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Thursday, January 22, 2009

विचार और विषय को निर्बाध गति से बाहर आने दें-आलेख

हर लिखने वाले की रचना में साहित्य ढूंढना ठीक नहीं है। उसी तरह हर साहित्यकार में भाषा शिल्प की संभावना भी नगण्य रहती है। मुख्य बात है कि लिखने वाले दो तरह के होते हैं एक तो वह जो अपने मन और बुद्धि में आते जाते विचारों को अभिव्यक्ति देने के लिये लिखते हैं दूसरे वह जो भाषा और शिल्प की दृष्टि से भाषा में साहित्य में परिवृद्धि के लिये सृजन करते हैं। ऐसे में संभव है कि अभिव्यक्ति के भाव से लिखने वाला शिल्प की दृष्टि से कमजोर होते हुए भी अपनी बात पाठक तक पहुंचाने में सक्षम हो जाये और साहित्यकार को इसमें सफलता न मिले।
किसकी रचना साहित्यक है और किसकी नहीं इस पर हमेशा बहस होती है और भाषा शिल्प की दृष्टि से कमजोर रचनाओं पर उनका उपहास उड़ाया जाता है भले ही उन्होंने पढ़ने वाले पाठकों की संख्या अधिक हो। भाषा और शिल्प से सजी साहित्यक रचनाओं को पंसद करने वाले हमेशा ऐसी रचनाओं का मखौल उड़ाते हैं। ऐसे में अतंर्जाल पर लिखने वालों को शायद संकोच होता है कि कहीं उनका मजाक न उड़ाया जाये। उन्हें अब इस संकोच में से परे हो जाना चाहिये। सच बात तो यह है कि एक दूसरे को अपने से हेय प्रमाणित करने के लिये हिंदी लेखकों में हमेशा संघर्ष चलता रहा है।

भारत में हिंदी निरंतर बढ़ती रही है पर अभी तक बौद्धिक,आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से मजबूत लोगों का उस पर नियंत्रण रहा है और इसलिये ऐसे लेखकों को आगे नहीं आने दिया गया जिन्होंने शक्तिशाली लोगों कह चाटुकारिता नहीं की। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अंतर्जाल पर हिंदी के पढ़ने वाले कुछ लोग अभी भी उसी पुरानी मानसिकता के साथ जी रहे हैं। वह लोगों की श्रेणियां बनाने में लगे हैं और उसका कोई तार्किक आधार उनके पास नहीं दिखता और जो वह आधार प्रस्तुत करते हैं उस पर स्वयं ही खड़े हुए नहीं दिखते। कुछ लोग तो ऐसा प्रयास करते हुए दिखते हैं कि अंतर्जाल पर हिंदी भाषा की विकास यात्रा का टिकट उन्होंने कटवाया है और इसलिये उनका निर्णय बहुत महत्वपूर्ण है और वह जो कहते हैं उसी राह पर सब चलें। समाचार पत्र पत्रिकाओं में हिंदी ब्लाग के विषय पर प्रकाशित लेखों को पढ़ने से पता लगता है कि वह ब्लाग लेखकों को पुरानी राह पर चलने का ही संदेश इस आशय से दिया जा रहा जैसे कि लेखों के लेखक अंतर्जाल विद्या में पारंगत हों।

अंतर्जाल पर जो ब्लाग लेखक सक्रिय हैं उनको यह बात समझ लेना चाहिये कि वह जिस तरह अपने ब्लाग पर लिख रहे हैं उसका इस देश में अनेक लोगों को ज्ञान नहीं है। अधिकतर लोग पत्र पत्रिकाओं में पढ़ने के आदी हैं इसलिये वह यह अपेक्षा कर रहे हैं कि ब्लाग पर भी वैसा ही दिखे। यह संभव नहीं है। सच बात तो यह है अंतर्जाल पर भाषा और शिल्प की बजाय कथ्य और भाव महत्वपूर्ण हैं और जहां किसी ने अपने भावों को रोककर भाषा और शिल्प पर विचार किया वहां वह मूल विषय को ही भूल जायेगा। बहुत कम लेखक-या कहा जाये उंगलियों पर गिनती करने लायक-भाषा और शिल्प की दृष्टि से बेहतर साहित्य लिख सकते हैं और अंतर्जाल पर जिस तरह पढ़ने के लिये सीमित समय और जगह है वहां विषय और विचार का होना महत्वपूर्ण है।

अंतर्जाल पर कुछ मूर्धन्य ब्लाग लेखक बहुत अच्छी साहित्यक रचनायें प्रस्तुत कर रहे हैं वह बधाई के पात्र हैं पर उनको देखकर कोई कुंठा अपने अंदर लाने की आवश्यकता नहीं है। इस हिंदी ब्लाग जगत में ऐसे भी लोग हैं जो भाषा की शिल्प की दृष्टि से बहुत अच्छा नहीं लिखते पर उनके शब्द मन को छू लेने वाले होते हैं तो कई लोगों के विषय भी बहुत दिल्चस्प होते हैं। ऐसे में जो लोग अपने मन की बात यह सोचकर लिखने से कतराते हैं कि उनके उनके मस्तिष्क में बहुत अच्छे विचार और विषय अपना डेरा जमाये बैठें हैं पर भाषा और शिल्प की दृष्टि से प्रस्तुत करने की उनकी कोई योजना नहीं बन पा रही है तो उनको यह संकोच छोड़ देना चाहिये। भाषा के आकर्षक शब्द और शिल्प की दृष्टि से विचार करने का अर्थ यह होगा कि अपनी रचनाओं को तत्काल निर्बाध गति से बाहर आने से रोकना। हां, लिखते हुए सामान्य व्याकरण का ध्यान तो रखा जाना चाहिये और शब्द संयोजन पर भी अपनी पैनी दृष्टि रखें पर उतनी ही जिससे कि अपने विचार और विषय से ध्यान न भटके। जहां तक साहित्य का प्रश्न है तो आज भी यही शिकायत की जाती है कि लोग साहित्य कम बेहूदी और अश्लील रचनायें अधिक पसंद करते हैं। यह एक अलग मुद्दा है पर एक बात का संकेत तो मिलता है कि लोगों की दिलचस्पी केवल विषय और विचार के अभिव्यक्त भाव में है। ऐसे में सात्विक विषयों में ही रस और अलंकार भरे जायें तो बेहतर हैं। अंतर्जाल एक अलग मार्ग है पर बाहर की दुनियां को यह प्रभावित करेगा इसमें संदेह नहीं है। वैसे ही आजकल की व्यस्तम जिंदगी में लोगों के पास कम समय है और अधिकतर ब्लाग लेखक अव्यवसायिक हैं तब व्यवसायिक प्रकाशनों की तरह सजी संवरी साहित्यक रचनायें मिलना संभव नहीं है फिर पढ़ने वाले को भी कितना समय मिल पाता है यह भी एक विचार का विषय है। ऐसे में भी अंतर्जाल पर लिखने वाले जेा ब्लाग लेखक लिख रहे हैं उन्हें अपने मस्तिष्क में सक्रिय और विचार निर्बाध गति से बाहर आने देने का प्रयास करना चाहिये।
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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Saturday, October 11, 2008

अंतर्जाल पर पाठ चुराने वाले हैकर भी कम नहीं होंगे-आलेख

पता नहीं वह ब्लागर कभी कभी दिखता है पर उसकी सलाह को कभी नहीं भूल सकता। उसने हैकरों से लड़ने का जो सुझाव दिया वह बहुत दिलचस्प रहा।
उसने कहा था कि मुझे अपने पाठ में उस हैकर के लिये अभद्र शब्द लिख कर एक पाठ डालना चाहिये और फिर उस पाठ को हटा देना चाहिये या फिर उसकी वेबसाइट को चोर बताते एक पाठ लिखना चाहिये। उसे धमकाना चाहिये। आदि आदि।

इधर कई दिनों से देख रहा था कई लोग मुफ्त का माल समझकर मेरे पाठों को उठाये जा रहे थे। कहना यह चाहिये कि उन्होंने अपने साफ्टवेयर इस तरह बनाये हैं कि वह एक जाल बन गये हैं और जब हम अपना पाठ प्रकाशित करते हैं तो वह एक अंतरिक्ष में अपने शब्दों के साथ उठ रहा पाठ पंछी की तरह उनके इस जाल में फंस जाता है। बहरहाल उस ब्लागर की बात ने मेरे दिमाग में एक विचार घुसा दिया। मैंने अपने पाठ में अपने उस ब्लाग/पत्रिका के साथ अन्य ब्लाग/पत्रिका के पते भी लगाना शुरु दिये। वह मेरे पाठ का इस तरह हिस्सा था कि उनकी वेबसाइट पर अगर कोई मेरा पाठ खोलेगा तो मेरा नाम और ब्लाग/पत्रिका भी दिखाई देती है और कोई चाहे तो उनको खोल भी सकता है। जब से इस तरह अपने ब्लाग/पत्रिका के पते देने शुरु किये हैं तब से अब पाठ चोरी होना एक तरह से बंद हो गया है।

सबसे बढि़या बात यह है कि मैंने अपना नाम ब्लाग/पत्रिकाओं के साथ अनजाने में जोड़ा थे पर अब उनका लाभ यह दिखाई दे रहा है कि अंतर्जाल के यह हैकर उससे बचना चाहते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि अपनी टिप्पणियों में ब्लाग/पत्रिकाओं में लिख जाते हैं कि प्रसिद्ध ब्लागर हूं-यह मजाक में वह लिखते हैं पर लगता है कि हैकरो ने यह पढ़ा है और इसी डर के कारण अब ऐसी शिकायतें कम हो गयीं हैं।
इन हैकरों ने लव,फ्रेंडस,विकिपीडिया और हिंदी और अन्य अनेक आकर्षक नाम लिखकर अपने वेबसाइट बनायी है। डोमेन पर पैसा खर्च किया पर लिखने के नाम पर पैदल हैं! वह अंतर्जाल पर हिंदी के वैसे ही प्रकाशक बनना चाहते हैं जैसे कि बाहर हैं। उनको लगता है कि ब्लाग लेखक तो एक मजदूर है वैसा ही जैसे कि बाहर होते हैं। यह उनका भ्रम है। अंतर्जाल पर सब वैसा नहीं चलेगा जैसा कि बाहर चल रहा है। वह पाठ लेना चाहते हैं पर नाम नहीं दिखे ऐसा इंतजाम कर लेते हैं तब गुस्सा आना स्वाभाविक है।

एक ब्लाग पर मैं विकिपीडिया का नाम देखकर तो हैरान हो गया और इधर मैं सोच रहा था कि इसकी शिकायत अपने मित्रों से करूं पर मेरी अपनी तकनीकी चालाकी की वजह से वह ब्लाग/वेबसाइट फिर मेरा पाठ लेने नहीं आया। हालांकि उसका लिंक अभी भी मेरे ब्लाग/पत्रिका पर दिख रहा है। हैकरी देखिये कि कोई और लिखे और हम उसका लाभ मुफ्त में उठायें।

इन हैकरों से जूझना भी एक अलग तरह का अनुभव है। कुछ लोगों को मेरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर इस तरह अनेक ब्लाग/पत्रिकाओं का पता देखकर हैरानी होती होगी उनको यह बता दूं कि यह केवल हैकरों से मुकाबला करने के लिये है। ऐसे हैकर जो लेखक का न नाम देना चाहते हैं और न नामा! आगे ऐसे हैकरों की संख्या और बढ़ेगी क्योंकि हिंदी में कई लोग अपने अंदर प्रकाशक होने का भ्रम पाल का डौमेन खरीद रहे हैं और ब्लाग के बारे में उनको लगा रहा है कि वह फ्री के हैं और लेखक तो उनकी नजर में फ्री के होते हैं।

इधर मैंने तय कर लिया है कि हिंदी की आधिकारिक साईटों पर ही जाना ठीक रहेगा। किसी समस्या के लिये ब्लाग लेखक मित्रों से पूछना ही ठीक है क्योंकि अंतर्जाल के बारे में अब वह जितना जानते हैं उतना शायद ही कोई जानता हो। इन हैकरों के बारे में उनसे जानकारी मिली तभी मैंने पाया कि कई ऐसे हैकर हैं जो मेरे पाठ ले जा रहे हैं। यहां यह बात बता दूं कि ब्लाग फ्री के जरूर हैं पर उस पर लिखा गया पाठ फ्री का नहीं होता। लेखक भले ही बैठकर लिखता है और उसका वहां भी पसीना बहता है।
कुछ लोग कहते हैं कि अंतर्जाल पर चोरी रोकने के लिये कानून होना चाहिये। यह बात सही है पर ऐसे हैकरों को बता दूं अनेक ऐसे भी कानून हैं जो उनको अपनी इन मूर्खताओं के लिये संकट में डाल सकते हैं।
डौमेन लेने वाले भी चेत जायें। कम से कम जहां मेरा नाम देखें तो अपने यहां से पाठ हटा लें। अगर मेरा पाठ लेते हैं तो मुझे पूर्व सूचना दें। मेरे पाठ केवल मेरे ब्लाग मित्र और हिंदी के ब्लाग दिखाने वाले चार फोरम ही दिखा सकते हैं क्योंकि यह मैंने तय किया है-अन्य का मामला मेरे विचाराधीन है। वैसे मुझे अपने लिखे से न तो पैसे की आशा है न ही अभी ऐसी कोई उत्सुकता है। भगवान का दिया सब कुछ है और सबसे बड़ी बात यह है कि सरस्वती मां की कृपा है पर अन्य ब्लाग लेखक मित्रों का परिश्रम व्यर्थ आते देख मेरा खून खौल उठता है तब प्रतिकार करने का मन होता है। सीधी बात यह है कि अगर आप अपनी वेबसाइट या ब्लाग पर इस तरह दिखाते हैं कि मेरा नाम नहीं दिखता तो इसका मतलब है कि आपकी नीयत ठीक नहीं है और उसका प्रतिकार आपको कभी भी झेलना पड़ सकता है।
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