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Friday, June 14, 2013

क्रिकेट में पैसा सिर चढ़कर बोल रहा है-लघु हिन्दी व्यंग्य चिंतन (cricket mein paisa sir chadhkaar bol rahaa hai-hindi vyangya chinttan(


        इस समय इंग्लैंड में चैम्पियन ट्राफी क्रिकेट प्रतियोगिता चल रही है। इसमें बीसीसीआई की टीम जोरदार प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ती जा रही है। अनेक क्रिकेट विशेषज्ञ चकित हैं। बीसीसीआई के क्रिकेट खिलाड़ी जिस तरह तूफानी बल्लेबाजी कर रहे है तो दूसरी टीमों के खिलाड़ी धीमे धीमे चल रहे हैं उससे लगता है कि जैसे पिचें अलग अलग हैं। कभी कभी लगता है कि बल्ला या गेंदें भी अलग अलग हैं। मतलब यह कि भारतीय बल्लेबाज दूसरों के मुकाबले ज्यादा आक्रामक हैं। किसी के समझ में नहीं आ रहा है।
          हम समझाते हैं कि आखिर मामला क्या है? गुरुगोविंद सिंह ने कहा है कि पैसा बहुत जरूरी चीज है पर खाने के लिये दो रोटी चाहिये। मतलब यह कि जिंदगी में पैसा जरूरी है।  एक विद्वान कहते हैं कि पैसा कुछ हो या न हो पर जीवन में आत्मविश्वास का बहुत बड़ा स्तोत्र होता है।  जी हां, आईपीएल में बीसीसीआई की टीम के बल्लेबाजों ने जमकर पैसा कमाया है।  यह उनके आत्मविश्वास का ही  कारण बन गया है।  उनको मालुम है कि हमारे पास पैसा बहुत है और यह भाव उनको आक्रामक बना देता है। सीधी बात कहें कि पैसा सिर चढ़कर बोलता है।  हम यहां बीसीसीआई के खिलाडियों की आलोचना नहीं कर रहे बल्कि यह बता रहे हैं कि जिस तरह अन्य टीमों के खिलाड़ी बुझे मन से खेल रहे हैं उससे तो यही लगता है कि उनमें वैसा विश्वास नहीं है जैसा बीसीसीाआई की टीम में हैं। इसे कहते हैं कि पैसा सिर चढ़कर बोलता है।



दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'

Gwalior, Madhya Pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com


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Saturday, December 8, 2012

विदुर नीति-बड़ो का आदर करने से प्राण स्थिर होते है(vidur neeti-badon ka aadar karne se pran sthir hote hain)

       हमारे भारतीय दर्शन में जिन संस्कारों को मनुष्य समाज के लिये आवश्यक बनाया गया है उनका कोई न कोई वैज्ञानिक आधार है।  अक्सर हमारे यहां कहा जाता है कि बुजुर्गों का सम्मान होना चाहिए।  इसके पीछे वजह यह है कि उनकी सामने उपस्थिति होने पर आयु तके  छोटे मनुष्य की मनस्थिति पर कुछ न कुछ ऐसा तीव्र हलचल के साथ  तीक्ष्ण प्रभाव पड़ता है जिसकी समझ होना जरूरी है।  दरअसल जब बड़ी आयु का आदमी सामने खड़ा हो तब किसी भी युवक के हृदय में ऐसा प्रभाव होता है कि उसके प्राण ऊपर आ जाते हैं। आंखों में आदर के भाव प्रकट होने के लिये तत्पर होते हैं।  उस समय अगर कोई ढीठता वश सीना तानकर खड़ा रहे तो यकीनन वह अपने हृदय और मस्तिष्क की नासिकाओं के लिये दुष्प्रभाव वाले कीटाणुओं का सृजन करता है। हालांकि अधिकतर युवक युवतियां स्वाभाविक रूप से मर्यादा का पालन करते हैं और इससे हम उनको संस्कारवान माने पर सच यह है कि बड़ो का आदमी करना छोटों का स्वाभाविक गुण होता है।  जिनके मन मे ढीठता का भाव है वह भले ही ऐसा न करें पर कहीं न कहीं वही अपने प्राणों को स्थिर  असुविधा के साथ विलंब  से कर पाते हैं।
विदुर महाराज की नीति के अनुसार
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ऊधर्व प्राणा ह्युत्क्रामति पुनः स्थावरः आयति।
प्रत्युथानाभिवादाभ्यां पुनस्तान। प्रतिपद्यते।।
      हिन्दी में भावार्थ-किसी  माननीय बुजुर्ग पुरुष के निकट आने पर पर नवयुवक के प्राण ऊपर गले तक आ जाते हैं फिर जब वह स्वागत में खड़ा होकर प्रणाम करता है तब उसके प्राणः पुनः पूर्ववत स्थापित होते हैं।

पीठं दत्त्वा साधवेऽभ्यागताय आनींयामः परिनिर्णिज्य पापौ।
सुख पृष्टवा प्रतिवेद्यात्मासंस्था ततो दद्यादन्नमवेक्ष्य धीरः।।
      हिन्दी में भावार्थ-धीर पुरुष को चाहिए कि वह अपने यहां सज्जन व्यक्ति के आने पर उसे उचित आसन प्रदान करने के साथ ही जल से उसके चरण पखारने के बाद उसकी कुशल क्षेम जानने के बाद अपनी बात कहे और फिर भोजन कराये।
     मनुष्य गुणों का ऐसा पुतला है जिसका इंद्रियां स्वाभाविक रूप से होता है।  सच बात तो यह है कि किसी को अधिक ज्ञान देना उसे भ्रमित कर सकता है। उसी तरह ज्यादा ज्ञान प्राप्त करने से भी अनेक तरह के विरोधाभास सामने आते हैं। बेहतर यह है कि अपनी दिलचर्या को सहज रखा जाये।  जब कोई दृश्य सामने आये या फिर कहीं हमें अपनी सक्रियता दिखानी हो वहां मन में सहज भाव रखना चाहिए तब स्वाभाविक रूप से हमारी इंद्रियां अंगों को संचालित करती हैं।  अपने घर आये सज्जन लोगों का आदर करना चाहिए पर जहां अपना सम्मान न हो और हमारे स्वाभाविक गुणों के अनुसार कार्य की स्थितियां न हों वहां न जाना ही बेहतर है। भारतीय दर्शन इसलिये भी वैज्ञानिक आधारों वाला माना जाता है क्योंकि वह स्वाभाविक रूप से सहज कर्म में मनुष्य को लिप्त रहने की प्रेरणा  देता है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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