Monday, March 29, 2010

शब्द और गणित-हिन्दी व्यंग्य कविता (word and mathmatics-hindi vyangya kavita)

उपदेश देते हुए उनकी
जुबान बहुत सुहाती हैं,
और बंद कमरे में उनकी हर उंगली
चढ़ावे के हिसाब में लग जाती है।
किताबों में लिखे शब्द उन्होंने पढ़े हैं बहुत
सुनाते हैं जमाने को कहानी की तरह
पर अकेले में करते दौलत का गणित से हिसाब
लिखने में कलम केवल गुणा भाग में चल पाती है।
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अपनी भाषा छोड़कर
कब तक कहां जाओगे,
किसी कौम या देश का अस्त्तिव
कभी भी मिट सकता है
परायी भाषा के सहारे
कहां कहां पांव जमाओगे।
दूसरों के घर में रोटी पाने के लिये
वैसी ही भाषा बोलने की चाहत बुरी नहीं है
दूसरा घर अकाल या तबाही में जाल में फंसा
तो फिर तुम कहां जाओगे।
अपनी भाषा तो नहीं आयेगी तब भी जुबां पर
फिर दूसरे घर की तलाश में कैसे जाओगे।
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Thursday, March 25, 2010

लुटेरे पहरेदार बनाये जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता (lutere aur paharedar-hindi satire poem)

अब तो पत्थर भी तराश कर
हीरे बनाये जाते हैं,
पर्दे पर चल रहे खेल में
कैमरे की तेज रोशनी में
बुरे चेहरे भी सुंदरता से सजाये जाते हैं।
ख्वाब और सपनों के खेल को
कभी हकीकत न समझना,
खूबसूरत लफ्ज़ों की बुरी नीयत पर न बहलना,
पर्दे सजे है अब घर घर में
उनके पीछे झांकना भी मुश्किल है
क्योंकि दृश्य हवाओं से पहुंचाये जाते हैं।
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कायरों की सेना क्या युद्ध लड़ेगी
नायक सबसे अधिक कायर बनाये जाते हैं।
कुछ खो जाने के भय से सहमे खड़े है
भीड़ में भेड़ों की तरह लोग,
चिंता है कि छिन न जायें
तोहफे में मिले मुफ्त के भोग,
इसलिये लुटेरे पहरेदार बनाये जाते हैं।
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Sunday, March 14, 2010

वह सिकंदर कहलायेगा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (vah sikandar kahlayega-hindi satire poem)

खतरा है जिनसे जमाने को
उनके घर सुरक्षा के पहरे लगे हैं,
लोगों के दिन का चैन
और रात की नींद हराम हो जाती जिनके नाम से
उनके घर के दरवाजे पर पहरेदार, चैबीस घंटे सजे हैं।
कसूरवारों को सजा देने की मांग कौन करेगा
लोग बेकसूर ही सजा होने से डरने लगे हैं।
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बाजार में जो महंगे भाव बिक जायेगा,
वही जमाने में नायक कहलायेगा।
जब तक खुल न जाये राज
कसूरवार कोई नहीं कहलाता,
छिपायेगा जो अपनी गल्तियां
वही सूरमा कहलायेगा।
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इंसान कितना भी काला हो चेहरा
पर उस पर मेअकप की चमक हो,
चरित्र पर कितनी भी कालिख हो
पर उसके साथ दौलत की महक हो,
वह शौहरत के पहाड़ पर चढ़ जायेगा।
बाजार में बिकता हो बुत की तरह जो इंसान
लाचार हो अपनी आजाद सोच से भले
पर वह सिकंदर कहलायेगा।

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Thursday, March 11, 2010

अहसास और सोच-हिन्दी व्यंग्य कविता (ahsas aur soch-hindi vyangya kavita)

देखते हैं घर की सजावट
दिल का प्यार नहीं देखते,
थाली में सजे व्यंजन पर है नज़र
सांसों की धड़कन में पल रहे
जज़्बात नहीं देखते।
इंसानी बुतों की दिल्लगी में
ढूंढ रहा है पूरा जमाना
कोई ख्वाबी जन्नत
हकीकत के इंसान नहीं देखते।
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अपने दिमाग पर उठाये बोझ
घूम रहे हैं लोग,
पल रहा है तनावों का रोग,
चल रही है दुनियां अपने आप
पर खुद पर टिके होने का अहसास सभी ने पाला।
सिकुड़ गये हैं लोगों के कदम
अपने मतलब की मंजिल तक
उससे आगे लगा है सोच पर ताला।
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Tuesday, March 9, 2010

हिन्दी ब्लाग का वैचारिक प्रभाव दिखने लगा है-आलेख (hindi blog's thought in media)

अंतर्जाल पर हिन्दी भाषा में लिख रहे लेखकों को अभी इसका अनुमान नहीं है कि संगठित प्रचार माध्यम-टीवी, रेडियो और समाचार पत्र पत्रिकाऐं-उनके ब्लाग पर नज़र रख रहे हैं। कुछ ब्लाग लेखक लिखते हैं कि इंटरनेट पर लिखने से समाज में कोई बड़ा वैचारिक बदलाव नहीं आने वाला तो उनकी स्थिति दो प्रकार की ही हो सकती है। एक तो यह कि वह अपने पाठों में कोई वैचारिक बात नहीं रखते और दूसरी यह कि रखते हैं तो उनके मौलिक न होने का अहसास स्वयं को है।
एक बड़े पत्रकार के व्यंग्य पर हिल जाने वाले हिन्दी ब्लाग जगत को अगर किसी बात की जरूरत है तो वह है आत्मविश्वास। प्रसंग वश यह लेख भी एक ऐसे ही टीवी और अखबार पत्रकार के लेख पर ही आधारित है जिसमें वह कुछ निष्पक्ष दिखने का प्रयास कर रहे थे। वह मान रहे थे कि केवल दो विचारधाराओं के मध्य ही प्रसारण माध्यमों में कार्यक्रम और समाचार पत्र पत्रिकाओं में आलेख होते हैं। उनका यह भी था कि जब हम कहीं बहस करते हैं तो एक तरफ राष्ट्रवादी तो दूसरी तरफ समतावादी विद्वानों को ही बुलाते हैं जो अपनी धुरी से इतर कुछ नहीं सोचते न बोलते। कहने का अभिप्राय यह है कि वह उस सत्य को स्वीकार कर रहे थे जिसे स्वतंत्र और मौलिक ब्लाग लेखक लिखते आ रहे हैं।
यहां यह भी उल्लेख करें कि वह पत्रकार स्वयं ही राष्ट्रवादियों पर सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगाकर अपने को समतावादी बताते रहें तो राष्ट्रवादियों ने भी उनको अपने धुरविरोधियों की सूची में शामिल कर रखा है। इतने बरसों से प्रचार माध्यमों में सक्रिय विद्वान की अभिव्यक्त्ति अपनी ही थी पर विचारों का स्त्रोत हिन्दी ब्लाग जगत का दिखा जहां यह बातें लिखी गयी हैं। कहने को तो यह भी कह जा सकता है कि इतने बड़े आदमी को भला कहां फुरसत रखी है? मगर यह सोचना गलता होगा। दरअसल आम पाठक इतना ब्लाग जगत पर नहीं आ रहा जितना यह बुद्धिजीवी आ रहे हैं। वजह साफ है कि वह अभी तक एक तय प्रारूप में चलते आ रहे थे इसलिये कुछ नया सोचने की जरूरत उनको नही थी पर इधर हिन्दी ब्लाग एक चुनौती बनता जा रहा है इसलिये यह संभव है कि वह यहां से विचारों को उठकार उस पर अपने मौलिक होने का ठप्पा लगाये क्योंकि उनके पास प्रचार माध्यमों की शक्ति है।
इन दो विचारधाराओं पर चलने वाली बहसों में आम आदमी का एक विचारवान व्यक्ति की बजाय निर्जीव प्रयोक्ता के रूप में ही रखा जाता है। सवाल यह है कि उनको यह विचार कहां से आया कि प्रचलित विचाराधाराओं से अलग भी किसी का विचार हो सकता है?
जवाब हम देते हैं। हिन्दी ब्लाग जगत पर बहुत कम लिखा जा रहा है पर याद रखिये न छपने की कुंठा लेकर आये ब्लाग लेखकों के साथ उनकी अभिव्यक्त होने के लिये तरस रही अपनी विचाराधारायें हैं। यह विचाराधारायें न तो विदेश से आयातित हैं और न अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से संपन्न देशी विद्वानों के सतही सोच पर आधारित है। वह उपजी है उनके स्वयं के विचार से। कहने का अभिप्राय है कि इंटरनेट पर हिन्दी में लिखने वाले ब्लाग लेखक बाहर चल रही गतिविधियों और प्रचार पर नज़र रखें। उनमें वैचारिक बदलाव नज़र आ रहा है। यह सच है कि हिन्दी ब्लाग जगत पर आम पाठकों की संख्या कम है पर खास वर्ग उस पर नज़र रखे हुए है क्योंकि एक ही विचार या नारे पर चलते हुए उसको अपना भविष्य अंधकार मय नज़र आ रहा है। दूसरा यह कि ब्लाग जगत से खतरे का आभास उनको है इसलिये वह अब कहीं कहीं यहां से विचार भी ग्रहण करने लगे हैं-इसे हम चोरी नहीं कह सकते-और उनको प्रस्तुत करते हैं। उनका नाम है इसलिये लगता है कि मौलिक हैं जबकि सच यह है कि हिन्दी ब्लाग लेखकों द्वारा आपसी चर्चाओं से उनका जन्म हुआ है। आप कुछ विचारों की बानगी देखिये।
1-इतने वर्षों से यह प्रचार माध्यम विज्ञापन पर चल रहे हैं पर बाजार और उसके प्रबंधकों को दबाव को कभी जाहिर नहीं किया। अब तो वह बहस करते हैं कि बाजार किस तरह तमाम क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा है। समाज के साथ ही वह खेलों और फिल्मों में बाजार के हस्तक्षेप की चर्चा करते हैं। लोग यकीन नहीं करेंगे कि पर सच बात यह है कि बाजार के इस रूप पर सबसे पहली चर्चायें हिन्दी ब्लाग जगत पर ही हुईं थी। यहां यह बात नहीं भूलना चाहिये कि इस लेखक को तीन साल अंतर्जाल पर हो गये हैं और अनेक पाठों पर दूसरे ब्लाग लेखकों की बाजार के इस कथित प्रभाव की चर्चा करती हुईं अनेक टिप्पणियां हैं जो इतनी ही पुरानी हैं।
2-गांधीजी पर लिखे गये इस लेखक के पाठों को यहां के ब्लाग लेखकों ने पढ़ा होगा। गांधीजी को नोबल न दिये जाने के विषय पर लिखे गये इस लेखक के विचारों को एक स्तंभकार ने जस का तस अपने लेख में लिखा। सच है उसे आम पाठकों ने अभी कम पढ़ा होगा पर उस स्तंभकार ने लाखों लोगों तक वह बात पहुंचा दी। अखबारों ने इस लेखक के वैचारिक चिंतन बिना नाम के छापे। यहां हम कोई शिकायत नहीं कर रहे बल्कि इंटरनेट लेखकों को बता रहे हैं कि वह अपने अंदर कुंठा न पालें। अगर वह मौलिकता के साथ आयेंगे तो वह वैचारिक शक्ति केंद्र का बिन्दु बनेंगे। आम पाठकों की कम संख्या को लेकर अपने अंदर कुंठा पालना व्यर्थ है।
3-कलकत्ता में एक धर्म के युवक की मौत पर एक वर्ग बावेला मचाता है पर कश्मीर पर दूसरे धर्म के युवक की मौत पर वही खामोश हो जाता है तो दूसरा मचाता है। हम यहां इस विषय पर बहस नहीं कर रहे कि कौन गलत है या कौन सही्! मुख्य बात यह है कि कथित विचारधाराओं ने लोगों को सोच तो प्रदान की है पर एक दायरे के अंदर तक सिमटी है। ऐसे में मुक्त भाव से लिखने वाले हिन्दी लेखक कई ऐसी बातें लिख जाते हैं जिनको स्थापित विद्वान सोच भी नहीं सकता।
अब संगठित प्रचार माध्यम में सक्रिय बुद्धिजीवियों को यह लगने लगा है कि उनकी विचारों की पूंजी बहुत कम है भले ही उनके द्वारा लिखे गये शब्दों की संख्या हिन्दी ब्लाग लेखकों से अधिक है। उनका नाम ज्यादा है पर उनका सोच आजाद नहीं है।
हां, यह सच है कि हम ब्लाग लेखक कुंठित होकर यहां आते हैं पर ब्लाग शुरु करने के बाद उसका नशा सब भुला देता है। जहां तक मठाधीशी का सवाल है तो हर ब्लाग लेखक जैसे ही ब्लाग खोलता है यह पदवी उसके पास स्वयं ही आ जाती है। इंटरनेट पर लिखने वाले लेखकों यह बात समझ लेना चाहिये कि उनका अकेला होना ही उनको स्वतंत्र बनाता है। वह जिन संघर्षों से गुजर रहे हैं वह उनके लिये सोच को विकसित करने वाला है। उनको संगठित प्रचार माध्यमों में गढ़े गये विचारों से आगे जाना है। जैसे जैसे ब्लाग लेखकों की संख्या बढ़ेगी वैसे उनकी सोच का दायरा भी बड़ा होगा। संगठित प्रचार माध्यमों में नाम पाना किसे बुरा लगता है पर दूसरा सच यह है कि वहां नवीन और मौलिक विचार या विद्या को साथ लेकर स्थान पाना कठिन है। ऐसे में ब्लाग जगत पर आकर दायरा बढ़ जाता है। जब तब आम पाठक है स्थापित विद्वान ब्लाग लेखकों के विचारों को ग्रहण कर अपना जाहिर कर सकते हैं पर कालंातर में यह तो जाहिर होना ही है कि उनका जनक कौन है?
जब कोई स्थापित विद्वान यह मान रहा है कि सीमित विचाराधाराओं के इर्दगिर्द प्रचार माध्यम घूमते रहे हैं वह अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं को भी जिम्मेदार मान रहा है क्योंकि अभी तक तो वह भी यही करते रहे थे।
हिन्दी ब्लाग जगत पर कुछ गजब के लिखने वाले हैं। यह सही है कि उनमें कुछ लकीर के फकीर है तो कुछ नये ढंग से सोचने वाले भी है। इसमें दिलचस्प बात यह है कि नये ढंग से सोचने वाले अधिक भाषा सौंदर्य से नहीं लिख पाते पर उनकी बातें बहुत प्रभावी होती हैं और वह शायद स्वयं ही नहीं जानते कि ऐसी बात कह रहे हैं जिनको संगठित प्रचार माध्यम जगह नहीं देंगे अलबत्ता कुछ स्थापित विद्वान उनके विचारों को उठा भी सकते हैं। आप कहेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? इसका जवाब यह है कि हमारे आसपास घटता बहुत कुछ है पर शाब्दिक अभिव्यक्ति कैसे की जाये यह महत्वपूर्ण बात है। बड़े विद्वान अभिव्यक्ति तो कर सकते हैं पर नवीन विचार के जनक तो हिन्दी ब्लाग लेखक ही बनेंगे। यह बात हमने अपने अनुभव से कही है। ऐसे विचारों को लिखते हुए हम यह कहना नहीं भूलते कि यह जरूरी नहीं कि हम सही हों। हो सकता है हमारा यह अनुमान हो, पर विचारणीय तो है। इतना तय है कि इस ब्लाग जगत पर अनेक लोग तो ऐसे हैं जो पाठ लिखने के साथ ही जोरदार वैचारिक टिप्पणियां भी लिख जाते हैं और भविष्य में उनकी चर्चा भी प्रचार माध्यमों में होगी।
आखिरी बात हम यह भी कह सकते हैं कि अगर विद्वानों ने हिन्दी ब्लाग जगत से विचार नहीं भी लिये होंगे पर यह हो सकता है कि यहां की जानकारी उनको तो हो ही गयी है और इसलिये प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभर रहे हिन्दी ब्लाग लेखकों को ध्यान में रखते हुए नये ढंग से सोचना शुरू किया हो-मतलब प्रभाव तो है न!
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, February 28, 2010

होली या दिवाली-आलेख और व्यंग्य क्षणिकायें (holi ho ya diwali-hindi article and satire poem)

होली हमारे देश का एक परंपरागत त्यौहार है जो उल्लास से मनाया जाता रहा है। यह अलग बात है कि इसे मनाने का ढंग अब लोगों का अलग अलग हो गया है। कोई रंग खेलने मित्रों के घर पर जाता है तो कोई घर पर ही बैठकर खापीकर मनोरंजन करते हुए समय बिताता है। इसका मुख्य कारण यह है कि जब तक हमारे देश में संचार और प्रचार क्रांति नहीं हुई थी तब तक इस त्यौहार को मस्ती के भाव से मनाया जरूर जाता था पर अनेक लोगों ने इस अवसर पर दूसरे को अपमानित और बदनाम करने के लिये भी अपना प्रयास कर दिखाया। केवल शब्दिक नहीं बल्कि सचमुच में नाली से कीचड़ उठाकर फैंकने की भी घटनायें हुईं। अनेक लोगों ने तो इस अवसर पर अपने दुश्मन पर तेजाब वगैरह डालकर उनको इतनी हानि पहुंचाई कि उसे देख सुनकर लोगों का मन ही इस त्यौहार से वितृष्णा से भर गया। तब होली उल्लास कम चिंता का विषय बनती जा रही थी।
शराब पीकर हुड़दंग करने वालों ने लंबे समय तक शहरों में आतंक का वातावरण भी निर्मित किया। समय के साथ सरकारें भी चेतीं और जब कानून का डंडा चला तो फिर हुडदंगबाजों की हालत भी खराब हुई। हर बरस सरकारें और प्रशासन होली पर बहुत सतर्कता बरतता है। इस बीच हुआ यह कि शहरी क्षेत्रों में अनेक लोग होली से बाहर निकलने से कतराने लगे। एक तरह से यह उनकी आदत बन गयी। अब तो ऐसे अनेक लोग हैं जो इस त्यौहार को घर पर बैठकर ही बिताते हैं।
जब सरकारों का ध्यान इस तरफ ध्यान नहीं था और पुलिस प्रशासन इसे सामान्य त्यौहारों की तरह ही लेता था तब हुड़दंगी राह चलते हुए किसी भी आदमी को नाली में पटक देते। उस पर कीचड़ उछालते। शहरों में तो यह संभव ही नहीं था कि कोई पुरुष अपने घर की स्त्री को साथ ले जाने की सोचे। जब पूरे देश में होली के अवसर पर सुरक्षा व्यवस्था का प्रचनल शुरु हुआ तब ऐसी घटनायें कम हो गयी हैं। इधर टीवी, वीडियो, कंप्यूटर तथा अन्य भौतिक साधनों की प्रचुरता ने लोगों को दायरे में कैद कर दिया और अब घर से बाहर जाकर होली खेलने वालों की संख्या कम ही हो गयी है। अब तो यह स्थिति है कि कोई भी आदमी शायद ही अनजाने आदमी पर रंग डालता हो। फिर महंगाई और रंगों की मिलावट ने भी इसका मजा बिगाड़ा।
महंगाई की बात पर याद आया। आज सुबह एक मित्र के घर जाना हुआ। उसी समय उसके मोहल्ले में होली जलाने के चंदा मांगने वाले कुछ युवक आये। हमने मित्र से हाथ मिलाया और अंदर चले गये। उधर उनकी पत्नी पचास रुपये लेकर आयी और लड़कों को सौंपते हुए बोली-‘इससे ज्यादा मत मांगना।’
एक युवक ने कहा-‘नहीं, हमें अब सौ रुपये चाहिये। महंगाई बढ़ गयी है।’
मित्र की पत्नी ने कहा-‘अरे वाह! तुम्हारे लिये महंगाई बढ़ी है और हमारे लिये क्या कम हो गयी? इससे ज्यादा नहीं दूंगी।’
लड़के धनिया, चीनी, आलू, और प्याज के भाव बताकर चंदे की राशि बढ़ाकर देने की मांग करने लगे।
मित्र ने अपनी पत्नी से कहा-‘दे दो सौ रुपया, नहीं तो यह बहुत सारी चीजों के दाम बताने लगेंगे। उनको सुनने से अच्छा है इनकी बात मान लो।’
गृहस्वामिनी ने सौ रुपये दे दिये। युवकों ने जाते हुए कहा-‘अंकल और अंाटी, आप रात को जरूर आईये। यह मोहल्ले की होली है, चंदा देने से ही काम नहीं चलेगा। आना भी जरूर है।’
मित्र ने बताया कि किसी समय उन्होंने ही स्वयं इस होली की शुरुआत की थी। उस समय लड़कों के बाप स्वयं चंदा देकर होली का आयोजन करते थे अब यह जिम्मेदारी लड़कों पर है।’
कहने का अभिप्राय यह है कि इस सामूहिक त्यौहार को सामूहिकता से मनाने की एक बेहतर परंपरा जारी है। जबकि पहले जोर जबरदस्ती सामान उठाकर ले जाकर या चंदा ऐंठकर होली मनाने का गंदा प्रचलन अब बिदा हो गया है। जहां नहीं हुआ वह उसे रोकना चाहिये। सच बात तो यह है कि अनेक बेवकूफ लोगों ने अपने कुकृत्यों से इसे बदनाम कर दिया। यह खुशी की बात है कि समय के साथ अब उल्लास और शांति से यह त्यौहार मनाया जाता है।
इस अवसर पर कुछ क्षणिकायें 
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रंगों में मिलावट
खोऐ में मिलावट
व्यवहार में दिखावट
होली कैसे मनायें।
कच्चे रंग नहीं चढ़ता
अब इस बेरंग मन पर
दिखावटी प्यार कैसे जतायें।
---------
रंगों के संग
खेलते हुए उन्होंने होली
कुछ इस तरह मनाई,
नोटों के झूंड में बैठकर
इठलाते रहे
इसलिये उनकी पूरी काया
रंगीन नज़र आयी।
---------
अगर रुपयों का रंग चढ़ा गया तो
फिर कौनसे रंग में
बेरंग इंसान नहायेगा,
आंख पर कोई रंग असर नहीं करता
होली हो या दिवाली
उसे बस मुद्रा में ही रंग नज़र आयेगा।



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Monday, February 22, 2010

शब्द मंद हो गये हैं-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (real word is slow-hindi comic poem)

हर तरफ घूम रहे
हाथ में खंजर लिये लोग
किसी से हमदर्दी का उम्मीद करना
बेकार है
पहले कोई किसी के पीठ में
घौंपकर आयेगा,
फिर अपनी पीठ को बचायेगा।
भला कब किसी को
दर्द सहलाने का समय मिल पायेगा।
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दौलत, शौहरत और ताकत के
घोड़े पर सवार लोग
गिरोहबंद हो गये हैं।
हवा के एक झौंके से
सब कुछ छिन जाने का खौफ
उनके दिल में इस कदर है कि
आंखों से हमेशा उनके खून टपकता है,
आम आदमी की पीठ पर
हर पल बरसा रहे चाबुक
फिर भी वह कांटे की तरह
आंखों में खटकता है,
समाज की हालातों पर
सच लिखने वाले शब्द मंद हो गये हैं।

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Thursday, February 18, 2010

शब्द और अनुभूति-हिन्दी कविता (shabd aur anubhuti-hindi poem)

कब तक तस्वीरों को देखकर
अपना दिल बहलायें,
चेहरों की आखों से पढ़कर
शब्द अपनी समझ से तय कर
दिमाग में सजायें।
इससे तो अच्छा है कि किताबों में
शब्द पढ़कर तस्वीरों के अहसास पायें।
तस्वीरें कितना बोलेंगी,
आंखें कैसे शब्दों को तोलेंगी,
चेहरे स्तब्ध करते हैं
आंखों में आश्चर्य भरते हैं,
दिल की गहराई तक तो
शब्द ही अनभूति पहुंचायें।
इसलिये फुरसत में अपने आगे
किताबों की ही सजायें।

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Saturday, February 13, 2010

माया तो संतों की दासी होती है-हिन्दी आलेख (maya to santon ki dasi hoti hai-hindi lekh)

भारतीय अध्यात्म ज्ञान के अनुसार ‘माया संतों की दासी होती है’, पर  अज्ञानी लोग इस बात को नहीं समझ सकते। इसके अलावा जिनका सोच पश्चिमी विचारधाराओं से प्रभावित है तो उनको समझाना अत्यंत कठिन है।
संत दो प्रकार के होते हैं, एक तो वह जो वनों में रहकर अपना जीवन पूरी तरह से सन्यासी की तरह बिताते हैं दूसरे वह जो समाज के बीच में रहते हैं।  जो संत समाज के बीच में रहते हैं वह तमाम तरह के दायित्व-जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य तथा समाज सुधार-भी अपनी सिर पर लेेते हैं। ऐसे में भक्त लोग उनको गुरु दक्षिणा, दान या उपहार भी प्रदान करते हैं जिसका वह उसी समाज के लिये उपयोग करते हैं।
जैसे जैसे देश में धन का वर्चस्व बढ़ रहा है वैसे ही उसका पैमाना संतों के पास भी बढ़ रहा है।  संतों की जो संपत्ति है वह अंततः सार्वजनिक काम में रहती है।  फिर दूसरी बात यह भी है कि उन संतों को अगर समाज के गरीब वर्ग की सहायता करनी है तो उसके लिये धन का होना आवश्यक है। अनेक संत दवाओं का निर्माण कर लोगों को बेचते हैं और उससे लोगों को लाभ भी होता है-अगर ऐसा न होता तो उनके द्वारा बेची जा रही वस्तुओं की बिक्री दिन-ब-दिन बढ़ती न जाती।  अनेक संत पत्रिकायें निकालते हैं और लोग उनको चाव से पढ़ते हैं।
ऐसे में आधुनिक बाजार और उनका प्रचारतंत्र विरोधी हो गया है।  इसका कारण एक तो यह है कि दवाईयों से जहां अनेक एलौपैथी कंपनियों का काम ठप्प हो रहा है वहीं रद्दी साहित्य प्रकाशित करने वाले प्रकाशनों को पाठक नहीं मिल रहे।  दूसरा यह कि उनके प्रवचनों में ढेर सारे श्रोता और भक्त जाते हैं जिससे आधुनिक बाजार और उसका प्रचार तंत्र अपने शिकारी पंजों से दूर पाता है। उसमें युवा वर्ग देखकर आधुनिक बाजार और उसका प्रचार तंत्र चिढ़ता है तो इसलिये क्योंकि उसे तो वैलंटाईन डे के लिये नये उत्पाद बेचने के लिये युवा वर्ग ही मिलता है। फिल्म देखने के लिये माल की महंगी टिकिटें खरीदने के लिये इसी नवधनाढ्य वर्ग के युवाओं की उसे जरूरत है। इसके अलावा क्रिकेट के खिलाड़ियों को महानायक के रूप में स्थािपत करने  भी यही वर्ग उपलब्ध है जिसे इस खेल पर लगे फिक्सिंग के दाग की जानकारी नहीं है।  ऐसे में प्रचारतंत्र अपने हाथ से एक बहुत बड़ा समाज दूर पाता है।
चिकित्सा और दवाईयों की बात करें तो एलौपेथी पर लोगों का विश्वास नहीं रहा।  ढेर सारे टेस्ट में समय और पैसा बरबाद कर चुके लोगों से उनकी दास्तान सुनी जा सकती है। जबकि इन बाबाओं के द्वारा बनायी गयी दवायें बहुत उपयोगी साबित हो रही हैं।  इसके अलावा ‘ऋषि प्रसाद’, अखंड ज्योति, तथा कल्याण जैसी पत्रिकायें समाज में अध्यात्मिक धारा को प्रवाहित किये हुए हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि ‘हमारे देश की सहज योग परंपरा का विस्तार हो रहा है पर आधुनिक बाजार का सारा काम लोगों में असहजता पैदा करना है। वह ऐसी विलासिता के साधनों को सुख कहकर बेच रहे हैं जिनके खराब होने पर आदमी अपने आपको अपाहिज अनुभव करता है।  वह नकली महानायक गढ़ रहे हैं और हालत यह है कि उनको क्रिकेट मैच और फिल्म देखने के लिये अनेक तरह के तनाव पैदा करने पड़ते हैं।  उसे असहज समाज चाहिये जबकि श्रीमद्भागवत गीता में चारों वेदों के सार तत्व के साथ जो सहज योग सरलता से लिखा गया है उसकी इस देश को सबसे अधिक जरूरत है।  इस प्रयास में सबसे आगे रहने वाले संतों में सर्वश्री आसाराम बापू, बाबा रामदेव तथा सुधांशु महाराज जैसे महापुरुष हैं। इन संतों का मायावी सौंदर्य देखकर अनेक विद्वान विचलित हो जाते हैं पर वह यह नहीं सोचते कि इतनी ऊंचाई पर कोई बिना ज्ञान, तप, तथा योग साधना के नहीं पहुंच सकता।  इन संतों ने असहजता पैदा करने वाले तत्वों से निपटने के लिये प्रयास किये हैं और इसके लिये धन की जरूरत होती है।  इन लोगों के लिये धन ही अस्त्र शस्त्र है, क्योंकि जो तत्व समाज में अस्थिरता, अज्ञान और असहजता फैला रहे हैं वह भी इसी अस्त्र शस्त्र का उपयोग कर रहे हैं। यह विद्वान लोग क्या चाहते हैं कि देश में अज्ञान, असहजता तथा अस्थिरता फैलाने वाले तत्वों से युद्ध बिना हथियार लिये लड़ें या उसे विकास का प्रतीक  मानकर उनकी तरह चुप बैठ कर देखें।
सच तो यह है कि संतों के पास जो धन है उसकी तुलना किसी अन्य धनाढ्य वर्ग से नहीं की जा सकती। 
कुछ अज्ञानी तो इन पर ठगने का आक्षेप भी लगाते हैं? दोष उनका नहीं है क्योंकि उनके संस्कारों में पश्चिमी विचार मौजूद हैं और उनको भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की बात समझ में नहीं आ सकती।  वह उस बाजार को नहीं देखते जिसका प्रचार तंत्र वैलंटाईन डे के नाम पर मनाये जाने वाले प्रेम दिवस पर केवल उभयपक्षी लिंग संबंध और बीयर पीने जैसी बातों को ही प्रोत्साहित करते हैं। फिल्मों के नकली पात्रों का अभिनय करने वाले अभिनेताओं को महानायक बताते हैं। इसके विपरीत संत तो केवल प्राचीन सत्साहित्य का ही प्रचार करते हैं इसमें ठगी कैसी?।  सच तो यह है कि अब इस देश में अगर आशा बची है तो इन्हीं संतों से! बाकी जिसकी जैसी मजी है। कहे या लिखे! हमने तो अपना विचार व्यक्त कर दिया।

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Sunday, February 7, 2010

इंसानी दिल-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (heart of man-hindi satire poem)

मतलब के लिए इंसान

अपना दिल इस तरह बदल जाते

कि आखें होती तो

बेपैंदी के लोटे भी देखकर शर्माते।

जुबान होती तो

एक दूसरे पर इंसान होने का शक जताते।

----------

नब्बे फीसदी सांप

जहरीले नहीं होते

यह विशेषज्ञ ने बताया।

तब से इंसानों की सांप से

तुलना करना बंद कर दिया हमने

क्योंकि सांप के डसने से

कई लोगों को बचते देखा

पर इंसानों के धोखे से बचता

कोई नज़र नहीं आया।

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Wednesday, February 3, 2010

नजरिया-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (nazariya-hindi comic poems)

जिंदगी का सच कटु होता जितना

इंसान का सपना उतना ही रंगीन हो जाता है।

रंगीले इंसानों के लिये

जिंदगी की  कड़वाहट में है मनोरंजन

इसलिये सोच से बने अफसानों में

हर रंग सराबोर हो जाता है।

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अमीर के बच्चे ने

गरीबों के दर्द पर

तो गरीब के बच्चे ने अमीरी के ख्वाब पर लिखा।

किन हालातों पर रोयें, किन पर हंसे

इंसानों के नजरिये में ही फर्क दिखा।

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Saturday, January 30, 2010

मत बहको ऊंचे ठाठ देखकर-हिन्दी शायरी (amiron ke thath dekhakr-hindi comic poem)

दौलत की रौशनी से अमीर, अपनी महफिलें सजाते हैं,

गरीबों के दिल में लगे आग, इसलिये  चिराग जलाते हैं।

मत बहको ऊंचे उनके ठाठ देखकर, हमेशा धोखा खाओगे,

बेचने वाली शयों के, सौदागर ही पहले ग्राहक बन जाते हैं।

दरियादिल दिख रहे है, पर सारा सामान मुफ्त का सजा है

कहीं से चीज का मिला तोहफा, कहीं से पैसा जुटाते हैं।

घी से भरा उनका घर, मिलावटी तेल के कनस्तर बेचकर

मौत के मुख में भेजने पहले, जिंदगी का रास्ता बताते हैं।

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Wednesday, January 27, 2010

प्यार, नफरत और दिल-हिन्दी व्यंग्य कविताएं (pyar,nafarat aur dil-hindi vyangya kavitaen)

राज रखकर ही राज

चलाये जाते हैं

सामने कर दुश्मनी के सौदे

बंद कमरे में दोस्तों में

बांटे जाते हैं।

जज़्बात मर गये हैं लोगों के

प्यार हो नफरत

दिल के अदंर तक नहीं पहुंचती

केवल जमाने को दिखाये जाते हैं।

--------

दिन भर दिखाते रहे

अपनी दुश्मनी जमाने को,

रात को चले दोस्ती निभाने को।

विज्ञापन का युग है

तारीफों पर अब लोग नहीं बहलते

इसलिये लोग चल पड़ते हैं

दोस्त के ही हाथ से अपने लिये गालियां लिखाने को।


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Sunday, January 24, 2010

उनके लिये देशभक्ति एक शय-हिन्दी शायरी (hindi shayri on deshbhakti)

स्वयं की है दौलत में आसक्ति,

वही सिखा रहे हैं सभी को करना

देश की भक्ति।



न आसमान गिर रहा है

न जमीन धंसक रही है

आम इंसान उनके रंगीन दृश्यों पर

कभी दृष्टि न डाले,

अपने अंदर खास होने के

कभी ख्याल न पाले,

इसलिसे उसे कभी सपने बेचकर बहलाते,

कभी सामने पर्दे पर

खौफ के मंजर भेजकर डराते,

रात की रौशनी से रोमांस करने वाले

दिन में पूरे जमाने को 

भरमाने में लगाते अपनी शक्ति।



जिनके लिये जज़्बात हैं, खाने का कबाब ,

उनके लिये पैसा ही है शराब,

असली खून पर उठाकर लाते बेचने आंसु,

नकली कामयाबी पर जश्न बेचते धांसु,

नारों को सोच बताकर बहस करते,

खाली वादों में ही

बड़े इंसानों की दरियादिली की हवस भरते,

ढेर सारे सामान लुटा लिये

फिर भी नहीं होती उनको विरक्ति,

जब नहीं होता सामान दुकान में

बेचने लगते हैं बाजार में देशभक्ति।

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Tuesday, January 19, 2010

चाहत और राहत-हिन्दी व्यंग्य कविता (chahat aur rahat-hindi vyangya kavita)

असुंदर को सुंदरता की,

भूखे को रोटी की,

और उदास इंसान को

मनोरंजन की होती है चाहत।

इसलिये सुंदर को

असुंदरता का अपमान देखकर,

अमीर को भूख के दर्द से

शाब्दिक हमदर्दी दिखाकर,

और मनोरंजन से थके इंसान को

उदासी की बातों से मिलती है राहत।

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Monday, January 11, 2010

देखें अपना चेहरा-हिन्दी शायरी (dekhen apna chehra-hindi shayri)

जो खुद टूटे हैं दिल से

वह क्या किसी को प्यार करेंगे,

फिर भी जरूरत पड़ी तो

दिखाने के लिये आखों में भरेंगे।



सभी दूसरों के अपमान पर खुश हैं

क्या किसी का सम्मान करेंगे

चाटुकारों की कमी नहीं है

सिक्के लेकर ताज सिर पर धरेंगे।



भूख प्यास से खौफ खाते लोग

क्या ईमान की जंग लड़ेंगे।

रोटी के एक टुकड़े से पेट भर जाये

पर वह बोरियां गोदाम में भरेंगे।

अपनी प्यास बुझ जाने पर भी चैन नहीं

दूसरा मरे, इसलिये समंदर से लड़ेंगे।



दूसरों पर छींटाकशी करने में सब आगे

अपनी नीयत देखने से हमेशा डरेंगे।

अपने दिल के आईने में देखें अपना चेहरा

तब दुनियां से कम, अपने से अधिक डरेंगे।


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Thursday, January 7, 2010

शहंशाह-हिन्दी शायरी (shanshah-hindi shayri)

जिसके सिर पर ताज का बोझ नहीं है,

काम करने का जिम्मा रोज नहीं है,

कान नहीं खड़े होते हमेशा

किसी का हुक्म सुनने के लिये,

जिसके हाथ नहीं मोहताज

किसी का जुर्म बुनने के लिये,

जिसकी आंखें नहीं ताकती

मदद के लिये किसी दूसरे की राह,

खुशदिल आदमी बोले हर समय ‘वाह’।

वही है असली शहंशाह।

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झुकते हैं वही सिर

जिन पर होता है ताज,

तलवार का वार झेलती  वही गर्दन

जो अकड़ जाती हैं करते राज

सफेल मलमल के सिंहासन के पीछे

डर और अहंकार का रंग है काला स्याह।

दौलत कमाने वाले नटों के

हाथ में डोर है

पुतले राज करते हुए कहलाते शहंशाह।



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Tuesday, December 29, 2009

धोखे की कहानी-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (dhokhe ki kahani-hindi vyangya kavitaen)

यह पेज
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उन्होंने धोखा दिया

इस पर क्यों अब आसू बहाते हो?

अपनों से ही होता है धोखा

दुनियां का यह कायदा क्यों भूल जाते हो।

उनके वादे पर रख दिया

अपना सारा सामान उनके घर,

कोई सबूत नहीं था

उनकी ईमानदारी का

यकीन किया तुमने उन पर मगर,

अपने बेबुनियाद विश्वास को छिपाकर

उनके धोखे की कहानी

पूरे जमाने को क्यों सुनाते हो।

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उनको महल में पहुंचा दिया

इस विश्वास पर कि

वह हमारी झौंपड़ी सजा देंगे।

यह नहीं सोचा

वह भी इंसान है हमारी तरह

याद्दाश्त उनकी भी कमजोर है

वहां मुद्दत बाद  मिले सुख में

अपने भी भूल जायेंगे दुःख के दिन

हमारे कैसे याद करेंगे।

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Wednesday, December 23, 2009

गुलामों पर राज-हिन्दी शायरी (gulam raj-hindi shayri)

हांड़मांस के बुत हैं

इंसान भी कहलाते हैं,

चेहरे तो उनके अपने ही है

पर दूसरे का मुखौटा बनकर

सामने आते हैं।

आजादी के नाम पर

उनके हाथ पांव में जंजीर नहीं है

पर अक्ल पर

दूसरे के इशारों के बंधन

दिखाई दे जाते हैं।

नाम के मालिक हैं वह गुलाम

गुलामों पर ही राज चलाये जाते हैं।


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Saturday, December 19, 2009

खूबसूरती और ताकत-हिन्दी साहित्य कवितायें (khubsurti aur takat-hindi sahitya kavita)

सुंदरता अब सड़क पर नहीं

बस पर्दे पर दिखती है

जुबां की ताकत अब खून में नहीं

केवल जर्दे में दिखती है।

सौंदर्य प्रसाधन पर पड़ती

जैसे ही पसीने की बूंद

सुंदरता बह जाती,

तंबाकू का तेज घटते ही

जुबां खामोश रह जाती,

झूम रहा है वहम के नशे में सारा जहां

औरत की आंखें देखती

दौलत का तमाशा

तो आदमी की नजर बस

कृत्रिम खूबसूरती पर टिकती है।

 


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