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Saturday, March 9, 2013

महिला दिवस पर संपादकीय-एक पहिया आगे तो दूसरा पीछे लगना ही है (edtorial on women day-man and woman two wheel of life)

       हमारे देश में आजकल रोज एक दिवस मनता दिखता है।  वैसे तो भारत को वैसे भी त्यौहारों का ही देश कहा जाता है पर वह सप्ताह या माह के अंतराल बाद ही आते हैं। पूर्णमासी तथा अमावस्या हर महीने ही आती हैं।  कैलेंडर में देखें तो रोज कोई न कोई खास दिन होता है। इधर पश्चात्य संस्कृति ने अपने पांव पसारे हैं तो लगता है कि हर दिन ही त्यौहार है। मित्र दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस और नया वर्ष जैसे दिन तो बहुत सुनते हैं। कभी एड्स विरोधी दिवस तो कभी कैंसर निरोधी दिवस भी सुनाई देता हैं  इधर हाल ही में महिला दिवस मना। व्यवसायिक बुद्धिमानों ने जहां अपनी वाणी और चेहरे से टीवी चैनलों के साथ ही रेडियों पर अपने भाषण झाड़े वही आमजनों में अपना रुतवा रखने वाले महानुभावों ने नारी शक्ति अनौपचारिक बैठकों में  बखान किया।
      हमने देखा है कि पुरुष दिवस कभी नहीं मनता। इसका सीधा मतलब यह है कि यह मान लिया गया है कि यह संसार पुरुषों की संपत्ति है जिसमें महिलायें उनकी अनुकंपा से जी रही हैं।  हमारे देश के जनवादी और प्रगतिशील  बुद्धिमान हमेशा ही जाति, वर्ण, भाषा तथा क्षेत्र के आधार पर भेदभाव का आरोप लगाते हैं पर नारी विषय पर उनका रुख बदल जाता है।  वहां वह पुरुष को एक तरह से राक्षसी वृत्ति का मान लेते हैं यह अलग बात है कि वह स्वयं भी पुरुष ही होते हैं। उनके तर्कों पर हम हंसते हैं।  कहते हैं कि समाज में पुरुषवादी मानसिकता है।  हम पूछते हैं कि जब आप नारी अनाचार के विरुद्ध विषवमन करते हो तब क्या कभी यह देखा है कि वास्तव में उनका शत्रु कौन होता है?
    कुछ नारीवादी बुद्धिमान तो नारी के लिये विवाह बंधन ही खतरनाक मानते हैं यह अलग बात है कि उनमें अविवाहित या ब्रह्चारी कोई नहीं होता।  आयुवर्ग में भी वह युवा न होकर उस अवस्था में होते हैं जब देह में रोमांस का असर काम हो जाता है।  अपनी बात वह युवाओं पर तब लादते दिखते हैं जब उनका खुद का समय बीत गया होता है। अपने युवा दिनों की मटरगस्ती को वह भूल जाते हैं।  कहा जाता है कि विवाह का लड्डू जो खाये वह भी दुःखी जो न खाये वह भी दुःखी।  जिन्होंने स्वयं खा लिया है वह दूसरों को न खाने की सलाह देते हैं।  मजे की बात यह कि भारतीय पारिवारिक संस्कारों के साथ जीने वाले लोग उसका मजाक बनाते हैं पर स्वयं के लिये उनका नियम पुराना ही होता है। वह विद्रोह का झंडा दूसरों के हाथ में देकर स्वयं आराम से सामाजिक फिल्म देखना चाहते हैं ताकि उसकी समीक्षायें लिखी और सुनाईं जा सकें।  समस्या यह है कि वह इस बात नियम को नहीं मानते कि नारी के लिये पुरुष कम नारियां ही अधिक समस्या खड़ी करती हैं।  भारतीय रिश्तों में नहीं वरन् पूरे विश्व में ही ननद-भाभी, सास-बहु, देवरानी-जेठानी तथा अन्य बहन जैसे रिश्तों में तनाव की बात सामने आती है।  अपवाद स्वरूप ही देवर-भाभी, ससुर-बहु, नन्दोही-सलहज और साली बहनोई के रिश्ते में खटास वाली घटनायें होती हैं।  सामाजिक विशेषज्ञों का अनुभव तो यह भी कहता है कि पर्दे के पीछे नारियों के विवाद होते हैं पर समाज के सामने फंसता पुरुष ही है क्योंकि परिवार उसके नाम पर जाना जाता है।  हमारे यहां घरेलु नारियों की रक्षा के नाम पर जितने भी प्रयास हुए हैं उनमें जड़ में नारियों का आपसी विवाद होता है पर परेशान पुरुष ही होता है।  इन मामलों में यह देखा गया है कि मामलों को बाहर सुलझाने के लिये घर से बाहर ले जाने जो प्रयास होते हैं उनमें से अधिकतर शिकायतें गलत आधार पर गलत व्यक्ति के खिलाफ होती है।  दहेज विरोधी कानून का जमकर दुरुपयोग हुआ।  अनेक सामाजिक विशेषज्ञ तो यह कहते हैं कि इस कानून का दुरुपयोग करने का यह परिणाम हुआ है कि ऐसे अनेक दंपत्ति जो एक साथ समझाने पर रह सकते थे वह मामला बाहर आने में मन में  बढ़ी हुई  खटास के कारण अलग हो गये।  अनेक लोगों की कथा तो इसलिये भी दर्दनाक रही है कि वह उस शादी में एक समय का भोजन करना उन्हें महंगा लगा जिसका भांडा चौराहे पर फूटा और उन पर भी घाव हुए। स्थिति इतनी खराब है कि कहीं नवदंपत्ति का विवाद होने  पर निकटस्थ रिश्तेदार बीच में आकर सुलझाना ही नहीं चाहते क्योंकि उनको लगता है कि कहीं उनका नाम चौराहे पर न घसीट लिया जाये।  विवाह एक सामाजिक मामला है और उसे उसके नियमों के दायरे में ही रखना चाहिये न कि उसमें राजकीय हस्तक्षेप हो।  राजकीय हस्तक्षेप से समाज के सुधार का प्रयास पाश्चात्य विचाराधारा से उपजा है जो निहायत अव्यवाहारिक है।  ऐसे प्रयासों से भारतीय समाज बिखरा है। दूसरी बात यह कि जिस तरह सारे पुरुष देवता नहीं है तो राक्षस भी नहीं है उसी तरह नारियों का भी हमेशा सकारात्म स्वरूप रहता है यह माना नहीं माना जा सकता।  अगर समाज में नारियों के विरुद्ध अपराध बढ़े हैं तो उसमें शामिल नारियों की संख्या भी बढ़ी है।
     अब मुश्किल यह है कि जनवादियों और प्रगतिवादियों ने देश के अभिव्यक्ति के साधनों पर इस कदर कब्जा कर लिया है कि उनके प्रतिकूल सर प्रथक  किसी बात कहने पर किसी पर प्रभाव नहीं होता।  समाज में आयु, वर्ण, जाति, भाषा, धर्म और लिंग के आधार पर कल्याण के दावे हो रहे हैं पर खुश कोई नहीं है।  वजह साफ है कि  समाज को एक इकाई मानते हुए देश में सभी शहरों के साथ गांवों में भी सड़कों का जाल बिछा होना चाहिये।   सभी जगह शुद्ध पेयजल प्रदाय की सहज व्यवस्था हो।  इसके साथ ही बिजली हर घर में पहुंचना चाहिये।  यह मूलभूत सुविधायें हैं अगर यह देश के किसी हिस्से में नहीं है तो हम अपने पूर्ण विकास का दावा नहीं कर सकते।  इसके विपरीत देश के बुद्धिमान किश्तों में अलग अलग समाज को भागों में बांटकर विकास देखना चाहते हैं।  हमारे देश में गरीब परिवारों जो स्थिति है उसमें नारी दयनीय जीवन जीती है पर यकीनन पुरुष भी कोई खुशहाल नहीं होता।   अपने पिता, पति और पुत्र को जूझते देखकर नारी स्वयं की दयनीय स्थिति से समझौता कर लेती है।  सीधी बात कहें तो नारी और पुरुष के बिना मानवीय संसार नहीं चल सकता।  दोनों परिवार के पहिये हैं।  एक पहिया पीछे तो एक आगे चलता है।  आगे का पहिया पुरुष है और अगर नारीवादी चाहते हैं कि नारी आगे पहिये के रूप में चले तो ठीक है।  उनके प्रयास बुरे नहीं है पर उन्हें यह समझना होगा कि तब पुरुष को पिछला पहिया बनना होगा। एक पहिया आगे तो एक पीछे रखना ही होगा। हालांकि तब इन नारीवादियों को तब पुरुषवादी बनना पड़ेगा।
  दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'

Gwalior, Madhya Pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Thursday, October 13, 2011

सिंध के विषय पर कुछ क्यों नहीं बोलते-हिन्दी लेख (disscussion on sindh state of pakistan and india-hindi article

             अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के लक्ष्यों को लेकर तो उनके विरोधी भी गलत नहीं मानते। इस देश में शायद ही कोई आदमी हो यह नहीं चाहता हो कि देश में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो। अन्ना हजारे ने जब पहली बार अनशन प्रारंभ किया तो उनको व्यापक समर्थन मिला। किसी आंदोलन या अभियान के लिये किसी संगठन का होना अनिवार्य है मगर अन्ना दिल्ली अकेले ही मैदान में उतर आये तो उनके साथ कुछ स्वयंसेवी संगठन साथ हो गये जिसमें सिविल सोसायटी प्रमुख रूप से थी। इस संगठन के सदस्य केवल समाज सेवा करते हैं ऐसा ही उनका दावा है। इसलिये कथित रूप से जहां समाज सुधार की जरूरत है वहां उनका दखल रहता है। समाज सुधार एक ऐसा विषय हैं जिसमें अनेक उपविषय स्वतः शामिल हो जाते हैं। इसलिये सिविल सोसायटी के सदस्य एक तरह से आलराउंडर बन गये हैं-ऐसा लगता है। यह अलग बात है कि अन्ना के आंदोलन से पहले उनकी कोई राष्ट्रीय छवि नहंी थी। अब अन्ना की छत्रछाया में उनको वह सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसकी कल्पना अनेक आम लोग करते हैं। इसलिये इसके सदस्य अब उस विषय पर बोलने लगे हैं जिससे वह जुड़े हैं। यह अलग बात है कि उनका चिंत्तन छोटे पर्दे पर चमकने तथा समाचार पत्रों में छपने वाले पेशेवर विद्वानों से अलग नहीं है जो हम सुनते हैं।
           बहरहाल बात शुरु करें अन्ना हजारे से जुुड़ी सिविल सोसायटी के सदस्य पर हमले से जो कि वास्तव में एक निंदनीय घटना है। कहा जा रहा है कि यह हमला अन्ना के सहयोगी के जम्मू कश्मीर में आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने पर दिया गया था जो कि विशुद्ध रूप से पाकिस्तान का ऐजंेडा है। दरअसल यह संयुक्त राष्ट्र में पारित उस प्रस्ताव का हिस्सा भी है जो अब धूल खा रहा है और भारत की सामरिक और आर्थिक शक्ति के चलते यह संभव नहीं है कि विश्व का कोई दूसरा देश इस पर अमल की बात करे। ऐसे में कुछ विदेशी प्रयास इस तरह के होना स्वाभाविक है कि भारतीय रणनीतिकारों को यह विषय गाहे बगाहे उठाकर परेशान किया जाये। अन्ना के जिस सहयोगी पर हमला किया गया उन्हें विदेशों से अनुदान मिलता है यह बात प्रचार माध्यमों से पता चलती रहती है। हम यह भी जानते हैं कि विदेशों से अनुदान लेने वाले स्वैच्छिक संगठन कहीं न कहीं अपने दानदाताओं का ऐजेंडा आगे बढ़ाते हैं।
           हमारे देश में लोकतंत्र है और हम इसका प्रतिकार हिंसा की बजाय तर्क से देने का समर्थन करते हैं। कुछ लोगों को यह लगता है कि मारपीट कर प्रतिकार करें तो वह कानून को चुनौती देते हैं। इस प्रसंग में कानून अपना काम करेगा इसमें भी कोई शक नहीं है।
           इधर अन्ना के सहयोगी पर हमले की निंदा का क्रम कुछ देर चला पर अब बात उनके बयान की हो रही है कि उसमें भी बहुत सारे दोष हैं। कहीं न कहीं हमला होने की बात पीछे छूटती जा रही है। एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हम अपनी बात कहें तो शायद कुछ लोगों को अजीब लगे। हमने अन्ना के सहयोगी के इस बयान को उन पर हमले के बाद ही सुना। इसका मतलब यह कि यह बयान आने के 15 दिन बाद ही घूल में पड़ा था। कुछ उत्तेजित युवकों ने मारपीट कर उस बयान को पुनः लोकप्रियता दिला दी। इतनी कि अब सारे टीवी चैनल उसे दिखाकर अपना विज्ञापनों का समय पास कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि कहीं यह उत्तेजित युवक यह बयान टीवी चैनलों पर दिखाने की कोई ऐसी योजना का अनजाने में हिस्सा तो नहीं बन गये। संभव है उस समय टीवी चैनल किसी अन्य समाचार में इतना व्यस्त हों जिससे यह बयान उनकी नजर से चूक गया हो। यह भी संभव है कि दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई बैंगलौर या अहमदाबाद जैसे महानगरों पर ही भारतीय प्रचार माध्यम ध्यान देते हैं इसलिये अन्य छोटे शहरों में दिये गये बयान उनकी नजर से चूक जाते हैं। इस बयान का बाद में जब उनका महत्व पता चलता है तो कोई विवाद खड़ा कर उसे सामने लाने की कोई योजना बनती हो। हमारे देश में अनेक युवक ऐसे हैं जो अनजाने में जोश के कारण उनकी योजना का हिस्सा बन जाते हैं। यह शायद इसी तरह का प्रकरण हो। हमला करने वाले युवकों ने हथियार के रूप में हाथों का ही उपयोग किया इसलिये लगता है कि उनका उद्देश्य अन्ना के सहयोगी को डराना ही रहा होगा। ऐसे में मारपीट कर उन्होंनें जो किया उसके लिये उनको अब अदालतों का सामना तो उनको करना ही होगा। हैरानी की बात यह है कि हमला करने वाले तीन आरोपियों में से दो मौके से फरार हो गये पर एक पकड़ा गया। जो पकड़ा गया वह अपने कृत्य पर शार्मिंदा नहीं था और जो फरार हो गये वह टीवी चैनलों पर अपने कृत्य का समर्थन कर रहे थे। हैरानी की बात यह कि उन्होंने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रति समर्थन देकर अपनी छवि बनाने का प्रयास किया। इसका सीधा मतलब यह था कि वह अन्ना की आड़ में उनके सहयोगी के अन्य ऐजेंडों से प्रतिबद्धता को उजागर करना चाहते थे। वह इसमें सफल रहे या नहीं यह कहना कठिन है पर एक बात तय है कि उन्होंने अन्ना के सहयोगी को ऐसे संकट में डाल दिया है जहां उनके अपने अन्य सहयोगियों के सामने अपनी छवि बचाने का बहुत प्रयास करना होगा। संभव है कि धीरे धीरे उनको आंदोलन की रणनीतिक भूमिका से प्रथक किया जाये। कोई खूनखराबा नहीं  हुआ यह बात अच्छी है पर अन्ना के सभी सहयोगियों के सामने अब यह समस्या आने वाली है कि उनकी आलराउंडर छवि उनके लिये संकट का विषय बन सकती है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन निर्विवाद है पर जम्मू कश्मीर, देश की शिक्षा नीति, हिन्दुत्ववाद, धर्मनिरपेक्षता तथा आतंकवाद जैसे संवेदनशील विषयों पर अपनी बात सोच समझकर रखना चाहिए। यह अलग बात है कि लोग चिंत्तन करने की बजाय तात्कालिक लोकप्रियता के लिये बयान देते हैं। यही अन्ना के सहयोगी ने किया। स्थिति यह है कि जिन संगठनों ने उन पर एक दिन पहले उन पर हमले की निंदा की दूसरे दिन अन्ना के सहयोगी के बयान से भी प्रथक होने की बात कह रहे हैं। अन्ना ने कुशल राजनीतिक होने का प्रमाण हमले की निंदा करने के साथ ही यह कहकर भी दिया कि मैं हमले की असली वजह के लिये अपने एक अन्य सहयेागी से पता कर ही आगे कुछ कहूंगा।
            आखिरी बात जम्मू कश्मीर के बारे में की जाये। भारत में रहकर पाकिस्तान के ऐजेंडे का समर्थन करने से संभव है विदेशों में लोकप्रिय मिल जाये। कुछ लोग गला फाड़कर चिल्लाते हुए रहें तो उसकी परवाह कौन करता है? मगर यह नाजुक विषय है। भारत का बंटवारा कर पाकिस्तान बना है। इधर पेशेवर बुद्धिजीवी विदेशी प्रायोजन के चलते मानवाधिकारों की आड़ में गाहे बगाहे जनमत संग्रह की बात करते हैं। कुछ ज्ञानी बुद्धिजीवी इस बात को जानते हैं कि यह सब केवल पैसे का खेल है इसलिये बोलते नहीं है। फिर बयान के बाद मामला दब जाता है। इसलिये क्या विवाद करना? अलबत्ता इन बुद्धिजीवियों को कथित स्वैच्छिक समाज सेवकों को यह बता दें कि विभाजन के समय सिंध और पंजाब से आये लोग हिन्दी नहीं जानते थे इसलिये अपनी बात न कह पाये न लिख पाये। उन्होंने अपनी पीड़ा अपनी पीढ़ी को सुनाई जो अब हिन्दी लिखती भी है और पढ़ती भी है। यह पेशेवर बुद्धिजीवी अपने उन बुजुर्गों की बतायी राह पर चल रहे हैं जिसका सामना बंटवारा झेलने वाली पीढ़ी से नहीं हुआ मगर इनका होगा। बंटवारे का सच क्या था? वहां रहते हुए और फिर यहां आकर शरणार्थी के रूप में कैसी पीढ़ा झेली इस सच का बयान अभी तक हुआ नहीं है। विभाजन से पूर्व पाकिस्तान में सिंध, बलूचिस्तान और सिंध प्रांतों में क्या जनमत कराया गया था? पाकिस्तान जम्मू कश्मीर का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार नहीं करता और जनमत संग्रह की मांग करने वाले खुले रूप से उससे हमदर्दी रखते हैं। ऐसे में जनमत संग्रह कराने का मतलब पूरा कश्मीर पाकिस्तान को देना ही है। कुछ राष्ट्रवादियों का यह प्रश्न इन कथित मानवाधिकारियों के सामने संकट खड़ा कर सकता है कि ‘सिंध किसके बाप का था जो पाकिस्तान को दे दिया या किसके बाप का है जो कहता है कि वह पाकिस्तान का हिस्सा है’। जम्मू कश्मीर को अपने साथ मिलाने का सपना पूरा तो तब हो जब वह पहले बलूचिस्तान, सीमा प्रांत और सिंध को आजाद करे जहां की आग उसे जलाये दे रही है। यह तीनों प्रांत केवल पंजाब की गुलामी झेल रहे हैं। इन संकीर्ण बुद्धिजीवियों की नज़र केवल उस नक्शे तक जाती है जो अंग्रेज थमा गये जबकि राष्ट्रवादी इस बात को नहीं भूलते कि यह धोखा था। संभव है कि यह सब पैसे से प्रायोजित होने की वजह से हो रहा हो। इसी कारण इतिहास, भूगोल तथा अपने पारंपरिक समाज से अनभिज्ञ होकर केवल विदेशियों से पैसा देकर कोई भी कैसा भी बयान दे सकता है। यह लोग जम्मू कश्मीर पर बोलते हैं पर उस सिंध पर कुछ नहीं बोलते जो हमारे राष्ट्रगीत में तो है पर नक्शे में नहीं है।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, October 1, 2011

महात्मा गांधी का दर्शन और भारत की वर्तमान स्थिति-2 अक्टुबर गांधी जयंती पर विशेष हिन्दी लेख (mahatma gandhi ka darshan nirapad nahin tha-hindi lekh on 2 october gandhi jayanti)

         कल दो अक्टोबर देश में गांधी जयंती मनाई जायेगी। प्रसंगवश इस दिन भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री का भी जन्म दिन मनाया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इतिहास में किसी भी महापुरुष का नाम बिना किसी योग्यता, कठिन परिश्रम या त्याग के दर्ज नहीं होता पर यह भी सत्य है कि एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन समय समय पर अनेक लोग अपने ढंग से करते हैं। एतिहासिक पुरुषों के परमधाम गमन के तत्काल बाद सहानुभूति के चलते जहां उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन करने वाले अत्यंत सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाते हैं। उस समय कोई प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं करता पर समय के साथ ही एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व का प्रभाव क्षीण होने लगता है तब विचारवान लोग प्रतिकूल टिप्पणियां भले न करें पर कुछ प्रश्न उठाने ही लगते हैं।
          गांधीजी के दर्शन  पर भी अनेक सवाल उठते हैं तो श्रीलाल बहादुर शास्त्री के बारे में भी यह पूछा जाता है कि पाकिस्तान से युद्ध जीतने के बाद भी उन्होंने मास्को जाकर सोवियत संघ की मध्यस्थता स्वीकार कर हारने जैसा काम क्यों किया? बहुत समय तक यह सवाल किसी ने नहीं पूछा था पर जब कारगिल युद्ध के बंद होने के बाद यह बात उठी थी तब शास्त्री जी की भूमिका सामने आयी थी भले ही उस समय सीधे किसी ने उनका नाम लेकर आक्षेप नहीं किया गया। फिर यह सवाल चर्चा में अधिक नहीं आया पर विचारवान लोगों के लिये इतना ही बहुत था। पाकिस्तान को परास्त करने के बाद विजेता भारत के प्रधानमंत्री का इस तरह मास्को जाकर पाकिस्तान के हुक्मरानों से समझौता करना वाकई देश के लिये कोई सम्मान की बात नहीं थी-यह बात आज अनेक लोग मानते हैं। इस समझौते में पाकिस्तान की जमीन बिना कुछ लिये दिये वापस कर दी गयी थी।
            गांधीजी को विश्व में महान सम्मान प्राप्त हुआ है पर भारतीय जनमानस में अब उनकी छवि क्षीण हो रही है फिर अब फिल्म, क्रिकेट और अन्य प्रतिष्ठित क्षेत्रों में सक्रिय नये नये महापुरुषों का भी प्रचार हो रहा है। सरकारी और गैर सरकारी तौर पर गांधी जयंती के समय खूब प्रचार होने के साथ ही अनेक कार्यक्रम भी होते हैं पर लगता नहीं कि आज के कठिन समय का सामना कर रहा भारतीय जनमानस उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा लेता हो। गांधीजी को राजनीतक संत कहना उनके दर्शन को सीमित दायरे में रखना है। मूलतः गांधी जी एक सात्विक प्रवृत्ति के धार्मिक विचार वाले व्यक्ति थे। निच्छल हªदय और सहज स्वभाव की वजह से उनमें उच्च जीवन चरित्र निर्माण हुआ। एक बात तय है कि उन्होंने भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने का जब अभियान प्रारंभ किया होगा तब उनका लक्ष्य आत्मप्रचार पाना नहीं बल्कि देश के आम इंसान का उद्धार करना रहा होगा। अलबत्ता अपने आंदोलन के दौरान उन्होंने इस बात को अनुभव किया होगा कि उनके सभी सहयोग उनकी तरह निष्काम नहीं है। इसके बावजूद वह इस बात को लेकर आशावदी रहे होंगे कि समय के अनुसार बदलाव होगा और अपने ही देश के भले लोग राज्य अच्छी तरह चलायेंगे। कालांतर में जो हुआ वह हम सब जानते हैं। उनके सपनों का भारत कभी न बना न बनने की आशा है। स्थिति यह है कि अनेक अनुयायी अब दूसरे स्वाधीनता आंदोलन का बात करने लगे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि गांधी जी का सपना पूरा नहीं हुआ और जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन प्रारंभ किया वह पूरा नहीं हुआ। दूसरे शब्दों में 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी केवल एक ऐसा प्रतीक है जिसकी स्मृतियां केवल उस दिन मनाये जाये वाले कार्यक्रमों में ही मिलती है। जमीन पर अभी गांधीजी के सपनों का पूरा होना बाकी है।
        यहां हम गांधीजी के व्यक्तित्व और कृतित्व की आलोचना नहीं कर रहे क्योंकि हम जैसा मामूली शख्स भला उन पर क्या लिख सकता है? अलबत्ता देश के हालात देखकर वैचारिक रूप से गांधी दर्शन अब निरापद नहीं माना जा सकता है। सबसे पहला सवाल तो यह है कि भारत का स्वाधीनता आंदोलन अंततः एक राजनीतिक प्रयास था जिसमें राजकाज भारतीयों के हाथ में होने का लक्ष्य तय किया गया था। दूसरी बात यह कि गांधीजी ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध आंदोलन किया था जिस पर भारतीयों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने का आरोप था। इसके अलावा देश की समस्याओं के प्रति अंग्रेज सरकार की प्रतिबद्धता पर भी संदेह जताया गया था। इसका अर्थ सीधा है कि गांधीजी एक ऐसी सरकार चाहते थे जो देश के लोगों की होने के साथ ही जनहित का काम करे। ऐसे में राजकाज के पदों पर बैठने वाले महत्वपूर्ण लोगों की गतिविधियां महत्वपूर्ण होती हैं। तब गांधी जी ने राजकाज प्रत्यक्ष रूप से चलाने के लिये कोई पद लेने से इंकार क्यों किया? क्या वह इन पदों को भोग का विषय समझते थे या दायित्व निभाने के लिये अपने अंदर क्षमता का अभाव अनुभव करते थे। अगर यह दोनों बातें नहीं थी तो क्या उनको भरोसा था कि जो लोग राजकाज देखेंगे वह उनके रहते हुए अच्छा काम ही करेंगे? क्या उनको यकीन था कि जिन लोगों को वह राजकाज का जिम्म सौंपेंगे वह अच्छा ही काम करेंगे?
यकीनन सरकार का सैद्धांतिक रूप उनके सपनों में रहा हो पर व्यवहारिक  रूप से उनको इसका कोई अनुभव नहीं था। वह राजनीतिक के सैद्धांतिक पक्ष और व्यवहारिक स्थिति के अंतर को नहीं जानते थे। उन्होंने एक ऐसा राजनीतिक अभियान शुरु किया जो कालांतर में सीमित लक्ष्य प्राप्त कर समाप्त हो गया। आज उसी प्राप्त लक्ष्य को भी चुनौती मिल रही है। गांधी जी के अनुयायी और आज के महानायक अन्ना हजारे मानते हैं कि आज का शासन भी अंग्रेजों जैसा ही है। श्री अन्ना हजारे स्वयं भी कोई पद नहीं लेना चाहते पर देश के स्वच्छ और विकसित होने की का जिम्मा सरकार का ही मानते हैं। तब ऐसा लगता है कि एक राजनीति शास्त्र का ज्ञान न रखने वाला व्यक्ति भी राजनीति कर सकता है या राजकाज कोई पद संभाल सकता है। हमारा तो मानना है कि अंग्रेजों के विरुद्ध गांधीजी के आंदोलन के बारे में अब इतिहास पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं अन्ना जी का आंदोलन बता रहा है कि उस समय क्या क्या हुआ होगा?
        28 अगस्त को अन्ना साहिब का जनलोकपाल विधेयक लाने संबंधी आंदोलन समाप्त हुआ। हासिल कुछ नहीं हुआ पर उन्होंने कहा कि हमें आधी जीत मिली है। तब हम जैसे लोग सड़कों पर घूमते हुए उस आधी जीत को ढूंढते हुए सोच रहे थे कि 16 अगस्त को भी कोई हम जैसा शख्स रहा होगा जो उस आजादी को ढूंढ रहा होगा जिसका दावा उस समय किया जा रहा था। बहरहाल गांधीजी के आंदोलन के पीछे उस समय के धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, तथा आर्थिक शिखरों पर बैठे लोग रहे होंगे जो अपने हित साधन के लिये ही ऐसी आजादी चाहते होंगे ताकि वह देश के आम इंसान को गुलाम बनाये रख सके। पता नहीं गांधीजी यह देख पाये या नहीं पर इतना तय है कि वह जैसा भारत चाहते थे वैसा बन नहीं पाया। आखिरी बात यह है कि गांधीजी सात्विक प्रवृत्ति के थे और उनका आंदोलन राजस वृत्ति का था। बात अगर राजनीति की है तो उसमे सात्विक प्रवृत्ति की आशा करना व्यर्थ है। यह राजसी वृत्ति वाले लोगों का काम है। राजसी वृत्ति बुरी नहीं है बशर्त व्यक्ति अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिये उचित ढंग से कार्य करे। मुश्किल यह है कि तामसी वृत्ति वाले लोग अब राजकाज करने लगे हैं। भारत में दूसरी भी समस्या है। राजसी लोगों को स्वार्थी जानकर लोग हªदय से सम्मान नहीं करते जबकि सामूहिक नेतृत्व करना उन्हीं के बूते का होता है। सात्विक लोगों को समाज सम्मान देता है पर वह निष्काम होने के कारण राजकाज का काम नहीं करते। यही कारण है कि राजसी वृत्ति के लोग सात्विक लोगों को ढाल बनाकर आगे चलते हैं ताकि समाज उनका नेतृत्व और शासन स्वीकार करे। इसी कारण पूरे विश्व के राष्ट्राध्यक्ष अपने संपर्क धार्मिक नेताओं  से रखते हैं। गांधी को हमने देखा नहीं और अन्ना से कभी मिले नहीं पर प्रचार माध्यमों में देखकर हमने अनुभव किया वह लिख दिया। इस अवसर पर महात्मा गांधी जी और शास्त्री जी को हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि!




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Sunday, January 30, 2011

जनआंदोलन और धार्मिक व्यवस्था-हिन्दी लेख (janandolan aur dharmik vyavastha-hindi lekh)

टुयूनिशिया तथा मिस्त्र की घटनाओं में जनआंदोलनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई जरूर देती है पर शक की पूरी यह गुंजायश है कि विश्व में अप्रत्यक्ष रूप से शासन कर रहे पूंजीपतियों की इसमें कोई न कोई योगदान हो सकता है। संभव है कि यह वर्ग महसूस कर रहा हो कि तेल क्षेत्रों में उसका काम चलता रहे इसलिये जनता में फैले विद्रोह को हवा देकर अपने नये मुखौटे खाड़ी तथा अरब क्षेत्रों में लाये जायें। इससे उनको दो लाभ होंगे कि एक तो नये मुखोटे जनता को ताजा लगेंगे कि दूसरा यह कि पुराने मुखोटे इन पूंजीपतियों को अभी भी केवल एक प्रयोजक मानकर राजकाज के काम में उपेक्षा करते होंगे इसलिये नये मुखौटे लाकर उनको अपना सीधा वर्चस्प स्थापित किया जाये क्योंकि वह औकात से अधिक पद मिल जाने के कारण हमेशा दबे रहेंगे।
संभव ऐसा न हो। वाकई जनविद्रोह हो रहा हो, पर भारतीय प्रचार माध्यम जिस तरह दुनियां के पचास तानाशाहों के लिये खतरा बता रहे हैं वह कहीं न कहंी दुनियां के पूंजीपति और अपराधियों के गिरोह में व्याप्त एक सोच का प्रतिबिंब भी हो सकते हैं जो प्रजा तथा राज्य को भरमाये रखने के लिये हमेशा नये मुखौटे तलाशता है। यह तानाशाह अफ्रीकी तथा खाड़ी देशों में हैं। इनमें अधिकतर धार्मिक राज्य हैं और उन पर अपने धर्म के आधार पर आतंकवाद को शह देने का संदेह भी किया जाता है। मुख्य बात यह है कि प्रत्यक्ष भले ही इन राष्ट्रों के वर्तमान प्रमुख भ अमेरिका का पिछलग्गू होने का दावा न करें या संभव है इनमें से कुछ अमेरिका का विरोधी होने का नाटक करते हों पर कमोबेश सभी उसके बंधक हैं। यह सभी तेल उत्पादक राष्ट्र हैं जहां अमेरिकी कंपनियों का प्रभुत्व हैं जो कि अपने व्यापार के लिये राजनीति संस्थाओं को अपने कब्जे में लेकर काम करती हैं। कई जगह तो अमेरिकी सेना अपना डेरा डाले बैठी है। अधिकतर तेल उत्पादक राष्ट्र तानाशाही का शिकार हैं भले ही कई जगह लोकतंत्र का दिखावा किया जाता है। मुख्य बात यह है कि यह सभी धर्म पर आधारित संवैधानिक व्यवस्था वाले राष्ट्र हैं। मगर जिस लोकतंत्र के लिये वहां जनआंदोलन हो रहे हैं कहीं न कहंी उसके पीछे वहां के धार्मिक तत्वों की सक्रियता दिखाई दे रही है उससे नहीं लगता कि अगर वहां तख्ता पलट हुआ भी तो सही मायने में लोकतंत्र आयेगा। ईरान इसका एक उदाहरण है जहां राजशाही पलटकर लोकतंत्र के लिये आंदोलन एक मौलवी ने किया और बाद में वहां का धार्मिक तानाशाह बन बैठा।
मिस्र में जनविद्रोह के लिये धार्मिक स्थलों का उपयोग हुआ। दिन भी शुक्रवार का चुना गया। एशियाई देशों में धर्म की महत्ता है पर मुश्किल यह है कि जब इसकी आड़ लेकर कोई आंदोलन होता है तो वह धार्मिक ठेकेदारों के नेतृत्व में ही होता है। वैसे भारतीय प्रचार माध्यमों ने सीधे नाम नहीं लिया पर सऊदी अरब की तरफ बदलाव के उनके संकेत कोई व्यवाहारिक नहीं लगते। वहां के शासक धार्मिक आधार पर सबसे ज्यादा मज़बूती से टिके हैं। दुनियां के एक सौ बीस करोड़ से अधिक लोगों का पवित्र स्थान वहंीं है। तानाशाही का अंत अगर वहां होता है तो वह संसार का नक्श पलट सकता है। वहां जन आंदोलन की आहट तो है पर वह गुर्राहट नहीं है। वैश्विक आतंकवाद में गैर अमेरिकी विरोधी संगठनों को उसका खुला प्रश्रय मिलता है। भारत के अनेक वांछित लोग वहां जाते हैं। मज़े की बात यह है कि भारतीय रणनीतिकार कभी उसका नाम नहीं लेकर पाकिस्तान तक ही अपना लक्ष्य रखते हैं। सऊदी अरब में ऐसा कोई जनआंदोलन होता है तो उसके एतिहासिक परिणाम होंगे क्योंकि तब वहां जो दौर चलेगा वह पूरे विश्व को प्रभावित करेगा।
पश्चिमी देशों में धर्म की नाम पर ही तानाशाही है और राष्ट्र प्रमुख अपनी जनता का ध्यान अपनी समस्याओं से हटाकर दूसरी जगह धर्म की जंग कराकर इसलिये लगाते हैं ताकि वह अंधविश्वास में पड़ी रहे। वहां के शेखों का धर्म केवल पैसा बनाना तथा उसके लिये चाहे जैसी जुगाड़ करना है। वह अपरे देशों के सबसे बड़े अमीर हैं तो वहां शासन भी करते हैं। दुनियां भर में लोकतंत्र का हामी अमेरिका ही इन तानाशाह शेखों पर अपना हाथ रखे हुए है। ऐसे में अगर कहीं आंदोलन हो रहा है तो अमेरिका रणीनीतिकार आंखें मूंदें नहीं बैठे होंगे। संभव है कि वह कोई नया मुखोटा ट्यूनिशिया और मिस्र में लाना चाहते हों। यह भी हो सकता है कि आंदोलन के चलते वह कोई नया मुखोटा वहां लाने की योजना बना रहे हों। मिस्र में स्थिति खराब है पर उसमें जल्दी सुधार आयेगा यह संभव नहीं लगता। वह एक तेल उत्पादक राष्ट्र और वहां सक्रिय पूंजीपतियों का समूह कहीं न कहीं अपनी भूमिका निभा रहा होगा और यह यकीन करना कठिन है कि तख्ता पलट से उनके हितों पर कोई आंच आयेगी।
इन दोनों जगहों पर हो रहे जनआंदोलनों का अन्य देशों में विस्तार लेने की अभी कोई संभावना नहीं दिखती जैसा कि भारतीय प्रचार माध्यम बता रहे हैं। इसका कारण यह है कि पूंजीपतियों, अपराधियों तथा उनके पाले बुद्धिजीवी समूहों ने विश्व को इस तरह टुकड़ों में बांट दिया है कहीं भी सामान्य जनों में एकता संभव नहीं है-किसी राष्ट्रप्रमुख को हटाने के लिये आंदोलन चलाने के लिये कतई नहीं। ऐसे में वहां जो आंदोलन चल रहे हैं वहां व्यवस्थापक तो बदल सकते हैं पर व्यवस्था नहीं। इन आंदोलनों को विश्व में किसी नयी आशा का संकेत भी नहीं माना जा सकता क्योंकि कहीं न कहीं इन देशों में धर्म आधारित व्यवस्था रहनी है जो आंतकवाद का मार्ग प्रशस्त करती है। धार्मिक स्थलों पर अवकाश के दिन एकत्रित होकर लोगों के आंदोलन करने से तो यही निष्कर्ष निकलता है। आगे क्या होगा यह देखने वाली बात होगी।
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Sunday, December 12, 2010

प्रचार की दलाली में समाचार-हिन्दी लेख (prachar ki dalali mein samchar-hindi lekh)

जब दर्द बढ़ जाये तो इंसान कहां जाये? खास तौर से जिसके चिंतन तत्व जिंदा हों उसके लिये अपनी मानसिक हलचल पर नियंत्रण रखना ऐसी हालत में दुष्कर कार्य हो जाता है जब अपराध पर दान, बेईमानी पर ईमान तथा भ्रष्टाचार पर शिष्टाचार का लेबल इस तरह लग जाता है कि समाज के आम इंसान भी उसे नहीं देखने और समझने में अपना समय बर्बाद नहीं चाहते। ऐसा लगता है जैसे कि पूरे देश ने यह स्वीकार कर लिया है कि कलियुग में सतयुगी पुरुषों का होना संभव नहीं है।
ऐसे में हंसी सूझती है। इधर अमेरिका के विकिलीक्स के खुलासों का प्रकरण चल रहा है तो अपने यहां भी घोटालों का टेलीफोन टेप प्रकरण कम दिलचस्प नहंी है। अंतर यह है कि विकीलीक्स के खुलासे अमेरिका के रणनीतिकारों के छिपे सोच को बताते हैं जबकि भारत के टेलीफोन टेप घोटालों का सच बताते हैं। इधर एक पत्रिका ने दावा किया है कि उसके पास उन टेपों के अभी ढेर सार संस्करण हैं जिनको लोग नहंी जान पाये। अब हमारी मानसिक हलचल में कभी विकीलीक्स तो कभी टेप का बात आती जाती रहती है। सच तो यह है कि भारतीय टेपों के आगे विकीलीक्स के खुलासे कम मज़ेदार दिख रहे हैं।
अमेरिकी रणनीतिकारों की नीति चाहे कैसी भी हो पर उनका सच कभी वैसे ही नहीं छिपता यह अलग बात है कि विकीलीक्स उसके प्रमाण प्रस्तुत कर रहा है। उसमें किसी बाज़ार के व्यक्तित्व पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। मगर भारतीय टेलीफोन टेप प्र्रकरण ने तो बाज़ार के अनेक व्यक्त्तिवों को भद्द पिटवा दी है। कथित धर्मनिरपेक्ष विचारक, महान पत्रकार, ईमानदार उद्योगपति तथा महान समाजसेवकों के साथ ही अनेक राजकीय व्यक्तित्वों पर छींटे पड़े हैं। एक तरह से स्वच्छ छवि का जो कथित किला था वह ढह गया है।
एक जनसंपर्क कंपनी की संचालिका के साथ वार्ता वाले यह टेप अनेक बातों को लेकर चौंकाते हैं। बड़े बड़े दिग्गज़ उसके सामने नतमस्तक हैं। एक कथित पत्रकार जो कई बरसों से महान होने की उपाधि धारण किये हुए थे उनकी वार्ता ने पलभर में उनका आभामंडल ध्वस्त कर दिया। इन पत्रकार महोदय ने एक उद्योगपति के लिये ऐसे शब्द का प्रयोग किया कि हम नाम न लिखने के बावजूद इस पाठ में उल्लेख नहीं सकते। इसके दूरगामी परिणाम होंगे। कथित महान पत्रकार जो दलाली के दम पर इतनी दूर तक चले आये अब उनके लिये आगे की राह कठिन होने वाली है। जब वह स्वयं मानते हैं कि जब दो भ्राता उद्योगपति किसी विषय पर एक साथ शामिल हैं तो यह संभव नहीं है कि एक से बैर लेकर वह अपनी दलाली यात्रा अधिक समय तक जारी रख पायेंगे।
यह पत्रकार महोदय एक हिन्दी समाचार चैनल के सिरमौर थे और सुना है कि उन्होंने वहां से इस्तीफा दे दिया है। वैसे उन्होंने उद्योगपति के लिये जो शब्द प्रयोग किया था वह अपने चैनल पर उपयोग नहंी करते थे क्योंकि अंततः हिन्दी के समाचार और मनोरंजन चैनल ऐसे ही उद्योगपतियों के दम पर चल रहे हैं।
वैसे हम लोग समाचार या मनोरंजन चैनलों के सामने दिख रहे चैनलों की गतिविधियों पर टिप्पणियां करते हैं पर यह भूल जाते हैं कि उनको अपने प्रबंधकों की बनाई नीतियों पर ही चलना पड़ता है। प्रबंधक जहां से विज्ञापन प्राप्त या कोई अन्य आर्थिक लाभ प्राप्त करते हैं उसका पता उनके कर्मचारियों को स्वतः जाता है। यह भी पता होता है कि अपने आर्थिक स्त्रोतों पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी उनकी नौकरी भी ले सकती है। ऐसे में उनको हमेशा ही उसी नीति पर चलना पड़ता है जिसका अनुकरण प्रबंधन करता है।
हम अपने देश की बृहद अर्थव्यवस्था को देखें तो उनके से कुछ खास क्षेत्र ही हैं जो भारी आय प्रदान करते हैं। सारा गोलमाल भी उन्हीं में होता है। उनमें सक्रिय धनाढ्य लोग हर तरफ अपना हाथ मारते हैं। वह किसी धंधे के जानकार हों या नहीं उसमें सक्रिय हो जाते हैं। आप बताईये कपड़ा, स्टील, ट्रक और ट्रेक्टर का निर्माण करने वाले आखिर टेलीफोन के क्षेत्र में कैसे आ गये? स्पष्टतः उनकी शक्ति किसी क्षेत्र में विशेषज्ञता या ज्ञान नहीं बल्कि पैसा ही होता है। पैसे से वह इंसान खरीदते हैं और उसका ईमान उनके यहां गिरवी हो जाता है। उनके देश और विदेश के आर्थिक स्त्रोतों का पता सभी को होता है। ऐसे में उनसे विज्ञापन पाने वाले अपने देशी आकाओं को नहीं उनके विदेशी मित्रों की प्रसन्नता का भी ख्याल रखते हैं।
बहरहाल प्रचार माध्यमों की आड़ में दलाली कर रहे पत्रकार हों या सफेदपोश उद्योगपति इस टेप कांड से आपस में ही उलझ रहे हैं। टेलीफोन टेप के अभी बहुत सारे अंश आने बाकी हैं। ऐसे में किस किसका आभामंडल बिखरेगा पता नहीं है। एक आम आदमी और लेखक के रूप में हम केवल इस टेलीफोन टेपों की जानकारी पर नज़र रखते हैं। यह सांप बिच्छुओं का आपसी द्वंद्व है जो देखने में मज़ा आ रहा है। यह द्वंद्व पहले भी होता था पर नज़र नहीं आता पर अब अंतर यह है कि चौराहे पर चर्चा होने लगी है। पहले दलाली और हलाली में लगे लोग कभी एक दूसरे पर बंद कमरों में या टेलीफोन पर पर आक्षेप करते होंगे पर प्रत्यक्ष कभी उनके टकराव का प्रचार नहीं होता था। यह टेलीफोन टेप उनको चौराहे पर लाया है। अतः उनकी लड़ाईयां भी सरेआम होंगी। ऐसे में आशा है कि आगे भी यह मनोरंजक लड़ाई सामने आती रहेगी, खासतौर से जब चैनलों में मसीहाई छवि बनाये लोगों का आभा मंडल जब बिखरता नज़र आयेगा। आखिरी बात यह है कि वैसे तो हम अनुमान ही करते थे कि हम जैसे लेखक आखिर क्यों परंपरागत प्रचार माध्यमों में जगह नहीं बना पाते! अब समझ में आ गया है कि दलाली और हलाली का काम भी आना चाहिए लिखते चाहे कैसा भी हों? साथ में यह आत्मविश्वास भी बढ़ा है कि हम लिखने के मामले में उनसे तो ठीक हैं जो महानता की छवि धारण किसे हुए थे। अनेक कथित महान लेखकों के शिखर पर पहुंचने का क्या मार्ग है अब समझ में आ गया है। राजनीति और उद्योगपतियों की प्रशंसा में गुणगान करने पर समाज से आदमी दूर हो जाता है और भले ही वह प्रचार माध्यमों की बनाई दुनियां में आत्ममुग्ध होकर बैठा रहे पर सच जानता है। यही कारण है कि यह कथित प्रचार पुरुष आपस में मिलते हैं तो यही कहते हैं कि ‘हम कहां बड़े आदमी, केवल मित्रों की वजह से यहां पहुंचे हैं?’
बाकी समय वह अपने ही सच से भागते हैं, वजह उनकी कलम दलाली की बैसाखियों के सहारे चलती हैं और यही उनके आत्मविश्वास की मौत कारण भी होती है। इतना ही नहीं वह अपने विज्ञापन दाताओं के कहे बगैर उनके मित्र तथा विदेशियों की आलोचना से भी घबड़ाते हैं। इतना ही नहीं विज्ञापन दाताओं की शरण में रहने वाले खिलाड़ियांे, फिल्म अभिनेताओं तथा अभिनेत्रियों के जन्म दिन, मैत्री संबंधी प्रकरणों या अदाओं पर ही समाचार चैनलों के एक घंटे में से पचपन मिनट बर्बाद होते हैं। उससे भी ज्यादा रियल्टी चेनलों में निकाले गये पात्रों की ब्रेकिंग न्यूज देनी पड़ती है। निकाले गये पात्रों के साक्षात्कार देने पड़ते हैं। कभी किसी कार्यक्रम की निंदा कर भी उसे लोकप्रिय बनाने का प्रयास करना पड़ता है। सीधी बात यह कि प्रचार की दलाली में समाचार देकर वह अपने आपको पत्रकार कहते हैं पर सच तो वह स्वयं भी जानते हैं। जनता अब जानने लगी है।
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Thursday, April 15, 2010

किक्रेट में सब चलता है-हिन्दी व्यंग्य (it's cricekt-hindi satire article)

उफ! यह क्रिकेट है! इस समय क्रिकेट खेल को देखकर जो विवाद चल रहा है उसे देखते हुए दिल में बस यही बात आती है कि ‘उफ! यह क्रिकेट है!
इस खेल को देखते हुए अपनी जिंदगी के 25 साल बर्बाद कर दिये-शायद कुछ कम होंगे क्योंकि इसमें फिक्सिंग के आरोप समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपने के बाद मन खट्टा हो गया था पर फिर भी कभी कभार देखते थे। इधर जब चार वर्ष पूर्व इंटरनेट का कनेक्शन लगाया तो फिर इससे छूटकारा पा लिया।
2006 के प्रारंभ में जब बीसीसीआई की टीम-तब तक हम इसे भारत की राष्ट्रीय टीम जैसा दर्जा देते हुए राष्ट्रप्रेम े जज्बे के साथ जुड़े रहते थे-विश्व कप खेलने जा रही थी तो सबसे पहला व्यंग्य इसी पर देव फोंट में लिखकर ब्लाग पर प्रकाशित किया था अलबता यूनिकोड में होने के कारण लोग उसे नहीं पढ़ नहीं पाये। शीर्षक उसका था ‘क्रिकेट में सब कुछ चलता है यार!’
टीम की हालत देखकर नहंी लग रहा था कि वह जीत पायेगी पर वह तो बंग्लादेश से भी हारकर लीग मैच से ही बाहर आ गयी। भारत के प्रचार माध्यम पूरी प्रतियोगिता में कमाने की तैयारी कर चुके थे पर उन पर पानी फिर गया। हालत यह हो गयी कि उसकी टीम के खिलाड़ियों द्वारा अभिनीत विज्ञापन दिखना ही बंद हो गये। जिन तीन खिलाड़ियों को महान माना जाता था वह खलनायक बन गये। उसी साल बीस ओवरीय विश्व कप में भारतीय टीम को नंबर एक बनवाया गया-अब जो हालत दिखते हैं उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है क्योंकि क्रिकेट के सबसे अधिक ग्राहक (प्रेमी कहना मजाक लगता है) भारत में ही हैं और यहां बाजार बचाने के लिये यही किया गया होगा। उस टीम में तीनों कथित महान खिलाड़ी नहीं थे पर वह बाजार के विज्ञापनों के नायक तो वही थे। एक बड़ी जीत मिल गयी आम लोग भूल गये। कहा जाता है कि आम लोगों की याद्दाश्त कम होती है और क्रिकेट कंपनी के प्रबंधकों ने इसका लाभ उठाया और अपने तीन कथित नायकों को वापसी दिलवाई। इनमें दो तो सन्यास ले गये पर वह अब उस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में खेलते हैं। अब पता चला है कि यह प्रतियोगिता तो ‘समाज सेवा’ के लिये आयोजित की जाती है। शुद्ध रूप से मनोरंजन कर पैसा बटोरने के धंधा और समाज सेवा वह भी क्रिकेट खेल में! हैरानी होती है यह सब देखकर!
आज इस बात का पछतावा होता है कि जितना समय क्रिकेट खेलने में बिताया उससे तो अच्छा था कि लिखने पढ़ने में लगाते। अब तो हालत यह है कि कोई भी क्रिकेट मैच नहीं देखते। इस विषय पर देशप्रेम जैसी हमारे मन में भी नहीं आती। हम मूर्खों की तरह क्रिकेट देखकर देशप्रेम जोड़े रहे और आज क्रिकेट की संस्थायें हमें समझा रही हैं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। यह अलग बात है कि टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाओं जब भारत का किसी दूसरे देश से मैच होता है तो इस बात का प्रयास करते हैं कि लोगों के अंदर देशप्रेम जागे पर सच यह है कि पुराने क्रिकेट प्रेमी अब इससे दूर हो चुके हैं। क्रिकेट कंपनियों की इसकी परवाह नहीं है वह अब क्लब स्तरीय प्रतियोगिता की आड़ में राष्ट्रनिरपेक्ष भाव के दर्शक ढूंढ रहे हैं। इसलिये अनेक जगह मुफ्त टिकटें तथा अन्य इनाम देने के नाम कुछ छिटपुट प्रतियोगितायें होने की बातें भी सामने आ रही है। बहुत कम लोग इस बात को समझ पायेंगे कि इसमें जितनी बड़ी राशि का खेल है वह कई अन्य खेलों का जन्म दाता है जिसमें राष्टप्रेम की जगह राष्ट्रनिरपेक्ष भाव उत्पन्न करना भी शामिल है।
कभी कभी हंसी आती है यह देखकर कि जिस क्रिकेट को खेल की तरह देखा वह खेलेत्तर गतिविधियों की वजह से सामने आ रहा है। यह क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में ऊपर क्या चल रहा है यह तो सभी देख रहे हैं पर जिस तरह आज के युवा राष्ट्रनिरपेक्ष भाव से इसे देख रहे हैं वह चिंता की बात है। दूसरी बात जो सबसे बड़ी परेशान करने वाली है वह यह कि इन मैचों पर सट्टे लगने के समाचार भी आते हैं और इस खेल में राष्ट्रनिरपेक्ष भाव पैदा करने वाले प्रचार माध्यम यही बताने से भी नहीं चूकते कि इसमें फिक्सिंग की संभावना है। सब होता रहे पर दाव लगाने वाले युवकों को बर्बाद होने से बचना चाहिेए। इसे मनोंरजन की तरह देखें पर दाव कतई न लगायें। राष्ट्रप्र्रेम न दिखायें तो राष्ट्रनिरपेक्ष भी न रहे। हम तो अब भी यही दोहराते हैं कि ‘क्रिकेट में सब चलता है यार।’
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Monday, February 22, 2010

शब्द मंद हो गये हैं-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (real word is slow-hindi comic poem)

हर तरफ घूम रहे
हाथ में खंजर लिये लोग
किसी से हमदर्दी का उम्मीद करना
बेकार है
पहले कोई किसी के पीठ में
घौंपकर आयेगा,
फिर अपनी पीठ को बचायेगा।
भला कब किसी को
दर्द सहलाने का समय मिल पायेगा।
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दौलत, शौहरत और ताकत के
घोड़े पर सवार लोग
गिरोहबंद हो गये हैं।
हवा के एक झौंके से
सब कुछ छिन जाने का खौफ
उनके दिल में इस कदर है कि
आंखों से हमेशा उनके खून टपकता है,
आम आदमी की पीठ पर
हर पल बरसा रहे चाबुक
फिर भी वह कांटे की तरह
आंखों में खटकता है,
समाज की हालातों पर
सच लिखने वाले शब्द मंद हो गये हैं।

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Sunday, February 1, 2009

इस खबर से सनसनी नहीं फैलेगी-हास्य व्यंग्य

अपने बास के आदेश पर टीवी कैमरामैन और संवाददाता कि सनसनीखेज खबर को ढूंढने लगे। वह अपनी कार में बैठे सड़कों पर इधर उधर घूम रहे थे। अचानक उन्होंने देखा कि एक आदमी पैदल चलते हुए सड़क पर बने एक गड़ढे में गिर गया। संवाददाता ने कार चालक को कार रोकने का इशारा किया और कैमरामैन से कहा-‘‘जल्दी उतरो। वह आदमी गड़ढे में गिर गया है।’’
कैमरामैने ने कहा-‘अरे सर! आप भूल रहे हो कि हमारा काम खबरें देना हैं न कि लोगों की मदद करना। कम से कम किसी गिरे को उठाने का काम तो हमारा बिल्कुल नहीं है।’
संवाददाता ने कहा-‘अरे, बीच सड़क पर गड्ढा बन गया है। उसमें आदमी गिर गया है। इस खबर से सनसनी फैल सकती है और नहीं फैलेगी तो गड्ढे की बदौलत हम उसे बना लेंगे। आदमी की मदद के लिये थोड़ी ही हम लोग चल रहे हैं।’
दोनों उतर पड़े। मगर तब तक वह आदमी वहां से उठ खड़ा हुआ और अपनी राह चलने लगा। संवाददाता उसके पास पहुंच गया और बोला-‘अरे, आप भी कमाल करते हैं। सड़क पर बने गड्ढे में गिर पड़े और बिना हल्ला मचाये चले जा रहे हैं। जरा रुकिये!’
उस आदमी ने कहा-‘भाई साहब, मुझे जल्दी जाना है। उधार वाले पीछे पड़े रहते हैं। अच्छा हुआ जल्दी उठ गया वरना अधिक देर लगाता तो हो सकता है कि यहां से कोई लेनदार गुजरता तो तकादा करने लग जाता।’
संवाददाता ने कहा-‘उसकी चिंता आप मत करिये। हम समाचार दिखाने वाले लोग हैं। किसी की हिम्मत नहीं है कि कोई हमारे कैमरे के सामने आपसे कर्जा मांग सके। आप वैसे ही इस गड्ढे में दोबारा गिर कर दिखाईये तो हम आपका फोटो टीवी पर दिखायेंगे। इससे गड्ढे के साथ आपका भी प्रचार होगा। आप देखना कल ही यह गड्ढा भर जायेगा।’
उस आदमी ने कहा-‘तो आप गड्ढे का ही फोटो खीच लीजिये न! कल अगर मेरा चेहरा लेनदारों को दिख गया तो उनको पता चलेगा कि मैं इसी शहर में हूं। अभी तो वह घर पर जाते हैं तो परिवार के सदस्य कह देते हैं कि बाहर गया है।’
संवाददाता ने कहा-‘कल तुम यहां की प्रसिद्ध हस्ती हो जाओगे किसी की हिम्मत नहीं है कि तुमसे कर्जा मांग सके। हो सकता है कि इतने प्रसिद्ध हो जाओ कि फिल्मों मेंं तुम्हें गड़ढे में गिरने वाले दृश्यों के लिये स्थाई अभिनेता मान लिया जाये।’
वह आदमी प्रसन्न हो गया। उसने गड्ढे में गिरने का अभिनय किया और इससे उसकी हथेली पहले से अधिक घिसट गयी और खरौंच के निशान बन गये। संवाददाता ने कैमरामैन को इशारा किया। इससे पहले वह फोटो खींचता कि संवाददाता का मोबाइल बज गया। उसने मोबाइल पर बात की और उसे तत्काल जेब में रखते हुए कैमरामैन से बोला-‘इसे छोड़ो। उधर एक सनसनीखेज खबर मिल गयी है। सर्वशक्तिमान की दरबार के बाहर एक चूहा मरा पाया गया है। अभी तक वहां कोई भी दृश्य समाचार टीम नहीं पहुंची है। इस खबर से सनसनी फैल सकती है।’

कैमरामैन ने- जो कि फोटो खींचने की तैयारी कर रहा था- संवाददाता के आदेश पर अपना कैमरा बंद कर दिया। संवाददाता और कैमरामैन दोनों वहां से चल दिये। पीछे से उस आदमी ने कहा-‘अरे, मरे चूहे से क्या सनसनी फैलेगी। तुम इस गड्ढे को देखो और फिर मेरी तरफ? मेरा हाथ छिल गया है? कितनी चोट लगी है।’
संवाददाता ने कहा-‘यह गड्ढा सड़क के एकदम किनारे है और तुम इधर उधर यह देखते हुए चल रहे थे कि कोई लेनदार देख तो नहीं रहा और गिर गये। इसलिये इस खबर से सनसनी नहीं फैलेगी। फिर पहले तो तुमको चोट नहीं आयी। टीवी पर दिखने की लालच पर तुम दूसरी बार गिरे। यह पोल भी कोई दृश्य समाचार देने वाला खोल सकता है। अब हमारे पास एक सनसनी खेज खबर आ गयी है इसलिये जोखिम उठाना बेकार है।
वह दोनों चले गये तो वह आदमी फिर उठकर खड़ा हुआ। यह दृश्य उसको रोज अखबार देने वाला हाकर देख रहा था। वह उसके पास आया और बोला-‘साहब, आप भी किसके चक्कर में पड़े गये और खालीपीली हाथ छिलवा बैठे।’
उस आदमी ने कहा-‘तुम अखबार में समाचार भी देते हो न! जाकर यह खबर दे देा कि दृश्य समाचार वालों के चक्कर में मेरी यह हालत हुई है। हो सकता है इससे प्रचार मिल जाये दूसरे दृश्य समाचार वाले मेरे से साक्षात्कार लेने आ जायें।’
हाकर ने कहा-‘साहब! मैं छोटा आदमी हूं। इन दृश्य समाचार वालों से बैर नहीं ले सकता। क्या पता कब अखबार की ऐजेंसी बंद हो जाये और हमें छोटे मोटे काम के लिये इनके यहां नौकरी के लिये जाना पड़े।’
वह आदमी अपने छिले हुए हाथ को देखता हुआ रुंआसे भाव से चला गया।
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Saturday, September 20, 2008

आज वह मजाक बनाएगा-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

दीपक बापू बाहर जाने के लिये बाहर निकल रहे थे तो बा (गृहस्वामिनी) ने कहा-‘अभी बिजली नहीं आयी है इसलिये सर्वशक्तिमान के दरबार में दर्शन करने जा रहे हो नहीं तो अभी तक कंप्यूटर पर अपनी आखें झौंक रहे थे।’
दीपक बापू ने कहा-‘कैसी बात करती हो। लाईट चली गयी तो चली गयी। मैं तो पहले ही कंप्यूटर को पर्दा गिराने (शट डाउन) का संदेश भेज चुका था। अपने नियम का मैं पक्का हूं। सर्वशक्तिमान की कृपा है कि मैं ब्लाग लिख पा रहे हूं।
बा ने कहा-‘फंदेबाज बताता रहता है कि तुम्हारे हिट होने के लिये वह कई जगह मन्नतें मांगता है। तुम्हारे फ्लाप शो से वह भी दुःखी रहता है।
दीपक बापू ने कहा-‘तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गयी। न वह पढ़ने में न लिखने में। आ जाता है फालतू की बातें करने। हमने कभी अपने फ्लाप रहने की परवाह नहीं की जो वह करता है। जिनके दोस्त ऐसे ही हों वह भला हिट ब्लागर बन भी कैसे सकता है।’

इतने में फंदेबाज ने दरवाजे पर दस्तक दी। दीपक बापू ने कहा-‘और लो नाम शैतान का। अच्छा खासा सर्वतशक्तिमान के दरबार में जा रहा था और यह आ गया मेरा समय खराब करने। साथ में किसी को लाया भी है।’
फंदेबाज उस आदमी को लेकर अंदर आया और बोला-‘दीपक बापू कहीं जा रहे थे क्या? लगता है घर में लाईट नहीं हैं वरना तुम इस तरह जाते नहीं।’
दीपक बापू ने कहा-‘ अब तुम कोई फालतू बात तो करना नहीं क्योंकि हमारे पास समय कम ही है। बताओ कैसे आये? आज हमारा हास्य कविता लिखने का कोई विचार नहीं है।’
फंदेबाज अपने साथ लाये आदमी की तरफ हाथ उठाते हुए बोला-‘ यह मेरा दोस्त टोपीबाज है। इसने कई धंधे किये पर हिट नहीं हो सका। आपको तो परवाह नहीं है कि हिट हैं कि फ्लाप पर हर आदमी फ्लाप होने का दर्द नहीं झेल सकता। इसे किसी तोते वाले ज्योतिषी ने बताया है कि टोपी के धंधे में इसे सफलता मिलेगी। इसलिये इसने झगड़ेबाज की जगह अपना नाम टोपीबाज कर लिया। यह धंधे के हिसाब से अपना नाम बदलता रहता है। यह बिचारा इतने धंधे कर चुका है कि अपना असली नाम तक भूल गया है। अब आप इसके धंधे का शुभारंभ करो। तोते वाले ज्योतिषी ने इसे बताया था कि किसी फ्लाप लेखक से ही उसका शुभारंभ करवाना। लोग उससे सहानुभूति रखते हैं इसलिये तुम्हें लाभ होगा।’

दीपक बापू ने उस टोपीबाज की तरफ दृष्टिपात किया और फिर अपनी टोपी पर दोनों हाथ लगाकर उसे घुमाया और हंसते हुए बोले-‘चलो! यह नेक काम तो हम कर ही देते हैं। वहां से कोई चार छहः टोपी खरीदनी है। इसकी दुकान से पहली टोपी हम खरीद लेंगे। वह भी नगद। वैसे तो हमने पिछली बार छहः टोपी बाजार से उधार खरीदी थी पर वह चुकायी नहीं। जब उस बाजार से निकलते हैं तो उस दुकान वाले रास्ते नहीं निकलते। कहीं उस दुकान वाले की नजर न पड़ जाये। अगर तुम्हारी दुकान वहीं है तो भैया हम फिर हम नहीं चलेंगे क्योंकि उस दुकानदार को देने के लिये हमारे पास पैसा नहीं है। वैसे सर्वशक्तिमान ने चाहा तो इसके यहां से टोपी खरीदी कहीं फलदायी हो गयी तो शायद कोई एकाध ब्लाग हिट हो जाये।
फंदेबाज बोला-‘अरे, तुम समझे नहीं। यह किसी टोपी बेचने की दुकान नहीं खोल रहा बल्कि यह तो ‘इसकी टोपी उसके सिर’ वाली लाईन में जा रहा है। हां, शुभारंभ आपसे करना चाहता है। आप इसे सौ रुपये दीजिये आपको अंतर्जाल का हिट लेखक बना देगा। इसके लिये वह घर पर बैठ कर अंग्रेजी का मंत्र जपेगा अब उसमें इसकी ऊर्जा तो खत्म होगी तो उसके लिये तो कुछ पैसा तो चाहिये न!
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, ऐसे व्यापार करने से तो न करना अच्छा। यह तो धोखा है, हम तो कभी हिट लेखक नहीं बन सकते। कहीं ठगीबाजी में यह पकड़ लिया गया तो हम भी धर जिये जायेंगे कि इसके धंधे का शुभारंभ हमने किया था।
फंदेबाज ने कहा-‘तुम्हें गलतफहमी हो गयी है कि इसे सौ रुपये देकर हिट लेखक बन जाओगे और यह कोई अंग्रेजी का मंत्र वंत्र नहीं जपने वाला। सौ रुपये नहीं यह तो करोड़ों के वारे न्यारे करने वाला है। यह तो आपसे शुरूआत है। इसलिये टोकन में सौ रुपये मांग रहा हूं। ऐसे धंधे में कोई पकड़ा गया है आजतक। मंत्र का जाप तो यह करेगा। कुछ के काम बनेंेगे कुछ के नहीं। जिनके बनेंगे वह इसका गुण गायेंगे और जिनके नहीं बनेंगे वह कौन शिकायत लेकर जायेंगे?’
दीपक बापू ने कहा-‘क्या तुमने हमें बेवकूफ समझ रखा है। ठगी के धंधे का शुभारंभ भी हम करें क्योंकि एक फ्लाप लेखक हैं।’
फंदेबाज ने कहा-‘तुम भी चिंता मत करो। कई जगह तुम्हारे हिट होने के लिये मन्नतें मांगी हैं। जब हिट हो जाओगे तो तुमसे किसी और बड़े धंधे का शुभारंभ करायेंगे।’
दीपक बापू ने आखें तरेर कर पूछा-‘तो क्या लूटपाट के किसी धंधे का शुभारंभ करवायेगा।’
बा ने बीच में दखल दिया और बोली-‘अब दे भी दो इस बिचारे को सौ रुपये। हो सकता है इसका ध्ंाधा चल निकले। कम से कम फंदेबाज की दोस्ती का तो ख्याल करो। हो सकता है अंग्रेजी के मंत्रजाप करने से आप कंप्यूटर पर लिखते हुए हिट हो जाओ।’
दीपक बापू ने सौ का नोट टोपीबाज की तरफ बढ़ा दिया तो वह हाथ जोड़ते हुए बोला-‘आपके लिये तो मैं सचमुच में अंग्रेजी में मंत्र का जाप करूंगा। आप देखना अब कैसे उसकी टोपी उसके सिर और इसकी टोपी उसके सिर पहनाने का काम शुरू करता हूं। घर घर जाकर अपने लिये ग्राहक तलाश करूंगा। कहीं न कहीं कोई समस्या तो होती है। सभी की समस्या सुनकर उनके लिये अंग्रेजी का मंत्र जपने का आश्वासन दूंगा जो अच्छी रकम देंगे उनके लिये वह जपूंगा और जो कम देंगे उनका फुरसत मे ही काम करूंगा।’
बा ने कहा-‘महाराज, आप हमारे इनके लिये तो आप जरूर अंग्रेजी का मंत्र जाप कर लेना। अगर हिट हो गये तो फिर आपकी और भी सेवा कर देंगे। आपका नाम अपने ब्लाग पर भी चापेंगे (छापेंगे)
अपना काम निकलते ही फंदेबाज बोला-‘अच्छा दीपक बापू चलता हूं। आज कोई हास्य कविता का मसाला मिला नहीं। यह दुःखी जीव मिल गया। अपने धंधे के लिये किसी फ्लाप लेखक की तलाश में था। यह पुराना मित्र है मैंने सोचा तुमसे मिलकर इसका काम करा दूं।’
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, इतने करोड़ो के बजट वाला काम शुरू किया है और दो लड्डे भी नहीं ले आये।’
फंदेबाज ने झुककर बापू के मूंह के पास अपना मूंह ले जाकर कहा-‘यह धंधा किस तरह है यह बताया था न! इसमेें लड्डू खाये जाते हैं खिलाये नहीं जाते।’
वह दोनो चले गये तो बा ने दोनों हाथ उठाकर ऊपर की तरफ हाथ जोड़कर कहा-‘चलो इस दान ही समझ लो। हो सकता है उसके अंग्रेजी का मंत्र से हम पर कृपा हो जाये।’
दीपक बापू ने कहा-‘यह दान नहीं है क्योंकि यह सुपात्र को नहीं दिया गया। दूसरा कृपा तो सर्वशक्तिमान ही करते हैं और उन्होंने कभी कमी नहीं की। हम तो उनकी कृपा से ब्लाग लिख रहे हैं उसी से हीं संतुष्ट हैं। फ्लाप और हिट तो एक दृष्टिकोण है। कौन किसको किस दृष्टि से देखता है पता नहीं। फिर अंतर्जाल पर तो जिसका आभास भी नहीं हो सकता उसके लिये क्या किसी से याचना की जाये।’
बा ने पूछा-‘पर यह मंत्र जाप की बात कर रहा था। फिर धंधे की बात कर रहा था समझ में नहीं आया।’
दीपक बापू ने कहा-‘इसलिये तो मैंने उसे सौ रुपये दे दिये कि वह तुम्हारी समझ में आने से पहले निकल ले। क्योंकि अगर तुम्हारे समझ में आ जाता तो तुम देने नहीं देती और बिना लिये वह जाता नहीं। समझ में आने पर तुम फंदेबाज से लड़ बैठतीं और वह पैसा लेकर भी वह अपना अपमान नहीं भूलता। फिर वह आना बंद कर देता तो यह कभी कभार हास्य कविताओं का मसाला दे जाता है उससे भी हाथ धो बैठते। यह तो सौ रुपये का मैंने दंड भुगता है।’
इतने में लाइट आ गयी और बा ने कहा-‘लो आ गयी बिजली! अब बैठ जाओ। फंदेबाज ने कोई मसाला दिया हो तो लिख डालो हास्य कविता।’
दीपक बापू ने कहा-‘अब तो जा रहे सर्वशक्तिमान के दरबार में। आज वह कोई मसाला नहीं दे गया बल्कि हमारी हास्य कविता बना गया जिसे दस को सुनायेगा। अभी तक हमने उसकी टोपी उड़ायी है आज वह उड़ायेगा।
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Sunday, September 7, 2008

फिर सोचता हूं कि लिखने में क्या बुराई है-आलेख

समय बदल रहा है और नित नयी तकनीकी के आगमन के साथ ही कोई न कोई नया उपकरण आता है जो संवाद प्रेषण को सरलता प्रदान के साथ उसे गति प्रदान कर रहा है। लोग चाहे जिससे जब बात कर सकते हैं और अपने मन पसंद के चित्र देखने के साथ ध्वनि भी सुन सकते है, पर फिर भी लोग लिखे हुए को पढ़ने को उत्सुक रहते है। कहने को मोबाइल, टीवी तथा इंटरनेट पर ढेर सारे मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं। उनमें तमाम तरह के ध्वनि और चित्रों से सुसज्जित सामग्री है। फिर भी लोग किसी का लिखा पढ़ने की अपनी इच्छा के साथ जीते हैं। दुर्भाग्य इस बात का है कि लोग यहां भी वैसे ही व्यवहार कर रहे हैं जैसे वह बाहर करते हैं।

हमने देखा होगा कि अच्छी और ज्ञानवद्र्धक सामग्री जो पढ़ने पर दिल को प्रसन्न कर देती है पर उसके लिये थोड़ा अपने मस्तिष्क को खुला रखना पड़ता है। युवा पाठक और उसे न पढ़कर यौन या जासूसी साहित्य को पढ़ना चाहते हैं। इसी कारण ऐसे प्रकाशकों की बाढ़ आ गयी जिन्होंने यौन और जासूसी साहित्य को प्रधानता दी। सामाजिक साहित्य के नाम पर भी सामान्य समाज से परे खूंखार घरेलू पात्रों से सुसज्जित कहानियां और उपन्यास खूब बिके। ऐसे में उत्कृष्ट साहित्य की रचनाओं का लिखा जाना बंद ही हो गया।

फिर साहित्य के नाम पर भी ऐसे लोगों ने ही लिखा जिनको किसी विचारधारा के होने के कारण पुरस्कार आदि मिलते रहे। आजकल कोई भी नया लेखक उत्कृष्ट साहित्य लिखने की सोच भी नहीं सकता। अगर लिखेगा तो उसे प्रकाशक नहीं मिलेगा और अपने पैसे खर्च करेगा तो उसकी किताबें घर में पड़ी रहेंगी। यही कारण है कि हिंदी में मूल रूप से बेहतर साहित्य लिखना नगण्य हो गया है। अगर देखा जाये तो हिंदी में अनुवाद कर लाया साहित्य ही अधिक लोकप्रिय हुआ। इसका कारण यह है कि भारत की क्षेत्रीय भाषाओं मे जनसंख्या कम है और इस कारण उनमें लिखने वाले लेखकों को अपने लिखे के कारण थोड़ा बहुत सम्मान समाज में मिलता है इसलिये वह लिखते हैं और इसी कारण उनकी बेहतर रचनाएं वहां जब सम्मान पाती है और पुरस्कार मिलने पर उनका हिंदी अनुवाद जब आता है तो वह प्रभावपूर्ण लगती हैं। हिंदी भाषा में मूल रूप से लिखने वालों को समाज कोई अधिक महत्व नहीं देता। हां, अगर कोई लोकप्रिय हो जाये तो पत्र पत्रिकाओं में उसको आराम से जगह मिल जाती है।

इधर देख रहा हूं कि अंतर्जाल पर भी सामान्य पाठकों का व्यवहार कुछ ऐसा ही है। वह तलाश रहे हैं वैसा ही साहित्य जैसा वह सामान्य रूप से पढ़ते हैं। मुझे पहले इसका पता नहीं था पर कुछ प्रयोग किये तो देखा कि शायद मेरे लिखे से अधिक इस बात का महत्व है कि मैं पाठकों के उन मार्गों पर अपना ब्लाग बिछा दूं जहां से वह ऐसा वैसा साहित्य पढ़ना चाहते हैं। हां, इसमें सफलता मिली। लोग पता नहीं जानते हुए मेरा ब्लाग देखते हैं या अनजाने में खोलते हैं। जरूर उनको निराशा होती होगी जब वहां मेरी फालतू कवितायें या व्यंग्य उनके सामने आते हैं। इस तरह हिट्स मिलना मुझे स्वतः ही पसंद नहीं पर अतंर्जाल पर प्रयोगधर्मिता की सुविधाओं का उपयोग करना भी कोई बुरी बात नहीं है। एक बात तय रही कि ऐसे पाठक वहां पढ़ने ही आते हैं कोई ध्वनि या चित्र देखने नहीं क्योंकि उसके लिये तो उनके पास अनेक मार्ग है।

मैंने वह साहित्य भी देखा और पढ़ा है। लगभग वैसा ही है जैसा बाजार में बिकता देखा है। कौन क्या लिखता है या पढ़ता है इससे एक लेखक के रूप मेें किसी मतलब नहीं होना चाहिए पर जब सामाजिक सरोकार से संबंधित लिखना है तो यह सब करना ही पड़ता है। वहां ऐसी सामग्री लिखने वालों ने मेहनत की है पर सवाल यह है कि क्या इतनी लंबी सामग्री का लोग आनंद उठा पाते होंगे। अगर हाथ में किताब हो तो ठीक है यहां कंप्यूटर पर आंखें गढ़ाकर क्या वह इतनी बड़ी सामग्री को पढ़कर एन्जाय कर पाते होंंगे। यौन या जासूसी साहित्य कभी भी संक्षिप्त रूप से नहीं लिखे जाते। वैसे यहां मैं केवल यौन साहित्य की बात कर रहा हूं क्योंकि यहां केवल वही मैंने देखा है। यह पता नहीं कि यह रोज लिखा जाता है या लिख कर रख दिया गया है। मेरा पाठकों के मार्ग में अपने ब्लाग रखने का कारण यह भी है कि हो सकता है कि कोई इसी बहाने अच्छा साहित्य पढ़ने की लालसा लेकर आता हो तो वह पढ़ ले-क्योंकि अधिकतर लोगों को पता ही नहीं कि अच्छा साहित्य भी यहां लिखा जाता है।

अंतर्जाल पर लिखने के लिये सबसे बेहतर तरीका यही है कि संक्षिप्त लिखा जाये। एक बात और भी है कि अगर यौन साहित्य भी लिखा जाये तो उसकी भी गरिमा होती है। पहले कुछ लेखकों ने आदमी की इंद्रियों को भड़काने के लिये ऐसे उपन्यास लिखे पर वह साहित्य का हिस्सा रहे। बिल्कुल सीधी भाषा में लिखे गये यौन साहित्य का आनंद लोगों को आता है पर गरिमा से लिखे गये साहित्य को वह पढ़ें तो फिर उसे ही पढ़ना चाहेंगे। ऐसी कहानियां और व्यंग्य मेरे दिमाग में आते हैं पर उन पर समय बहुत लगता है। फिर संक्षिप्त में लिखना कोई सरल काम नहीं है। किश्तों में भी लिखा जा सकता है। उसके लिये यह जरूरी है कि कहीं से उसके लिये आय होती हो। यौन और जासूसी साहित्य को तो आजकल के प्रकाशन व्यवसाय का एक असली भाग है। ऐसे में अगर मैं यहां मेहनत करूं तो उसका कोई आर्थिक फायदा नजर नहीं आता। फिर मैं सोचता हूं कि सत्साहित्य की वजह से ही जब मुझे जाना जा रहा है तो फिर इस चक्कर में क्यों पड़ूं। जासूसी उपन्यास तो मेरे में लिखने का ख्याल आता है पर उसके लिये आर्थिक प्रोत्साहन के बिना आगे बढ़ना संभव नहीं है।

मुख्य बात है कि कंप्यूटर पर ऐसा साहित्य पढ़कर अपनी आंखों और देह के साथ खिलवाड़ करना है। ऐसे में जब पाठकों के मार्ग में मेरी छोटी हास्य कवितायें और व्यंग्य आयेंगे तो हो सकता है उन्हें अच्छा लगे। इसमें कोई संशय नहीं है कि सत्साहित्य के लिये कोई धन का भुगतान नहीं करना चाहता । केवल वाहवाही से हर कोई काम चलाता हैं। इधर मैं भी इंटरनेट कनेक्शन अधिक समय तक नहीं चला पाऊंगा। लिखने के जो हालत हैं वह कोई अच्छे नहीं हैं। मुझे अन्य सुविधायें और उपकरण चाहियें ताकि नये तरीके से काम कर सकूं। उसके लिये चाहिये धन। मैं जिस कमरे में लिखता हूं वहां आजकल उमस है। मेरे बैठने की कुर्सी ठीक नहीं है पर अब नयी कुर्सी लाने की सोचना बेकार लगता है। डेढ़ बरस से लिखते हुए बोरियत हो गयी है। अपने लिखने की जगह बदलने का मतलब है उस पर कुछ पैसे खर्च करना। ऐसे में लगता है कि अब क्या लिखना। हां, ब्लागों पर 800 तक की व्यूज संख्या देखकर मन तो प्रसन्न होता है और यही बात सोचकर लिखता हूं कि यार अगर किसी को सुख दे सकता हूं तो उसमें क्या बुराई है। वैसे अब अधिक रचनायें लिखना कठिन होगा यह भी मुझे लगता है।
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Sunday, June 22, 2008

रेल की बोगी में ज्ञान की किताबें बेच सकते हैं, ज्ञान नहीं-आलेख


वृंदावन की यात्रा कर हम दोनों पति-पत्नी दोनों ही खुश होते हैं। इस बार जब हम दोनों वहां पहुंचे तो बरसात हो रही थी और ठहरने के स्थान पर सामान रखकर हम सबसे अंग्रेजों के मंदिर में गये क्योंकि वह अधिक पास था। हमारे साथ के परिचित सज्जन तो नहीं चले पर उनकी दस वर्षीय बेटी हमारे साथ वहां चली।

वृंदावन में अनेक मंदिर हैं पर बांके बिहारी और अंग्रेजों (इस्कान) का मंदिर बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं और हम दोनों भी वहां रहते हुए प्रतिदिन जाते हैं। अंग्रेजों के मंदिर में आरती के समय नाचते हुए लोगों का दृश्य भी अच्छा लगता है। हालांकि बरसों से जा रहे हैं पर अब वहां मैटल डिक्टेटर और अन्य कड़ी सुरक्षा सहित अन्य परिवर्तन देखकर हमें आश्चर्य होता है। वहां तमाम लोग आते हैं और ऐसा लगता है कि कुछ पिकनिक मनाने के लिए भी आते हैं तो कुछ केवल देखने भर के लिये चले आते हैं। कुछ लोग भक्ति भाव से आते हैं। अगर सीधे कहें तो वहां चारों तरह के भक्त आते हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी। मैं तो वहां कर ध्यान लगाता हूं और मेरी पत्नी भीड़ में बैठकर तालियां बजाते हुए भजन गाती है।

बरसात बंद होने पर जो उमस का गुब्बार फूटा तो उसमें हम पसीना-पसीना हो गये थे। ग्यारस और अवकाश का दिन होने के कारण वहां भीड़ अधिक थी और मुझे ध्यान के लिये किसी अच्छी जगह की तलाश थी। मेरी पत्नी ने दीवार से रखे कूलर की तरफ इशारा किया और मैं वहां ध्यान लगाने बैठ गया और वह आगे बैठकर ताली बजाते हुए नाम जपने लगी। कुछ देर बाद हम बांके बिहारी के मंदिर जाने के लिये तैयार होकर बाहर निकलने लगे। वहां लगी दुकान पर किताबों का मैं निरीक्षण करने लगा। मेरी पत्नी किताबों में रुचि नहीं लेती वह फिर माला या कोई गले में डालने के लिये प्रतीकों के हार खरीदने के इरादे से खड़ी हो गयी।

मैं किताब की दुकान पर पहुंचा तो वहां धवल वस्त्र पहने एक सेल्समेन ने
मेरी तरफ चार पांच छोटी किताबों एक साथ आगे बढ़ाते हुए कहा-‘यह लीजिये सौ रुपये की हैं। दान समझकर लीजिये इससे आपको ज्ञान भी मिलेगा।’

मैंने उससे पूछा-‘क्या कबीर की रचनाओं का कोई अंग्रेजी संग्रह है?’

उसने तुरंत कहा-‘यहां तो केवल हमारी किताबें ही मिलती हैं।’

मैं वहां से चल पड़ा तो पत्नी ने कहा-‘जब आपको मालुम है तो फिर इन किताबोंे की दुकान पर जाते क्यों हैं?’
मैंने कहा-‘इस उम्मीद में शायद कोई किताब मिल जाये।’
वहां से बाहर निकलते हुए कम से कम तीन स्थानों पर ऐसी किताबें खरीदने के लिए हमारे समक्ष रखी गयी। अचानक मेरी पत्नी को याद आया कि कभी मैंने उससे इस्कान की श्रीगीता खरीदने की बात कही थी और उसने पूछा-‘आप खरीदते क्यों नहीं।’
मैंने उससे कहा-‘यह आज से पांच वर्ष पूर्व की बात है। तब तो मैंने अनेक संतों की व्याख्या वाली श्रीगीता खरीद ली थी, पर मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा था कि गोरखपुर प्रेस की वही गीता पढ़ना जिसमें केवल संस्कृत श्लोक का अनुवाद हो। किसी द्वारा की गयी व्याख्या या महात्म्य वाली मत पढ़ना क्योंकि उससे भ्रमित हो जाओगे।’ वह तो मेरे पास थी।’
पत्नी ने पूछा-‘ पर उसने ऐसा क्यों कहा था?’
मैंने कहा-‘उसने मेरा लिखा पढ़ा था और वह जानता था कि मैं स्वयं भी अपना सृजन कर सकता हूं। वह मुझे और मेरे लेखन का प्रशंसक था और नहीं चाहता था कि मैं किसी दूसरे की सोच पर चलूं। वह मुझसे आज भी मौलिक सोच और सृजन की आशा करता हैं।’
पत्नी ने पूछा-‘वैसे इस तरह किताबों को इस तरह बेचना ठीक लगता है। अरे, जिसे खरीदना है वह खरीद लेगा।’
मैंने कहा-‘हां, मुझे भी लगता है कि किताबें तो बेची जा सकती हैं पर ज्ञान नहीं बेचा जा सकता है।’

रास्ते में एक जगह किताबों की दुकान पड़ी। वहां एक जगह हमारे साथ चल रही लड़की उसी दुकान के पास पानी पताशा खाने की जिद करने लगी तो मेरी पत्नी भी वहां रुक गयी। मैं पानी पताशा नहीं खाता इसलिये मेरी पत्नी ने उस किताब की दुकान की तरफ इशारा करते हुए बोली-‘आपको कोई किताब खरीदनी हो तो यहां देख लीजिये। आपकी पसंद की किताबें तो ऐसी ही दुकानों पर मिल पातीं हैं।’
मैं वहां जाकर किताबें देखने लगा। एक किताब ली। वहां से हम बांके बिहारी मंदिर में चले गये।

अगली सुबह हम वापस रवाना होने के लिये रेल्वे स्टेशन पर पहुंचे। वहां से हम एक ट्रेन में बैठे तो वहां इस्कान का ही एक गेहुंआ वस्त्र पहने व्यक्ति अपने हाथ में अपने संस्थान द्वारा प्रकाशित श्रीगीता और श्रीमद्भागवत सभी यात्रियों को दिखाकर उनको खरीदने के लिए प्रेरित करता हुआ हमारे पास आया। मेरे इंकार करने पर वह चला गया। मेरी पत्नी ने फिर हैरान होकर पूछा-‘यह क्या तरीका है?’
मैंने कहा-‘लगता है कि प्राईवेट कंपनियों की तरह इन पर भी टारगेट का बोझ है। शायद इन लोगों का अपने टारगेट पूरा करने पर ही आश्रमों मे बने रहने की छूट दी जाती होगी।

मुझे याद आ जब मैं छोटा था तब अपने माता पिता के साथ अंग्रेजों कें मंदिर में गया था उसके बाद उसमें बहुत विकास हुआ है। एक समय मैं सोचता था कि जो अंग्रेज भगवान श्रीकृष्ण के भक्त हैं वह शायद श्रीगीता को समझ पायें क्योंकि भारत में तो ऐसे लोग कम ही दिखते हैं। यहां तो ज्ञान का व्यापार होता। लगता है कि जाने अनजाने इस्कान के लोग भारतीय साधु संतों से अपने आपको बड़ा भक्त साबित करने के लिये ऐसा प्रयास कर रहे हैं जिनका कोई तार्किक आधार नहीं है। जहां तक किताबों का प्रश्न है जो जिज्ञासु और ज्ञानी भक्त हैं वह तो स्वयं ही खरीद लेते हैं पर अर्थाथी या आर्ती हैं उनकी इन किताबों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। इस रेल्वे की बोगियों में इस तरह पवित्र ग्रंथों का ज्ञान बेचने वाले भक्त किस श्रेणी के हैं यह मेरे समझ से परे है? वैसे रेल की बोगी में ज्ञान और भक्ति की किताबें बेच सकते हैं पर ज्ञान और भक्ति भाव किसी में स्थापित करना मुश्किल है।

Thursday, November 15, 2007

एग्रीग्रेटरों से लिंक ब्लोग पर ही समस्या क्यों ?

मैंने लगातार यह देखने का प्रयास किया है कि कहीं कोई गलती मेरे से तो नहीं हुई है, पर पता नहीं लग रहा है। ब्लागस्पाट.कॉम के जो ब्लोग किसी भी एग्रीगेटर के यहाँ लिंक नहीं है वह काम कर रहे हैं। जो एग्रीग्रेटरों के यहाँ लिंक हैं उनमें सेव भी नहीं हो रहा है। अगर किसी एग्रीग्रेटर ने अपने यहाँ हाल ही में दिनांक और समय में कोइ परिवर्तन किया हो तो उसे देखे कहीं वह ब्लोगरों के ब्लोग में दर्ज समय और दिनांक को प्रभावित तो नहीं कर रहा है। यह भी देखें कि क्या क्या ब्लागस्पाट के कुछ ब्लोग ऐसे हैं जो प्रकाशित कर रहे हैं और वह किसी विशेष एग्रीग्रेटर के यहाँ लिंक नहीं हैं। अगर यह समस्या मेरे साथ होती तो कोई बात नहीं थी, परमजीत बाली जी के दिशाएं में भी यह समस्या थी, पर पता नहीं उनका इंकलाब ब्लोग कैसे दिखाई दे रहा था।

अपने आप में यह आश्चर्य जनक बात है कि आखिर एग्रीग्रेटरों से लिंक ब्लोग पर ही यह समस्या क्यों है? क्या किसी को हिन्दी ब्लोग एक जगह दिखना नहीं सुहाता है-या परमजीत बाली और मैं ही इसी समस्या के शिकार हैं। कम से कम यह समस्या ब्लागस्पाट.कॉम की नहीं लगती-अगर होती तो मेरे यह कहीं लिंक न होने वाले ब्लोग क्यों काम कर रहे हैं। मैंने जो कर के देखा है वही लिख रहा हूँ और बाकी कोई सुधीजन हो तो बताये मैं क्या करूं? उम्मीद करता हूँ कि सक्रिय लोग इस तरफ ध्यान देंगे।

Saturday, September 22, 2007

बहस और तर्क तो विद्वानों को करना चाहिए

बहस और तर्क विद्वानों के बीच होना चाहिए। विद्वान का मतलब यह कि जिस विषय पर बहस हो उसमें उसने कहीं न कहीं शिक्षा और उपाधि प्राप्त की हो या उसने उस विषय को इस तरह पढा हो कि उसे उसके संबंध में हर तथ्य और तत्व का ज्ञान हो गया हो। हमारे देश में हर समय किसी न किसी विषय पर बहस चलती रहती है और उसमें भाग लेने वाले हर विषय पर अपने विचार देते हैं जैसे कि उस विषय का उनको बहुत ज्ञान हो और प्रचार माध्यमों में उनका नाम गूंजता रहता है। उनकी राय का मतलब यह नहीं है कि वह उस विषय में पारंगत हैं। उनको प्रचार माध्यमों में स्थान मिलने का कारण यह होता है कि वह अपने किसी अन्य कारण से चर्चित होते हैं, न कि उस विषय के विद्वान होने के की वजह से ।

स्वतंत्रता के बाद इस देश में सभी संगठनों, संस्थाओं और व्यक्तियों की कार्यशैली का एक तयशुदा खाका बन गया है जिससे बाहर आकर कोई न तो सोचना चाहता है और न उसके पास ऐसे अवसर हैं। धर्म, विज्ञान, अर्थशास्त्र, साहित्य, राजनीति, फिल्म और अन्य क्षेत्रों में बहुत लोग सक्रिय हैं पर प्रचार माध्यमों में स्थान मिलता है जिसके पास या तो कोई पद है या वह उन्हें विज्ञापन देने वाला धनपति है या लोगों की दृष्टि में चढ़ा कोई खिलाडी या अभिनेता है-यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि उसे उस विषय का ज्ञान हो जिस पर वह बोल रहा हो। इसी कारण सभी प्रकार की बहस बिना किसी परिणाम पर समाप्त हो जाती हैं या वर्षों तक चलती रहती हैं। जैसे-जैसे इलेक्ट्रोनिक प्रचार माध्यमों का विस्तार हुआ है और बहस भी बढने लगी है और कभी-कभी तो लगता है कि प्रचार माध्यमों को लोगों की दृष्टि में अपना प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखने के लिए विषयों की जरूरत है तो उनमें अपना नाम छपाने के लिए उन्हें यह अवसर सहजता से प्रदान करते हैं।

अन्य विषयों पर बहस होती है तो आम आदमी कम ही ध्यान देता है पर अगर धर्म पर बहस चल रही है तो वह खिंचा चला आता है। धर्म में भी अगर भगवान् राम श्री और श्री कृष्ण का नाम आ रहा तो बस चलता-फिरता आदमी रूक कर उसे सुनने, देखने और पढने के लिए तैयार हो जाता है। मैं कुछ लोगों की इस बात से सहमत हूँ कि भगवान श्री राम और श्री कृष्ण इस देश में सभी लोगों के श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक हैं। लोग उनके प्रति इतने संवेदनशील होते हैं कि उनकी निन्दा या आलोचना से उन्हें ठेस पहुँचती हैं। इसके बावजूद कुछ लोग प्रचार की खातिर ऐसा करते हैं और उसमें सफल भी रहते हैं।

धर्म के संबंध में सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे प्राचीन ग्रंथों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं किया गया पर इसके बावजूद इन्हें श्रद्धा भाव से पढने वालों की कमीं नहीं है। यह अलग बात है कि कोई कम तो कोई ज्यादा पढता है। फिर कुछ पढने वाले हैं तो ऐसे हैं जो इसमें ऐसी पंक्तियों को ढूंढते हैं जिसे उनकी आलोचना करने का अवसर मिले। वह पंक्तिया किस काल और संदर्भ में कही गयी हैं और इस समय क्या भारतीय समाज उसे आधिकारिक रुप से मानता है या नहीं, इस बात में उन्स्की रूचि नहीं होती। मुझे तो आश्चर्य तो तब होता है कि ऐसे लोग अच्छी बातों की चर्चा क्यों नहीं करते-जाहिर है कि उनका उद्देश्य ही वही होता है किसी तरह नकारात्मक विचारधारा का प्रतिपादन करें। मजे की बात तो यह है कि जो उनका प्रतिवाद करने के लिए मैदान में आते हैं वह भी कोई बडे ज्ञानी या ध्यानी नहीं होते हैं केवल भावनाओं पर ठेस की आड़ लेकर वह भी अपने ही लोगों में छबि बनाते हैं-मन में तो यह बात होती है कि सामने वाला और वाद करे तो प्रतिवाद कर अपनी इमेज बनाऊं।

मतलब यह कि धर्म मे विषय में ज्ञान का किसी से कोई वास्ता नहीं दिखता। एक मजेदार बात और है कि अगर किसी ने कोई संवेदनशील बयान दिया है प्रचार माध्यम भी उसके समकक्ष व्यक्ति से प्रतिक्रिया लेने जाते हैं बिना यह जाने कि उसे उस विषय का कितना ज्ञान है। भारत के प्राचीन ग्रंथों के कई प्रसिद्ध विद्वान है जो इस विषय के जानकार हैं पर उनसे प्रतिक्रिया नहीं लेने जाता जबकि उनके जवाब ज्यादा सटीक होते, पर उससे समाचारों का वजन नही बढ़ता यह भी तय है क्योंकि लोगों के दिमाग में भी यही बात होती है कि प्रतिक्रिया देने का हक केवल पद, पैसा और प्रतिष्ठा से संपन्न लोगों को ही है पंडितों (यहाँ मेरा आशय उस विषय से संबधित ज्ञानियों और विद्वानों से है जो हर वर्ग और जाति में होते हैं) को नहीं। वाद, प्रतिवाद और प्रचार के यह धुरी समाज कोई नयी चेतना जगाने की बजाय लोगों की भावनाओं का दोहन या व्यापार करने के उद्देश्य पर ही केंद्रित है।

इसलिये जब ऐसे मामले उठते हैं तब समझदार लोग इसमें रूचि कम लेते हैं और असली भक्त तो बिल्कुल नहीं। इसे उनकी उदासीनता कहा जाता है पर मैं नहीं मानता क्योंकि प्रचार की आधुनिक तकनीकी ने अगर उसके व्यवसाय से लगे लोगों को तमाम तरह की सुविधाएँ प्रदान की हैं तो लोगों में भी चेतना आ गयी है और वह जान गए हैं कि इस तरह के वाद,प्रतिवाद और प्रचार में कोई दम नहीं है।

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