद देखा जा सकता है कि वह कहीं गुमनामी के अंधेरे में न खो जायें।
स्वतंत्रता से पूर्व ही भारत के हिंदी लेखकों का एक वर्ग सक्रिय हो गया था जो भारतीय अध्यात्म की पुस्तकों को पढ़ न पाने के कारण उसमें स्थित संदेशों को नहीं समझ पाया इसलिये उसने विदेशों से विचारधारायें उधार ली और यह साबित करने का प्रयास किया कि वह आधुनिक भारत बनाना चाहते हैं। उन्होंने अपने को विकासवादी कहा तो उनके सामने खड़े हुए परंपरावादियों ने अपना मोर्चा जमाया यह कहकर कि वह अपनी संस्कृति और संस्कारों के पोषक हैं। यह लोग भी कर्मकांडों से आगे का ज्ञान नहीं जानते थे। बहरहाल इन्हीं दो वर्गों में प्रतिबद्ध ढंग से लिखकर ही लोगों ने नाम कमाया बाकी तो संघर्ष करते रहे। अब अंतर्जाल पर यह अवसर मिला है कि विचाराधाराओं से हटकर लिखें और अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचायें।
पर यह क्या? अगर विदेशी विचाराधाराओं के प्रवर्तक लेखक भगवान श्रीकृष्ण या श्रीगीता की आड़ में व्यंग्य लिखें तो समझा जा सकता है और उस पर उत्तेजित होने की जरूरत नहीं है। निष्काम कर्म, निष्प्रयोजन दया और ज्ञान-विज्ञान में अभिरुचि रखने का संदेश देने वाली श्रीगीता का नितांत श्रद्धापूर्वक अध्ययन किया जाये तो वह इतना दृढ़ बना देती है कि आप उसकी मजाक उड़ाने पर भी विचलित नहीं होंगे बल्कि ऐसा करने वाले पर तरस खायेंगे।
अगर श्रीगीता और भगवान श्रीकृष्ण में विश्वास करने वाले होते तो कोई बात नहीं पर ऐसा करने वाले कुछ लेखक विकासवादी विचाराधारा के नहीं लगे इसलिये यह लिखना पड़ रहा है कि अगर ऐसे ही व्यंग्य कोई अन्य व्यक्ति करता तो क्या वह सहन कर जाते? नहीं! तब वह यही कहते कि हमारे प्रतीकों का मजाक उड़ाकर हमारा अपमान किया जा रहा है। यकीनन श्रीगीता में उनकी श्रद्धा होगी और कुछ सुना होगा तो कुछ ज्ञान भी होगा मगर उसे धारण किया कि पता नहीं। श्रीगीता का ज्ञान धारण करने वाला कभी उत्तेजित नहीं होता और न ही कभी अपनी साहित्य रचनाओं के लिये उनकी आड़ लेता है।
सच बात तो यह है कि पिछले कुछ दिनों से योगसाधना और श्रीगीता की आड़ लेकर अनेक जगह व्यंग्य सामग्री देखने,पढ़ने और सुनने को मिल रही है। एक पत्रिका में तो योगसाधना को लेकर ऐसा व्यंग्य किया गया था जिसमें केवल आशंकायें ही अधिक थी। ऐसी रचनायें देखकर तो यही कहा जा सकता है कि योगसाधना और व्यंग्य पर वही लोग लिख रहे हैं जिन्होंने स्वयं न तो अध्ययन किया है और न उसे समझा है। टीवी पर अनेक दृश्यों में योगसाधना पर व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति देखकर इस बात का आभास तो हो गया है कि यहां गंभीर लेखन की मांग नहीं बल्कि चाटुकारिता की चाहत है। लोगों को योग साधना करते हुए हादसे में हुई एक दो मौत की चर्चा करना तो याद रहता है पर अस्पतालों में रोज सैंकड़ों लोग इलाज के दौरान मरते हैं उसकी याद नहीं आती।
देह को स्वस्थ रखने के लिये योगसाधना करना आवश्यक है पर जीवन शांति और प्रसन्नता से गुजारने के लिये श्रीगीता का ज्ञान भी बहुत महत्वपूर्ण है। इस धरती पर मनुष्य के चलने के लिये दो ही रास्ते हैं। मनुष्य को चलाता है उसका मन और वह श्रीगीता के सत्य मार्ग पर चलेगा या दूसरे माया के पथ पर। दोनों ही रास्तों का अपना महत्व है। मगर आजकल एक तीसरा पथ भी दिखता है वह दोनों से अलग है। माया के रास्ते पर चले रहे हैं पर वह उस विशाल रूप में साथ नहीं होती जो वह मायावी कहला सकें। तब बीच बीच में श्रीगीता या रामायण का गुणगान कर अनेक लोग अपने मन को तसल्ली देते हैं कि हम धर्म तो कर ही रहे हैं। यह स्थिति तीसरे मार्ग पर चलने वालों की है जिसे कहा जा सकता है कि न धन साथ है न धर्म।
अगर आप व्यंग्य सामग्री लिखने की मौलिक क्षमता रखते हैं तो फिर प्राचीन धर्म ग्रंथों या देवताओं की आड़ लेना कायरता है। अगर हमें किसी पर व्यंग्य रचना करनी है तो कोई भी पात्र गढ़ा जा सकता है उसके लिये पवित्र पुस्तकों और भगवान के स्वरूपों की आड़ लेने का आशय यह है कि आपकी सोच की सीमित क्षमतायें है। जो मौलिक लेखक हैं वह अध्यात्म पर भी खूब लिखते हैं तो साहित्य व्यंग्य रचनायें भी उनके हाथ से निकल कर आती हैं पर कभी भी वह इधर उधर से बात को नहीं मिलाते। अगर किसी अध्यात्म पुरुष पर लिखते हैं फिर उसे कभी अपने व्यंग्य में नहीं लाते।
अरे इतने सारे पात्र व्यंग्य के लिये बिखरे पड़े हैं। जरूरी नहीं है कि किसी का नाम दें। अगर आप चाहें तो रोज एक व्यंग्य लिख सकते हैं इसके लिये पवित्र पुस्तकों यह देवताओं के नाम की आड़ लेने की क्या आवश्यकता है? वैसे भी जब अब किसी का नाम लेकर रचना करते हैं और वह सीधे उसकी तरफ इंगित होती है तो वह व्यंजना विधा नहीं है इसलिये व्यंग्य तो हो ही नहीं सकती।
यह पाठ किसी प्रकार का विवाद करने के लिये नहीं लिखा गया है। हम तो यह कहते हैं कि दूसरा अगर हमारी पुस्तकों या देवताओं की मजाक उड़ाता है तो उस पर चर्चा ही नहीं करो। यहां यह भी बता दें कुछ लोग ऐसे है जो जानबूझकर अपने आपको धार्मिक प्रदर्शित करने के लिये अपने ही देवताओं और पुस्तकों पर रची गयी विवादास्पद सामग्री को सामने लाते हैं ताकि अपने आपको धार्मिक प्रदर्शित कर सकें। उनकी उपेक्षा कर दो। ऐसा लगता है कि कुछ लोग वाकई सात्विक प्रवृत्ति के हैं पर अनजाने में या उत्साह में ऐसी रचनायें कर जाते हैं। उनका यह समझाना भर है कि जब हम अपनी पवित्र पुस्तकों या देवताओं की आड़ में कोई व्यंग्य सामग्री लिखेंगे- भले ही उसमें उनके लिये कोई बुरा या मजाकिया शब्द नहीं है-तो फिर किसी ऐसे व्यक्ति को समझाइश कैसे दे सकते हैं जो बुराई और मजाक दोनों ही करता है। याद रहे समझाईश! विरोध नहीं क्योंकि ज्ञानी लोग या तो समझाते हैं या उपेक्षा कर देते हैं। यह भी समझाया अपने को जाता है गैर की तो उपेक्षा ही की जानी चाहिये। हालांकि जिन सामग्रियों को देखकर यह पाठ लिखा गया है उनमें श्रीगीता और भगवान श्रीकृष्ण के लिये कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं थी पर सवाल यह है कि वह व्यंग्यात्मक सामग्रियों में उनका नाम लिखने की आवश्यकता क्या है? साथ ही यह भी कि अगर कोई इस विचार से असहमत है तो भी उस पर कोई आक्षेप नहीं किया जाना चाहिये। सबकी अपनी मर्जी है और अपने रास्ते पर चलने से कोई किसी को नहीं रोक सकता, पर चर्चायें तो होती रहेंगी सो हमने भी कर ली।
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Wednesday, March 18, 2009

तभी अपने लिए उम्मीद कर पाओगे-हिंदी शायरी (apne liye ummid-hindi shayri)

अपने दिल के घाव छिपाना, नहीं तो बहुत पछताओगे.
देख लिया किसी ने तो, ज़माने में बिचारे बन जाओगे.

अपने अन्दर बहते हुए आंसुओं पर खूब हंसना
किसी से हमदर्दी चाही तो खुद एक मजाक बन जाओगे.

पूरा ज़माना डूबा है गम में, ढूंढता है दूसरा ग़मगीन
देख लिया किसी ने दिल तुम्हारा, तो हंसी की शय बन जाओगे.

रोने से इन्सान के लड़ने की ताकत कम हो जाती है
मांस के बुतों का यह शहर है, कोई हमदर्द नहीं ढूंढ पाओगे.

दस्तूर हैं दूसरों की मदद का, पर निभाते हैं उसे कम लोग
पर तुम बाँटना दूसरों का दर्द, तभी अपने लिए उम्मीद कर पाओगे.

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Thursday, March 12, 2009

अपनी नजरों के दायरे में कैद-व्यंग्य कविता (hindi vyangya kavita)

रीढ़हीन हो तो भी चलेगा।
चरित्र कैसा हो भी
पर चित्र में चमकदार दिखाई दे
ऐसा चेहरा ही नायक की तरह ढलेगा।

शब्द ज्ञान की उपाधि होते हुए भी
नहीं जानता हो दिमाग से सोचना
तब भी वह जमाने के लिये
लड़ता हुआ नायक बनेगा।
कोई और लिखेगा संवाद
बस वह जुबान से बोलेगा
तुतलाता हो तो भी कोई बात नहीं
कोई दूसरा उसकी आवाज भरेगा।

बाजार के सौदागर खेलते हैं
दौलत के सहारे
चंद सिक्के खर्च कर
नायक और खलनायक खरीद
रोज नाटक सजा लेते हैं
खुली आंख से देखते है लोग
पर अक्ल पर पड़ जाता है
उनकी अदाओं से ऐसा पर्दा पड़ जाता
कि ख्वाब को भी सच समझ पचा लेते हैं
धरती पर देखें तो
सौदागर नकली मोती के लिये लपका देते हैं
आकाश की तरफ नजर डालें
तो कोई फरिश्ता टपका देते हैं
अपनी नजरों की दायरे में कैद
इंसान सोच देखने बाहर नहीं आता
बाजार में इसलिये लुट जाता
ख्वाबों का सच
ख्यालों की हकीकत
और फकीरों की नसीहत के सहारे
जो नजरों के आगे भी देखता है
वही इंसान से ग्राहक होने से बचेगा।

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entertainment, hindi, masti, mastram, poem, मनोरंजन, मस्त राम, मस्ती, समाज, हिंदी साहित्य

Tuesday, March 10, 2009

सभी को याद करना पर हमें भूल जाना-हिंदी कविता (holi par hamen bhool jana-hindi kavita)

होली के रंग खूब खेलना
पर हमारी तरफ नहीं ठेलना।
जमाने के रंग हर बार फीके होते देखे हैं
रंगीन चेहरों के भी तेवर तीखे देखे हैं
दिलो दिमाग मे जलती है आग
उसी से रौशन है हमारा चिराग
बुझ जायेगा, पानी की बूंदों में
रंग डालकर होली हमारे साथ मत खेलना ।

हमारा चेहरा उदास देखकर
उस पर कोई रंग पोतकर
चमक लाने की कोशिश बेकार होगी
जनम से ही चिंतन के रोगी
पैदा कर लेते हैं ख्यालों के रंग
बाहर के रंगों से
भला उन पर क्या रौनक होगी
खेलते हुए कम पड़ जायें तो
रंग हम से उधार ले लेना।

आदत हो गयी है अपनी उदासियों के साथ जिंदा रहने की
अपने पीठ पीछे निंदा सहने की
अपनी बात कहना आया नहीं
दूसरे का कहा कभी भाया नहीं
पहले कितने भी चमके
पर बाद में फीके पड़े गये रंग
कितना भी खेला हो इंसान
पर बढ़ा नहीं उसकी सोच का दायरा
दिमाग रहा हमेशा तंग
प्यासे हैं बरसों के
एक दिन होली खेलने से मन नहीं भरेगा
प्यास बढ़ गयी अरमानों की तो
कौन उनको पूरा करेगा
बेरंग हो चुकी हमारी जिंदगी में
कोई रंग अब नहीं भरा जा सकता
अकेले में उदासी ही हमारा रंग है
तुम खुशनसीब हो जो भीड़ में
अपने लिये खुशियां तलाश लेते हो
दुआ है हमारी अधिक से अधिक सहेज लेना।

सभी को याद करना पर हमें भूल जाना
पसंद नहीं है किसी की यादों पर जाकर उसे सताना
खूब उड़ाना रंग और गुलाल
पर हमारी तरफ नहीं आना
बेरंग होती जा रही हमारी जिंदगी
में अपना पांव नहीं फंसाना
यकीन करो अकेले में
अपने उदासी के रंगों से खेलना
हमें बहुत भाता है
तुम डर जाओगे वह देखकर
इसलिये बीच बाजार होली हमें भुलाकर खेलना

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Saturday, February 28, 2009

नहीं बनी ऐसी कोई तराजू-हास्य व्यंग्य कविताएँ (nahin bani esi tarazu-hindi hasya vyangya kavitaen)

उनके कान खुले हैं
पर सुनते हैं कि नहीं कैसे बताएं
क्योंकि उनको सुनाया कई बार है दर्द अपना
पर कभी ऐसा नहीं हुआ कि वह कोई दवा लाएं
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इश्क तो असल अब वही है
जिसके नाम पर कोई उत्पाद
बाज़ार में बिकता है
औरत हो या मर्द
असल में जज्बातों खरीददार होता है बाज़ार में
भले ही माशूक और आशिक के तौर पर दिखता है
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शब्द बिके नहीं बाज़ार में
तो पढ़े भी नहीं जाते
बिकने लायक लिखें तो
समझने लायक नहीं रह जाते
शब्दों के सौदागरों बनते हैं हमदर्द
पर दिल में उनके जज़्बात कभी
पहुँच नहीं पाते
नहीं बनी कोई ऐसी तराजू
जिसमें शब्दों को तौल पाते
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Thursday, February 26, 2009

रंग भी अपना रंग बदलते हैं-हिंदी शायरी (rang bhee badalte hain-hindi poem)

आंखों से देखकर भी
विश्वास नहीं होता
कभी बनते हैं
कभी मिटते हैं
दृश्य तो पलपल बदलते हैं।
सामने से गुजरते हुए
जिंदा इंसान और सामान
अपने अस्तित्व का देते आभास
पर अगले पल नहीं होते पास
किसको यकीन दिलायें कि
यह हमने देखा था, वह नहीं
घूमते सूरज और चांद
जगह बदलती है यह धरती
जिनके होने का अहसास
सुखद अनुभूति देता है
वह भी मिट जाते हैं
जिनसे होता कष्ट
वह भी नष्ट हो जाते हैं
रंगरंगीली इस दुनियां में
रंग भी अपना रंग बदलते हैं
कुछ देर ठहर जायें सुनहरे पल
यह ख्वाहिश करना बेकार है
वह भी किसी के इशारे पर चलते हैं

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Tuesday, February 24, 2009

आजाद की तरह हर गुलाम बहस करेगा-हास्य व्यंग्य कविता (azad aur gulam-hindi hasya kavita)

फंदेबाज बोला
बहुत समय से सुनते आ रहे थे नाम
अब तो आया अपने यहां भी इनाम
बताओ यह ऑस्कर क्या होता हैं
जिसको याद कर अपनी फिल्मी दुनियां का आदमी
रात को भी नहीं सोता है
बरसों से प्रेम,पैसे और प्रतिष्ठा से
जिनको अपने सिर पर बैठा रखा
वही लोग अपने हाथ बाहर फैलाये रहते हैं
भीख की तरह इनाम मिले
इसके लिये हर तरह का ताना सहते हैं
गोरे जब तक न करें वाह
तब तक भरते रहते हैं आह
अब तो यह ऑस्कर आ गया
खुशी मना रहे हैं जमकर लोग
जैसे भाग गया हो कोई पुराना रोग
जरा तुम ही हमें समझाओ’

पहले सुनकर चैंके
फिर आंखों और नाक के बीच लटके चश्में से
झांकते हुए बोले दीपक बापू
‘जब पूरी तरह अपनी बात कह डाली
फिर हमसे क्या सुनना चाहते हो
खुद ही कर लिया करो कविता
हमारे हास्य रस में क्यों नहाते हो
जिन के सिर पर रखते हैं देश के लोग ताज
गुलामी की आदत कुछ ऐसी है उनमें
गोरे अगर नजर इनायत न करें तो
उस पर नहीं होता उनको नाज
इसलिये हाथ फैलाये खड़े हो जाते हैं
ऑस्कर का कार्यक्रम तो बाद में आता
यहां विज्ञापन से पहले ही पैसा वसूल हो जाता
गोरे भी आकर इंसान है
कभी तो उनका दिल जाता है पसीज
खाली हाथ लौटाने वालों की
नहीं सह सकता कोई भी खीज
गोरी चमड़ी का घमंड वह छोड़ नहीं सकते
इसलिये इनामों में भी अब
पुराने गुलामों को चालाकी से तो जोड़ सकते
इसलिये गोरे चेहरे से ही एक फिल्म बनवाई
उसमें अभिनय के लिये गुलामों की भीड़ लगाई
फिल्म के शीर्षक में भी ‘कुत्ता’ शब्द जोड़कर
बता दिया अपने लोगों को
नहीं जा रहे असलियत छोड़कर
अवार्ड डाला कि हड्डी कोई नहीं जानता
फूट डालो और राज करो की नीति में
गोरे हमेशा सफल रहे
इसलिये कोई अवार्ड को अपना
तो कोई पराया मानता
तुमने कहा तो हमने भी कह दिया
मगर बहस यहां बहुत होगी
नहीं तो विज्ञापन से कमाई कौन करेगा
उसकी कमाई मरेगी जो इसे अवार्ड नहीं कहेगा
जिसको कुछ नहीं मिलना वह हड्डी कहेगा
देखते रहो दृष्टा बनकर
आजाद की तरह हर गुलाम बहस करेगा
तुम तो बस ताली बजाओ
नहीं तो महफिल ही छोड़ जाओ

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Friday, February 20, 2009

ऐसा वैसा पढ़ने की चाहत-आलेख

‘आपके लिखने की शैली दीपक भारतदीप से एकदम मिलती जुलती है’-हिंदी के ब्लाग एक ही जगह दिखाने वाले वेबसाईट संचालक ने यह बात मुझे तब लिखी जब मैंने अपने छद्म नाम के दूसरे ब्लाग को अपने यहां दिखाने का आग्रह किया। इस बात ने मुझे स्तब्ध कर दिया। इसका सीधा आशय यह था कि मेरे लिये यहां छद्म नाम से लिखने का अवसर नहीं था। दूसरा यह कि उस समय तक मैं इतना लिख चुका था कि अधिकतर ब्लाग लेखक मेरी शैली से अवगत हो चुके थे। छद्म नाम के उस ब्लाग पर मैंने महीनों से नहीं लिखा पर ब्लाग स्पाट पर वह मेरा सबसे हिट ब्लाग है। सुबह योगसाधना से पहले कभी कभी ख्याल आता है तो मैं अपने ब्लाग के व्यूज को देखता हूं। रात 10 बजे से 6 बजे के बीच उन्हीं दो ब्लाग पर ही पाठक आने के संकेत होते हैं बाकी पर शून्य टंगा होता है। अपने लिखने पर मैं कभी आत्ममुग्ध नहीं होता पर इतना अनुभव जरूर हो गया है कि कुछ लोग ऐसे हैं जो मुझे पढ़ने से चूक नहीं सकते। यही कारण है कि छद्म ब्लाग पर लिखना करीब करीब छोड़ दिया क्योंकि वहां मेरे परिचय का प्रतिबिंब मुझे नहीं दिखाई देता-आर्थिक लाभ तो खैर होना संभव ही नहीं है।

मुझे याद है कि मैंने यह ब्लाग केवल बेकार के विषयों पर लिखने के लिये बनाया था। इस ब्लाग पर पहली रचना के साथ ही यह टिप्पणी मिली थी कि ‘हम तो इसे ऐसा वैसा ब्लाग समझ रहे थे पर आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं।’
उस समय इस टिप्पणी पर लिखी बात मेरे समझ में नहीं आयी पर धीरे धीरे यह पता लग गया कि ब्लाग नाम लोकप्रियता के शिखर से जुड़ा था।
उस दिन अखबार में पढ़ा हिंदी भाषी क्षेत्रों मेें 4.2 करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं। इस लिहाज से हिंदी में सात्विक विषयों के ब्लाग पढ़ने की संख्या बहुत कम है। ऐसा नहीं है कि हिंदी के ब्लाग लोग पढ़ नहीं रहे पर उनको तलाश रहती है ‘ऐसा वैसा’ पढ़ने की। जिन छद्म ब्लाग की बात मैंने की उन पर ऐसा वैसा कुछ नहीं है पर वह उनके नाम में से तो यही संकेत मिलता है। यही कारण है कि लोग उसे खोलकर देखते हैं। मैंने उन ब्लाग पर अपने सामान्य ब्लाग के लिंक लगा दिये हैं पर लोग उनके विषयों में दिलचस्पी नहीं लेते क्योंकि वहां से पाठक दूसरे विषयों की तरफ जाते ही नहीं जबकि दूसरे सामान्य ब्लाग पर इधर से उधर पाठकों का आना जाना दिखता है। मैंने उन दोनों ब्लाग से तौबा कर ली क्योंकि उन पर लिखना बेकार की मेहनत थी। न नाम मिलना न नामा।
वर्डप्रेस पर भी दो ब्लाग है जिन पर मैंने अपने नाम के साथ मस्तराम शब्द जोड़ दिया। तब दोनों ब्लाग अच्छे खासे पाठक जुटाने लगे। तब एक से हटा लिया और उस पर पाठक संख्या कम हो गयी पर दूसरे पर बना रहा। वह ब्लाग भी प्रतिदिन अच्छे खासे पाठक जुटा लेता है। तब यह देखकर आश्चर्य होता है कि लोग ‘ऐसा वैसा’ पढ़ने को बहुत उत्सुक हैं और उनकी दिलचस्पी सामान्य विषयों में अधिक नहीं हैं। अभी हाल ही में एक सर्वे में यह बात कही गयी है कि इंटरनेट पर यौन संबंधी साहित्य पढ़ना अधिक घातक होता है बनिस्बत सामान्य स्थिति में। एक तो यौन संबंधी साहित्य वैसे ही दिमागी तौर पर तनाव पैदा करता है उस पर कंप्यूटर पर पढ़ना तो बहुत तकलीफदेह होता है। इस संबंध में हानियों के बारे में खूब लिखा गया था और उनसे असहमत होना कठिन था।
उन ब्लाग की पाठक संख्या अन्य ब्लाग की संख्या को चिढ़ाती है और अपने ब्लाग होने के बावजूद मुझे उन ब्लाग से बेहद चिढ़ है। वह मुझे बताते हैं कि मेरे अन्य विषयों की तुलना में तो यौन संबंधी विषय ही बेहद लोकप्रिय है। सच बात तो यह है कि पहले जानता ही नहीं था कि मस्तराम नाम से कोई ऐसा वैसा साहित्य लिखा जाता है। मेरी नानी मुझे मस्तराम कहती थी इसलिये ही अपने नाम के साथ मस्तराम जोड़ दिया। इतना ही नहीं अपने एक दो सामान्य ब्लाग पर पाठ लिखने के एक दिन बाद-ताकि विभिन्न फोरमों पर तत्काल लोग न देख पायें’-मस्तराम शब्द जोड़कर दस दिन तक फिर कुछ नहीं लिखा तो पता लगा कि उस पर भी पाठक आ रहे हैं। तब बरबस हंसी आ जाती है। अनेक मिलने वाले ऐसी वैसी वेबसाईटों के बारे में पूछते हैंं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों के इंटरनेट कनेक्शन लेने वाले शायद इस उद्देश्य से लेते हैं कि ‘ऐसा वैसा’ पढ़े और देख सकें।

उस दिन एक जगह अपने कागज की फोटो स्टेट कराने गया। वह दुकानदार साइबर कैफे भी चलाता है। उस दिन वह अपने बिल्कुल अंदर के कमरे में था तो मैं इंटरनेट के केबिनों के बीच से होता हुआ वहां तक गया। धीरे धीरे चलते हुए मैं काचों से केबिन में झांकता गया। आठ केबिन में छह को देख पाया और उनमें तीन पर मैंने लोगों को ‘ऐसे वैसे‘ ही दृश्य देखते पाया और बाकी क्या पढ़ रहे थे यह जानने का अवसर मेरे पास नहीं था।

सामान्य रूप से भी यौन संबंधी मनोरंजन साहित्य और सीडी कैसिट उपलब्ध हैं पर इंटरनेट भी एक फैशन हो गया है सो लोग सक्रिय हैं पर उनकी मानसिकता में भी एसा वैसा ही देखने और पढ़ने की इच्छा है। यह कोई शिकायत नहीं है क्योंकि लोगों की ‘यौन संबंधी मनोरंजन साहित्य’ पढ़ने की इच्छा बरसों पुरानी है पर सात्विक साहित्य पढ़ने वालों की भी कोई कमी नहीं है-यह अलग बात है कि वह अभी समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों को ही देखने में सक्रिय हैं और इंटरनेट पर देखने और पढ़ने की उनमें इच्छा अभी बलवती नहीं हो रही है। जिनमें ऐसा वैसा पढ़ने की इच्छा होती है उनके लिये इंटरनेट खोलने की तकलीफ कुछ भी नहीं है पर सात्विक पढ़ने वालों के लिये अभी भी बड़ी है। कहते हैं कि व्यसन और बुरी आदतें आदमी का आक्रामक बना देती हैं पर सात्विक भाव में तो सहजता बनी रहती है।
ऐसा नहीं है कि सामान्य ब्लाग@पत्रिकाओं पर पाठक कोई कम हैं पर उनमें बढ़ोतरी अब नहीं हो रही है। ब्लागस्पाट के ब्लाग तो वैसे ही अधिक पाठक नहीं जुटाते पर वर्डप्रेस के ब्लाग पर नियमित रूप से उनकी संख्या ठीकठाक रहती है। सामान्य विषयों में भी अध्यात्म विषयों के साथ हास्यकवितायें, व्यंग्य और चिंतन के पाठकों की संख्या अच्छी खासी है-कुछ पाठ तो दो वर्ष बाद भी अपने लिये पाठक जुटा रहे हैं। यह कहना भी कठिन है कि ऐसा वैसा पढ़ने वालों की संख्या अधिक है या सात्विक विषय पढ़ने वालों की। इतना जरूर है कि ‘ऐसा वैसा’ पढ़ने पर जो हानियां होती हैं उनके बारे में पढ़कर उन लोगों के प्रति सहानुभूति जाग उठी जो उसमें दिलचस्पी लेते हैं।
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Monday, February 9, 2009

अपनी ऑंखें तो फेर सकते हैं-व्यंग्य आलेख (ankhen to fer sakte hain-hindi satire)

हम कपड़े क्यों पहनते हैं? इसके चार जवाब हो सकते हैं
1.सभी कपड़े पहनकर घूमते हैं।
2.हम बिना कपड़े पहने बाहर निकलेंगे तो लोगों की नजरें हम केंद्रित हो जायेंगी और हमें शर्म आ जायेगी।
3.हम कपड़े पहनकर नहंी निकलेंगे तो लोगों को शर्म आयेगी।
4.हमारा शरीर इसका आदी हो गया है और अगर हम उसे नहीं पहनेंगे तो शरीर को गमी या सदी लग जायेगी।
इनमें से कोई एक या सारे उत्तर सही हो सकते हैं। प्राचीन इतिहास से पता चलता है कि पहले लोग कपड़े नहीं पहनते थे। आदमी पहले बंदर की तरह ही था जिसकी देह पर बड़े बड़े बाल हुआ करते थे। समय के साथ वह कपड़े पहनने लगा तो धीरे धीरे उसकी देह के यह बाल छोटे होते गये। आदमी को कभी पूंछ भी हुआ करती थी जो पायजामा या धोती पहने छोटी होते हुए लुप्त हो गयी । पूंछ के लुप्त होते होते आदमी नैतिकता का लबादा ओढ़ता चला गया। नैतिकता एक फैशन की तरह है। किसी के लिये एक वस्तु या काम बुरा हो सकता है तो दूसरे के लिये अच्छा। सभी कहते हैं कि रिश्वत लेना पाप है जिसको अवसर मिलता है वह लेता है तब वह उसके लिये एक अधिकार होता है। रिश्वत देने वाला आधिकारिक मूल्य के रूप में देता है और लेना वाला कमीशन के रूप में लेता है। तब न देने वाला कहता है कि ‘आपको रिश्वत दे रहा हूं’ और न लेने वाला सोचता है कि रिश्वत ले रहा हूं।’

यही हाल है विवाह पूर्व और विवाहेत्तर प्रेम संबंधों का भी है। सभी लड़के चाहते है कि उनके पास एक ‘गर्लफ्रैंड’ हो ताकि मित्रों पर रुतवा जता सकें। जिसको प्रणय संबंध मिल गया वह लड़की को प्रेयसी कहता है अगर कोई लड़का उससे नाराज होता है तो लड़के के लिये कहता है‘फटकीबाज’ और लड़की को चालू कहता है। विवाहेत्तर संबंधों का भी यही हाल है। जो धनी मानी लोग हैं उनके लिये ऐसे संबंध बनाना कोई मुश्किल काम नहीं होता। ऐसे विवाहेत्तर संबंधों को लोग ‘हाई सोसायटी का ट्रैंड’ कहते हैं। भारतीय समाज की अपनी गति है और वह यहां संस्कार फैशन की तरह बनते और बिगड़ते है तो संस्कृति भी निर्मित और ध्वस्त होती है।

ऐसे में जिन लोगों को नये संस्कार दिल को अच्छे लगते हैं वह उसे अपना लेते हैं-जैसे शराब पीना,जुआ खेलना और विवाहपूर्व शारीरिक संबंध बनाना और विवाहेत्तर संबंधों का निर्माण करना। जिनको आंखों का सुख लेना है उनको स्त्रियों का आधुनिक कपड़े पहनना बुरा नहीं लगता। कुछ लोग ऐसे हैं जिनको अच्छा नहीं लगता वह आंखें फेर लेते हैं क्योंकि अपने देह पर कौन कैसे कपड़े पहन रहा है किसके साथ घूम रहा है यह उसका निजी मसला है। अपना मसला तो अपनी आंखें हैं उनको ही फेरा जा सकता है। ऐसे में कुछ लोग ऐसे भी है जो सुखद दृश्यों को सहन नहीं कर पाते तो वह उनको मिटाना चाहते हैं। दरअसल उनको समाज पर नियंत्रण करने की अपनी शक्ति का भ्रम होता है।
नैतिकता एक बहुत बड़ा भ्रम है। एक विचार या पहनावा किसी के लिये बहुत अच्छा है दूसरे के लिये बुरा है। संस्कार और संस्कृति व्यक्ति के निजी आचरण का प्रतीक होता है और वह उसके परिवार, समाज और घरेलू आर्थिक स्थिति के अनुसार निर्धारित होता है। इस देश में कुछ जातीय समाज ऐसे हैं जहां औरतें बीड़ी और शराब पीतीं हैं। आप उनके शराब पीने को अनैतिकता नहीं कहा सकते। अब अगर कुछ अमीर और धनी परिवार की स्त्रियां शराब पी रहीं हैं तो उन्हेेंं हाई सोसायटी का ट्रैंड कहा जाता है। वह अपने आपको आधुनिक कहती हैं। ऐसे में अगर मध्यम वर्ग की कोई स्त्री पीती है तो उसे अनैतिकता कहा जाता है।

नैतिकता के मुख्य आधार कभी नहीं बदलते। किसी दूसरे को दुःख न देना, ईष्र्या और द्वेष से परे रहना और अवसर पड़े तो दूसरे की सहायता करना। यही संस्कार भी है और संस्कृति। इसके अलावा जो संस्कृति या संस्कार हैं वह कपड़े पहने और खानपान से संबंधित होते हैं। उसका सीधा आधार यही है कि जैसा करेगा वैसा भरेगा। फिर आखिर किस नैतिकता की बात लोग करते हैं। किस सस्कृति की रक्षा करते हैं और वह कौनसे संस्कार हैं जिनको वह जीवंत रखना चाहते हैं।
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Thursday, February 5, 2009

पसीना और प्रबंध-तीन व्यंग्य कवितायें

प्रबंध का मतलब उनको केवल
इतना ही समझ में आता है।
परिश्रमी के शरीर से निकले
पसीने का अमृत बना दें
अपने मालिक के लिये
बदले में डालें उस पर विष भरी दृष्टि
और मुफ्त में उसके काम पर गरियायें
हालांकि अवसर आने पर
पसीने का उचित दाम का
नारा लगाना भी उनको खूब आता है।
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इस देश में कुशल प्रबंधक
उसे ही कहा जाता है
जो मालिक की नजर में चढ़ जाता है
दूसरे के पसीने से सींचे हुए फूलों को
जो न्यौछावर कर दे
अपने मालिक के लिये
वही तरक्की की राह पाता है।
पसीने की बूंदों को भले ही
अमृत कहते हों सभी लोग
पर कुशल प्रबंधक वही कहलाता
जो उसमें शोषण का विष मिलाता है।

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पसीने का मूल्य
पूरी तरह नहीं चुकाओ
तभी कुशल प्रबंधक कहलाओगे
कुचलोगे नहीं जब तक किसी निरीह को
तब तक वीर नहीं कहलाओगे।
जमाने का उसूल है
अच्छा है या बुरा
करता है जीतने वालों को सलाम
पद दिल भी कोई चीज है
अपने ईमान से भटके तो
जीत कर भी पछताओगे।
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Sunday, February 1, 2009

इस खबर से सनसनी नहीं फैलेगी-हास्य व्यंग्य

अपने बास के आदेश पर टीवी कैमरामैन और संवाददाता कि सनसनीखेज खबर को ढूंढने लगे। वह अपनी कार में बैठे सड़कों पर इधर उधर घूम रहे थे। अचानक उन्होंने देखा कि एक आदमी पैदल चलते हुए सड़क पर बने एक गड़ढे में गिर गया। संवाददाता ने कार चालक को कार रोकने का इशारा किया और कैमरामैन से कहा-‘‘जल्दी उतरो। वह आदमी गड़ढे में गिर गया है।’’
कैमरामैने ने कहा-‘अरे सर! आप भूल रहे हो कि हमारा काम खबरें देना हैं न कि लोगों की मदद करना। कम से कम किसी गिरे को उठाने का काम तो हमारा बिल्कुल नहीं है।’
संवाददाता ने कहा-‘अरे, बीच सड़क पर गड्ढा बन गया है। उसमें आदमी गिर गया है। इस खबर से सनसनी फैल सकती है और नहीं फैलेगी तो गड्ढे की बदौलत हम उसे बना लेंगे। आदमी की मदद के लिये थोड़ी ही हम लोग चल रहे हैं।’
दोनों उतर पड़े। मगर तब तक वह आदमी वहां से उठ खड़ा हुआ और अपनी राह चलने लगा। संवाददाता उसके पास पहुंच गया और बोला-‘अरे, आप भी कमाल करते हैं। सड़क पर बने गड्ढे में गिर पड़े और बिना हल्ला मचाये चले जा रहे हैं। जरा रुकिये!’
उस आदमी ने कहा-‘भाई साहब, मुझे जल्दी जाना है। उधार वाले पीछे पड़े रहते हैं। अच्छा हुआ जल्दी उठ गया वरना अधिक देर लगाता तो हो सकता है कि यहां से कोई लेनदार गुजरता तो तकादा करने लग जाता।’
संवाददाता ने कहा-‘उसकी चिंता आप मत करिये। हम समाचार दिखाने वाले लोग हैं। किसी की हिम्मत नहीं है कि कोई हमारे कैमरे के सामने आपसे कर्जा मांग सके। आप वैसे ही इस गड्ढे में दोबारा गिर कर दिखाईये तो हम आपका फोटो टीवी पर दिखायेंगे। इससे गड्ढे के साथ आपका भी प्रचार होगा। आप देखना कल ही यह गड्ढा भर जायेगा।’
उस आदमी ने कहा-‘तो आप गड्ढे का ही फोटो खीच लीजिये न! कल अगर मेरा चेहरा लेनदारों को दिख गया तो उनको पता चलेगा कि मैं इसी शहर में हूं। अभी तो वह घर पर जाते हैं तो परिवार के सदस्य कह देते हैं कि बाहर गया है।’
संवाददाता ने कहा-‘कल तुम यहां की प्रसिद्ध हस्ती हो जाओगे किसी की हिम्मत नहीं है कि तुमसे कर्जा मांग सके। हो सकता है कि इतने प्रसिद्ध हो जाओ कि फिल्मों मेंं तुम्हें गड़ढे में गिरने वाले दृश्यों के लिये स्थाई अभिनेता मान लिया जाये।’
वह आदमी प्रसन्न हो गया। उसने गड्ढे में गिरने का अभिनय किया और इससे उसकी हथेली पहले से अधिक घिसट गयी और खरौंच के निशान बन गये। संवाददाता ने कैमरामैन को इशारा किया। इससे पहले वह फोटो खींचता कि संवाददाता का मोबाइल बज गया। उसने मोबाइल पर बात की और उसे तत्काल जेब में रखते हुए कैमरामैन से बोला-‘इसे छोड़ो। उधर एक सनसनीखेज खबर मिल गयी है। सर्वशक्तिमान की दरबार के बाहर एक चूहा मरा पाया गया है। अभी तक वहां कोई भी दृश्य समाचार टीम नहीं पहुंची है। इस खबर से सनसनी फैल सकती है।’

कैमरामैन ने- जो कि फोटो खींचने की तैयारी कर रहा था- संवाददाता के आदेश पर अपना कैमरा बंद कर दिया। संवाददाता और कैमरामैन दोनों वहां से चल दिये। पीछे से उस आदमी ने कहा-‘अरे, मरे चूहे से क्या सनसनी फैलेगी। तुम इस गड्ढे को देखो और फिर मेरी तरफ? मेरा हाथ छिल गया है? कितनी चोट लगी है।’
संवाददाता ने कहा-‘यह गड्ढा सड़क के एकदम किनारे है और तुम इधर उधर यह देखते हुए चल रहे थे कि कोई लेनदार देख तो नहीं रहा और गिर गये। इसलिये इस खबर से सनसनी नहीं फैलेगी। फिर पहले तो तुमको चोट नहीं आयी। टीवी पर दिखने की लालच पर तुम दूसरी बार गिरे। यह पोल भी कोई दृश्य समाचार देने वाला खोल सकता है। अब हमारे पास एक सनसनी खेज खबर आ गयी है इसलिये जोखिम उठाना बेकार है।
वह दोनों चले गये तो वह आदमी फिर उठकर खड़ा हुआ। यह दृश्य उसको रोज अखबार देने वाला हाकर देख रहा था। वह उसके पास आया और बोला-‘साहब, आप भी किसके चक्कर में पड़े गये और खालीपीली हाथ छिलवा बैठे।’
उस आदमी ने कहा-‘तुम अखबार में समाचार भी देते हो न! जाकर यह खबर दे देा कि दृश्य समाचार वालों के चक्कर में मेरी यह हालत हुई है। हो सकता है इससे प्रचार मिल जाये दूसरे दृश्य समाचार वाले मेरे से साक्षात्कार लेने आ जायें।’
हाकर ने कहा-‘साहब! मैं छोटा आदमी हूं। इन दृश्य समाचार वालों से बैर नहीं ले सकता। क्या पता कब अखबार की ऐजेंसी बंद हो जाये और हमें छोटे मोटे काम के लिये इनके यहां नौकरी के लिये जाना पड़े।’
वह आदमी अपने छिले हुए हाथ को देखता हुआ रुंआसे भाव से चला गया।
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Tuesday, January 27, 2009

लोगों में पैदा कर सकें खेद-हास्य कविता

नयी धोती, कुरता और टोपी पहनकर
बाहर जाने को तैयार हुए
कि आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू
अच्छा हुआ तैयार हुए मिल गये
समय बच जायेगा
चलो आज अपने भतीजे के पब के
उदघाटन कार्यक्रम में तुम्हें भी ले जाता।
वहां तुम्हें पांचवें नंबर का अतिथि बनाता।
किसी ने नहीं दिया होगा ऐसा सम्मान
जो मैं तुम्हें दिलाता
खाने के साथ जाम भी पिलाता’।

सुनकर क्रोध में भर गये
फिर लाल लाल आंखें करते हुए बोले
दीपक बापू
‘कमबख्त जब भी मेरे यहां आना
प्यार में हो या गुस्से में जरूर देना ताना
पब में पीने से
शराब का कोई अमृत नहीं बन जाता।
पीने वाला पीकर तामस
प्रवृत्ति का ही हो जाता ।
झगड़े पीने वाला शुरु करे या दूसरा कोई
बदनाम तो दोनों का नाम हो जाता।
शराब कोई अच्छी चीज नहीं
इसलिये घर में सभी को पीने में लज्जा आती
बाहर पियें दोस्तों के साथ महफिल में
तो कभी झगड़ों की खबर आती
शराब-खाने के नाम पर कान नहीं देंगे लोग
इसलिये पब के नाम से खबर दी आती
शराब का नाम नहीं होता
इसलिये वह सनसनी बन जाती
शराब पीने पर फसाद तो हो ही जाते हैं
शराब की बात कहें तो असर नहीं होता
इसलिये खाली पब के नाम खबर में दिये जाते हैं
पिटा आदमी शराबी है
इसे नहीं बताया जाता
क्योंकि उसके लिये जज्बात पैदा कर
सनसनी फैलाने के ख्वाब मिट जाते हैं
पब नाम रखा जाता है इसलिये कि
शराब का नाम देने में सभी शरमाते हैं
वहां हुए झगड़ों में भी
अब ढूंढने लगे जाति,धर्म,भाषा और लिंग के भेद
ताकि शराब पीकर पिटने वालों के लिये
लोगों में पैदा कर सकें खेद
रखो तुम अपने पास ही उदघाटन का सम्मान
कभी पब पर कुछ हुआ तो
हम भी हो जायेंगे बदनाम
वैसे भी हम नहीं पीते अब जाम
अंतर्जाल पर हास्य कवितायें लिखकर ही
कर लेते हैं नशा
हमें तो अपना कंप्यूटर ही पब नजर आता है

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Thursday, January 22, 2009

विचार और विषय को निर्बाध गति से बाहर आने दें-आलेख

हर लिखने वाले की रचना में साहित्य ढूंढना ठीक नहीं है। उसी तरह हर साहित्यकार में भाषा शिल्प की संभावना भी नगण्य रहती है। मुख्य बात है कि लिखने वाले दो तरह के होते हैं एक तो वह जो अपने मन और बुद्धि में आते जाते विचारों को अभिव्यक्ति देने के लिये लिखते हैं दूसरे वह जो भाषा और शिल्प की दृष्टि से भाषा में साहित्य में परिवृद्धि के लिये सृजन करते हैं। ऐसे में संभव है कि अभिव्यक्ति के भाव से लिखने वाला शिल्प की दृष्टि से कमजोर होते हुए भी अपनी बात पाठक तक पहुंचाने में सक्षम हो जाये और साहित्यकार को इसमें सफलता न मिले।
किसकी रचना साहित्यक है और किसकी नहीं इस पर हमेशा बहस होती है और भाषा शिल्प की दृष्टि से कमजोर रचनाओं पर उनका उपहास उड़ाया जाता है भले ही उन्होंने पढ़ने वाले पाठकों की संख्या अधिक हो। भाषा और शिल्प से सजी साहित्यक रचनाओं को पंसद करने वाले हमेशा ऐसी रचनाओं का मखौल उड़ाते हैं। ऐसे में अतंर्जाल पर लिखने वालों को शायद संकोच होता है कि कहीं उनका मजाक न उड़ाया जाये। उन्हें अब इस संकोच में से परे हो जाना चाहिये। सच बात तो यह है कि एक दूसरे को अपने से हेय प्रमाणित करने के लिये हिंदी लेखकों में हमेशा संघर्ष चलता रहा है।

भारत में हिंदी निरंतर बढ़ती रही है पर अभी तक बौद्धिक,आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से मजबूत लोगों का उस पर नियंत्रण रहा है और इसलिये ऐसे लेखकों को आगे नहीं आने दिया गया जिन्होंने शक्तिशाली लोगों कह चाटुकारिता नहीं की। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अंतर्जाल पर हिंदी के पढ़ने वाले कुछ लोग अभी भी उसी पुरानी मानसिकता के साथ जी रहे हैं। वह लोगों की श्रेणियां बनाने में लगे हैं और उसका कोई तार्किक आधार उनके पास नहीं दिखता और जो वह आधार प्रस्तुत करते हैं उस पर स्वयं ही खड़े हुए नहीं दिखते। कुछ लोग तो ऐसा प्रयास करते हुए दिखते हैं कि अंतर्जाल पर हिंदी भाषा की विकास यात्रा का टिकट उन्होंने कटवाया है और इसलिये उनका निर्णय बहुत महत्वपूर्ण है और वह जो कहते हैं उसी राह पर सब चलें। समाचार पत्र पत्रिकाओं में हिंदी ब्लाग के विषय पर प्रकाशित लेखों को पढ़ने से पता लगता है कि वह ब्लाग लेखकों को पुरानी राह पर चलने का ही संदेश इस आशय से दिया जा रहा जैसे कि लेखों के लेखक अंतर्जाल विद्या में पारंगत हों।

अंतर्जाल पर जो ब्लाग लेखक सक्रिय हैं उनको यह बात समझ लेना चाहिये कि वह जिस तरह अपने ब्लाग पर लिख रहे हैं उसका इस देश में अनेक लोगों को ज्ञान नहीं है। अधिकतर लोग पत्र पत्रिकाओं में पढ़ने के आदी हैं इसलिये वह यह अपेक्षा कर रहे हैं कि ब्लाग पर भी वैसा ही दिखे। यह संभव नहीं है। सच बात तो यह है अंतर्जाल पर भाषा और शिल्प की बजाय कथ्य और भाव महत्वपूर्ण हैं और जहां किसी ने अपने भावों को रोककर भाषा और शिल्प पर विचार किया वहां वह मूल विषय को ही भूल जायेगा। बहुत कम लेखक-या कहा जाये उंगलियों पर गिनती करने लायक-भाषा और शिल्प की दृष्टि से बेहतर साहित्य लिख सकते हैं और अंतर्जाल पर जिस तरह पढ़ने के लिये सीमित समय और जगह है वहां विषय और विचार का होना महत्वपूर्ण है।

अंतर्जाल पर कुछ मूर्धन्य ब्लाग लेखक बहुत अच्छी साहित्यक रचनायें प्रस्तुत कर रहे हैं वह बधाई के पात्र हैं पर उनको देखकर कोई कुंठा अपने अंदर लाने की आवश्यकता नहीं है। इस हिंदी ब्लाग जगत में ऐसे भी लोग हैं जो भाषा की शिल्प की दृष्टि से बहुत अच्छा नहीं लिखते पर उनके शब्द मन को छू लेने वाले होते हैं तो कई लोगों के विषय भी बहुत दिल्चस्प होते हैं। ऐसे में जो लोग अपने मन की बात यह सोचकर लिखने से कतराते हैं कि उनके उनके मस्तिष्क में बहुत अच्छे विचार और विषय अपना डेरा जमाये बैठें हैं पर भाषा और शिल्प की दृष्टि से प्रस्तुत करने की उनकी कोई योजना नहीं बन पा रही है तो उनको यह संकोच छोड़ देना चाहिये। भाषा के आकर्षक शब्द और शिल्प की दृष्टि से विचार करने का अर्थ यह होगा कि अपनी रचनाओं को तत्काल निर्बाध गति से बाहर आने से रोकना। हां, लिखते हुए सामान्य व्याकरण का ध्यान तो रखा जाना चाहिये और शब्द संयोजन पर भी अपनी पैनी दृष्टि रखें पर उतनी ही जिससे कि अपने विचार और विषय से ध्यान न भटके। जहां तक साहित्य का प्रश्न है तो आज भी यही शिकायत की जाती है कि लोग साहित्य कम बेहूदी और अश्लील रचनायें अधिक पसंद करते हैं। यह एक अलग मुद्दा है पर एक बात का संकेत तो मिलता है कि लोगों की दिलचस्पी केवल विषय और विचार के अभिव्यक्त भाव में है। ऐसे में सात्विक विषयों में ही रस और अलंकार भरे जायें तो बेहतर हैं। अंतर्जाल एक अलग मार्ग है पर बाहर की दुनियां को यह प्रभावित करेगा इसमें संदेह नहीं है। वैसे ही आजकल की व्यस्तम जिंदगी में लोगों के पास कम समय है और अधिकतर ब्लाग लेखक अव्यवसायिक हैं तब व्यवसायिक प्रकाशनों की तरह सजी संवरी साहित्यक रचनायें मिलना संभव नहीं है फिर पढ़ने वाले को भी कितना समय मिल पाता है यह भी एक विचार का विषय है। ऐसे में भी अंतर्जाल पर लिखने वाले जेा ब्लाग लेखक लिख रहे हैं उन्हें अपने मस्तिष्क में सक्रिय और विचार निर्बाध गति से बाहर आने देने का प्रयास करना चाहिये।
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Sunday, January 18, 2009

पर्दे पर रिश्ते पैसे लेकर बने होते हैं-हास्य कविता

बेटे ने पूछा मां से
‘मां टीवी पर धारवाहिकों में
सभी के दादा दादी तो बहुत जवान होते है।ं
सभी के बाल होते हैं काले
चेहरे होते हैं गोरे
हमेशा रहते वह सजे संवरे
पोतों को प्यार करने
दौड़ते है उनको गोदी में उठाने बहुत जल्दी
जब वह रोते हैं
अपने दादा दादी तो बस बीमार होकर सोते है।
उनके बाल भी हो गये सफेद
हमेशा पुराने कपड़े पहने रहते हैं।
प्यार करते हैं बहुत कम
कभी भी उनके उनके चेहरे
टीवी वाले दादा दादी जैसे नहीं होते हैं।

मां ने कहा-‘
बेटे! टीवी देखकर भूल जाया करो
वहां सब काल्पनिक दृश्य और
लोग नकली होते हैं
अभी तू दादा दादी के लिये कह रहा है
कल मां बाप के लिये भी यही कहेगा
क्योंकि वह भी कभी बूढ़े नहीं होते हैं
हमने पाया है एक दूसरे को जन्म से
पर्दे पर रिश्ते पैसे लेकर बने होते हैं
इसलिये सभी के चेहरे प्रफुल्ल होते है
जिंदगी की है कठिन डगर
उसे पर्द से कभी नहीं मिलाना
क्योंकि हम जी रहे हैं हकीकत में
पर्दे पर तो बस ख्वाब ही होते है।

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Wednesday, January 14, 2009

शर्तों पर आजादी-हिंदी शायरी

कितने भी बुरे लगे
कई रंगों में एक रंग तो
चुनना ही होगा
लोगों को आजादी दी है
इस शर्त के साथ
कि बेरंग उनको नहीं रहना होगा
..................................
साफ सुथरे पहने कपड़ों में लिपटे
सजे हैं खूबसूरत बुत
उनके चेहरों में ही
कोई अपना एक तय करना होगा।
किसी के दिल की नीयत पर
सवाल कभी नहीं करना
असत्य से सत्य की ओर जाने की
ख्वाहिश बहुत अच्छी है
पर बुरे भले का फैसला
आम इंसान को नहीं करना होगा।
दौलत और शौहरत के ढेर पर
खड़े हैं जो बुत बने
उनकी हर बात का समर्थन करना
पूरी आजादी है उनको
जो हांक सकते हैं जमाने को
अपनी दौलत और ताकत से
एक छोड़ जाये ठिकाना
तो दूसरे बुत को सहन करना होगा
बस आम इंसान को तो
भीड़ में शामिल भेड़ की तरह रहना होगा
शर्तों पर मिली आजादी को
अपने कंधों पर मूंह बंद रख वहन करना होगा

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Friday, January 9, 2009

आय और आयु का सवाल-व्यंग्य

उस 21 साल की अभिनेत्री ने एक 24 साल की अभिनेत्री के लिये कह दिया कि ‘वह मेरे जैसी कम उम्र की अभिनेत्रियों के लिये प्रेरणास्त्रोत हैै।’
भला इसमें बवाल मचने जैसे क्या बात है? मगर मचा क्योंकि एक स्+त्री दूसरे के मुकाबले अपने को कम उम्र का बताकर उसके दिल पर घाव दे रही है जो प्रेरणास्त्रोत बताने से भर नहीं जाता। टीवी चैनल वालों ने 24 साल की उस अभिनेत्री को बूढ़ी कहकर प्रचारित करना शुरू किया और फिर उससे प्रतिक्रिया लेने पहुंच गये। कई बार उस अभिनेत्री के लिये बूढ़ी बूढ़ी शब्द सुनकर हमें हैरानी हुई। वजह! इस समय उस बड़ी अभिनेत्री को भारत की सैक्सी अभिनेत्री कहा जाता है-इसका अर्थ हमें स्वयं भी नहीं मालुम- और नयी आयी छोटी अभिनेत्री भी कम प्रसिद्ध नहीं है। पहले दो क्रिकेट सितारों-इस खेल के लिये खिलाड़ी शब्द अब हल्का लगता है-और एक फिल्मी सितारे से उसके रोमांस के चर्चे बहुत हुए हैं। सवाल यह है कि 24 साल और 21 साल की युवती के बीच इस तरह का वार्तालाप वाकई तनाव का कारण हो हो सकता है?
जवाब है हां! कहते है कि आदमी की आय और औरत की आयु पर कभी उससे सवाल नही करना चाहिये। समझदार कहते हैं कि इशारों में एसी बात नहीं करना चाहिये। उससे उनमें गुस्सा उत्पन्न होता है। खैर, उस दिन दो लड़कों के बीच संवाद इस तरह जो दिलचस्प तो था ही साथ ही यह भी जाहिर करता है कि मनुष्य की मानसिकता कुछ ऐसी ही है कि वह कभी कभी किसी दूसरे के बारे में कोई फैसला उसके साथी की उम्र देखकर भी कर लेता है। भले ही वह दूसरा आदमी उमर का छोटा पर जब वह अपने से बड़ी आयु की संगत करता है तो पहला आदमी चाहे तो भी वह अपने मानसिक दृष्टिकोण को बदल नहीं सकता।
पहला लड़का-‘अरे, तेरी मनपसंद हीरोइन की फिल्म आयी है। चलेगा देखने?
दूसरा बोला-‘अरे, यार वह तो अब बूढ़ी लगने लगी है।’
पहला-‘क्या बेवकूफी की बात करता है वह तेरे से केवल पांच साल ही तो बड़ी है। आजकल यह सब चलता है।’
दूसरा बोला-‘नहीं यार, जब तक वह जवान हीरो के साथ उसका अफेयर था तब तब मुझे वह अच्छी लगती थी आजकल वह मेरे पिताजी के बराबर अभिनेता के बराबर से उसके अफेयर की चर्चा है इसलिये मेरा दिमाग बदल गया है।’
पहले वाले को जैसे ज्ञान प्राप्त हो गया और वह बोला-‘यार, बात तो सही कहते हो। मेरे दिमाग में ऐसी ही बात चल रही थी कि आखिर इतनी बड़ी उम्र का हीरो है और वह हीरोइन उसके साथ रोमांस कर रही है।’
कहीं से एक तीसरा लड़का भी आ गया था और बोला-‘उस हीरो को तो अधिक सिगरेट पीने के कारण दिल दौरा भी पड़ चुका है। एक बार मैंने टीवी पर सुना था।’
स्वाभाविक है यह 21 वर्ष की उस हीरोईन के दिमाग के भी बात स्वाभाविक रूप से आती हो क्योंकि 24 वर्ष की बड़ी हीरोईन का जिस हीरो के साथ कथित रूप से रोमांस है वह भी 43 से ऊपर का हो चुका है। ऐसे में उसकी गलती स्वाभाविक लगती है। कई बार टीवी पर होने वाले साक्षात्कारों में उस हीरो चेहरे पर झुर्रियां दिखाई भी दे जाती हैं। वैसे यह प्यार और शादी निजी विषय हैं और इन पर चर्चा करना ठीक नहीं है पर जब आप सार्वजनिक जीवन में और वह भी अपनी देह के सहारे अभिनेता और अभिनेत्रियों हों तो -फिल्मों से कला का कोई लेना देना लगता भी नहीं है-फिर उम्र और चेहरे की चर्चा के साथ दैहिक रिश्तों पर भी आम लोग दृष्टि डालते ही हैं। हीरोइने युवा लोगों के जज्बातों के कारण ही अपना स्थान बनाये हुये हैं पर उनके रोमांस की खबरों जब अधिक आयु वाले हीरो के साथ आती हैं तो लड़कों में भी उनके प्रति आकर्षण कम हो सकता है। वैसे दो तीन लड़कों की बात पर निष्कर्ष निकालना गलत भी लग सकता है।

मर्दों की आय का भी कुछ ऐसा ही मामला है। एक आदमी सरकारी नौकरी में था। उसकी नौकरी में उपरी आय का कोई चक्कर नहीं था। उसके माता पिता ने उसकी शादी होते ही अपना बड़ा मकान बेचकर छोटा मकान इस इरादे लिया कि छोटे बेटे को भी व्यापार करा देंगे। वैसे उसके पिताजी को यह भ्रम था कि बड़ी बहु कहीं मकान पर कब्जा कर हमें बाहर न निकाल दें। बड़े बेटे ने समझाया कि नौकरी कुछ पुरानी होने दो ताकि वेतन बढ़े तो वह भाई के लिये कुछ इंतजाम कर देगा पर वह नहीं माने। बहरहाल नौकरी वाला बेटा किराये के मकान में चला गया। उसकी पत्नी ने उसे ताना भी दिया कि‘देखो तुम्हारे माता पिता ने मेरे माता पिता के साथ धोखा किया।’

बहरहाल माता पिता का छोटा बेटा अपने व्यापार में घाटा उठाता गया तो उन्होंने वह मकान भी बेच दिया और किराये के मकान में आ गये। अब उनके रिश्तेदारी उनसे सवाल करने लगे कि यह क्या हुआ? बड़ा बेटा सामथर््यानुसार उनकी सहायता करता पर छोटे बेटे की नाकामी छिपाने के लिये आपने हाल के लिये वह बड़े बेटे और बहु को जिम्मेदारी बताते। बहु का हाल यह था कि वह अपने सास ससुर के साथ मुश्किल से दो महीने रही होगी पर अब हुआ यह कि वह अपने रिश्तेदारों के पास जाकर बड़े बेटे और बहु का रोना रोते रहते। रिश्तेदार बड़े बेटे को कहते। उसके रिश्तेदार यह समझते थे कि जब वह सरकारी नौकरी मेें है तो उपरी आय भी अच्छी होगी जबकि वह सूखी तनख्वाह में अपना घर चलाता था। रिश्तेदार व्यापारी धनी थे तो उसे कहते कि‘भई तेरी तन्ख्वाह कितनी है। उपरी कमाई तो होगी। अपने मां बाप की मदद किया कर बिचारे परेशान रहते हैं!’

बड़े बेटे को यह अपमानजनक लगता पर वह कर भी क्या सकता था? इधर पिता का देहावसान हुआ। फिर उसने किसी तरह अपने छोटे भाई की शादी भी करवाई पर अपने व्यसनों की वजह से उसकी नयी नवेली पत्नी भी उसको छोड़ गयी। इधर रिश्तेदारों के सवाल जवाब से वह चिढ़ता भी था। आखिर उसने एक दिन आकर एक बुजुर्ग रिश्तेदार को एक पारिवारिक कार्यक्रम में सभी के सामने कह दिया‘ चाचा जी आप में इतनी अक्ल नहीं है कि औरत की आयु और मर्द की आय नहीं पूछना चाहिये। अच्छा बताईये चाचा जी आपकी कुल आय कितनी है और चाची की उमर भी बताईये।’
चाचा के पैरों तले जमीन खिसक गयी। बहुत पैसे वाले थे पर अपनी आय इस तरह सार्वजनिक रूप से बताने का मतलब था कि जमाने भर के लोगों में एक आंकड़ा देना जो चर्चा का विषय बन जाये यानि चारों और डकैतों के यहां अपने घर पर आक्रमण करने का निमंत्रण देना। बड़े बेटे की यह बात सभी ने सुनी तो उसके बाद फिर रिश्तेदारों ने उससे यह सवाल करना बंद कर दिया।

इस तरह विवादों से बचने का सबसे बढि़या उपाय यही है कि किसी मर्द से उसकी आय और औरत से उसकी आयु न तो सीधे पूछना चाहिये न इशारा करना चाहिये। दूसरी बात अपने आप भी सतर्क रहें। कहीं अपनी आर्थिक तंगी और पत्नी की बीमारी की चर्चा न करें वरना इस तरह के सवाल कोई भी पूछ सकता है।
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Monday, January 5, 2009

टूटेगा तो आम आदमी-व्यंग्य कविता


गरीब का मान क्या, सम्मान क्या
उसके लिये तो रोटी से पेट भरने में ही
रोज मजा आता है
आत्मसम्मान और कौम के ईमान की
बात करते हैं वह सौदागर
जंग का मैदान हो या
अमन का रास्ता
दौलत का हर कतरा
जिनके ठिकाने की तरफ बढ़ता नजर आता है
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असली जंग का शंखनाद बड़े लोगों के भौंपू
रोज बजा रहे है
शायद मंदी से हैरान हैं
आम आदमी नहीं खरीद सकता रोज चीज
न देता हर विज्ञापन पर ध्यान
इसलिये सौदागर परेशान है
उनका नया और ताजा माल
कबाड़ बनता जा रहा है
पूंजी पर मंदी की मार हो गयी है ज्यादा
शायद जंग से तेजी लाने का है इरादा
मुनाफाखोरी और जमाखोरी के आदी
साहूकारों को जंग से क्या वास्ता
शांति में भी नहीं उनकी आस्था
दुनियां की दौलत का रथ
उनके दरवाजे तक ही जाता है
गरीब का क्या
वह तो उनके लिये भीड बन जाता है
इधर लड़े या उधर मरे
टूटेगा तो आम आदमी इसलिये
बड़े लोग भविष्य में हो न हो
फिलहाल जंग का बिगुल बजा रहे हैं

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Thursday, January 1, 2009

समाज, संस्कार और संस्कृति की रक्षा का प्रश्न-आलेख

हम अक्सर अपने संस्कार और संस्कृति के संपन्न होने की बात करते हैं। कई बार आधुनिकता से अपने संस्कार और संस्कृति पर संकट आने या उसके नष्ट होने का भय सताने लगता है। आखिर वह संस्कृति है क्या? वह कौनसे संस्कार है जिनके समाप्त होने का भय हमें सताता है? इतना ही नहीं धार्मिक आस्था या विश्वास के नाम पर भी बहस नहीं की जाती। कोई प्रतिकूल बात लगती है तो हाल आस्था और विश्वास पर चोट पहुंचने की बात कहकर लोग उत्तेजित हो जाते हैे।

कभी किसी ने इसका विश्लेषण नहीं किया। कहते हैं कि हमारे यहां आपसी संबंधों का बड़ा महत्व है, पर यह इसका तो विदेशी संस्कृतियों में भी पूरा स्थान प्राप्त है। छोटी आयु के लोगों को बड़े लोगों का सम्मान करना चाहिये। यह भी सभी जगह होता है। ऐसे बहुत विषय है जिनके बारे में हम कहते हैं कि यह सभी हमारे यहां है बाकी अन्य कहीं नहीं है-यह हमारा भ्रम या पाखंड ही कहा जा सकता है।

स्वतंत्रता के बाद कई विषय बहुत आकर्षक ढंग से केवल ‘शीर्षक’ देकर सजाये गये जिसमें देशभक्ति,आजादी,भाषा प्रेम,देश के संस्कार और आचार विचार संस्कृति शामिल हैं। धार्मिक आजादी के नाम पर तो किसी भी प्रकार की बहस करना ही कठिन लगता है क्योंकि धर्म पर चोट के नाम पर कोई भी पंगा ले सकता है। देश में एक समाज की बात की गयी पर जाति,भाषा,धर्म और क्षेत्र के आधार पर बने समाजों और समूहों के अस्तित्व की लड़ाई भी योजनापूर्वक शुरु की गयी। बोलने की आजादी दी गयी पर शर्तों के साथ। ऐसे में कहीं भी सोच और विचारों की गहराई नहीं दिखती।

कभी कभी यह देखकर ऊब होने लगती है कि लोगों सोच नहीं रहे बल्कि एक निश्चित किये मानचित्र में घूम कर अपने विचारक,दार्शनिक,लेखक और रचनाकार होने की औपचारिकता भर निभा रहे हैं। नये के नाम एक नारे या वाद का मुकाबला करने के लिये दूसरा नारा या वाद लाया जाता है। फिल्म, पत्रकारिता,समाजसेवा या अन्य आकर्षक और सार्वजनिक क्षेत्रों में नयी पीढ़ी के नाम पर पुराने लोगों के परिवार के युवा लोगा ही आगे बढ़ते आ रहे हैं। ऐसा लगता है कि समाज जड़ हो गया है। अमीर गरीब, पूंजीपति मजदूर और उच्च और निम्न खानदान के नाम पर स्थाई विभाजन हो गया है। परिवर्तन की सीमा अब उत्तराधिकार के दायरे में बंध गयी है। कार्ल माक्र्स से अनेक लोग सहमत नहीं होते पर कम से कम उनके इस सिद्धांत को कोईै चुनौती नहीं दे सकता कि इस दुनियां में दो ही जातियां शेष रह गयीं हैं अमीर गरीब या पूंजीपति और मजदूर।

भारतीय समाज वैसे ही विश्व में अपनी रूढ़ता के कारण बदनाम है पर देखा जाये तो अब समाज उससे अधिक रूढ़ दिखाई देता हैं। पहले कम से कम रूढ़ता के विरुद्ध संघर्ष करते कुछ लोग दिखाई देते थे पर अब तो सभी ं ने यह मान लिया है कि परिवर्तन या विकास केवल सरकार का काम है। यहा तक कि समाज का विकास और कल्याण भी सरकार के जिम्मे छोड़ दिया गया है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगतसिंह,चंद्रशेखर आजाद और अशफाकुल्ला के प्रशंसक तो बहुत मिल जायेंगे पर कोई नहीं चाहेगा कि उनके घर का लाल इस तरह बने। यह सही है कि अब कोई आजादी की लड़ाई शेष नहीं है पर समाज के लिये अहिंसक और बौद्धिक प्रयास करने के लिये जिस साहस की आवश्यकता है वह कोई स्वतंत्रता संग्राम से कम नहीं है।
अब कभी यहां राज राममोहन राय,कबीर,विवेकानेद,रहीम और महर्षि दयानंद जैसे महापुरुष होंगे इसकी संभावना ही नहीं लगती क्योंकि अब लोग समाज में सुधार नहीं बल्कि उसका दोहन करना चाहते हैं। वह चाहे दहेज के रूप में हो या किसी धार्मिक कार्यक्रम के लिये चंदा लेना के।

कभी कभी निराशा लगती है पर जब अंतर्जाल पर लिखने वाले लोगों को देखते हैं तो लगता है कि ऐसा नहीं है कि सोचने वालों की कमी है पर हां समय लग सकता है। अभी तक तो संचार और प्रचार माध्यमों पर सशक्त और धनी लोगोंं का कब्जा इस तरह रहा है कि वह अपने हिसाब से बहस और विचार के मुद्दे तय करते हैं। अंतर्जाल पर यह वैचारिक गुलामी नहीं चलती दिख रही है। मुश्किल यह है कि रूढ़ हो चुके समाज में बौद्धिक वर्ग के अधिकतर सदस्य कंप्यूटर और इंटरनेट से कतरा रहे हैं। उनको अभी भी इसकी ताकत का अंदाजा नहीं है समय के साथ जब इसको लोकप्रियता प्राप्त होगी तो परिवर्तन की सोच को महत्व मिलेगा। वैसे जिन लोगों की समाज के विचारकों, चिंतकों और बुद्धिजीवियों को गुलाम बनाने की इच्छा है वह लगातार इस पर नजर रख रहे है कि कहीं यह आजाद माध्यम लोकप्रिय तो नहंी हो रहा है। जब यह लोकप्रिय हो जायेगा तो वह यहां भी अपना वर्चस्व कायम करने का प्रयास करेंगे।

मुख्य बात यह नहीं कि विषय क्या है? अब तो इस बात का प्रश्न है कि क्या लोगों की सोच नारे और वाद की सीमाओं से बाहर निकल पायेगी क्योंकि उसे दायरों में बांधे रखने का काम समाज के ताकतवर वर्ग ने ही किया है। जब हम किसी विषय पर सोचे तो उसक हर पहलू पर सोचें। नया सोचें। देश की कथित संस्कृति या सस्कारों पर भय की आशंकाओं से मुक्त होकर इस बात पर विचार करें कि लोगोंं के आचरण में जो दोहरापन उसे दूर करें। हमारे समाज की कथनी और करनी में अंतर साफ दिखाई देता है और इसी कारण समाज के संस्कार और संस्कृति की रक्षा करने का विषय उठाया जाता है वह अच्छा लगता है पर नीयत भी देखना होगी जो केवल उसका दोहन करने तक ही सीमित रह जाती है। इसी कथनी करनी के कारण भारतीय समाज के प्रति लोगों के मन में देश तथ विदेश दोनों ही जगह संशय की स्थिति है। शेष किसी अगले अंक में
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