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Thursday, February 26, 2009

रंग भी अपना रंग बदलते हैं-हिंदी शायरी (rang bhee badalte hain-hindi poem)

आंखों से देखकर भी
विश्वास नहीं होता
कभी बनते हैं
कभी मिटते हैं
दृश्य तो पलपल बदलते हैं।
सामने से गुजरते हुए
जिंदा इंसान और सामान
अपने अस्तित्व का देते आभास
पर अगले पल नहीं होते पास
किसको यकीन दिलायें कि
यह हमने देखा था, वह नहीं
घूमते सूरज और चांद
जगह बदलती है यह धरती
जिनके होने का अहसास
सुखद अनुभूति देता है
वह भी मिट जाते हैं
जिनसे होता कष्ट
वह भी नष्ट हो जाते हैं
रंगरंगीली इस दुनियां में
रंग भी अपना रंग बदलते हैं
कुछ देर ठहर जायें सुनहरे पल
यह ख्वाहिश करना बेकार है
वह भी किसी के इशारे पर चलते हैं

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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Friday, February 20, 2009

ऐसा वैसा पढ़ने की चाहत-आलेख

‘आपके लिखने की शैली दीपक भारतदीप से एकदम मिलती जुलती है’-हिंदी के ब्लाग एक ही जगह दिखाने वाले वेबसाईट संचालक ने यह बात मुझे तब लिखी जब मैंने अपने छद्म नाम के दूसरे ब्लाग को अपने यहां दिखाने का आग्रह किया। इस बात ने मुझे स्तब्ध कर दिया। इसका सीधा आशय यह था कि मेरे लिये यहां छद्म नाम से लिखने का अवसर नहीं था। दूसरा यह कि उस समय तक मैं इतना लिख चुका था कि अधिकतर ब्लाग लेखक मेरी शैली से अवगत हो चुके थे। छद्म नाम के उस ब्लाग पर मैंने महीनों से नहीं लिखा पर ब्लाग स्पाट पर वह मेरा सबसे हिट ब्लाग है। सुबह योगसाधना से पहले कभी कभी ख्याल आता है तो मैं अपने ब्लाग के व्यूज को देखता हूं। रात 10 बजे से 6 बजे के बीच उन्हीं दो ब्लाग पर ही पाठक आने के संकेत होते हैं बाकी पर शून्य टंगा होता है। अपने लिखने पर मैं कभी आत्ममुग्ध नहीं होता पर इतना अनुभव जरूर हो गया है कि कुछ लोग ऐसे हैं जो मुझे पढ़ने से चूक नहीं सकते। यही कारण है कि छद्म ब्लाग पर लिखना करीब करीब छोड़ दिया क्योंकि वहां मेरे परिचय का प्रतिबिंब मुझे नहीं दिखाई देता-आर्थिक लाभ तो खैर होना संभव ही नहीं है।

मुझे याद है कि मैंने यह ब्लाग केवल बेकार के विषयों पर लिखने के लिये बनाया था। इस ब्लाग पर पहली रचना के साथ ही यह टिप्पणी मिली थी कि ‘हम तो इसे ऐसा वैसा ब्लाग समझ रहे थे पर आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं।’
उस समय इस टिप्पणी पर लिखी बात मेरे समझ में नहीं आयी पर धीरे धीरे यह पता लग गया कि ब्लाग नाम लोकप्रियता के शिखर से जुड़ा था।
उस दिन अखबार में पढ़ा हिंदी भाषी क्षेत्रों मेें 4.2 करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं। इस लिहाज से हिंदी में सात्विक विषयों के ब्लाग पढ़ने की संख्या बहुत कम है। ऐसा नहीं है कि हिंदी के ब्लाग लोग पढ़ नहीं रहे पर उनको तलाश रहती है ‘ऐसा वैसा’ पढ़ने की। जिन छद्म ब्लाग की बात मैंने की उन पर ऐसा वैसा कुछ नहीं है पर वह उनके नाम में से तो यही संकेत मिलता है। यही कारण है कि लोग उसे खोलकर देखते हैं। मैंने उन ब्लाग पर अपने सामान्य ब्लाग के लिंक लगा दिये हैं पर लोग उनके विषयों में दिलचस्पी नहीं लेते क्योंकि वहां से पाठक दूसरे विषयों की तरफ जाते ही नहीं जबकि दूसरे सामान्य ब्लाग पर इधर से उधर पाठकों का आना जाना दिखता है। मैंने उन दोनों ब्लाग से तौबा कर ली क्योंकि उन पर लिखना बेकार की मेहनत थी। न नाम मिलना न नामा।
वर्डप्रेस पर भी दो ब्लाग है जिन पर मैंने अपने नाम के साथ मस्तराम शब्द जोड़ दिया। तब दोनों ब्लाग अच्छे खासे पाठक जुटाने लगे। तब एक से हटा लिया और उस पर पाठक संख्या कम हो गयी पर दूसरे पर बना रहा। वह ब्लाग भी प्रतिदिन अच्छे खासे पाठक जुटा लेता है। तब यह देखकर आश्चर्य होता है कि लोग ‘ऐसा वैसा’ पढ़ने को बहुत उत्सुक हैं और उनकी दिलचस्पी सामान्य विषयों में अधिक नहीं हैं। अभी हाल ही में एक सर्वे में यह बात कही गयी है कि इंटरनेट पर यौन संबंधी साहित्य पढ़ना अधिक घातक होता है बनिस्बत सामान्य स्थिति में। एक तो यौन संबंधी साहित्य वैसे ही दिमागी तौर पर तनाव पैदा करता है उस पर कंप्यूटर पर पढ़ना तो बहुत तकलीफदेह होता है। इस संबंध में हानियों के बारे में खूब लिखा गया था और उनसे असहमत होना कठिन था।
उन ब्लाग की पाठक संख्या अन्य ब्लाग की संख्या को चिढ़ाती है और अपने ब्लाग होने के बावजूद मुझे उन ब्लाग से बेहद चिढ़ है। वह मुझे बताते हैं कि मेरे अन्य विषयों की तुलना में तो यौन संबंधी विषय ही बेहद लोकप्रिय है। सच बात तो यह है कि पहले जानता ही नहीं था कि मस्तराम नाम से कोई ऐसा वैसा साहित्य लिखा जाता है। मेरी नानी मुझे मस्तराम कहती थी इसलिये ही अपने नाम के साथ मस्तराम जोड़ दिया। इतना ही नहीं अपने एक दो सामान्य ब्लाग पर पाठ लिखने के एक दिन बाद-ताकि विभिन्न फोरमों पर तत्काल लोग न देख पायें’-मस्तराम शब्द जोड़कर दस दिन तक फिर कुछ नहीं लिखा तो पता लगा कि उस पर भी पाठक आ रहे हैं। तब बरबस हंसी आ जाती है। अनेक मिलने वाले ऐसी वैसी वेबसाईटों के बारे में पूछते हैंं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों के इंटरनेट कनेक्शन लेने वाले शायद इस उद्देश्य से लेते हैं कि ‘ऐसा वैसा’ पढ़े और देख सकें।

उस दिन एक जगह अपने कागज की फोटो स्टेट कराने गया। वह दुकानदार साइबर कैफे भी चलाता है। उस दिन वह अपने बिल्कुल अंदर के कमरे में था तो मैं इंटरनेट के केबिनों के बीच से होता हुआ वहां तक गया। धीरे धीरे चलते हुए मैं काचों से केबिन में झांकता गया। आठ केबिन में छह को देख पाया और उनमें तीन पर मैंने लोगों को ‘ऐसे वैसे‘ ही दृश्य देखते पाया और बाकी क्या पढ़ रहे थे यह जानने का अवसर मेरे पास नहीं था।

सामान्य रूप से भी यौन संबंधी मनोरंजन साहित्य और सीडी कैसिट उपलब्ध हैं पर इंटरनेट भी एक फैशन हो गया है सो लोग सक्रिय हैं पर उनकी मानसिकता में भी एसा वैसा ही देखने और पढ़ने की इच्छा है। यह कोई शिकायत नहीं है क्योंकि लोगों की ‘यौन संबंधी मनोरंजन साहित्य’ पढ़ने की इच्छा बरसों पुरानी है पर सात्विक साहित्य पढ़ने वालों की भी कोई कमी नहीं है-यह अलग बात है कि वह अभी समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों को ही देखने में सक्रिय हैं और इंटरनेट पर देखने और पढ़ने की उनमें इच्छा अभी बलवती नहीं हो रही है। जिनमें ऐसा वैसा पढ़ने की इच्छा होती है उनके लिये इंटरनेट खोलने की तकलीफ कुछ भी नहीं है पर सात्विक पढ़ने वालों के लिये अभी भी बड़ी है। कहते हैं कि व्यसन और बुरी आदतें आदमी का आक्रामक बना देती हैं पर सात्विक भाव में तो सहजता बनी रहती है।
ऐसा नहीं है कि सामान्य ब्लाग@पत्रिकाओं पर पाठक कोई कम हैं पर उनमें बढ़ोतरी अब नहीं हो रही है। ब्लागस्पाट के ब्लाग तो वैसे ही अधिक पाठक नहीं जुटाते पर वर्डप्रेस के ब्लाग पर नियमित रूप से उनकी संख्या ठीकठाक रहती है। सामान्य विषयों में भी अध्यात्म विषयों के साथ हास्यकवितायें, व्यंग्य और चिंतन के पाठकों की संख्या अच्छी खासी है-कुछ पाठ तो दो वर्ष बाद भी अपने लिये पाठक जुटा रहे हैं। यह कहना भी कठिन है कि ऐसा वैसा पढ़ने वालों की संख्या अधिक है या सात्विक विषय पढ़ने वालों की। इतना जरूर है कि ‘ऐसा वैसा’ पढ़ने पर जो हानियां होती हैं उनके बारे में पढ़कर उन लोगों के प्रति सहानुभूति जाग उठी जो उसमें दिलचस्पी लेते हैं।
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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Monday, February 9, 2009

अपनी ऑंखें तो फेर सकते हैं-व्यंग्य आलेख (ankhen to fer sakte hain-hindi satire)

हम कपड़े क्यों पहनते हैं? इसके चार जवाब हो सकते हैं
1.सभी कपड़े पहनकर घूमते हैं।
2.हम बिना कपड़े पहने बाहर निकलेंगे तो लोगों की नजरें हम केंद्रित हो जायेंगी और हमें शर्म आ जायेगी।
3.हम कपड़े पहनकर नहंी निकलेंगे तो लोगों को शर्म आयेगी।
4.हमारा शरीर इसका आदी हो गया है और अगर हम उसे नहीं पहनेंगे तो शरीर को गमी या सदी लग जायेगी।
इनमें से कोई एक या सारे उत्तर सही हो सकते हैं। प्राचीन इतिहास से पता चलता है कि पहले लोग कपड़े नहीं पहनते थे। आदमी पहले बंदर की तरह ही था जिसकी देह पर बड़े बड़े बाल हुआ करते थे। समय के साथ वह कपड़े पहनने लगा तो धीरे धीरे उसकी देह के यह बाल छोटे होते गये। आदमी को कभी पूंछ भी हुआ करती थी जो पायजामा या धोती पहने छोटी होते हुए लुप्त हो गयी । पूंछ के लुप्त होते होते आदमी नैतिकता का लबादा ओढ़ता चला गया। नैतिकता एक फैशन की तरह है। किसी के लिये एक वस्तु या काम बुरा हो सकता है तो दूसरे के लिये अच्छा। सभी कहते हैं कि रिश्वत लेना पाप है जिसको अवसर मिलता है वह लेता है तब वह उसके लिये एक अधिकार होता है। रिश्वत देने वाला आधिकारिक मूल्य के रूप में देता है और लेना वाला कमीशन के रूप में लेता है। तब न देने वाला कहता है कि ‘आपको रिश्वत दे रहा हूं’ और न लेने वाला सोचता है कि रिश्वत ले रहा हूं।’

यही हाल है विवाह पूर्व और विवाहेत्तर प्रेम संबंधों का भी है। सभी लड़के चाहते है कि उनके पास एक ‘गर्लफ्रैंड’ हो ताकि मित्रों पर रुतवा जता सकें। जिसको प्रणय संबंध मिल गया वह लड़की को प्रेयसी कहता है अगर कोई लड़का उससे नाराज होता है तो लड़के के लिये कहता है‘फटकीबाज’ और लड़की को चालू कहता है। विवाहेत्तर संबंधों का भी यही हाल है। जो धनी मानी लोग हैं उनके लिये ऐसे संबंध बनाना कोई मुश्किल काम नहीं होता। ऐसे विवाहेत्तर संबंधों को लोग ‘हाई सोसायटी का ट्रैंड’ कहते हैं। भारतीय समाज की अपनी गति है और वह यहां संस्कार फैशन की तरह बनते और बिगड़ते है तो संस्कृति भी निर्मित और ध्वस्त होती है।

ऐसे में जिन लोगों को नये संस्कार दिल को अच्छे लगते हैं वह उसे अपना लेते हैं-जैसे शराब पीना,जुआ खेलना और विवाहपूर्व शारीरिक संबंध बनाना और विवाहेत्तर संबंधों का निर्माण करना। जिनको आंखों का सुख लेना है उनको स्त्रियों का आधुनिक कपड़े पहनना बुरा नहीं लगता। कुछ लोग ऐसे हैं जिनको अच्छा नहीं लगता वह आंखें फेर लेते हैं क्योंकि अपने देह पर कौन कैसे कपड़े पहन रहा है किसके साथ घूम रहा है यह उसका निजी मसला है। अपना मसला तो अपनी आंखें हैं उनको ही फेरा जा सकता है। ऐसे में कुछ लोग ऐसे भी है जो सुखद दृश्यों को सहन नहीं कर पाते तो वह उनको मिटाना चाहते हैं। दरअसल उनको समाज पर नियंत्रण करने की अपनी शक्ति का भ्रम होता है।
नैतिकता एक बहुत बड़ा भ्रम है। एक विचार या पहनावा किसी के लिये बहुत अच्छा है दूसरे के लिये बुरा है। संस्कार और संस्कृति व्यक्ति के निजी आचरण का प्रतीक होता है और वह उसके परिवार, समाज और घरेलू आर्थिक स्थिति के अनुसार निर्धारित होता है। इस देश में कुछ जातीय समाज ऐसे हैं जहां औरतें बीड़ी और शराब पीतीं हैं। आप उनके शराब पीने को अनैतिकता नहीं कहा सकते। अब अगर कुछ अमीर और धनी परिवार की स्त्रियां शराब पी रहीं हैं तो उन्हेेंं हाई सोसायटी का ट्रैंड कहा जाता है। वह अपने आपको आधुनिक कहती हैं। ऐसे में अगर मध्यम वर्ग की कोई स्त्री पीती है तो उसे अनैतिकता कहा जाता है।

नैतिकता के मुख्य आधार कभी नहीं बदलते। किसी दूसरे को दुःख न देना, ईष्र्या और द्वेष से परे रहना और अवसर पड़े तो दूसरे की सहायता करना। यही संस्कार भी है और संस्कृति। इसके अलावा जो संस्कृति या संस्कार हैं वह कपड़े पहने और खानपान से संबंधित होते हैं। उसका सीधा आधार यही है कि जैसा करेगा वैसा भरेगा। फिर आखिर किस नैतिकता की बात लोग करते हैं। किस सस्कृति की रक्षा करते हैं और वह कौनसे संस्कार हैं जिनको वह जीवंत रखना चाहते हैं।
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