Friday, April 1, 2011

लंकादहन को उकसाते हैं पर खुद नारे ही लगाते रहेंगे-हिन्दी व्यंग्य चिंतन (lanka dahan aur cricket match-hindi vyangya chittan)

भारत में कुछ ज्ञानी बुद्धिजीवी आम बुद्धिजीवियों पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि ‘कुछ लोग चाहते हैं कि उनके यहां पैदा होने वाला बेटा कहीं का कलेक्टर बने भले ही पड़ौसी का लड़का भगतसिंह बन जाये।’
आजादी के बाद देश में एक ऐसा सुविधा भोगी वर्ग बन गया है जो क्रांति, इंकलाब, अभिव्यक्ति की आज़ादी तथा गरीबों का कल्याण की बात करते हुए जमकर नारे लगाता है पर जहां प्रतिरोध सामने आया भाग खड़ा होता है। यह वर्ग अपने आकाओं के लिये भीड़ जुटाता है पर विपत्ति जब सामने खड़ी हो तो उसमें शामिल लोग अपने को लाने वाले ठेकेदार की तरफ सहारे के लिये देखते हैं तो उसे नदारद पाते हैं।
ऐसा कई बार हुआ है और हालत यह है कि अगर कोई सामान्य व्यक्ति जब कोई आदर्श की बात करता है तो ‘‘लोग उससे पूछते हैं कि तू क्या नेता हो रहा है। यह सब बातें कर रहा है पर समय आने पर तू ही सबसे पहले पलटा खायेगा।’’
इधर अपने देश में नेतागिरी, समाज सेवा, क्रिकेट बाजी, फिल्म बाजी और जितने भी आकर्षण पैदा करने वाले काम हैं सभी का व्यवसायीकरण इस तरह हो गया है कि उसमें आदर्श की बातें बेची जाती हैं पर व्यवहार में अपनाई कतई नहीं जाती। अभी भारत में चल रही विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता 2011 में यही हाल दिखाई दिया। प्रचार माध्यम यानि समाचार पत्र पत्रिकाऐं और टीवी चैनल अपने विज्ञापनदाताओं को इस कदर समर्पित हो गये कि क्रिकेट जैसे व्यापार में देशभक्ति बेच डाली।
मोहाली में पीसीबी (पाकिस्तान) और बीसीसीआई (भारत) की टीम के बीच मैच को प्रचार माध्यमों ने महा मुकाबला इस तरह प्रचारित किया कि कई जगह बड़ी स्क्रीन पर मैच दिखाने की मुफ्त व्यवस्था की गयी। ऐसे ही एक सामूहिक केंद्र पर हम मैच देखने गये। यह तो केवल बहाना था दरअसल उस दिन हम लोगों की प्रतिक्रिया देखना चाहते थे। उस केंद्र पर एक टीवी रखा रहता है जो मैच के दिनों में चलता रहता है। हम भी राह चलते हुए कभी कभार पानी आदि पीने के विचार से वहां चले जाते हैं। उस दिन हमारे जाते ही मुल्तान का सुल्तान आउट हो गया।
गनीमत किसी ऐसे आदमी ने नहीं देखा जो हमसे कुछ कहने का साहस रखे कि ‘देखो इनके चरण कमल पड़ते ही मुल्तान का सुल्तान आउट हो गया।’
जिन्होंने देखा उनको पता था कि यह व्यंग्यकार है और कहीं कुछ ऐसा वैसा कह दिया तो अपनी भड़ास ब्लाग पर जाकर निकालेगा। भले ही वह ब्लाग नहीं पढ़ते हों पर यह आशंका उनको रहती है कि कहंी मुफ्त में इसे व्यंग्य की सामग्री उपलब्ध न करायें।
हमने थोड़ी देर मैच देखा फिर लौटे आये। फिर थोड़ी देर बाद गये तो पता लगा कि गंभीर का झटका लगा है। अब हमें खुटका होने लगा कि कहीं यह बीसीसीआई की टीम देश का नाम डुबो न दे। तब हम बाहर चाय की दुकान पर जमे रहे। वहां मैच नहीं दिख रहा था पर इधर उधर से आते जाते लोग बता गये कि युवराज का सिंहासन भी चला गया है। हमने तय किया कि यह मैच नहीं देखेंगे। देखकर क्या तनाव पालना? दरअसल हमें अब क्रिकेट से कोई लगाव नहीं है क्योंकि इसे देखते हुए टीवी पर आंखें खराब करने और रिमोट पर उंगलियां थकाने से इंटरनेट पर व्यंग्य लिखना अच्छा लगता है।
वैसे हम पर भी ‘परोपदेशे कुशल बहुतेरे’ का सिद्धांत लागू होता है। भले ही पाठकों से माफिया, मीडिया तथा मनीपॉवर के इस संयुक्त उपक्रम क्रिकेट खेल से दूर रहने को कहें पर जाल में खुद भी फंस जाते हैं। खुद से ही नजरें चुराकर इस तरह देख तो लेते ही हैं कि‘हम भला कहां मैच देख रहे हैं? सो फिर सामूहिक केंद्र की तरफ चले गये तो देखा लोग वहां से निकल रहे हैं।
हमने एक से पूछा‘क्या बात है, क्या बिजली चली गयी?’
उसने कहा-‘नहीं, क्रिक्रेट का भगवान चला गया। अब तो हो गयी टीम की ऐसी की तैसी? दो सौ रन भी नहीं बनेंगे।
हमने कहा-‘अरे, ऐसा क्यों सोचते हो? अभी तो रैना है देखना दो सौ पचास से ऊपर रन बनेंगे और हम जीतेंगे।’
बिल्कुल तुक्का था पर सही जगह पर जाकर लगा। रैना से आशा गलत नहीं थी पर यह एक अनुमान था। टीम की जीत का विश्वास तो प्रचार माध्यमों की वजह से हो चला था। प्रचार माध्यमों की बातों से अनुमान किया था कि पर्दे के पीछे भी कुछ ताकतें हैं जो भारत में क्रिकेट को जिंदा रखना चाहती हैं।
अगले दिन वह आदमी हमसे मिला तो खुश हो गया और बोला-‘यार, तुम गजब की जानकारी रखते हो। यह तो बताओ कि तुम्हारे ब्लाग का नाम क्या है? मैं अपने लड़के से कहकर उसे देखा करूंगा क्योंकि वह घर पर कंप्यूटर पर काम करता है।’
हमने उससे कहा कि ‘अरे, कोई खास ब्लाग नहीं है। ऐसा ही है।
उसे टरकाना जरूरी था। क्रिकेट में जिस तरह देशभक्ति घुस गयी है उसके बाद किसी से इस विषय पर चर्चा करना ठीक नहीं लगता जब तक वह समान विचार वाला न हो। ऐसे में अपने ब्लाग पर जो हमने लिखा है वह उसे नापसंद भी हो सकता है।
पाकिस्तान को रौंद डालो का नारा खत्म हुआ तो अब आया कि लंकादहन कर डालो।’
पता नहीं किसकी सीता अपहृत हो गयी है। फिर सुना है कि मुंबई में बीसीसीआई की टीम के साथ श्रीलंका की टीम का फायनल मैच देखने के लिये वहां के राष्ट्रपति राजपक्षे आ रहे हैं। गनीमत है उनको हिन्दी नहीं आती भले ही उनका नाम कर्णप्रिय संस्कृतनिष्ठ है। उनको शायद ही कोई बताये कि देखिए यह भारत के हिन्दी प्रचार माध्यम क्या उल्टा सीधा बकवास कर रहे हैं।
लंकादहन सीता हरण का परिणाम था और यकीनन वहां के लोगों से अब हमारा कोई ऐसा धार्मिक या सांस्कृतिक बैर नहीं है। ऐसे में इस तरह धार्मिक प्रतीकों का उपयोग करना अत्यंत निंदनीय लगता है। पाकिस्ताने से साठ साल पुराना बैर है पर श्रीलंका के साथ कोई ऐसा विवाद नहीं रहा जिसे उसके दुश्मन घोषित किया जाये।
पाकिस्तान जब हारने लगा था तब यही प्रचार माध्यम खेल को खेल की तरह देखें का नारा लगाने लगे थे जबकि बैर की आग भी उसीने लगायी थी। अगर श्रीलंका मैच हार गया तो फिर कोई नहीं कहेगा कि ‘हमारी टीम ने लंकादहन कर लिया।’ वजह तब तक तो लोगों की भावनाओं का नकदीकरण तो हो चुका होगा न!
सुनने में आया कि आईसीसी के आदेश पर फायनल मैच में वानखेड़े स्टेडियम में मीडिया का प्रवेश रोक दिया गया। इस पर टीवी चैनलों ने बावेला मचाया। अशोक मल्होत्रा ने राय दी कि ‘तुम प्रचार माध्यम भी क्रिकेट का बहिष्कार कर दो क्योंकि यह तुम्हारे दम पर ही हिट है।’
सच तो यह है कि यही हिन्दी प्रचार माध्यम लोगों को बरगलाकर भीड़ जुटा रहे हैं वरना क्या आईसीसी और क्या बीसीसीआई, कभी भी 2007 के बाद क्रिकेट को इस देश में जिंदा नहीं रख सकते थे। मोहाली के मैच में हमने ब्लाग पर पचास से साठ फीसदी पाठ पठन तथा पाठक संख्या कम दर्ज पाई। इसका मतलब यह कि इंटरनेट पर सक्रिय एक बहुत बड़ा वर्ग क्रिकेट के चक्कर में फंस गया था। यह सब इन्हीं प्रचार माध्यमों का प्रभाव था। आईसीसी ने फायनल में अपने ही अघोषित मित्रों पर पाबंदी लगा दी। प्रचार माध्यम चाहते तो आज ही बदले की कार्यवाही करते हुए क्रिकेट की खबरों से किनारा कर लेते। अशोक मल्होत्रा की सलाह से पहले ही यह काम करते तो आईसीसी वाले पांव छूकर माफी मांग लेते। मगर हुआ क्या? प्रदर्शन करने पहुंच गये। फिर आईसीसी वालों ने यह बैन हटा दिया और उनको अभ्यास के साथ ही मैच देखने की अनुमति दे दी। सो प्रचार माध्यमों ने माफ कर दिया। अपने साथ हुई बदसलूकी भूल गये। आईसीसी वाले जानते हैं कि भारतीय प्रचार माध्यम क्रिकेट की कतरन पर ही जिंदा है। गाहे बगाहे फिल्म वाले भी इन प्रचार माध्यमों के कर्मियों को जलील करते हैं क्योंकि उनकी कतरनें भी समाचारों का हिस्सा बनती हैं। प्रचार तंत्र के मालिकों को कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि उनकी तो हमेशा ही पूजा होती है। जलील तो सामान्य वर्ग के कर्मचारी ही होते हैं। ऐसे में समाचार और विश्लेषण वाचक आक्रामक होने की बात तो कर सकते हैं पर खबरों से किनारा नहीं कर सकते। अगर ऐसा करेंगे तो एक घंटे में पांच मिनट तक ही चल पायेंगे। मालिक अधिक खर्चा नहीं कर सकते। कर्मचारी भगत सिंह की तरह शहीद होने की बात कर सकते हैं पर हो नहीं सकते और मालिक तो सोच भी नहीं सकते क्योंकि वह तो क्रिकेट से जुड़े उसी संयुक्त उपक्रम का हिस्सा हैं जो आज भी अंग्रेजों के मार्ग पर चलता है और बागी को कंगाल बना देता है। सो यह प्रचार माध्यम एक दिन शहीद दिवस पर भगतसिंह को याद कर लेंगें बाकी समय तो क्रिकेट का भगवान ही पूजते रहेंगे जिससे उनको सहारा है जिसके बल्ले से प्रचार कार्यक्रमों की सामग्री मुफ्त में मिलती है।
---------------



यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपकबापू कहिन 
५.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.शब्द पत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका 

Wednesday, March 23, 2011

खामोशी और तटस्थता-हिन्दी कविता (khamoshi aur tatsthta-hindi poem)

किसे क्या समझायें,
भला कोई किसी को समझा पाया है,
किसको कैसे मनायें
भला कोई किसी को समझा पाया है।
पूरा ज़माना वहम में जीने का आदी है
दूर उससे सच का साया है,
बेहतर है खामोश हो जायें
या तटस्थ होकर देखते रहें,
विद्वानों ने यही मार्ग बताया है।
------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपकबापू कहिन 
५.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.शब्द पत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका 

Friday, March 18, 2011

होली पर क्रिकेट का सच तो मजाक में भी लिखा जा सकता है-हिन्दी व्यंग्य (holi par cricket ka sach aur majak-hindi vyangya)

होली, क्रिकेट और सट्टा
लेखक -दीपक 'भारतदीप'  
इस बार होली का मजा वैसे भी किरकिरा होना ही है क्योंकि विश्वकप क्रिकेट प्रतियोगिता के मैचे खेल जा रहे हैं। होली पर देश का जनजीवन एकदम ठप्प हो जाता है। कुछ लोग रंग खेलने में लग जाते है तो कुछ उनसे बचने के लिये घरों में दुबक जाते हैं। दोपहर एक बजे तक सड़कें सन्नाटे से घिर जाती हैं जिसको होली के अवसर पर निकलने वाले झुंड ही अपने शोर से चीरकर निकल जाते हैं। जिन लोगों को साफ सुथरा जीवन पसंद है उनके लिये यह दिन उदासी का दिन हो जाता है। ऐसे अवसर पर हमारे देश के बहुत सारे लोग अपनो के बीच जुआ खेलते हैं तो आदतन जुआरियों के लिये तो यह दिन स्वर्णिम होता है। कहीं खुले में भी खेलते हैं तो उनके पास इस बात का पारंपरिक लाईसैंस होता है कि वह यह बताने के लिये कि वह तो रस्म निभा रहे हैं।
शराब, जुआ और बेकार की बकवास करने के लिये होली का दिन उपयुक्त मान लिया जाता है। वैसे दिवाली पर भी लोग जुआ की रस्म निभाते हैं। इससे एक बात तो प्रमाणित होती है कि हमारे पवित्र त्यौहारों में प्रमाद और व्यसनों की अनिवार्यता को जो लोग स्वीकार करते हैं वह निहायत अज्ञानी हैं और ऐसे लोगों की कमी नहीं है। मनोरंजन और खुशी के लिये बने दिनों में व्यसन में लिप्त होकर हुआ में लगने की प्रवृत्ति देश के लिये खतरनाक रही है। यही कारण है कि क्रिकेट तो क्रिकेट अब सुनने में आ रहा है कि टीवी चैनलों में प्रतियोगिताओं पर आधारित हास्य, संगीत तथा वाद विवाद कार्यक्रमों में जीत हार पर सट्टे लगता है और वहां विजेता और उपविजेता फिक्स होते हैं । हम यह न समझें कि सट्टा लगाने और लगवाने वाले कोई अदृश्य तत्व हैं बल्कि वह इस देश के ही लोग हैं। खासतौर से आर्थिक उदारीकरण के बाद बने नवधनाढ्य वर्ग के लोग इसमें शामिल हो रहे हैं। समस्या यह है कि उनके साथ मध्यम और निचली आयवर्ग के युवक भी शामिल होते हैं जो कि संकट का कारण बनती है।
एक बात तय है कि विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता के मैचों में सट्टा चल रहा है। अनेक जगह पुलिस ने अनेक लोगों को पकड़ा है। जब यह सट्टे वाले दो सौ करोड़ तक की रकम वाले संगीत कार्यक्रम को फिक्स कर सकते हैं तो वह अरबों की राशि वाले क्रिकेट मैच में अपना हाथ न दिखायें इस पर अब कौन यकीन कर सकता है। खासतौर से जब धनपति और घनपति-यानि काले धंधे वाले लोग-और उनके पालित मनपति-यानि लोगों के मन का हरण करने वाले प्रचार माध्यमों मे लोग-यह स्वयं बता रहे हैं कि पांच देशों के 21 खिलाड़ी तथा खेले गये सात मैचों की जांच विश्व कप क्रिकेट की अंतर्राष्ट्रीय संस्था आई सी आई कर रही है। इन मैचों के फिक्स होने का उसे संदेह है। भारतीय प्रचार माध्यमों ने इसमें विदेशी खिलाड़ियों होने की बात तो कही है पर भारतीय खिलाड़ियों की तरफ कोई संकेत न कर अपनी व्यवसायिक सीमाओं का भी प्रमाण दिया है। भारतीय खिलाड़ियों की गल्तियों पर खूब शोर हो रहा है पर वह उन्होंने अनजाने में की या अनजाने में हो गयीं इसका पता नहीं। न ही यह पता लग रहा है कि वह उनसे करवाई गयी। इस पर विशेषज्ञ खामोश हैं। बात सीधी है कि टीवी पर हर विषयों की तरह क्रिकेट के विशेषज्ञ भी प्रायोजित हैं। इनमें एक तो ऐसा कप्तान भी है जो फिक्सिंग की वजह से सजा भी पा चुका है मगर जोड़तोड़ कर अब टीवी चैनलों में अपना चेहरा विशेषज्ञ की तरह दिखाने लगा है। क्या मान लें कि भारतीय खिलाड़ी वाकई साफ सुथरे हैं? मान लेते हैं क्योंकि धनपतियों, घनपतियों और मनपतियों ने ऐसा वातावरण फिर बना दिया है जिससे लोग विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में देशप्रेम से जुड़ रहे हैं। इसलिये कुछ कहने या सुनने में खतरे हैं।
उस दिन एक आदमी ने दूसरे से क्रिकेट प्रेमी से कहा-‘काहेका क्रिकेट! सब मैच फिक्स हैं।’
दूसरा उग्र हो गया और बोला-‘तू क्या अपने देश को खिलाड़ियों की पाकिस्तानियों से तुलना कर रहा है।’
वह चुप हो गया। पाकिस्तान का भी एक ऐसा खिलाड़ी विशेषज्ञ की भूमिका हमारे देश के टीवी चैनलों में निभा रहा है जिस पर उसके अपने देश के लोग ही फिक्सर होने का आरोप लगाते हैं। यह आईसीआई क्रिकेट में खेल रहे खिलाड़ियों के किसी सट्टेबाज से मिलने पर उससे शक की निगाह से देखती है पर यह विशेषज्ञ की भूमिका में बदनाम लोग घूम रहे हैं उसके बारे में उसकी राय का पता नहीं चलता। इससे एक बात लगती है कि विश्व क्रिकेट पर नियंत्रण करने वाली संस्था यह प्रयास नहीं कर रही कि खेल साफ सुथरा हो बल्कि वह चाहती है कि वह ऐसा दिखे। कम से कम भारतीय खिलाड़ी तो पाक साफ दिखें क्योंकि इसी देश के लोगों का पैसा इस खेल की प्राणवायु हैं जो कि मनोरंजन और खुशी भी जुआ और सट्टे के साथ मनाते हैं।
वैसे जिस तरह मैच चल रहे हैं अनेक लोगों को शक है कि कुछ गड़बड़ है। ऐसे में अगर मान लीजिये होली के दिन कोई भारतीय खिलाड़ियों के सट्टे में शामिल होने के बारे में कोई बात सत्य भी लिख दे तो लोगों को मजाक लगेगा। वैसे इतने सारे अखबार हैं। इंटरनेट पर भी बहुत कुछ लिखा जा रहा है। इसलिये संभव है उस दिन कोई मजाक करते हुए भी सत्य लिख सकता है। हां, होली पर कोई बात सच कहकर उसे मजाक का रूप दिया जा सकता है।
--------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपकबापू कहिन 
५.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.शब्द पत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका 

Saturday, March 5, 2011

पक्का ख्याल-हास्य कविता (pakka khyal-hasya kavita)

कैदखाने के मुखिया ने
अपनी यहां से रिहा हो रहे चोर से कहा-‘‘
कमबख्त,
तू फिर दस हजार की चोरी के
आरोप की छाया में यहां आया,
पिछली बार की रकम पांच हजार की
चोरी में धरा गया था
अब महंगाई का हिसाब देखें
तू उसमें कोई इजाफा नहीं कर पाया।
शर्म आती है तुम्हें अपने यहां आते देखते हैं,
दस पंद्रह हजार तो अमीर ऐसे ही फैंकते हैं,
यह भी क्या बात हुई कि
जहां हम करोड़ों की हेराफेरी वाले अपने यहां रख रहे है,ं
वहीं हजार की चोरी वाले भी हमारा माल चख रहे हैं,
अब तुम लोगों की यहां कद्र नहीं है
क्या सोचकर यहां चले आते हो,
छोटी मोटी चोरी कर पकड़े जाने पर नहीं शर्माते हो,
बाहर भी तुमने इज्जत नहीं कमाई,
यहां भी तुम्हें कौन पूछेगा
तुमसे बड़े लोगों ने आकर कैदखाने की रौनक बढ़ाई,
इससे अच्छा मूंगफली बेचकर अपना काम चलाओ,
यहां आकर अपनी औकात मत घटाओ,
कैदखाना अब बदनाम जगह नहीं रही,
तुमसे बड़े लुटेरों ने अपनी देह से अब इसे सजाया।’

सुनकर चोर बोला-‘
आपके ज्ञान से मेरे अंर्तचक्षु खुल गये हैं,
यहां से छूटकर करूंगा अच्छा काम
लगता है मेरे सारे पुराने पाप धुल गये हैं।
सही कहते हैं कि संत लोग
सत्संग का असर होता है,
वरना आदमी ख्वाब में सोता है,
मेरा सौभाग्य है जो आपने ज्ञान दिया,
चोर होते हुए भी सम्मान किया,
दरअसल अब हमें भी शर्म आती है,
पकड़े जाते हैं चोरी के आरोप में
रंगेहाथ पकड़े गये रिश्वतखोरों के साथ
जब मिलते हैं
अपनी ही करनी छोटी नज़र आती है,
हम तो लाचारी की वजह से चोरी करते हैं,
वह तो पकवान से पेट भरने के बाद भी
अपनी तिजोरी भी भरते हैं,
बड़े बड़े धुरंधरों को आपके यहां देखकर
सोचता हुं कि
बड़े काम मिलने पर भी रिश्तवतखोरी और बेईमानी
पर आदमी उतारू हो जाता है,
दो नंबर की कमाई करते हुए बाजारू हो जाता है
पहले छोटा काम करने में होती हिचक,
अब उसको लेकर खत्म हो गयी झिझक,
यहां आकर भी छोटी चोरी करने का मलाल मन में आया
बड़ा बुरा काम करना अब संभव नहीं
इससे अच्छा ठेला चलाकर जिंदगी गुजारूं
यह पक्का ख्याल मेरे मन में आया।
-----------------
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपकबापू कहिन 
५.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.शब्द पत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका 

Sunday, February 27, 2011

योग गुरू श्री रामदेव के साथ विवाद तो चलते ही रहेंगे-हिन्दी आलेख (yog guru shri ramdev and controvarsy-hindi lekh)

बाबा रामदेव को योग शिक्षा सिखाते हुए बहुत समय हुआ होगा पर उनको चर्चा में आये पांच छह वर्ष से अधिक नहीं हुआ है, जबकि इस देश में भारत में योग साधना की अनिवार्यता पिछले पंद्रह वर्षों से बहुत तेजी से की जा रही थी। इसका कारण यह था कि जैसे जैसे आधुनिक विलासिता साधनों का प्रयोग बढ़ा वैसे ही लोगों में राजरोग का प्रचलन बढ़ा तो समाज में मानसिक तनाव की स्थिति भी बढ़ती देखी गयी। दूसरी बात यह रही कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गैसीय विकार तथा हृदय का रोगी होना आम बात हो गयी। एक मजे की बात यह रही कि अंग्रेजी चिकित्सा में इनका इलाज किया गया पर यह भी बताया कि अंततः इन पर परहेज से ही नियंत्रण पाया जा सकता। साथ ही यह भी बताया गया कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा अन्य बीमारियों से होने वाली तत्कालिक पीड़ा से मुक्ति का उपाय तो है पर उनको समाप्त करने वाली कोई दवा नहीं है। ऐसे में समाज विशेषज्ञों का ध्यान देशी चिकित्सा पद्धतियों की तरफ गया तो धार्मिक संतों ने इन बीमारियों को जड़ से मिटाने के लिये भारतीय योग साधना का उपाय बड़े जोरदार ढंग से बताना प्रारंभ किया।
अनेक पुराने संत इसकी चर्चा करते थे पर वह अध्यात्मिक प्रवचनों में अन्य विषयों के साथ योग साधना का भी उपदेश देते थे। इधर समाज बीमार हो रहा था और जरूरत थी इसके लिये इलाज की। जिस तरह हृदय की पीड़ा से जूझ रहे आदमी के नाक में आक्सीजन का सिलैंडर लगाया जाता है न कि उसके पास ज्ञानी बढ़ाने के लिये श्रीमद्भागवत गीता पढी जाती हैं क्योंकि यह उस समय की आवश्यकता नहीं होती। उसी तरह समाज में विकारों के बढ़ते प्रकोप से बचने के लिये जरूरत थी केवल योग साधना के प्रचार की और ऐसे में अन्य विषयों की चर्चा अनावश्यक लगने लगी। उस समय योग गुरु बाबा रामदेव का प्रचार शिखर पर अवतरण हुआ। लोग उनके साथ तेजी से जुड़ने लगे। स्थिति यह हो गयी कि अंग्रेजी चिकित्सा के चिकित्सक लोगों को योग साधना करने के लिये प्रेरणा देने लगे।
इस देश में ऐसे अनेक लोग हैं जो उनसे भी पहले योग साधना करने के साथ ही सिखाते रहे हैं मगर व्यवसायिक न होने की वजह से उनको प्रचार माध्यमों में महत्व नहीं मिला। अनेक बुद्धिजीवी ऐसे हैं जो स्वयं योग साधना करते हैं पर सिखाने का उनके पास समय नहीं मिलता। ऐसे लोगों ने बाबा रामदेव को खुला समर्थन दिया।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि बाबा रामदेव का योग का प्रचार बढ़ाना उस हर व्यक्ति के लिये प्रसन्नता का विषय है जो निष्काम भाव से समाज का हित सोचते हैं। स्वस्थ, मजबूत और चिंतन क्षमता वाला समाज अंततः बुद्धिजीवियों को ही संरक्षण देता है यह सर्वमान्य तथ्य है। ऐसे में इस लेखक ने भी बाबा रामदेव के समर्थन में जमकर लेख लिखे हैं। चूंकि हम चार वर्ष से इंटरनेट पर लिख रहे हैं और योग तथा श्रीमद्भागवत इस लेखक के प्रिय विषय हैं तो स्वाभाविक रूप से स्वामी रामदेव पर सदैव कुछ न कुछ लिखने में मजा आया। अब पुराने लेखों पर यह टिप्पणियां मिल रही हैं कि आप जैसे लोगों ने बाबा रामदेव का भाव बढ़ाया है तो यह बात भी लिखनी पड़ रही है कि अगर बात केवल योग शिक्षा की है तो यह तथ्य तो उनके आलोचकों को भी मानना चाहिये कि भारतीय समाज में चेतना लाने में बाबा रामदेव की महत्वपूर्ण भूमिका है। अलबत्ता योग शिक्षा से इतर विषयों पर उनसे सहमति और असहमति की हमारे पास पूरी गुंजायश है और हमने तो इस विषय पर अनेक पाठ लिखे हैं।
बाबा रामदेव योग शिक्षा में मिली सफलता से उत्साहित होकर राष्ट्रीय स्वाभिमान अभियान प्रारंभ किया है। सैद्धांतिक रूप से यह अच्छा है पर जैसे जैसे बाबा रामदेव अपने इस अभियान के दौरान कुछ व्यक्तियों या संगठनों पर शाब्दिक प्रहार करेंगे तब इसमें विवाद भी होंगे। एक पुराने समर्थक होने के बावजूद अनेक बुद्धिजीवी योग शिक्षा से इतर उनकी सक्रियता पर सवाल उठायेंगे। यह समाज मंथन का दौर है और इसमें द्वंद्व ढूंढने की बजाय सामजंस्य बढ़ाना चाहिये। हालांकि बहसों से द्वंद्व बढ़ता है पर यह बात सामान्य लोगों पर लागू होती है पर जहां ज्ञानी बहस करते हैं वहां निष्कर्ष निकलता है और समाज में सामंजस्य तथा आपसी सहयोग बढ़ता है। बाबा रामदेव अब एक शिखर पुरुष हैं और हम जैसा आम लेखक उनके पास न जा सकता है न मिल सकता है। अपने अभ्यास से वह योग रूप हो गये हैं इसलिये उन पर अपना ज्ञान भी नहीं झाड़ा जा सकता। इसके बावजूद यह सच है कि एक आम योग साधक और लेखक होने के कारण उनकी योग शिक्षा के साथ ही अन्य विषयों पर भी उनके वक्तव्यों पर दृष्टिपात करते हैं। उनको टीवी पर देखकर और उनके वक्तव्य समाचार पत्रों में पढ़कर योग साधना के कुछ रहस्य तो वैसे ही प्रकट हो जाते हैं।
आखिर में उनकी गतिविधियों से मिले रहस्यों की चर्चा करते हैं। एक रहस्य तो यह कि योग साधकों को उसके आठों अंगों की शिक्षा के अलावा कुछ अन्य नहीं देना चाहिये। अगर वह योग शिक्षा में पारंगत हो गया तो सारे विषय उसके पीछे चलेंगे। यदि आप योग साधक हैं तो अपने भविष्य की योजना के बारे में सार्वजनिक घोषणा बिल्कुल न करें क्योंकि आप नहीं जानते कि योग माता आपकों कहां ले जायेगी? बाबा श्रीरामदेव ने घोषणा की थी कि वह कभी राजनीति नहंी करेंगे। उनका यह वक्तव्य इस लेखक ने टीवी पर सुना था। तब ही यह अनुमान किया था कि एक न एक दिन इनको अपनी राष्ट्रवादी संकल्प के कारण इस चुनावी राजनीति में भी आना पड़ेगा। वजह यह कि योग साधना बरसों से कर रहे हैं। नित प्रतिदिन देह में पवित्र रक्त का प्रवाह तथा उच्च विचारों का निर्माण उनके अंदर होता होगा। जब योग का चरम शिखर पा लेंगे तो फिर उनके देह में मौजूद पवित्र गुण उनको समाज तथा राष्ट्र के नवनिर्माण के प्रेरित करेंगे। ऐसे में वह पुराने समय की तरह कोई युद्ध तो लड़ना संभव नहीं है इसलिये वह प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति में आयेंगे जो कि आजकल युद्ध की तरह ही होती है। इसका सीधा मतलब यह कि हम उनके चुनावी राजनीति में न आने के संकल्प की याद करना पसंद नहीं करते।
आगे क्या होगा, यह तो हम देखेंगे। यह पाठ हमने एक पाठक की उस टिप्पणी पर ही लिखा है जिसका हमने जिक्र किया है। उसी ने यह याद दिलाया था कि योग गुरु रामदेव ने पहले राजनीति में न आने की घोषणा की थी पर अब आ गये। इसका मतलब यह कि वह भी दूसरे लोगों की तरह हैं। हम इसके जवाब में यही कहते हैं कि योग साधना बहुत जरूरी है पर श्रीमद्भागवत का अध्ययन उसके साथ होना चाहिये। जब गीता संदेश पढ़ने लगेंगे तक यह समझ जायेंगे कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। सहज योगी हो या असहज योगी अपने गुण के वश में होकर ही काम करता है। दूसरी बात यह कि महाभारत युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने हथियार न उठाने की घोषणा की थी पर वीरवर भीष्म पितामह ने उनको इस प्रतिज्ञा से विचलित कर दिया था। हम यहां बाबा रामदेव की तुलना भगवान श्रीकृष्ण से नहीं कर रहे बल्कि यह बता रहे हैं कि योगियों की लीला खुद योग भी नहीं जानते। इसलिये उनको ऐसी घोषणाओं से बचना चाहिये। अगर योगी अपनी राह बदल कर आ भी जायें तो उस भी आपत्ति नहीं करना चाहिए।
---------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपकबापू कहिन 
५.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.शब्द पत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका 

Monday, February 21, 2011

लोहे का हरकारा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


अपने आशियाने दायरों से बाहर तुम यूं ही बनाओगे,
मुफ्त के माल पर कब्जा कर जिंदगी को सजाओगे।
गुजर जाये कई बरस बड़े आराम और शांति से शायद
मगर जब आया बुलडोजर तो खून के आंसुओं से नहाओगे।
-----------
तुम्हारे अतिक्रमण पर हुआ आक्रमण
भला कौन तुम्हें बचायेगा,
हदों से बाहर बने आशियानों में
रहने वाले तभी तक रहेंगे बेखौफ
जब तक जमींदौज करने कोई नहीं  आयेगा।
------------
अपनी खिड़की से बाहर
यूं न झांका करो,
कोई परिंदा आंख से टकरा जायेगा,
हदों से बाहर है तुम्हारा आशियाना,
पर अहसास होगा इसको तब तुम्हारा
जब कोई लोहे का हरकारा खौफ बनकर आयेगा।
---------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपकबापू कहिन 
५.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.शब्द पत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका 

Wednesday, February 9, 2011

रंग बदलती दुनियां-हिन्दी व्यंग्य शायरी (rang badalti duniya-hindi vyangya shayari)

सामानों के पीछे दौड़ते रहे
मगर सब जेब से महंगे हो गये,
जिन लोगों की नीयत पर शक नहंी था
वह सस्ते बिक कर नंगे हो गये।
कमबख्त,
इस रंग बदलती दुनियां के
नज़ारे कुछ हमने ऐसे देखे कि
जिसे चाहा अपना हुआ नहीं,
अपना होकर भी गैर बनकर साथ रहा यहीं,
स्वच्छ छवि
सम्मानीय व्यक्तित्व का स्वामी
और सफेद ख्याल का जिसे माना
वही डालर, पौंड और दीनार की खातिर
कोयले की दलाली करते
काले रंग से रंगे हो गये।
--------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपकबापू कहिन 
५.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.शब्द पत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका 

Sunday, January 30, 2011

जनआंदोलन और धार्मिक व्यवस्था-हिन्दी लेख (janandolan aur dharmik vyavastha-hindi lekh)

टुयूनिशिया तथा मिस्त्र की घटनाओं में जनआंदोलनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई जरूर देती है पर शक की पूरी यह गुंजायश है कि विश्व में अप्रत्यक्ष रूप से शासन कर रहे पूंजीपतियों की इसमें कोई न कोई योगदान हो सकता है। संभव है कि यह वर्ग महसूस कर रहा हो कि तेल क्षेत्रों में उसका काम चलता रहे इसलिये जनता में फैले विद्रोह को हवा देकर अपने नये मुखौटे खाड़ी तथा अरब क्षेत्रों में लाये जायें। इससे उनको दो लाभ होंगे कि एक तो नये मुखोटे जनता को ताजा लगेंगे कि दूसरा यह कि पुराने मुखोटे इन पूंजीपतियों को अभी भी केवल एक प्रयोजक मानकर राजकाज के काम में उपेक्षा करते होंगे इसलिये नये मुखौटे लाकर उनको अपना सीधा वर्चस्प स्थापित किया जाये क्योंकि वह औकात से अधिक पद मिल जाने के कारण हमेशा दबे रहेंगे।
संभव ऐसा न हो। वाकई जनविद्रोह हो रहा हो, पर भारतीय प्रचार माध्यम जिस तरह दुनियां के पचास तानाशाहों के लिये खतरा बता रहे हैं वह कहीं न कहंी दुनियां के पूंजीपति और अपराधियों के गिरोह में व्याप्त एक सोच का प्रतिबिंब भी हो सकते हैं जो प्रजा तथा राज्य को भरमाये रखने के लिये हमेशा नये मुखौटे तलाशता है। यह तानाशाह अफ्रीकी तथा खाड़ी देशों में हैं। इनमें अधिकतर धार्मिक राज्य हैं और उन पर अपने धर्म के आधार पर आतंकवाद को शह देने का संदेह भी किया जाता है। मुख्य बात यह है कि प्रत्यक्ष भले ही इन राष्ट्रों के वर्तमान प्रमुख भ अमेरिका का पिछलग्गू होने का दावा न करें या संभव है इनमें से कुछ अमेरिका का विरोधी होने का नाटक करते हों पर कमोबेश सभी उसके बंधक हैं। यह सभी तेल उत्पादक राष्ट्र हैं जहां अमेरिकी कंपनियों का प्रभुत्व हैं जो कि अपने व्यापार के लिये राजनीति संस्थाओं को अपने कब्जे में लेकर काम करती हैं। कई जगह तो अमेरिकी सेना अपना डेरा डाले बैठी है। अधिकतर तेल उत्पादक राष्ट्र तानाशाही का शिकार हैं भले ही कई जगह लोकतंत्र का दिखावा किया जाता है। मुख्य बात यह है कि यह सभी धर्म पर आधारित संवैधानिक व्यवस्था वाले राष्ट्र हैं। मगर जिस लोकतंत्र के लिये वहां जनआंदोलन हो रहे हैं कहीं न कहंी उसके पीछे वहां के धार्मिक तत्वों की सक्रियता दिखाई दे रही है उससे नहीं लगता कि अगर वहां तख्ता पलट हुआ भी तो सही मायने में लोकतंत्र आयेगा। ईरान इसका एक उदाहरण है जहां राजशाही पलटकर लोकतंत्र के लिये आंदोलन एक मौलवी ने किया और बाद में वहां का धार्मिक तानाशाह बन बैठा।
मिस्र में जनविद्रोह के लिये धार्मिक स्थलों का उपयोग हुआ। दिन भी शुक्रवार का चुना गया। एशियाई देशों में धर्म की महत्ता है पर मुश्किल यह है कि जब इसकी आड़ लेकर कोई आंदोलन होता है तो वह धार्मिक ठेकेदारों के नेतृत्व में ही होता है। वैसे भारतीय प्रचार माध्यमों ने सीधे नाम नहीं लिया पर सऊदी अरब की तरफ बदलाव के उनके संकेत कोई व्यवाहारिक नहीं लगते। वहां के शासक धार्मिक आधार पर सबसे ज्यादा मज़बूती से टिके हैं। दुनियां के एक सौ बीस करोड़ से अधिक लोगों का पवित्र स्थान वहंीं है। तानाशाही का अंत अगर वहां होता है तो वह संसार का नक्श पलट सकता है। वहां जन आंदोलन की आहट तो है पर वह गुर्राहट नहीं है। वैश्विक आतंकवाद में गैर अमेरिकी विरोधी संगठनों को उसका खुला प्रश्रय मिलता है। भारत के अनेक वांछित लोग वहां जाते हैं। मज़े की बात यह है कि भारतीय रणनीतिकार कभी उसका नाम नहीं लेकर पाकिस्तान तक ही अपना लक्ष्य रखते हैं। सऊदी अरब में ऐसा कोई जनआंदोलन होता है तो उसके एतिहासिक परिणाम होंगे क्योंकि तब वहां जो दौर चलेगा वह पूरे विश्व को प्रभावित करेगा।
पश्चिमी देशों में धर्म की नाम पर ही तानाशाही है और राष्ट्र प्रमुख अपनी जनता का ध्यान अपनी समस्याओं से हटाकर दूसरी जगह धर्म की जंग कराकर इसलिये लगाते हैं ताकि वह अंधविश्वास में पड़ी रहे। वहां के शेखों का धर्म केवल पैसा बनाना तथा उसके लिये चाहे जैसी जुगाड़ करना है। वह अपरे देशों के सबसे बड़े अमीर हैं तो वहां शासन भी करते हैं। दुनियां भर में लोकतंत्र का हामी अमेरिका ही इन तानाशाह शेखों पर अपना हाथ रखे हुए है। ऐसे में अगर कहीं आंदोलन हो रहा है तो अमेरिका रणीनीतिकार आंखें मूंदें नहीं बैठे होंगे। संभव है कि वह कोई नया मुखोटा ट्यूनिशिया और मिस्र में लाना चाहते हों। यह भी हो सकता है कि आंदोलन के चलते वह कोई नया मुखोटा वहां लाने की योजना बना रहे हों। मिस्र में स्थिति खराब है पर उसमें जल्दी सुधार आयेगा यह संभव नहीं लगता। वह एक तेल उत्पादक राष्ट्र और वहां सक्रिय पूंजीपतियों का समूह कहीं न कहीं अपनी भूमिका निभा रहा होगा और यह यकीन करना कठिन है कि तख्ता पलट से उनके हितों पर कोई आंच आयेगी।
इन दोनों जगहों पर हो रहे जनआंदोलनों का अन्य देशों में विस्तार लेने की अभी कोई संभावना नहीं दिखती जैसा कि भारतीय प्रचार माध्यम बता रहे हैं। इसका कारण यह है कि पूंजीपतियों, अपराधियों तथा उनके पाले बुद्धिजीवी समूहों ने विश्व को इस तरह टुकड़ों में बांट दिया है कहीं भी सामान्य जनों में एकता संभव नहीं है-किसी राष्ट्रप्रमुख को हटाने के लिये आंदोलन चलाने के लिये कतई नहीं। ऐसे में वहां जो आंदोलन चल रहे हैं वहां व्यवस्थापक तो बदल सकते हैं पर व्यवस्था नहीं। इन आंदोलनों को विश्व में किसी नयी आशा का संकेत भी नहीं माना जा सकता क्योंकि कहीं न कहीं इन देशों में धर्म आधारित व्यवस्था रहनी है जो आंतकवाद का मार्ग प्रशस्त करती है। धार्मिक स्थलों पर अवकाश के दिन एकत्रित होकर लोगों के आंदोलन करने से तो यही निष्कर्ष निकलता है। आगे क्या होगा यह देखने वाली बात होगी।
---------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपकबापू कहिन 
५.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.शब्द पत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका 

Monday, December 27, 2010

इंसान हो या परिंदा-हिन्दी शायरी (insan ho ya parinda-hindi shayari)

इतिहास एक झूठ का पुलिंदा है,
सच वही है जो जिंदगी जिंदा है।
लोग बना लेेेेते हैं ख्याली फरिश्ते,
जोड़ लेते हैं उनसे दिल के रिश्ते,
हकीकत यह है कि कोई भी
इंसानी शरीर गंदगी से बचा नहीं है,
जो दावा करे सफाई का वह सचा नहीं है,
स्याही से लिखा हमेशा सही नहीं होता,
लिखने वाले का मन जो कहे वही होता,
समय वह तूफान है जो रोज चलता है,
बहा लेता है हर शय, चाहे इंसान है या परिंदा है।
-----------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपकबापू कहिन 
५.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.शब्द पत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका 

Sunday, December 12, 2010

प्रचार की दलाली में समाचार-हिन्दी लेख (prachar ki dalali mein samchar-hindi lekh)

जब दर्द बढ़ जाये तो इंसान कहां जाये? खास तौर से जिसके चिंतन तत्व जिंदा हों उसके लिये अपनी मानसिक हलचल पर नियंत्रण रखना ऐसी हालत में दुष्कर कार्य हो जाता है जब अपराध पर दान, बेईमानी पर ईमान तथा भ्रष्टाचार पर शिष्टाचार का लेबल इस तरह लग जाता है कि समाज के आम इंसान भी उसे नहीं देखने और समझने में अपना समय बर्बाद नहीं चाहते। ऐसा लगता है जैसे कि पूरे देश ने यह स्वीकार कर लिया है कि कलियुग में सतयुगी पुरुषों का होना संभव नहीं है।
ऐसे में हंसी सूझती है। इधर अमेरिका के विकिलीक्स के खुलासों का प्रकरण चल रहा है तो अपने यहां भी घोटालों का टेलीफोन टेप प्रकरण कम दिलचस्प नहंी है। अंतर यह है कि विकीलीक्स के खुलासे अमेरिका के रणनीतिकारों के छिपे सोच को बताते हैं जबकि भारत के टेलीफोन टेप घोटालों का सच बताते हैं। इधर एक पत्रिका ने दावा किया है कि उसके पास उन टेपों के अभी ढेर सार संस्करण हैं जिनको लोग नहंी जान पाये। अब हमारी मानसिक हलचल में कभी विकीलीक्स तो कभी टेप का बात आती जाती रहती है। सच तो यह है कि भारतीय टेपों के आगे विकीलीक्स के खुलासे कम मज़ेदार दिख रहे हैं।
अमेरिकी रणनीतिकारों की नीति चाहे कैसी भी हो पर उनका सच कभी वैसे ही नहीं छिपता यह अलग बात है कि विकीलीक्स उसके प्रमाण प्रस्तुत कर रहा है। उसमें किसी बाज़ार के व्यक्तित्व पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। मगर भारतीय टेलीफोन टेप प्र्रकरण ने तो बाज़ार के अनेक व्यक्त्तिवों को भद्द पिटवा दी है। कथित धर्मनिरपेक्ष विचारक, महान पत्रकार, ईमानदार उद्योगपति तथा महान समाजसेवकों के साथ ही अनेक राजकीय व्यक्तित्वों पर छींटे पड़े हैं। एक तरह से स्वच्छ छवि का जो कथित किला था वह ढह गया है।
एक जनसंपर्क कंपनी की संचालिका के साथ वार्ता वाले यह टेप अनेक बातों को लेकर चौंकाते हैं। बड़े बड़े दिग्गज़ उसके सामने नतमस्तक हैं। एक कथित पत्रकार जो कई बरसों से महान होने की उपाधि धारण किये हुए थे उनकी वार्ता ने पलभर में उनका आभामंडल ध्वस्त कर दिया। इन पत्रकार महोदय ने एक उद्योगपति के लिये ऐसे शब्द का प्रयोग किया कि हम नाम न लिखने के बावजूद इस पाठ में उल्लेख नहीं सकते। इसके दूरगामी परिणाम होंगे। कथित महान पत्रकार जो दलाली के दम पर इतनी दूर तक चले आये अब उनके लिये आगे की राह कठिन होने वाली है। जब वह स्वयं मानते हैं कि जब दो भ्राता उद्योगपति किसी विषय पर एक साथ शामिल हैं तो यह संभव नहीं है कि एक से बैर लेकर वह अपनी दलाली यात्रा अधिक समय तक जारी रख पायेंगे।
यह पत्रकार महोदय एक हिन्दी समाचार चैनल के सिरमौर थे और सुना है कि उन्होंने वहां से इस्तीफा दे दिया है। वैसे उन्होंने उद्योगपति के लिये जो शब्द प्रयोग किया था वह अपने चैनल पर उपयोग नहंी करते थे क्योंकि अंततः हिन्दी के समाचार और मनोरंजन चैनल ऐसे ही उद्योगपतियों के दम पर चल रहे हैं।
वैसे हम लोग समाचार या मनोरंजन चैनलों के सामने दिख रहे चैनलों की गतिविधियों पर टिप्पणियां करते हैं पर यह भूल जाते हैं कि उनको अपने प्रबंधकों की बनाई नीतियों पर ही चलना पड़ता है। प्रबंधक जहां से विज्ञापन प्राप्त या कोई अन्य आर्थिक लाभ प्राप्त करते हैं उसका पता उनके कर्मचारियों को स्वतः जाता है। यह भी पता होता है कि अपने आर्थिक स्त्रोतों पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी उनकी नौकरी भी ले सकती है। ऐसे में उनको हमेशा ही उसी नीति पर चलना पड़ता है जिसका अनुकरण प्रबंधन करता है।
हम अपने देश की बृहद अर्थव्यवस्था को देखें तो उनके से कुछ खास क्षेत्र ही हैं जो भारी आय प्रदान करते हैं। सारा गोलमाल भी उन्हीं में होता है। उनमें सक्रिय धनाढ्य लोग हर तरफ अपना हाथ मारते हैं। वह किसी धंधे के जानकार हों या नहीं उसमें सक्रिय हो जाते हैं। आप बताईये कपड़ा, स्टील, ट्रक और ट्रेक्टर का निर्माण करने वाले आखिर टेलीफोन के क्षेत्र में कैसे आ गये? स्पष्टतः उनकी शक्ति किसी क्षेत्र में विशेषज्ञता या ज्ञान नहीं बल्कि पैसा ही होता है। पैसे से वह इंसान खरीदते हैं और उसका ईमान उनके यहां गिरवी हो जाता है। उनके देश और विदेश के आर्थिक स्त्रोतों का पता सभी को होता है। ऐसे में उनसे विज्ञापन पाने वाले अपने देशी आकाओं को नहीं उनके विदेशी मित्रों की प्रसन्नता का भी ख्याल रखते हैं।
बहरहाल प्रचार माध्यमों की आड़ में दलाली कर रहे पत्रकार हों या सफेदपोश उद्योगपति इस टेप कांड से आपस में ही उलझ रहे हैं। टेलीफोन टेप के अभी बहुत सारे अंश आने बाकी हैं। ऐसे में किस किसका आभामंडल बिखरेगा पता नहीं है। एक आम आदमी और लेखक के रूप में हम केवल इस टेलीफोन टेपों की जानकारी पर नज़र रखते हैं। यह सांप बिच्छुओं का आपसी द्वंद्व है जो देखने में मज़ा आ रहा है। यह द्वंद्व पहले भी होता था पर नज़र नहीं आता पर अब अंतर यह है कि चौराहे पर चर्चा होने लगी है। पहले दलाली और हलाली में लगे लोग कभी एक दूसरे पर बंद कमरों में या टेलीफोन पर पर आक्षेप करते होंगे पर प्रत्यक्ष कभी उनके टकराव का प्रचार नहीं होता था। यह टेलीफोन टेप उनको चौराहे पर लाया है। अतः उनकी लड़ाईयां भी सरेआम होंगी। ऐसे में आशा है कि आगे भी यह मनोरंजक लड़ाई सामने आती रहेगी, खासतौर से जब चैनलों में मसीहाई छवि बनाये लोगों का आभा मंडल जब बिखरता नज़र आयेगा। आखिरी बात यह है कि वैसे तो हम अनुमान ही करते थे कि हम जैसे लेखक आखिर क्यों परंपरागत प्रचार माध्यमों में जगह नहीं बना पाते! अब समझ में आ गया है कि दलाली और हलाली का काम भी आना चाहिए लिखते चाहे कैसा भी हों? साथ में यह आत्मविश्वास भी बढ़ा है कि हम लिखने के मामले में उनसे तो ठीक हैं जो महानता की छवि धारण किसे हुए थे। अनेक कथित महान लेखकों के शिखर पर पहुंचने का क्या मार्ग है अब समझ में आ गया है। राजनीति और उद्योगपतियों की प्रशंसा में गुणगान करने पर समाज से आदमी दूर हो जाता है और भले ही वह प्रचार माध्यमों की बनाई दुनियां में आत्ममुग्ध होकर बैठा रहे पर सच जानता है। यही कारण है कि यह कथित प्रचार पुरुष आपस में मिलते हैं तो यही कहते हैं कि ‘हम कहां बड़े आदमी, केवल मित्रों की वजह से यहां पहुंचे हैं?’
बाकी समय वह अपने ही सच से भागते हैं, वजह उनकी कलम दलाली की बैसाखियों के सहारे चलती हैं और यही उनके आत्मविश्वास की मौत कारण भी होती है। इतना ही नहीं वह अपने विज्ञापन दाताओं के कहे बगैर उनके मित्र तथा विदेशियों की आलोचना से भी घबड़ाते हैं। इतना ही नहीं विज्ञापन दाताओं की शरण में रहने वाले खिलाड़ियांे, फिल्म अभिनेताओं तथा अभिनेत्रियों के जन्म दिन, मैत्री संबंधी प्रकरणों या अदाओं पर ही समाचार चैनलों के एक घंटे में से पचपन मिनट बर्बाद होते हैं। उससे भी ज्यादा रियल्टी चेनलों में निकाले गये पात्रों की ब्रेकिंग न्यूज देनी पड़ती है। निकाले गये पात्रों के साक्षात्कार देने पड़ते हैं। कभी किसी कार्यक्रम की निंदा कर भी उसे लोकप्रिय बनाने का प्रयास करना पड़ता है। सीधी बात यह कि प्रचार की दलाली में समाचार देकर वह अपने आपको पत्रकार कहते हैं पर सच तो वह स्वयं भी जानते हैं। जनता अब जानने लगी है।
-------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपकबापू कहिन 
५.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.शब्द पत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका 

Sunday, December 5, 2010

शब्द और दलाली-हिन्दी कवितायें (shabd aur dalali-hindi kavitaen)

कलमकार भी अब
सत्ता के दलाल हो गये,
ईमानदारी और नैतिकता
दो शब्द हैं जो नारे बने
जिनको अपनी कलम से
जिंदगी देने का दावा करते थे झूठा
यह दोनों ही नये धंधे में हलाल हो गये।
----------
उधार के शब्दों ने
उनको कलम का धनी बना दिया,
जो सत्ता की गली में घुसे
उनकी छवि को
दलाली की वसूली ने
उनकी छवि को कीचड़ में सना दिया।
शब्द तो एक छलावा था उनके
जिसके सहारे चढ़ना था सीढ़ियां,
हम तो समझे थे कि
इतिहास में उनके शब्दों की
शामिल होंगी कई पीढ़ियां,
क्या मालुम था वह कर रहे हैं छलावा,
उनको रचनाकार मानने पर होगा पछतावा,
अपनी नीयत में दलाली के धंधे को
उन्होंने अपनी मंज़िल बना लिया।
---------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपकबापू कहिन 
५.हिन्दी पत्रिका 
६.ईपत्रिका 
७.शब्द पत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका 

Monday, November 22, 2010

पहले अपना पांव कीचड़ में डाल दो-हिन्दी व्यंग्य एवं कविता (bigg boss and his actres-hindi vyangya and kavita)

बिग बॉस से निकाली गयी उस अभिनेत्री ने गुरुद्वारे जाकर मत्था टेका। भगवान श्रीगुरुनानक तथा उसके बाद के सिख धर्म गुरुओं की भारतीय जनमानस में जो प्रतिष्ठा है उसे देखते हुए किसी देशवासी का वहां मत्था टेकना कौनसी बड़ी बात है? मगर किसी व्यक्ति विशेष का वहां जाकर मत्था टेकने की खबर जब टीवी समाचार चैनलों ये अखबार में छपे तो यह देखना पड़ता है कि आखिर मत्था टेकने के इस प्रचार को भी तो कहीं नकदी में परिवर्तित नहीं किया जा रहा। जब समाचारों मे विज्ञापन की बजाय विज्ञापनों में समाचार हों तब यह शक पुख्ता हो जाता है कि सभी रसों की तरह अब भक्ति का भी प्रदर्शन हो गया जिससे वह अभिनेत्री अब स्वच्छ छवि होकर विज्ञापनों के लिये काम कर सकेगी और लोग उसके बिग बॉस के अभिनय को भूलकर उससे प्रभावित होंगे।
बिग बॉस में अपनी बदतमीजी तथा गाली गालौच के लिये विख्यात हो चुकी वह अभिनेत्री अब बाहर टीवी समाचार चैनलों और अखबारों के लिये प्रकाशन सामग्री के लिये एक महत्वपूर्ण चेहरा बन गयी है। विख्यात इसलिये लिखा है कि अब कुख्यात कहना भी अज़ीब लगता है। जरा, प्रचार जगत की भूमिका देखें। अधिक समय नहीं एक सप्ताह हुआ होगा जब वह अभिनेत्री उसके लिये कुख्यात थी। लोग बिग बॉस पर आखों तरेर रहे थे और प्रचार जगत उनके बयानों को जगह दे रहा था। ऐसा लग रहा था कि वह अभिनेत्री देश के लिये कोई कलंक है। यह अलग बात है कि इस विवाद के बाद ही हम जैसे लोगों को पता चला कि बिग बॉस नाम का एक कार्यक्रम चल रहा है। समाचार चैनलों का एक बहुत सारा समय उस अभिनेत्री को कोसने में लग गया तो समाचार पत्र पत्रिकाओं में सामग्री प्रकाशित हुई-विज्ञापन अपनी कमाई देते रहे।
एक दिन अचानक ब्रेकिंग न्यूज आई। उसे बिग बॉस निकाल दिया गया-अगर ऐसी खबर ब्रेकिंग बने तो आप समझ सकते हैं कि हमारे प्रचार प्रबंधकों को समाज हित से ज्यादा अपने आर्थिक हितों की चिंता है। मात्र दो दिनों में ही उस अभिनेत्री के साक्षात्कार टीवी चैनलों में आने लगे। वह मुस्कराने लगी। सफाई देती रही। हर चैनल उसके साक्षात्कार को अपने विज्ञापनों में सजाने लगा। ऐसे साक्षात्कारों में हर एकाध मिनट में ब्रेक लिया जाता है क्योंकि प्रचार प्रबंधकों को पता है कि साक्षात्कार के लिये प्रस्तुत चेहरा इस समय ताज़ा है और लोग अपनी आंखें गड़ाकर देखेंगे। इसके लिये जरूरी था कि उस अभिनेत्री की छवि सुधारी जाये। उसको जो ख्याति-अब उसमें सु जोड़े या कु यह पढ़ने वालों पर है-मिली उसे भुनाने के लिये विज्ञापन भी तैयार हो सकते हैं। कुछ दिन बाद वह कोई सामान बेचने के लिये उसका प्रचार करती नज़र आयेगी। इसलिये उससे कहा गया होगा कि‘जाओ, किसी गुरुद्वारे का चक्कर भी लगाकर आओ क्योंकि व्यवायिकता के लिये यह जरूरी है।’
वह गयी होगी। वहां उसने भजन गाये। उसके दृश्य कैमरे में कैद करने के लिये बकायदा चैनल वाले गये होंगे। यकीनन कहीं न कहीं संवाद कायम किया गया होगा और इसके लिये व्यवसायिक आधार वाले लोग ही शामिल हुए होंगे।
बिग बॉस तथा अन्य रियल्टी शो बाज़ार तथा प्रचार के लिये नये मॉडल बनाने के अलावा कुछ नहीं कर रहे, यह इस बात से भी प्रमाणित होने लगा है कि उनके प्रसारणों की पटकथा पहले लिखी जाती है। इंसाफ धारावाहिक प्रसारित करने वाली एक अभिनेत्री ने कहा है कि जैसा उससे कहा जाता है वैसा ही वह बोलती है। बिग बॉस से निकाली गयी अभिनेत्री के बारे में भी लोग यही कह रहे थे कि उसे यही सब करने के लिये पैसे दिये जा रहे थे। वह विख्यात हो रही थी तो बाज़ार के ताकतवर सौदागर तथा प्रचार से जुड़े मध्यस्थ बैचेन हो रहे थे कि कहीं वह बिग बॉस में अधिक चली तो धीरे धीरे नाम की चमक फीकी होती जायेगी तब उनका हिस्सा मारा जायेगा। सो बाहर करवा दिया। अब भक्ति का वह रस उस पर चढ़ा रहे है जिसके बिना भारत में किसी की छवि नहीं बन सकती।
प्रस्तुत है इस पर कविता
........................................
अपने मुख से कुछ शब्द
आग से नहलाकर बाहर उछाल दो,
अपनी आंखों के तीर में
नफरत का बाण भी डाल दो।
बदनाम होकर अपना चेहरा
ज़माने में चमकाना जरूरी है,
क्योंकि आंख और कान से
लोगों की अक्ल की बहुत दूरी है,
फिर सर्वशक्तिमान की दरबार में
जाकर हाजिरी देना
जीवन सुधर जायेगा,
बद है जो नाम
वह मशहूर हो जायेगा,
बाज़ार के दौलतमंद सौदागारों का आसरा मिलेगा
वह कमल बनाकर खिला देंगे
पहले अपना पांव कीचड़ में तो डाल दो।
-------------

प्रस्तुत है इस विषय पर दो लेख जिसमें बिग बॉस तथा राखी इंसाफ पर विचार व्यक्त किये गए हैं एक लेख परसों तथा दूसरा कल लिखा गया था 

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Sunday, November 14, 2010

बैचेन रहने की आदत ऐसे नहीं जायेगी-हिन्दी व्यंग्य (bachain rahne ki aadat aise nahin jayegi -hindi vyangya)

लिखना तथा एक तिवारी जी नामक हिन्दी पटकथा लेखक पर संयोग ऐसा बन गया कि हमें अपना नाम जोड़कर भी इस लेख को लिखना पड़ रहा है क्योंकि इंतजार है उस ब्लाग लेखक के उत्तर का जिसने बिना कांट छांट किये हमारी एक कविता को अपने ब्लाग पर बिना नाम के छाप दिया और हमने उस पर अपनी टिप्पणी लिख कर मामले के निपटारे की मांग की है।
हिन्दी में रचनाकार नहीं है, यह नारा बहुत दिनों से सुन रहे हैं-इस नारे में बाज़ार, राज्य तथा प्रचार व्यवसाय के जुड़े लोगों के जो वह बुद्धिजीवी लगाते हैं जो केवल आलेख लिखते हैं वह भी प्रायोजन मिलने पर। इधर राखी का इंसाफ धारावाहिक विवाद में फंसा तो एक राखी का स्वयंवर धारावाहिक का एक पटकथा लेखक सामने आया जिसने यह दावा किया है कि वह उसकी चुराई हुई है। स्थिति यह है कि उसने आत्महत्या करने की धमकी दे डाली है जैसे कि राखी के इंसाफ में ताने से प्रेरित होकर झांसी के एक लक्ष्मण युवक ने कर ली है।
तिवारी नाम धारी उसे लेखक का दावा था कि जब उसने अपनी पटकथा का होने का दावा किया तो उसे धमकाया गया और कहा गया कि ‘इसकी नायिका एक तरह से पूरे मीडिया की बेटी है। इसलिये उससे पंगा मत लो।’
हमें उस तिवारी नामधारी लेखक से सहानुभूति है। ऐसा लगता है कि वह सच बोल रहा होगा क्योंकि फिल्मों के बारे में मिली यह पहली शिकायत नहीं है। हमारे एक चौरसिया नाम के एक मित्र कहानीकार हैं। उन्होंने कम से कम पच्चीस वर्ष पूर्व एक कलात्मक फिल्म में अपनी कहानी चोरी होने की बात कही थी। तब हंसी आयी थी पर इसमें कोई शक नहीं था चौरसिया जी उच्च दर्जे के कहानीकार हैं। इधर हमने यह भी देखा कि एक अखबार हमारे ही चिंतनों को जस का तस छापता रहा है। जब नाम छापने को कहते हैं कि तो जवाब मिलता है कि ब्लाग का नाम छापने की परंपरा नहीं है। नाम छापने को कहा गया तो जवाब मिला कि अपने संपादक से कहेंगे कि आपकी रचनायें नहीं ले।
कितनी तुच्छ मानसिकता है उन लोगों की जो हिन्दी की खा रहे हैं। हिन्दी लेखक उनकी नज़र में है क्या? क्या खौफ है कि नाम छापेंगे तो लेखक अमिताभ बच्चन बन जायेगा और उसे साबुन, क्रीम या मोटरसाइकिल के विज्ञापन मिलने लगेंगे। मजे की बात है कि नामा न देने की बात स्वीकार तो हिन्दी लेखक कर ही लेते हैं कि क्योंकि उनको पता है कि हिन्दी लेखन और पूंजीपतियों के बीच जो दलाल हैं वह अपना ही पेट मुश्किल से भर पाते हैं पर नाम न देने की बात हमारे समझ में नहीं आयी। स्थिति यह हो गयी है कि समाचार पत्र पत्रिकाओं के पास अब साफ सुथरी हिन्दी लिखने वाले ही नहीं बचे। महंगाई बढ़ रही है कि हिन्दी के अखबार की कीमत आज भी दो ढाई रुपये से अधिक नहीं है। अब तो ऐसा लगता है कि प्रचार माध्यमों के लिये पाठक और दर्शक एक तरह से गूंगी फौज हो गयी है जिसके सहारे वह उच्च स्तर पर अपनी ताकत दिखा रहे हैं वरना आम आदमी में उनकी कोई पकड़ नहीं है। आजकल तो हर आदमी टीवी की तरह मुंह किये बैठा है। इसलिये ही स्थानीय स्तर पर टीवी चैनलों ने अपने पंाव फैला दिये हैं। अखबार छपने की संख्या और उसे पढ़ने वालों की संख्या में बहुत अंतर है। उससे भी अधिक अंतर तो पढ़ने वाले और उस अखबार से हमदर्दी रखने और पढ़ने वालों के बीच है। मतलब यह कि पहले लोग न केवल अखबार पढ़ते थे बल्कि उसे मानसिक हमदर्दी भी रखते थे। यह अब नहंी है।
हिन्दी ब्लाग पर लिखना और लिखवाना आसान नहीं है। अगर किसी लेखक से लिखने को कहो तो वह कहता है कि रचना चोरी हो जायेगी। मतलब यह कि लिखने को तैयार नहीं है और जो लिख रहे हैं वह चोरी का शिकार हो रहे हैं। लोग झूठ कहते हैं कि हिन्दी के ब्लाग केवल ब्लाग लेखक ही पढ़ रहे हैं और अच्छा नहीं लिखा जा रहा है। जबकि इस लेखक के गांधी और ओबामा पर लिखे पाठों के अनेक एक स्तंभकार ने चोरी किये जो कि इसका प्रमाण है कि कथित बुद्धिजीवी भी अब अंतर्जाल पर अपनी सामग्री टटोल रहे हैं। यह शायद मजाक लगता हो पर सच यही है कि कुछ ब्लाग लेखकों का नाम बाहर नहीं लिया जा रहा पर सच यही है कि उनके पाठ दूरगामी मार वाले हैं और बुद्धिजीवी उनसे प्रभावित हैं। हिन्दी ब्लाग पर कूड़ा लिखा जा रहा है तो बताईये बाहर कौनसा सदाबाहर साहित्य लिखा पढ़ने को मिल रहा है। इस ब्लाग लेखक के ब्लागों पर पाठकों की टिप्पणियां इस तरह की आती हैं कि ‘गजब! आप ऐसा भी सोच और लिख सकते हैं।’
लोगों के पास चिंतन नहीं है, दावा चाहे कितने भी करें। नारों पर लिखते हैं और वाद सजाते हैं। फिर उसमें किसी न किसी की तारीफ या निंदा का बिगुल बजाते हैं। फिल्म वालों के पास तो काल्पनिकता और यथार्थ का समन्वय करने की कभी शक्ति ही नहीं दिखी है क्योंकि वहां के निर्माता और निर्देशक हिन्दी लेखकों को स्वतंत्रता न देकर लिपिक बना लेते हैं। समाचार पत्र पत्रिकाओं में लेखकों को लिपिक की तरह ही देखा जाता है। स्थिति यह है कि अधिकतर हिन्दी अखबार अब अंग्रेजी शब्दों के मोह में फंस गये हैं। प्रबंधन करना नहीं आया तो अब मैनेजमेंट करने लगे हैं। क्या खाक करेंगे? प्रबंधन हो या मैनेजमेंट बिना चिंतन और मनन के नहीं होते। हिन्दी का खाकर उसे मिटाने की योजना या साजिश रची गयी है। कहते हैं कि हिन्दी को विश्व स्तर पर पहुंचाना है। क्या खाक पहुंचायेंगे खुद को आती नहीं है। फिर दावा कि हम भाषाविद हैं? क्या खाक हैं एक ढंग की कविता नहीं लिख सकते। हम जैसी कि चुराने का मन हो? कुछ गुस्सा और कुछ हंसी! इस भाव से हम यह लेख लिख रहे हैं क्योंकि चोरी का सदमा है तो खुशी इस बात की है कि हम अच्छा लिख रहे हैं।
आईये पहले उस ब्लाग का नाम देखें। उससे पहले देखकर आयें कि उसने हमारी टिप्पणी का क्या किया? उसने न टिप्पणी प्रकाशित की और न ही जवाब दिया। हम भी उसका नाम नहीं लिख रहे। उसकी बेवसाईट का पता रख लिया है। ऐसा लगता है कि बिचारा रोमन में हिन्दी लिखता है और यह उसकी पहली ऐसी रचना है जो देवानगारी में है। हम उसे बदनाम नहीं करना चाहते पर उम्मीद है कि भाई लोग इसे पढ़कर उसे समझायेंगे। वैसे वह  हमारी टिप्पणियाँ नहीं छाप रहा पर रोमन लिपि में अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर रहा  है । हम यह सब  इसलिए रहे हैं क्योंकि बैचेन रहने की आदत ऐसे नहीं जाएगी। यहाँ यह भी बता दें हमारी रचना छापने का दाम पूछकर एक हज़ार और न पूछना पर दो हज़ार है और हम इसकी विधिवत माग करेंगे। इस लेख का लिखने का दंड अलग से वसूल करेंगे।  
हमारी   रचना यह है 
-------------------------
बैचेन रहने की  आदत 
लोगों की हमेशा बेचैन रहने की
आदत ऐसी हो गयी है कि
जरा से सुकून मिलने पर भी
डर जाते हैं,
कहीं कम न हो जाये
दूसरों के मुकाबले
सामान जुटाने की हवस
अभ्यास बना रहे लालच का
इसलिये एक चीज़ मिलने पर
दूसरी के लिये दौड़ जाते हैं
। 
---------------------------
हमारा लिंक यह हैं
http://rajdpk.wordpress.com/2010/10/31/baichen-ki-aadta-hindi-poem/

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Sunday, October 31, 2010

आस्था और आदर्श-हास्य कविताएँ (aastha aur adarsha-hasya kavitaen)

उनकी भावनायें इतनी महान है कि
इलाज की दुकान हो या
रहने का मकान
उनका नाम भी आस्था रखते हैं,
दौलत की चाहत पूरी होने का मज़ा
और सर्वशक्तिमान पर अहसान के साथ ही
दोनों का स्वाद एक साथ चखते हैं।
--------
समाज सेवक ने कहा अपने शिष्य से
‘देखो यह संस्था केवल लोगों की
भलाई के लिये है यह सच मत मान लेना,
भले ही कोई भी नाम रख लेना,
हमारा मुख्य लक्ष्य अपने लिये पैसा कमाना है।
सुनकर शिष्य बोला
‘’मैं मदद के मामले में पुराना पापी हूं,
सारा काम करने के लिये अकेला काफी हूं,
आप अपना आशीर्वाद देते रहें,
ताकि हम लोगों से दान लेते रहें,
जहां तक नाम का सवाल है कुछ भी रख लें
कोई अंतर नहीं पड़ता,
अपनी नीयत से भी अब मैं नहीं डरता,
अलबत्ता लोगों का दिल के जज़्बात भुनाने के लिये
आदर्श नाम रख लेते हैं,
अच्छा है, समझ लीजिये इसमें माल खूब आना है।’’
--------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

हास्य कविताऐं,astha,aadrash,hindi literature,mastram,aspatal,dukan,niyat,neeyat

Monday, October 18, 2010

आतंक के पक्के व्यापारी-हिन्दी हास्य कविता (atank ke pakke vyapari-hindi hasya kavita)

एक पत्रकार आतंकवादी का
साक्षात्कार लेने पहुंचा और बोला
‘भई, बड़ी मुश्किल से तुम्हें ढूंढा है
अब इंटरव्यु के लिऐ मना नहीं करना
बहुत दिन से कोई सनसनीखेज खबर नहीं मिली
इसलिये नौकरी पर बन आई है,
तुम मुझ पर रहम करना
आखिर दरियादिल आतंकवादी की
छबि तुमने पाई हैं।’
सुनकर आतंकवादी बोला
‘‘भई, हमारी मजबूरी है,
तुम्हें साक्षात्कार नहीं दे सकता
क्योंकि तुमने कमीशन देने की
मांग नहीं की पूरी है,
पता नहीं तुम यहां कैसे आ गये,
जिंदा छोड़ रहा हूं
तुम शायद सीधे और नये हो
इसलिये मुझे भा गये,
कमबख्त!
तुम्हें आर्थिक वैश्वीकरण के इस युग में
इस बात का अहसास नहीं है कि
आतंकवाद भी कमीशन और ठेके पर चलता है,
उसी पर ही हमारे अड्डे का चिराग जलता है,
टीवी पर चाहे जैसा भी दिखता हो,
अखबार चाहे जो लिखता हो,
हक़ीकत यह है कि
अगर पैसा न मिले तो हम आदमी क्या
न मारें एक परिंदा भी,
आतंक के पक्के व्यापारी हैं
कहलाते भले ही दरिंदा भी,
हमें सुरक्षा कमीशन मिल जाये
तो समझ लो हाथी सलामत निकल जाये,
न मिले तो चींटी भी गोली खाये,
आजकल निठल्ला बैठा हूं
इसका मतलब यह नहीं कि काम नहीं है
सभी चुका रहे हैं मेरा कमीशन
फिर हमला करने का कहीं से मिला दाम नहीं है,

अब इससे ज्यादा मत बोलना
निकल लो यहां से
सर्वशक्तिमान को धन्यवाद दो कि
क्योंकि अभी तुम्हारी जिंदगी ने अधिक आयु पाई है।
--------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Tuesday, October 5, 2010

अंधेरे का सौदा-हिन्दी कविता (andhera ka sauda-hindi shayari)

लोग जलाते हैं जो चिराग
वह उसे बुझा देते हैं,
रौशनी के दलाल
अपनी दलाली के लिये
करते हैं अंधेरों का सौदा
रात के अंधेरे में चमकता
कोई तिनका भी राह में दिख जाये
उसे भी पत्थरों के नीचे दबा देते हैं।
-------------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Wednesday, September 29, 2010

भक्तों के लिये भोले हैं राम-हिन्दी कविता (bhakton ke liye bhole hain ram-hindi poem)

दिल में नहीं था कहीं
पर जुबान से लेते रहे राम का नाम,
बनाते रहे अपने काम,
बरसती रही उन पर रोज़ माया,
फिर भी चैन नहीं आया,
कुछ लोग मतलब से पास आते हैं,
निकलते ही दूर चले जाते हैं,
राम का नाम बेचने में
उनको आता है मज़ा,
मगर मिलती है उनको भी बैचेनी की सज़ा,
भक्तों के लिये भोले हैं राम,
जरूरत से बनाते जाते काम
पर जो भक्तों को भुलाते हैं,
झूठे दर्द का वास्ता देकर रुलाते हैं,
नाम लेने से भर जाती उनकी भी झोली,
मगर हृदय में नहीं होते राम,
नहीं पाते इसलिये वह कभी आराम।
____________


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

हिन्दी साहित्य,समाज,संदेश,मनोरंजन,,hindi lieterature,sahitya,hindi poemअयोध्या में राम, अयोध्या में राम जन्मभूमि,अयोध्या में राम मंदिर,ayodhya mein ram,ayodhya men ram,ayodhya mein ram janmabhoomi,ayodhaya men ram janmabhoomi,ayodhya mein ram janambhoomi,ayodhya men ram janambhoomi,ayodhya ke ramlala

Friday, September 24, 2010

आस्था का व्यापार-हिन्दी कविताऐं (aastha ka vyapar-hindi kavitaen)

अपनी आस्थाओं को दिखाने के लिये
वह चीखते और चिल्लाते हैं,
भीड़ में प्रचार पाने के लिये
लेकर सर्वशक्तिमान का इठलाते हैं,
उनके लिये अपना विश्वास
दिल में रखकर चलने की चीज नहीं
दुनियां जीतने के इरादे से
भक्ति भी नारों की तरह गाते हैं।
-------
जिनको अपनी आस्थाओं के साथ
जंदा रहना नहीं आता है,
दूसरों की भावनाओं पर
अपने विचारों का व्यापार करने में ही
उनको आस्था का प्रश्न नज़र आता है।
------
अपनी आस्था दिल से निकालकर
किसी को दिखलायें
यह हमें करना नहीं आता है,
मुश्किल यह है कि जो नहीं रखते दिल में
आस्था का व्यापार उनको ही करना आता है।
--------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Wednesday, September 15, 2010

कहीं हिन्दी दिवस तो कहीं हिन्दी सप्ताह-हिन्दी लेख (hindi divas aur hindi saptah-hindi lekh)

12 सितंबर को सर्च इंजिनों से हिन्दी दिवस से खोज करते हुए पाठकों की संख्या कुछ अधिक दिखी तो आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि इसका अनुमान था कि 14 सितंबर को मनाये जाने वाले कार्यक्रमों के लिये लोग कुछ खोज रहे हैं। आखिर कौन लोग हो सकते हैं यह खोज करने वाले।
शायद वह लोग जो इन कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि या संचालक के रूप में सम्मिलित होते होंगे। उनको वहां बोलने के लिये कोई जानकारी यहां से चाहिए।
यह वह विद्वान भी हो सकते हैं जिनको समाचार पत्रों के लिये लिखना हो या फिर चैनलों पर बहस के लिये जाना हो। साथ ही वह संपादक भी जिनको अपने प्रकाशन के लिये हिन्दी पर कुछ नया लिखना हो वह सर्च इंजिनों में कुछ ढूंढ रहे होंगे।
शायद वह प्रतियोगी भी हो सकते हैं जो इस हिन्दी दिवस पर होने वाली निबंध प्रतियोगिताओं में कुछ लिखना चाहते हों।
वह छात्र भी हो सकते हैं जिनको अपने शिक्षकों ने इस अवसर पर कक्षा में ही अपने विचार रखने का आमंत्रण भी दिया हो या फिर वाद विवाद प्रतियोगता आयोजत की गयी हो।
ऐसे में यह विचार बुरा नहीं लगा कि ब्लाग स्पॉट पर लिखे गये कुछ पाठों को उठाकर वर्डप्रेस के अपने अधिक प्रसिद्ध ब्लागों पर हिन्दी दिवस शब्द लगाकर प्रस्तुत किया जायें ताकि देखा जाये कि पाठ तथा पाठन संख्या में क्या प्रभाव पड़ता है? यह काम 12 सितंबर को कर लेने के बाद 13 सितंबर की शाम को उन ब्लाग संख्या के पाठ/पाठ पठन संख्या का अवलोंकन किया तो गुणात्मक वृद्धि पाई। इसका मतलब यह था कि कुछ नया हिन्दी में ढूंढा जा रहा था। जब इतने सारे समाचार पत्र पत्रिकाऐं उपलब्ध है अनेक किताबें भी मिलती हैं तब आखिर अंतर्जाल पर कौन क्या ढूंढ रहा था। कुछ नया ही न! इसका मतलब यह कि अंतर्जाल के बाहर जो लिखा जा रहा है वह लीक से हटकर नहीं है या विचारों की रूढ़ता के कारण सभी लेखकों के लेख करीब एक जैसे होते हैं जिनका उपयोग करने से भाषण या रचना रूढ़ हो जाती है। इसलिये ही अंतर्जाल पर कुछ नया पढ़ने की चाहत यहां आने के लिये लोगों को बाध्य कर रही है।
दीपक बापू कहिन, हिन्दी पत्रिका, शब्द पत्रिका, ईपत्रिका तथा शब्दलेख पत्रिका-इन पांच ब्लाग पर पाठकों की संख्या 13 सितंबर को अत्यधिक दर्ज की गयी। हिन्दी पत्रिका और शब्द पत्रिका एक दिन में एक हजार पाठक संख्या पार करने के करीब पहुंच गये पर हुए नहीं। प्रथम तीन ब्लाग ने अपने पिछले कीर्तिमान से अधिक पाठक संख्या ढूंढे। शब्द पत्रिका पर 980 पाठक आये जो कि इस लेखक के किसी भी ब्लाग पर आये पाठकों की संख्या से ज्यादा है। shity stat में अंग्रेजी ब्लाग पर साहित्य वर्ग में बढ़त बनाते हुए शब्द पत्रिका, दीपक बापू कहिन तथा ईपत्रिका ने क्रमशः 6, 8 तथा 22 के स्थान पर अपनी उपस्थिति दर्ज की। हिन्दी पत्रिका ने अन्य वर्ग में 54 वां स्थान पाया। अगर यह संख्या नियमित रहती तो यकीनन शब्द पत्रिका नंबर एक पर आता पर इसकी आशा करना व्यर्थ था क्योंकि 14 सितंबर को पाठक संख्या कम हो गयी क्योंकि अपने देश में कार्यक्रम दोपहर या शाम तक ही होते हैं और उसके बाद ऐसा होना स्वाभाविक था।
हिन्दी दिवस के अलावा भी अन्य पर्वो पर उनसे संबंधित पाठों की खोज बहुत तेज होती है पर इतनी अधिक वृद्धि उस समय दर्ज नहीं की जाती। इस बात से एक निष्कर्ष तो निकलता है कि कि समाचार पत्रों के पुराने लेखों या किताबों की अपेक्षा अब नया पाठक तथा विद्वान वर्ग इंटरनेट पर अधिक निर्भर हो रहा है। ऐसे में अंतर्जाल पर अच्छे लेख न देखकर स्वयं को निराशा ही हाथ लगती है पर किया क्या जाये क्योंकि यहां स्वतंत्र मौलिक लेखकों के लिये यहां कोई आर्थिक प्रोत्साहन नहीं है। किसी अच्छे हिन्दी लेखक से यह कहना कठिन है कि इंटरनेट पर लिखो। जो पुराने लेखक लिख रहे हैं तो उनकी रचनाऐं रूढ़ किस्म की हैं और समाचार पत्र पत्रिकाओं में उनको लोग पढ़ते भी हैं। जब इंटरनेट का बिल स्वयं चुकाते हुए लिखना है तो पाठों की गुणवता से अधिक अपनी अभिव्यक्ति ही महत्वपूर्ण लगती है। पाठकों की संख्या भी कोई अधिक प्रेरक नहीं लगती। इस पर संगठित प्रचार माध्यमों ने-टीवी तथा समाचार पत्र पत्रिकाऐं-वातावरण ऐसा बना दिया है जिससे समाज में यह संदेश जाता है कि लेखन केवल अभिनेताओं, नेताओं, अधिकारियों तथा प्रतिष्ठित समाज सेवकों का है। उनके 140 शब्दों के ट्विटर पूरे संचार और प्रचार माध्यमों में छा जाते हैं और हिन्दी ब्लाग लेखकों को तो यह मान लिया गया है कि वह कोई भूत है जो अंतर्जाल पर लिखता है-जिसका दैहिक रूप से कोई अस्तित्व ही नहीं है। अनेक रचनायें यहां से उठाकर वहां छाप दी जाती है।
समाज में लिखना कोई नहीं चाहता और जो लिखते हैं वह अपने आसपास के लोगों को प्रभावित करने के लिये ही लिखते हैं ताकि अखबार में छप जाये तो बात जम जाये। यह कहना कठिन है कि हम अपने लिखे से लोगों को कितना प्रभावित कर रहे हैं क्योंकि इसके लिये कोई तरीका अपने पास उपलब्ध नहीं है। साथ ही यह भी भाव हमारे अंदर है कि हम कोई पैसे, पद तथा प्रतिष्ठा के शिखर पर नहीं बैठे कि हमारे शब्द लोग पढ़ने के लिये लालायित हों।
पहले लगता था कि हिन्दी दिवस मनाने की क्या जरूरत है? यह भी कहते थे कि मित्र दिवस, पितृ दिवस, मातृ दिवस, प्रेंम दिवस या इष्ट दिवस मनाने की क्या जरूरत है क्योंकि वह तो हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा है। यह भी कहते थे कि यह तो पश्चिम में होता है जहां रिश्ते इतने स्वाभाविक नहीं होते। अब हिन्दी दिवस माने की जरूरत लगती है क्योंकि समाज में उसकी उपस्थिति स्वाभाविक रूप से नहीं दिखती। अंग्रेजी का आकर्षण और हिन्दी की जरूरत के बीच फंसा समाज कुछ सोच नहंी पाता। अगर ऐसा होता तो शायद हम अंग्रेजी दिवस मना रहे होते।
आखिरी बात यह कि हिन्दी दिवस पर इतने पाठक आने का आशय यह कतई नहीं है कि वह आम पाठक थे क्योंकि अगर ऐसा होता तो यकीनन यह संख्या अगले दिनों में भी दिखती। इसका आशय यह है कि अभी केवल प्रबुद्ध वर्ग ही इंटरनेट पर सक्रिय है जिसे अपने विषयों से संबंधित जानकारी कहीं प्रस्तुत करने के लिये चाहिए। वैसे हिन्दी दिवस के साथ ही अनेक सरकार संस्थाओं के हिन्दी सप्ताह भी बनता है। हिन्दी दिवस तो निकल गया पर हिन्दी सप्ताह पर अच्छी चर्चायें हों और कोई अन्य बेहतर निष्कर्ष सामने आयें इसकी कामना तो हम ही कर सकते हैं। पाठक संख्या कम जरूर हो गयी है पर इस पूरे सप्ताह तक उसका प्रभाव जरूर रहेगा।
----------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Thursday, September 9, 2010

जिंदगी का हिसाब-हिन्दी शायरी (zindgi ka hisab-hindi shayari)

अवसाद के क्षण भी बीत जाते हैं,
जब मन में उठती हैं खुशी की लहरें
तब भी वह पल कहां ठहर पाते हैं,
अफसोस रहता है कि
नहीं संजो कर रख पाये
अपने गुजरे हुए वक्त के सभी दृश्य
अपनी आंखों में
हर पल नये चेहरे और हालत
सामने आते हैं,
छोटी सी यह जिंदगी
याद्दाश्त के आगे बड़ी लगती है
कितनी बार हारे, कितनी बार जीते
इसका पूरा हिसाब कहां रख पाते हैं।
----------

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकाऐं

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर