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Tuesday, December 29, 2009

धोखे की कहानी-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (dhokhe ki kahani-hindi vyangya kavitaen)

यह पेज
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उन्होंने धोखा दिया

इस पर क्यों अब आसू बहाते हो?

अपनों से ही होता है धोखा

दुनियां का यह कायदा क्यों भूल जाते हो।

उनके वादे पर रख दिया

अपना सारा सामान उनके घर,

कोई सबूत नहीं था

उनकी ईमानदारी का

यकीन किया तुमने उन पर मगर,

अपने बेबुनियाद विश्वास को छिपाकर

उनके धोखे की कहानी

पूरे जमाने को क्यों सुनाते हो।

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उनको महल में पहुंचा दिया

इस विश्वास पर कि

वह हमारी झौंपड़ी सजा देंगे।

यह नहीं सोचा

वह भी इंसान है हमारी तरह

याद्दाश्त उनकी भी कमजोर है

वहां मुद्दत बाद  मिले सुख में

अपने भी भूल जायेंगे दुःख के दिन

हमारे कैसे याद करेंगे।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Friday, July 3, 2009

आशिक, माशुका और महबूब-हास्य कविता (ashiq, mashuka & mahboob-hasya kavita)

श्रृंगार रस का कवि
पहुंचा हास्य कवि के पास
लगाये अच्छी सलाह की आस
और बोला
‘यार, अब यह कैसा जमाना आया
समलैंगिकता ने अपना जाल बिछाया।
अभी तक तो लिखी जाती थी
स्त्री पुरुष पर प्रेम से परिपूर्ण कवितायें
अब तो समलिंग में भी प्रेम का अलख जगायें
वरना जमाने से पिछड़ जायेंगे
लोग हमारी कविता को पिछड़ी बतायेंगे
कोई रास्ता नहीं सूझा
इसलिये सलाह के लिये तुम्हारे पास आया।’

सुनकर हास्य कवि घबड़ाया
फिर बोला-’‘बस इतनी बात
क्यों दे रहे हो अपने को ताप
एकदम शुद्ध हिंदी छोड़कर
कुछ फिल्मी शैली भी अपनाओ
फिर अपनी रचनायें लिखकर भुनाओ
एक फिल्म में
तुमने सुना और देखा होगा
नायक को महबूबा के आने पर यह गाते
‘मेरा महबूब आया है’
तुम प्रियतम और प्रियतमा छोड़कर
महबूब पर फिदा हो जाओ
चिंता की कोई बात नहीं
आजकल पहनावे और चाल चलन में
कोई अंतर नहीं लगता
इसलिये अदाओं का बयान
महबूब और महबूबा के लिये एक जैसा फबता
कुछ लड़के भी रखने लगे हैं बाल
अब लड़कियों की तरह बड़े
पहनने लगे हैं कान में बाली और हाथ में कड़े
तुम तो श्रृंगार रस में डूबकर
वैसे ही लिखो समलैंगिक गीत कवितायें
जिसे प्राकृतिक और समलैंगिक प्रेम वाले
एक स्वर में गायें
छोड़े दो सारी चिंतायें
मुश्किल तो हमारे सामने है
जो हास्य कविता में आशिक और माशुका पर
लिखकर खूब रंग जमाया
पर महबूब तो एकदम ठंडा शब्द है
जिस पर हास्य लिखा नहीं जा सकता
हम तो ठहरे हास्य कवि
साहित्य और भाषा की जितनी समझ है
दोस्त हो इसलिये उतना तुमको बताया।

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Sunday, October 12, 2008

जुबान का खेल है यह ज़िन्दगी-व्यंग्य कविता

तुम्हारे मुख से निकले कुछ
प्रशंसा के कुछ शब्द
किस तरह लुभा जाते हैं
जो तुम्हे करते हैं नापसंद
वही तुम्हारे प्रशंसक हो जाते

जुबान का खेल है यह जिन्दगी
कर्ण प्रिय और कटु शब्दों से
ही रास्ते तय हो पाते हैं
जो उगलते हैं जहर अपने लफ्जों से
वह अपने को धुप में खडे पाते
जिनकी बातों में है मिठास
वही दोस्ती और प्यार का
इम्तहान पास कर
सुख की छाया में बैठ पाते

जिन्होंने नहीं सीखा लफ्जों में
प्यार का अमृत घोलना
रूखा है जिनका बोलना
वह हमेशा रास्ते भटक जाते
उनके हमसफर भी अपने
हमदर्द नहीं बन पाते हैं
चुनते हैं भाषा से शब्दों को
फूल की तरह
लुटाते हैं लोगों पर अपनों की तरह
गैरों से भी वह हमदर्दी पाते
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