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Saturday, February 25, 2012

रोना और हँसना-हिन्दी कविता

अब अपने दिल के घर से
बाहर आकर
न हम रोते
न हँसते हैं,
लोग पर्दे पर चलते अफसाने
देखते देखते
हो गए इस जहान के लोग
हर पल प्रपंच रचने के आदी
हम उनके जाल में यूं नहीं फँसते हैं।
कहें दीपक बापू
फिल्म की पटकथाएँ
और टीवी धारावाहिकों की कथाएँ
ले उड़ जाती हैं अक्ल पढ़े लिखे लोगों की
ख्याली दुनियाँ के पात्रों को ढूंढते हुए
ज़मीन की हक़ीक़तों में खुद ही धँसते हैं,
रोना तो छूट गया बरसों पहले
अब ज़माने के कभी बहते घड़ियाली आंसुओं
कभी फीकी उड़ती मुस्कान देखकर
अब अपने दिल को साथ लेकर
बस, हम भी हँसते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Tuesday, August 10, 2010

अपने से अज़नबी हो गया आदमी-हिन्दी कविता (apne se azanabi ho gaya aadmi-hindi poem

लोगों की संवेदनाऐं मर गयी हैं
इसलिये किसी को दूसरे का दर्द
तड़पने के लिये मजबूर नहीं कर पाता है।

निगाहों ने खो दी है अच्छे बुरे की पहचान
अपने दुष्कर्म पर भी हर कोई
खुद को साफ सुथरा नज़र आता है।

उदारता हाथ ने खो दी है इसलिये
किसी के पीठ में खंजर घौंपते हुए नहीं कांपता,
ढेर सारे कत्ल करता कोई
पर खुद को कातिल नहीं पाता है।

जीभ ने खो दिया है पवित्र स्वाद,
इसलिये बेईमानी के विषैले स्वाद में भी
लोगों में अमृत का अहसास आता है।

किससे किसकी शिकायत करें
अपने से ही अज़नबी हो गया है आदमी
हाथों से कसूर करते हुए
खुद को ही गैर पाता है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, May 2, 2010

समाज सेवा और अपराध-हिन्दी क्षणिकायें (social service and crime-hindi short poem)

समाज सेवा शुरु करने से पहले
कोई न कोई अपराध करना जरूरी है,
लोग देते हैं डर कर चंदा
कभी नहीं पड़ता धंधे में मंदा,
घी निकालने के लिये टेढी उंगली की तरह
चलना आजकल की मजबूरी है।
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नैतिकता की बातें करते वह लोग,
दौलत पाने की चाहत का लगा जिनको रोग।
सिमट गया है शिखर पुरुषों का दायरा
वाद और नारों के इर्दगिर्द,
खुद हो गये हैं सफेदपोश
काले करनामों अंजाम दे रहे उनके शागिर्द,
लोगों को त्याग करने की क्या प्रेरणा देंगे
अपने लिये जुटा रहे ढेर सारे भोग।
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दुःख इस बात का नहीं कि
वह अपने वादे से मुकर गये,
तकलीफ इस बात ये हुई,
वह अपना यकीन हमारे यहां खो गये।
चेहरे पर नकाब पहनकर धोखा देते तो
कोई बात नहीं थी,
पर हमारे अरमान का कत्ल कर
वह झूमकर नाचे
जैसे खुद शहंशाह हो गये।
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Monday, March 29, 2010

शब्द और गणित-हिन्दी व्यंग्य कविता (word and mathmatics-hindi vyangya kavita)

उपदेश देते हुए उनकी
जुबान बहुत सुहाती हैं,
और बंद कमरे में उनकी हर उंगली
चढ़ावे के हिसाब में लग जाती है।
किताबों में लिखे शब्द उन्होंने पढ़े हैं बहुत
सुनाते हैं जमाने को कहानी की तरह
पर अकेले में करते दौलत का गणित से हिसाब
लिखने में कलम केवल गुणा भाग में चल पाती है।
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अपनी भाषा छोड़कर
कब तक कहां जाओगे,
किसी कौम या देश का अस्त्तिव
कभी भी मिट सकता है
परायी भाषा के सहारे
कहां कहां पांव जमाओगे।
दूसरों के घर में रोटी पाने के लिये
वैसी ही भाषा बोलने की चाहत बुरी नहीं है
दूसरा घर अकाल या तबाही में जाल में फंसा
तो फिर तुम कहां जाओगे।
अपनी भाषा तो नहीं आयेगी तब भी जुबां पर
फिर दूसरे घर की तलाश में कैसे जाओगे।
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Sunday, March 14, 2010

वह सिकंदर कहलायेगा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (vah sikandar kahlayega-hindi satire poem)

खतरा है जिनसे जमाने को
उनके घर सुरक्षा के पहरे लगे हैं,
लोगों के दिन का चैन
और रात की नींद हराम हो जाती जिनके नाम से
उनके घर के दरवाजे पर पहरेदार, चैबीस घंटे सजे हैं।
कसूरवारों को सजा देने की मांग कौन करेगा
लोग बेकसूर ही सजा होने से डरने लगे हैं।
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बाजार में जो महंगे भाव बिक जायेगा,
वही जमाने में नायक कहलायेगा।
जब तक खुल न जाये राज
कसूरवार कोई नहीं कहलाता,
छिपायेगा जो अपनी गल्तियां
वही सूरमा कहलायेगा।
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इंसान कितना भी काला हो चेहरा
पर उस पर मेअकप की चमक हो,
चरित्र पर कितनी भी कालिख हो
पर उसके साथ दौलत की महक हो,
वह शौहरत के पहाड़ पर चढ़ जायेगा।
बाजार में बिकता हो बुत की तरह जो इंसान
लाचार हो अपनी आजाद सोच से भले
पर वह सिकंदर कहलायेगा।

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Thursday, March 11, 2010

अहसास और सोच-हिन्दी व्यंग्य कविता (ahsas aur soch-hindi vyangya kavita)

देखते हैं घर की सजावट
दिल का प्यार नहीं देखते,
थाली में सजे व्यंजन पर है नज़र
सांसों की धड़कन में पल रहे
जज़्बात नहीं देखते।
इंसानी बुतों की दिल्लगी में
ढूंढ रहा है पूरा जमाना
कोई ख्वाबी जन्नत
हकीकत के इंसान नहीं देखते।
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अपने दिमाग पर उठाये बोझ
घूम रहे हैं लोग,
पल रहा है तनावों का रोग,
चल रही है दुनियां अपने आप
पर खुद पर टिके होने का अहसास सभी ने पाला।
सिकुड़ गये हैं लोगों के कदम
अपने मतलब की मंजिल तक
उससे आगे लगा है सोच पर ताला।
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Sunday, June 28, 2009

पकाना रोटी और खबर का-हास्य व्यंग्य कविता (roti aur khabar-hasya kavita)

बोरवेल का ढक्कन खुला देख कर
सनसनी खबर की तलाश में भटक रहे
संवाददाता ने कैमरामेन से कहा
^रुक जाओ यहाँ
लगता है अपनी सनसनीखेज खबर पक रही है
अपनी टांगें वैसे ही थक रही है.

पास से निकल रहा चाय की रेहडी वाला भी रुक गया
और बोला
^साहब अच्छा हुआ!
आज अतिक्रमण विरोधी अभियान कि वजह से
मैं दूसरी जगह ढूंढ रहा था
आपके शब्द कान में अमृत की तरह पड़े
अब रुक यही जाता हूँ
आपको छाया देने के लिए
प्लास्टिक की चादर लगाकर
बैठने के लिए बैंच बिछाता हूँ
भगवान् ने चाहा तो दोनों का
काम हो जाएगा
कोई बदकिस्मती से गिरा इस गड्ढे में
तो लोगों का हुजूम लग जाएगा
आपकी सनसनीखेज खबर के साथ
मेरी भी रोटी पक जायेगी
अगर आप बोहनी कराओ तो अच्छा
इसके लिए सुबह से मेरी आँखें तक रही हैं.
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नोट-यह व्यंग्य कविता काल्पनिक है तथा किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है. कोई संयोग हो जाये तो यह महान हास्य कवि उसके लिए जिम्मेदार नहीं है.


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Tuesday, October 21, 2008

मुफ्त में जुर्म सहती जाना-हास्य कविता

सास ने बहू से कहा
'तुम्हें आज मायके जाने की अनुमति
पर शाम ढलने से पहले घर लौट आना
तेरे ससुर और पति से तेरे जाने की
ख़बर छुपाये रखूँगी
उनके आने से पहले नहीं आई
तो दोनों नाराज होंगे
पडेगा तुम्हें पछताना
हाँ, मेरे लिए कोई तोहफा
जरूर लाना'
बहू बिचारी शाम से पहले वापस आयी
साथ में सास के लिए साड़ी भी लाई
पर सास को साड़ी पसंद नही आयी
और जोर से किया चिल्लाना शुरू
'कैसे कंगाल घर की हैं
इतनी सस्ती साड़ी लाई
ज़रा भी शर्म नहीं आयी
पता नहीं कौनसे मुहूर्त में
इसका रिश्ता अपने बेटे के लिए माना'

बेटा और पति के घर लौटने तक
उसने मचा रखा कोहराम
नहीं करने दिया बहु को आराम
घर में उनके घुसते उसने
उनको दी शिकायत
बहु को कोसने में नहीं की किफायत
ससुर ने बहु से कहा
'बेटी नए जमाने की हो
पर बदला नहीं है ज़माना
तुमने अभी सास-बहु के
रिश्ते को नहीं जाना
कभी तुम सास को खुश नहीं कर सकती
चाहे लाख जतन कर लो
इसलिए कभी सास के लिए कुछ नहीं लाना
अपने पिता का खर्चा करा कर भी झेलने से
तो अच्छा है मुफ्त में सास के जुर्म सहती जाना'
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Wednesday, September 19, 2007

विचारों का धंधा

एक विचारक पहुंचा दूसरे के पास
और बोला
'यार आजकल कोई
अपने पास नहीं आता है
हमसे पूछे बिना यह समाज
अपनी राह पर चला जाता है
हम अपनी विचारधाराओं को
लेकर करें जंग
लोगों के दिमाग को करें तंग
ताकि वह हमारी तरफ आकर्षित हौं
और विद्वान की तरह सम्मान करें
नहीं तो हमारी विचारधाराओं का
हो जायेगा अस्तित्व ही खत्म
उसे बचने का यही रास्ता नजर आता है'

दूसरा बोला
'यार, पर हमारी विचारधारा क्या है
यह मैं आज तक नहीं समझ पाया
लोग तो मानते हैं विद्वान पर
मैं अपने को नही मान पाया
अगर ज्यादा सक्रियता दिखाई
तो पोल खुल जायेगी
नाम बना रहे लोगों में
इसलिये कभी-कभी
बयानबाजी कर देता हूँ
इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं आता है'

विचारक बोला
'कहाँ तुम चक्कर में पड़ गये
विचारधाराओं में द्वंद में भला
सोचना कहाँ आता है
लड़कर अपनी इमेज पब्लिक में
बनानी है
बस यही होता है लक्ष्य
किसी को मैं कहूं मोर
तो तुम बोलना चोर
मैं कहूं किसी से बुद्धिमान
तुम बोलना उसे बैईमान
मैं बजाऊँ किसी के लिए ताली
तुम उसके लिए बोलना गाली
बस इतने में ही लोगों का ध्यान
अपने तरफ आकर्षित हो जाता है'

दूसरा खुश होकर उनके पाँव चूने लगा
और बोला
'धन्य जो आपने दिया ज्ञान
अब मुझे अपना भविष्य अच्छा नजर आता है'

विचारक ने अपने पाँव
हटा लिए और कहा
'यह तो विचारों के धंधे का मामला है
सबके सामने पाँव मत छुओ
वरना लोग हमारी वैचारिक जंग पर
यकीन नहीं करेंगे
मुझे तो लोगों को भरमाने में ही
अपना हित नजर आता है।

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