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Sunday, July 7, 2013

विशिष्ट रविवारीय लेख-बौद्धिगया में विस्फोट करना निंदनीय कार्य (special hindi article on sanday-bauddhigaya mein visfot karna nindaneeya)



       भारत में रविवार अब एक तरह से अवकाश के साथ ही अध्यात्म दिवस भी बन गया है।  पहले सरकारी क्षेत्र बढ़ा था और उसके अधिकांश कर्मचारी रविवार को अवकाश होने से बाज़ार के साथ ही अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों की शोभा बढ़ाते थे। अब निजी क्षेत्र में भी रोजगार पाने वाले लोगों के लिये भी रविवार के दिन ही अवकाश रहता है।  वैसे छात्रों को भी रविवार मिलता है और उनमें कुछ मौज मस्ती करते हैं तो कुछ अकेले या परिवार के साथ ही अध्यात्मिक दिवस मनाते हैं।  यह बात बाज़ार तथा उसके प्रचार प्रबंधक जानते हैं इसलिये ही रविवार को ऐसे विषय चुनते हैं जो ज्वलंत हों। कभी कभार उनको स्वतः ही ऐसे विषय मिल जाते हैं। कभी अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान प्रचार समूहों ने जिस तरह अपने विज्ञापन का समय पास किया उसने उनके सामने किसी विषय को निरंतर ज्वंलत बनाये रखकर उसका व्यवसायिक बनाने की योजना की प्रेरणा प्रस्तुत की।
       अभी केदारनाथ सहित पूरे उत्तराखंड में जो प्रकोप हुआ उससे पूरे दो सप्ताह तक प्रचार समूहों का किसी नवीन विषय की आवश्यकता भी नहीं रही।  यह भी देखा गया है कि अर्थ, धर्म, कला, फिल्म और सार्वजनिक विषयों से जुड़े शिखर पुरुषों ने भी अब रविवार का उपयोग आम आदमी तक पहुंचने के लिये प्रचार के रूप में  करना प्रारंभ कर दिया है।  वैसे देखा जाये तो हमारे देश में  संतों पर अक्सर लोगों के भक्ति भाव का दोहन करने का आरोप लगता है पर सच यह है कि जनसमूहों को प्रभावित करने की उनकी कला का अनुकरण हमारे लोकतांत्रिक देश में गैर धार्मिक लोग भी कर रहे हैं।  रविवार का प्रचार के लिये उपयेाग करने का प्रयास पेशेवर धार्मिक संतों ने ही शुरु किया है।
            जब सभी रविवार का उपयोग इस तरह कर रहे हैं तो वह अपराधी समूह कैसे पीछे रह सकते हैं जो जनता में अपनी हिंसा का प्रचार चाहते हैं।  आज बिहार में बौद्धिगया में एक साथ नौ विस्फोट जिस तरह किये गये उससे लगता है कि जानबूझकर रविवार का दिन चुना गया।  समय भी वह चुना गया जिस समय लोग वहां कम थे।  स्पष्टतः इस विस्फोट से जुड़े अपराधियों का मुख्य ध्येय रविवार को अपराध कर सारे दिन टीवी पर बैठकर उसका प्रचार देखते रहना भी हो सकता है।  समय प्रातः पांच से छह के बीच का चुना गया।  यह समय एकदम नियमित भक्तों का होता है जिनकी संख्या नगण्य ही होती है।  वह भक्त  जिनके मन में भगवान के प्रति इतनी श्रद्धा होती है कि वह प्रातः आने वाली मीठी नींद का त्याग कर देते हैं। यही त्याग उनको सच्चा भक्त बनाता है। हम यह नहीं कहते है कि देर से उठकर भगवान की भक्ति करने वाली कोई भक्त नहीं है। एक ज्ञान साधक के लिये किसी की भक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करना वर्जित है पर जब हम थोड़ा विस्तार से विश्लेषण करते हैं तो कुछ ऐसी टिप्पणियां आ ही जाती हैं जब किसी को थोड़ा बेहतर बताया जाये तो तय बात है कि भले ही सीधी न कहें पर किसी का  कम बेहतर होना स्वतः ही प्रकट हो जाता हैं।  हमारा यह भाव कतई नहीं है कि हम देर उठकर भक्ति करने वालों की आलोचना करें पर इतना तय है कि प्रातः जल्दी उठकर सर्वशक्तिमान की प्रार्थना करने वाला वास्तव में एक सच्चा भक्त है।
     एक बार हम अपने एक मित्र के साथ एक  घर से दूर  एक योग शिविर में गये। शिविर का स्थान एक ऐसी कालोनी में था जहां व्यवसायिक लोग रहते हैं।  शिविर पांच दिनों का था पर हम शनिवार और रविवार को ही  वहां गये। वहीं हमारे एक मित्र के मित्र वहीं  रहते थे।  पहले दिन तो हम दोनों निकल आये पर दूसरे दिन मित्र के मित्र का लड़का मिल गया।  रविवार होने के कारण वह प्रातःकाल की सैर को आठ बजे निकला था।  तब हम शिविर से  बाहर निकलकर आपसी वार्तालाप कर रहे थे। हमारी साधना समाप्त हुए भी करीब एक घंटा बीत चुका था।  वहां नाश्ता तथा वार्तालाप में एक घंटा लग गया था।  बाहर निकले तो वह लड़का हमारे मित्र के पास आया। उसे समझते देर नहीं लगी कि हम यहां योग शिविर में आये हैं।  उसने हमारे मित्र से कहा-‘‘अंकल, अब तो आपका कार्यक्रम समाप्त हो गया है। चलिये हमारे घर, कभी तो आया करिये। आज अवसर है तो आप घर चलें और पापा मम्मी से मुलाकात करिये।  मैं थोड़ा घूमकर आता हूं।’’
  हमारे मित्र ने उसकी बात मान ली और उसके घर तक आये। संयुक्त परिवार होने के कारण बड़ा घर था और उसमें घुसने के लिये दो बड़े लोहे के दरवाजे थे। हमारे मित्र ने अपने लक्ष्य वाले दरवाजे की घंटी बजायी तो कोई बाहर नहीं आया।  हम दरवाजा खोलकर दालान पार करते हुए  मकान के अंदर दरवाजे तक आये। वह भी खुला था। मित्र ने अपने मित्र का नाम लेकर आवाज लगायी। कोई जवाब नहीं आया। फिल्म और धारावाहिकों में हम अनेक वारदातें ऐसी देख चुके हैं कि अंदर घुसने का साहस नहीं हुअता। हमारे मित्र के मित्र का छोटा भाई ऊपर से झांक रहा था। हमने उसे अपने आने का कारण बताया।   तब वह अंदर ही नीचे से उतरकर भाई को बुलाने गया।  इतने में उनके काम करने वाली एक महिला का आना हुआ। हमारे मित्र को अनेक बार आने के कारण वह जानती थी।  उसने कहा कि ‘‘आप अंदर चलिये न! वह लोग अंदर ही सो रहे होंगे।’’
       हम उसके साथ ही अंदर दाखिल हो गये।  उस महिला ने बैडरूम के दरवाजे पर जाकर अपने मालिकों को आवाज दी और हमारे  आने की सूचना भी सुना दी।
          हम शिविर से उस मकान तक भी रुकते रुकते पहुंचे थे। घड़ी में उस समय आठ बजकर चालीस मिनट हुए थे। मतलब हमें बिस्तर छोड़े उस समय तक चार घंटे हो चुके थे। हमारी  दैहिक स्थिति इतनी अच्छी थी कि हम घर न जाकर कहीं दूसरा काम भी कर सकते थे-जैसे खरीददारी वगैरह  या कहीं मंदिर में जाकर घ्यान और पूजा करना! खरीददारी करने की बात बेकार है क्योंकि बाज़ार भी अब ग्यारह बजे से पहले कहां खुलते हैं? किसी के घर प्रातःकाल जाकर उसे  किस तरह उसे तकलीफ दी जा सकती है यह भी हमने उस दिन देखा। मित्र तथा उसकी पत्नी एकदम नींद से उठकर बाहर आये। उन्होंने हमारा स्वागत हृदय से किया इसमें संशय नहीं है क्योंकि हम कोई ऐसे रिश्तेदार नहीं थे जो तकलीफ देने वाले हों।
             वहां से हम दस बजे चाय और नाश्ता कर ही बाहर आये। इसकी कोई आवश्यकता भी हमें नहीं थी पर मेजबान का दिल रखने के लिये उनके पदार्थों को सेवन आधे मन से  स्वीकार करना पड़ा। उसी दौरान उनका छोटा भाई भी मिलने आया जो हमें प्रातःकाल आया देखकर हैरान था।  वह अपनी पत्नी के साथ रविवार का दिन होने के कारण  मंदिर जा रहा था।
                 कहने का अभिप्राय यह है कि प्रातःकाल के समय मनुष्य का मन स्वतः ही पवित्र होता है और अगर वह भगवान की भक्ति में लीन हो तो फिर कभी उस पर संशय करना ही नहीं चाहिए।  जब बौद्धिगया में भगवान बुद्ध के मंदिर पर विस्फोटो का विचार करते हैं तो उन दो लामाओं के घायल होने पर दर्द होता ही है जो प्रातःकाल अपने भगवान की सेवा में लीन थे। यकीनन ऐसे विस्फोट करने और कराने वालों को नीच ही कहा जा सकता है।  अभी इस घटना की जांच चल रही है इसलिये कहना कठिन है इससे किसका लक्ष्य पूरा हुआ पर इतना तय है कि इस घटना को किसी भी  धर्म से जोड़ने को हम गलत मानते हैं। हमारा मानना है कि पहले आतंकवाद के अर्थशास्त्र का पता लगाया जाये।  कुछ विद्वान मानते हैं कि आतंकवाद घटनाओं की आड़ में गंदे और गलत काम करने वाले लोग अपनी सक्रियता बढ़ा देते हैं। उनका लक्ष्य प्रजा, प्रशासन तथा पुलिस का ध्यान भटकाकर अपने दो नंबर का काम करना होता है और वही आतंकवाद के प्रायोजक भी होते  है। विस्फोट करने वाले बिना धन या अन्य लाभ के ऐसा काम करें यह भी जंचता नहीं है।  बहरहाल हम इस घटना से पीड़ित लोगों के स्वस्थ होने का हृदय से कामना करते हैं।

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Sunday, December 30, 2012

कन्या भ्रूण हत्या पर 11 फ़रवरी पर लिखा गया लेख आज भी प्रासंगिक-हिंदी सम्पादकीय (kanya bhrun hatya par likha gaya lekh aaj bhee prangik-hindi article and thought)

       इस लेखक के इन्टरनेट पर लिखे गए लेखों में एक है कन्या भ्रुण हत्या से मध्ययुगीन स्थिति की तरफ बढ़ता समाज-हिन्दी लेख। 11 फ़रवरी 2011 को लिखे गए इस लेख पर आज तक भी टिप्पणियाँ आती हैं।  इस पर कुछ टिप्पणीकारों ने यह भी लिखा कि  आपकी बात हमारे समझ में नहीं आयी तो  अनेक लोगों ने अपनी  व्यथा कथा भी कही है।  लिखने का अपना अपना तरीका होते है।  जब किसी विषय पर  गंभीरता से  लिखते हुए कोई डूब जाये तो भाषा सौंदर्य दूर हो जाता है और अगर शब्दों की चिंता करें तो दिमाग सतह पर आ जाता है।  हम जैसे हिंदी के गैर पेशेवर लेखकों के लिया यही मुश्किल है कि पाठक हमारे लेखों में भाषा सौन्दर्य न देखकर यह मान लेते हैं इनकी बात तो आम भाषा में लिखी गयी है इसलिए यह कोई मशहूर लेखक नहीं बन पाए।  बाज़ार के सहारे  मशहूर लेखकों को  पढ़कर भी  पाठक  निराश होते हैं की उन्होंने कोई नयी बात नहीं कही।  कन्या भ्रूण हत्या पर लिखे गए इस लेख में समाज की आंतरिक और बाह्य सत्यता का वर्णन किया गया था।  इसके लिए किसी खास घटना पर आंसू नहीं बहाए गए थे।   एक पेशेवर लेखक की तरह पाठकों का ध्यान सामयिक रूप से अपनी तरफ आकर्षित करने का यह कोई प्रयास नहीं था।
       आज मन में आया कि  भारतीय नारियों के प्रति अपराध पर कुछ नया लिखा जाए पर पता चला की पाठकों की नज़र आज भी इस पर पड़ी  हुई है तब लगा कि  इसे पुन: प्रस्तुत किया जाए।  पूरे लेख को हमें पढ़ा तो लगा कि  यह अब भी प्रासंगिक है।  11 फरवरी 2011 तथा 29 दिसंबर 2012 में करीब 23 महीने का अंतर है।  नारियों के प्रति बढ़ते अपराधों के लिए अनेक कारण है।  दरअसल कुछ ऐसे भी हैं जो सभीके सामने हैं, लोग जानते हैं, मानते भी हैं मगर बाहरी रूप से कोई स्वीकार नहीं करना चाहता है।  पुरुष ही नहीं नारियां भी शुतुर्मुर्गीय अंदाज़ में  बहस कर रहे हैं।  अभी हाल ही में दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की घटना हुई।  इस पर इतने प्रदर्शन हुए। अख़बारों में सम्पाकीय छपे। टीवी चैनलों पर बहसें  हुई।  सब कुछ प्रायोजित लगा।  हमें लगा कि  11 फरवरी 2011 को लिखा गया यह लेख अभी भी सीना तनकर खड़ा है और पेशेवर लेखकों को ललकार रहा हो ऐसा बोलकर और लिखकर दिखाओ।
 जिन्होंने बहस की उन्होंने कुछ न कुछ पाया होगा। चैनलों ने पांच मिनट  की बहस की तो पच्चीस  मिनट का विज्ञापन चलाया।  मगर सच कोई नहीं बोला।  वैसे तो .धनपतियों के हाथ में पूरी दुनिया है पर समाज उनके हाथ में पूरी तरह नहीं रहा था। उनके सहारे चल रहे प्रचार माध्यमों  ने यह काम भी कर दिखाया। उदारीकरण के चलते सार्वजानिक क्षेत्र कम हुआ है। सीधी बात कहें तो समाज की राज्य से अधिक निजी क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ गयी है।  मान सम्मान की रक्षा, सुरक्षित सेवाओं का प्रबंध तथा प्रजा हित को सर्वोपरि मानते हुए अपना काम जितना राज्य कर सकता है, निजी क्षेत्र के लिए यह संभव नहीं है।  राज्य के लिए अपने लोग महत्वपूर्ण होते हैं निजी क्षेत्र के लिए अपनी कमाई सर्वोपरि होती है।
                इससे भी अधिक  बात यह है की राज्य का जिम्मा अपने प्रजा को संभालना भी होता है और निजी क्षेत्र कभी इसे महत्व नहीं देता।
  निजी क्षेत्र कभी राज्य का प्रतीक  नहीं हो सकते।   जब निजी क्षेत्र अपने साथ राज्य के प्रतीक के रूप में अपनी ताकत दिखाते हैं तो कुछ ऐसी समस्याएँ उठ सकती हैं जिनकी कल्पना कुछ लोगों ने की भी होगी।  इस पर किसी ने  प्रकाश नहीं डाला। इसी अपेक्षा भी नहीं थी। कारण की बाज़ार के सौदागरों और प्रचार प्रबंधकों का या सिद्धान्त है की बहसें खूब हों पर इतनी कि  लोग बुद्धिमान न हो जाएँ।  इसलिए नारे लगाने तथा रुदन करने वाले बुद्धिजीवियों को आमंत्रित करते हैं।  इनमें कुछ एक हद तक व्यवस्था तो कुछ समाज की आलोचना करने की खानापूरी करते हैं।  इस विषय पर बहुत कुछ लिखने का मन है पर क्या करें अपने पास समय की सीमायें हैं।  पेशेवर बुद्धिजीवियों के मुकाबले हम जैसे आम लेखकों को समाज अधिक महत्व भी नहीं देता।  इसलिए जब समाज मिलता है अपनी बात कह जाते हैं। 
पहले लिखा गया लेख पढना चाहें तो पढ़ सकते हैं।
              हो सकता है कि कुछ लोग हमारी बुद्धि पर ही संशय करें, पर इतना तय है कि जब देश के बुद्धिजीवी किसी समस्या को लेकर चीखते हैं तब उसे हम समस्या नहीं बल्कि समस्याओं या सामाजिक विकारों का परिणाम मानते हैं। टीवी और समाचार पत्रों के समाचारों में लड़कियों के विरुद्ध अपराधों की बाढ़ आ गयी है और कुछ बुद्धिमान लोग इसे समस्या मानकर इसे रोकने के लिये सरकार की नाकामी मानकर हो हल्ला मचाते हैं। उन लोगों से हमारी बहस की गुंजायश यूं भी कम हो जाती हैं क्योंकि हम तो इसे कन्या भ्रुण हत्या के फैशन के चलते समाज में लिंग असंतुलन की समस्या से उपजा परिणाम मानते है। लड़की की एकतरफ प्यार में हत्या हो या बलात्कार कर उसे तबाह करने की घटना, समाज में लड़कियों की खतरनाक होती जा रही स्थिति को दर्शाती हैं। इस पर चिंता करने वाले कन्या भ्रूण हत्या के परिणामों को अनदेखा करते हैं।
        इस देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का फैशन करीब बीस-तीस साल पुराना हो गया है। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ जब देश के गर्भ में भ्रुण की पहचान कर सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य लोगों पेट के दोषों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। भारत के भी निजी चिकित्सकालयों में भी यही उद्देश्य कहते हुए इस मशीन की स्थापना की गयी। यह बुरा नहीं था पर जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्या भ्रुण हत्या का फैशन प्रारंभ हुआ उसने समाज में लिंग अनुपात की  स्थिति को बहुत बिगाड़ दिया। फैशन शब्द से शायद कुछ लोगों को आपत्ति हो पर सच यह है कि हम अपने धर्म और संस्कृति में माता, पिता तथा संतानों के मधुर रिश्तों की बात भले ही करें पर कहीं न कहीं भौतिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की वजह से उनमें जो कृत्रिमता है उसे भी देखा जाना चाहिए। अनेक ज्ञानी लोग तो अपने समाज के बारे में साफ कहते हैं कि लोग अपने बच्चों को हथियार की तरह उपयोग करना चाहते हैं जैसे कि स्वयं अपने माता पिता के हाथों हुए। मतलब दैहिक रिश्तों में धर्म या संस्कृति का तत्व देखना अपने आपको धोखा देना है। जिन लोगों को इसमें आपत्ति हो वह पहले कन्या भ्रुण हत्या के लिये तर्कसंगत विचार प्रस्तुत करते हुए उस उचित ठहरायें वरना यह स्वीकार करें कि कहीं न कहीं अपने समाज के लेकर हम आत्ममुग्धता की स्थिति में जी रहे हैं।
           जब कन्या भ्रुण हत्या का फैशन की शुरुआत हुई तब समाज के विशेषज्ञों ने चेताया था कि अंततः यह नारी के प्रति अपराध बढ़ाने वाला साबित होगा क्योंकि समाज में लड़कियों की संख्या कम हो जायेगी तो उनके दावेदार लड़कों की संख्या अधिक होगी नतीजे में न केवल लड़कियों के प्रति बल्कि लड़कों में आपसी विवाद में हिंसा होगी। इस चेतावनी की अनदेखी की गयी। दरअसल हमारे देश में व्याप्त दहेज प्रथा की वजह से लोग परेशान रहे हैं। कुछ आम लोग तो बड़े आशावादी ढंग से कह रहे थे कि ‘लड़कियों की संख्या कम होगी तो दहेज प्रथा स्वतः समाप्त हो जायेगी।’
                  कुछ लोगों के यहां पहले लड़की हुई तो वह यह सोचकर बेफिक्र हो गये कि कोई बात नहीं तब तक कन्या भ्रुण हत्या की वजह से दहेज प्रथा कम हो जायेगी। अलबत्ता वही दूसरे गर्भ में परीक्षण के दौरान लड़की होने का पता चलता तो उसे नष्ट करा देते थे। कथित सभ्य तथा मध्यम वर्गीय समाज में कितनी कन्या भ्रुण हत्यायें हुईं इसकी कोई जानकारी नहीं दे सकता। सब दंपतियों के बारे में तो यह बात नहीं कहा जाना चाहिए पर जिनको पहली संतान के रूप में लड़की है और दूसरी के रूप में लड़का और दोनों के जन्म के बीच अंतर अधिक है तो समझ लीजिये कि कहीं न कहंी कन्या भ्रुण हत्या हुई है-ऐसा एक सामाजिक विशेषज्ञ ने अपने लेख में लिखा था। अब तो कई लड़किया जवान भी हो गयी होंगी जो पहली संतान के रूप में उस दौर में जन्मी थी जब कन्या भ्रुण हत्या के चलते दहेज प्रथा कम होने की आशा की जा रही थी। मतलब यह कि यह पच्चीस से तीस साल पूर्व से प्रारंभ  सिलसिला है और दहेज प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। हम दहेज प्रथा समाप्ति की आशा भी कुछ इस तरह कर रहे थे कि शादी का संस्कार बाज़ार के नियम पर आधारित है यानि धर्म और संस्कार की बात एक दिखावे के लिये करते हैं। अगर लड़कियां कम होंगी तो अपने आप यह प्रथा कम हो जायेगी, पर यह हुआ नहीं। 
            इसका कारण यह है कि देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। मध्यम वर्ग के लोग अब निम्न मध्यम वर्ग में और निम्न मध्यम वर्ग के गरीब वर्ग में आ गये हैं पर सच कोई स्वीकार नहीं कर रहा। इस कारण लड़कों से रोजगार के अवसरों में भी आकर्षण शब्द गायब हो गया है। लड़कियों के लिये वर ढूंढना इसलिये भी कठिन है क्योंकि रोजगार के आकर्षक स्तर में कमी आई है। अपनी बेटी के लिये आकर्षक जीवन की तलाश करते पिता को अब भी भारी दहेज प्रथा में कोई राहत नहीं है। उल्टे शराब, अश्लील नृत्य तथा विवाहों में बिना मतलब के व्यय ने लड़कियों की शादी कराना एक मुसीबत बना दिया है। इसलिये योग्य वर और वधु का मेल कराना मुश्किल हो रहा है।
           फिर पहले किसी क्षेत्र में लड़कियां अधिक होती थी तो दीवाने लड़के एक नहीं  तो दूसरी को देखकर दिल बहला लेते थे। दूसरी नहीं तो तीसरी भी चल जाती। अब स्थिति यह है कि एक लड़की है तो दूसरी दिखती नहीं, सो मनचले और दीवाने लड़कों की नज़र उस पर लगी रहती है और कभी न कभी सब्र का बांध टूट जाता है और पुरुषत्व का अहंकार उनको हिंसक बना देता है। लड़कियों के प्रति बढ़ते अपराध कानून व्यवस्था या सरकार की नाकामी मानना एक सुविधाजनक स्थिति है और समाज के अपराध को दरकिनार करना एक गंभीर बहस से बचने का सरल उपाय भी है।
              हम जब स्त्री को अपने परिवार के पुरुष सदस्य से संरक्षित होकर राह पर चलने की बात करते हैं तो नारीवादी बुद्धिमान लोग उखड़ जाते हैं। उनको लगता है कि अकेली घूमना नारी का जन्मसिद्ध अधिकार है और राज्य व्यवस्था उसको हर कदम पर सुरक्षा दे तो यह एक काल्पनिक स्वर्ग की स्थिति है। यह नारीवादी बुद्धिमान नारियों पर हमले होने पर रो सकते हैं पर समाज का सच वह नहीं देखना चाहते। हकीकत यह है कि समाज अब नारियों के मामले में मध्ययुगीन स्थिति में पहुंच रहा है। हम भी चुप नहीं  बैठ सकते क्योंकि जब नारियों के प्रति अपराध होता है तो मन द्रवित हो उठता है और लगता है कि समाज अपना अस्तित्व खोने को आतुर है।

दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप'
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior,madhya Pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Friday, September 28, 2012

देश की खुशहाली के लिए वेदों के मन्त्रों का जाप करें-हिंदी चिंत्तन (desh ki khushahli ke liye vedmantron kaa jaap karen-hindi chittan)

       आज भारत में चल हिन्दी टीवी चैनलों पर चल रहे कार्यक्रमों को देखा जाये तो लगेगा कि हमारे देश में केवल युवाओं की  इश्क बाज़ी, क्रिकेट, फिल्म और तथा प्रशासनिक घोटालों के अलावा अन्य कोई विषय नहीं है। सबसे बड़ी बात तो यह मान ली गई लगती है कि आम आदमी की कोई स्वयं  की  सोच नहीं है। उसकी कोई  आवाज़ नहीं है। प्रचार और समाज सेवा से जुड़े लोग चाहे जैसे अपने हिसाब से आम आदमी की अभिव्यक्ति प्रदर्शित करते दिखते हैं।  देश एक तरह से दो भागों में बाँट गया है। एक तरफ है इंडिया तो दूसरी तरफ हैं भारत।
    इंडिया का मुख बाहर की तरफ है तो भारत का रूप विश्व परिदृश्य से अज्ञात दिखता है। इस इंडिया में  देश के आठ दस बड़े शहर हैं जो विश्व बिरादरी से जुड़े हैं और यहीं के सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक तथा धार्मिक शिखर पर विराजमान लोग और उनके  पालित विद्वान बुद्धिजीवी जैसा देश का रूप दिखा रहे हैं वैसा ही सभी देख रहे हैं।  इतना ही नहीं देश के अंदर भी यही लोग भाग्य विधाता बना गए हैं।  यह सब बुरा नहीं होता अगर स्वार्थवाश कार्य करने वाले इन लोगों  की बुद्धि संकुचित और शारीरिक क्षमता सीमित नहीं होती।  एक बात निश्चित है कि स्वार्थ मनुष्य को संकीर्ण और सीमित क्षमता वाला बना देता हैं इसलिए  इन शिखर  पुरुषों से यह अपेक्षा तो करनी ही नहीं चाहिए कि वह अपने दृष्टिकोण  यह u को कभी व्यापक रखकर काम करें क्योंकि उन्होंने हमेशा ही दायरों में रहकर जीवन बिताया है।  यह इनके  लिए संभव ही नहीं है।  कहा जाता है जो  देह के पास हैं वही दिल के पास है।  बड़े शहरों में यही शिखर पुरुष और इनके पालित बुद्धिमान रहते हैं।  इनके पास सारी सुविधाएँ हैं जो इन्होने सारे देश से कमाई हैं मगर अपने पास स्थापित वैभव के इनको कुछ नहीं दिखता।  यह सब भी स्वीकार्य होता  अगर पूरे देश को प्रभैत करने का माद्दा इनके पास नहीं होता।
        इन्हीं शिखर पुरुषों के पास देश का  भविष्य और व्यवस्था को प्रभावित करने वाली शक्ति  है जिसका उपयोग  यह अपने पालित बुद्धिजीवियों कि राय से तय करते हैं।  यह दोनों मिलकर एक दुसरे के हितों की चिंता के अलावा कुछ नहीं करते।  इनका  दावा यह कि यह आम आदमी को जानते हैं। दूर की बात क्या  बड़ी इमारतों में रहने वाले इन लोगों को अपने ही बड़े शहरों के छोटे लोगों का ज्ञान नहीं है।  समाज, कला, अर्थ, धर्म   और प्रबंध के क्षेत्र में कार्यरत लोग आमजन निराश है। देश में जो निराशा और हताशा का वातावरण हैं उसके लिए जिम्मेदार कौन है? इस पर कोई विचार कोई नहीं करता ।
        सच बात तो यह कि इसके लिए हमारे देश  के वही आमजन जिम्मेदार  हैं जो हमेशा  ही इन शक्तिशाली, वैभवशाली और ऊंची जगहों पर बैठे लोगों की तरफ मूंह किए बैठे रहते हैं, जिससे इनको अपनी विशिष्टता का बोध होता है जिससे  यह उदार होने की बजाय आत्ममुग्ध हो जाते हैं।  आमजन उनमें अपने वैभव का अहंकार भरते हैं। यही कारण  है की   दौलत, शौहरत  और ताकत में मदांध यह लोग अपने कार्यों सामान्य  कार्यों में भी विशिष्टता की अनुभूति  कराना  नहीं भूलते।  सच बात तो यह है देश भगवान भरोसे चल रहा है। अगर इसी तरह चलता रहा तो आगे हालात  और कठिन होने वाले हैं।  फिर भी हम मानते हैं हमारी  भूमि देव भूमि है और वही इसकी रक्षा करते हैं।  उनमें वह शक्ति  है जो इस अपनी भूमि की रक्षा के लिए अदृश्य रहकर भी काम करते  हैं और समय आने पर किसी की बुद्धि और ताकत कम या ज्यादा  आकर अंतत: हमारी रक्षा करेंगे।  वेदों में इस तरह की ऐसी अनेक प्रार्थनाएँ हैं उनमें से रोज एक जपना चाहिए।  हमारा मानना है उससे लाभ अपने को तो होगा ही पूरे समाज को भी होगा। अब यह नहीं सोचना चाहिए कि इससे  तो उन लोगों को भी लाभ होगा जो प्रार्थना नहीं करते।  हम जब शिखर पुरुषों और उनके पालित बुद्धिजीवियों पर संकीर्ण होने का संदेह करते हैं तब अपने व्यापक दृष्टिकोण अपनाकर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। जय श्री राम, जय श्री कृष्ण, जय श्री शिव शंकर,हरिओम।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, madhya pradesh

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