Tuesday, June 30, 2015

खुशी पैसे से ही आती है-हिन्दी व्यंग्य कविता(khushi paise se hi aatee hai-hindi satire poem)

पेड़ पौद्यों से होता है
स्वच्छ वातावरण
मगर दिल में खुशहाली
पैसे से ही आती है।

अच्छी बातों से 
नहीं भरता पेट
रोटी पैसे से ही आती है।

कहें दीपक बापू गुड़ नहीं  देते
मगर उस जैसी बात
कहने का जिम्मा भी नहीं लेते
इतनी ताकत उनमे
पैसे से ही आती है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Thursday, June 25, 2015

जिंदगी का दर्शन-हिन्दी कविता(zindagi ka darshan-hindi poem)

सफर में ढेर सारे
वादे करते रहो
मंजिल पाते ही भूल जाओ।

पीछे छूटे हमराही
सवाल करने नहीं आते
अपने मुख से निकले शब्द
दिल के न शूल बनाओ।

कहें दीपक बापू जिंदगी का दर्शन
जो समझा वह तर गये
फरेबों की सौगात बांटी
उनके घर दौलत से भर गये
सच की राह कांटो से भरी है
झूठ के पैर नहीं होते
साथ लेते उनके पांव
जमीन पर नहीं होते
तुम भी चाहो उसकी
गोद मे झूल जाओ।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Friday, June 19, 2015

खंडहर हो चुके ख्याल-हिन्दी कविता(khandahar ho chuke khayal-hindi poem)


पुरानी किताबों में लिखे
शब्दों के अर्थ का व्यापार
वह चमका रहे हैं।

स्वर्ग का सौदा करते
बंदों में सर्वशक्तिमान के दलाल बनकर
 नरक के भय से
वह धमका रहे हैं।

कहें दीपक बापू सांसों से
लड़खड़ाते बूढ़े हो चुके चेहरे
इंसानों में पुराने होने के भय से
खंडहर हो चुके ख्यालों को
नया कहकर चमका रहे हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Saturday, June 13, 2015

कूड़े पर क्षणिकायें(short poem on kuda)

सर्वशक्तिमान के दरबार में
अब वह हाजिरी नहीं लगायेंगे,
कूड़े के इर्द गिर्द झाड़ू 
झंडे की तरह लहराकर
प्रतिष्ठा का दान पाकर
शिखर पर चढ़ जायेंगे।
----------------

शहर में कचरा बहुत
उम्मीद है कोई तो आकर
उसे हटायेगा।
कभी अभियान चलेगा
स्वच्छता का
कोई तो झाड़ू झंडे की तरह
लहराता आयेगा।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Wednesday, June 10, 2015

व्यक्ति वस्तु और विषयों पर योग दृष्टि से विचार करना जरूरी-21 जून 2015 को विश्व योग दिवस पर विशेष हिन्दी लेख(vyakti vastu aur vishayon par yoga drishti se vichar karna jaroori-A Hindi article on world yaga day or yog diwas on 21 june 2015A new post on yoga day)


       पूरे विश्व में 21 जून को योग दिवस मनाया जा रहा है। इसका प्रचार देखकर ऐसा लगता है कि योग साधना के दौरान किये जाने वाले आसन एक तरह से ऐसे व्यायाम हैं जिनसे बीमारियों का इलाज हो जाता है।  अनेक लोग तो योग शिक्षकों के पास जाकर अपनी बीमारी बताते हुए दवा के रूप में आसन की सलाह दवा के रूप में मांगते हैं।  इस तरह की प्रवृत्ति योग विज्ञान के प्रति  संकीर्ण सोच का परिचायक है जिससे उबरना होगा।  हमारे योग दर्शन में न केवल देह वरन् मानसिक, वैचारिक तथा आत्मिक शुद्धता की पहचान भी बताई जाती है जिनसे जीवन आनंद मार्ग पर बढ़ता है।
पातञ्जलयोग प्रदीप में कहा गया है कि
-----------------------अनित्यशुचिदःखनात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या।।

हिन्दी में भावार्थ-अनित्य, अपवित्र, दुःख और जड़ में नित्यता, पवित्रता, सुख और आत्मभाव का ज्ञान अविद्या है।
         आज भौतिकता से ऊबे लोग मानसिक शांति के लिये कुछ नया ढूंढ रहे हैं।  इसका लाभ उठाते हुए व्यवसायिक योग प्रचारक योग को साधना की बजाय सांसरिक विषय बनाकर बेच रहे हैं। हाथ पांव हिलाकर लोगों के मन में यह विश्वास पैदा किया जा रहा है कि वह योगी हो गये हैं। पताञ्जलयोग प्रदीप के अनुसार  योग न केवल देह, मन और बुद्धि का ही होता है वरन् दृष्टिकोण भी उसका एक हिस्सा है। किसी वस्तु, विषय या व्यक्ति की प्रकृृत्ति का अध्ययन कर उस पर अपनी राय कायम करना चाहिये। बाह्य रूप सभी का एक जैसा है पर आंतरिक प्रकृत्तियां भिन्न होती हैं। आचरण, विचार तथा व्यवहार में मनुष्य की मूल प्रकृत्ति ही अपना रूप दिखाती है। अनेक बार बाहरी आवरण के प्रभाव से हम किसी विषय, वस्तु और व्यक्ति से जुड़ जाते हैं पर बाद में इसका पछतावा होता है। हमने देखा होगा कि लोहे, लकड़ी और प्लास्टिक के रंग बिरंगे सामान बहुत अच्छे लगते हैं पर उनका मूल रूप वैसा नहीं होता जैसा कि दिखता है। अगर उनसे रंग उतर जाये या पानी, आग या हवा के प्रभाव से वह अपना रूप गंवा दें तब उन्हें देखने पर अज्ञान की  अनुभूति होती है।  अनेक प्रकार के संबंध नियमित नहीं रहते पर हम ऐसी आशा करते हैं। इस घूमते संसार चक्र में हमारी आत्मा ही हमारा साथी है यह सत्य ज्ञान है शेष सब बिछड़ने वाले हैं। हम बिछड़ने वाले व्यक्तियों, छूटने वाले विषयों और नष्ट होने वाली वस्तुंओं में मग्न होते हैं पर इस अज्ञान का पता योग चिंत्तन से ही चल सकता है। तब हमें नित्य-अनित्य, सुख-दुःख और जड़े-चेतन का आभास हो जाता है।
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Friday, June 5, 2015

अंग्रेजी की धारा-हिन्दी कविता(angreji ki dhara-hindi poem)

ज्ञान के प्रज्जविलत
दीपक के प्रकाश से
वैभवशाली डर जाते हैं।

अज्ञान के अंधेरे में
फंसे लोगों का भटकता मन
बहलाने से उनके घर भर जाते हैं।

कहें दीपक बापू संस्कृत से
हिन्दी तक भरा अक्षुण्ण ज्ञान,
धारण हो जाये
सोना लोहा लगता एक समान,
सौदागर उठा लाये
अंग्रेजी की अंधेरी धारा
जिसमें उनके सौदे तर जाते हैं।
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Saturday, May 30, 2015

कंपनी दैत्य का प्रसाद-हिन्दी कविता(kanpany daitya ka prasad-hindi poem)


भोजन जल्दी खाना है
या पकाना
पता नहीं
मगर जहर तो न पकाओ।

दुनियां में अधिक खाकर
आहत होते हैं लोग
भूख से मरने का
भय दिल में न लाओ।

कहें दीपक बापू जिंदगी में
पेट भरना जरूरी है
जहर खायेंगे
यह भी क्या मजबूरी है
घर की नारी के हाथ से बने
भोजन के मुकाबले
कंपनी दैत्य के विषैले
चमकदार लिफाफे में रखे
प्रसाद को कभी अच्छा न बताओ।
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Sunday, May 24, 2015

स्वर्ग का सपना-हिन्दी व्यंग्य कविता(swarga ka sapana-hindi satire poem)

जमीन पर पैदा
फरिश्तों का समूह
पिछड़ेपन का अंधेरा छांटेगा।


विकास के बादल
साथ लिये
दौलत पानी की तरह
गरीबों में बांटेगा।

कहें दीपक बापू सपनों का स्वर्ग
धरती पर उतर आयेगा,
रौशनी इतनी होगी
आंखों में अंधेरा छायेगा,
हर कसूर माफ होगा
गलती पर कोई नहीं डांटेगा।
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Monday, May 18, 2015

ज़माने के अंतद्वंद्व-हिन्दी कविता(zamane ke antardwandwa-hindi poem)


कुछ लोगों के घर
अन्न और धन के भंडार से
इसलिये भर जाते क्योंकि
धरती पर कुछ लोग भूखे हैं।

अमीर लोग नहा रहे
रोज शाम इसलिये शराब में
क्योंकि कुछ लोगों  के गले
हमेशा प्यास से सूखे हैं।

कहें दीपक बापू प्रेम की धारा
इसलिये प्रवाहित कर रहे हैं
पेशेवर समाज सेवक
क्योंकि अपनी हालातों से
जूझते लोग दिल से रूखे हैं।
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Sunday, May 10, 2015

जज़्बातों कातिल बन जाते पहरेदार-हिन्दी कविता(jazbaton ke quatil ban jate paharedar-hindi poem)


सपना सभी का होता है
मगर राज सिंहासन तक
चतुर ही पहुंच पाते हैं।

बादशाहों की काबलियत पर
सवाल उठाना बेकार हैं
दरबार में उनकी
अक्लमंद भी धन के गुलाम होकर
सलाम बजाने पहुंच जाते हैं।

कहें दीपक बापू इंसानों ने
अपनी जिंदगी के कायदे
कुदरत से अलग बनाये,
ताकतवरों ने लेकर उनका सहारा
कमजोरों पर जुल्म ढहाये,
हुकुमतों के गलियारों में
जज़्बातों के कातिल भी पहरेदारी
करने पहुंच जाते हैं।
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Monday, May 4, 2015

हिन्दी के पतन की आशा या आशंका-हिन्दी लघु व्यंग्य(hindi ka patan ki asha ya ashanka-hindi short satire)

एक टीवी चैनल पर एक उद्घोषक ने कहा-‘‘नेपाल में उम्मीद से कहीं अधिक नुक्सान हुआ है।’’
नुक्सान की कभी उम्मीद या आशा नहीं होती वरन् डर या आशंका होती है। किसी घटना के होने की संभावना या अनुमान होता है। इस संभावना को भी आशा या उम्मीद नहीं कहा जा सकता।  ऐसा लगता है कि टीवी चैनलों ने हिन्दी भाषियों पर विज्ञापन थोपकर पैसा कमाने की ऐसी प्रवृत्ति घर कर गयी है कि उन्हें भाषा के मूल शब्दों का अर्थ और भाव ही नहीं मालुम। हमें उन पर तरस नहीं आता क्योंकि वह तो पैसा कमा रहे हैं। हमारे यहां कमाने के हजार खून माफ हैं। अफसोस इस बात का है कि बहसों के समय ऐसे शब्द आते हैं और कोई विद्वान उन्हें टोकता नहीं है-शायद डरते हैं कि कहीं उन्हें बुलाना न बंद कर दिया जाये।
मुश्किल यह है कि हमें समाचार सुनने की बीमारी बचपन से लगी है। उस पर भाषा ज्ञान लकवाग्रस्त है। कहीं से कोई ऐसा शब्द जो भाव के विपरीत हो सहन नहीं हो पाता। हिन्दी भाषा का श्रवण हो या पाठन धारा प्रवाह में जब कोई शब्द भाव से विपरीत होता है तो मस्तिष्क ठहर जाता है। हमें तो हिन्दी से कमाने वालों से यह आशंका लगने लगी है कि कहीं वह ऐसा हाल न कर दें कि कहीं ऐसी घटनायें सामने न आने लगें जो अर्थ का अनर्थ कर दें। कैसे?
कहीं किसी अस्पताल में किसी सामूहिक दुर्घटटना पर घायल भर्ती हों और उद्घोषक पूछें कि-अस्पताल में भर्ती घायलों के  क्या हाल है?’’
जवाब मिले-‘‘ठीक है, कई गंभीर हैं। उनका इलाज चल रहा है अब उनमें से किसी के भी  परमधाम गमन की कोई आशा नहीं है।’’
संभव है कि आगे चलकर समाज से आशंका और डर शब्द ही गायब हो जायें और अपने घर के बीमार लोगों पर लोग ऐसी बातें कहने लगें। यह सोचकर हमें हिन्दी के पतन की आशंकायें लगती हैं। उन्नति की आशा समाप्त होती नज़र आती है।
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Tuesday, April 28, 2015

वही जीते जिंदगी-हिन्दी कविता(vahi jeete zindagi-hindi poem)


जिंदगी की सासें
कब तक उखड़ेंगी
तय नहीं है

कभी हादसे कभी खुशियां
समय की चाल में
लय नहीं है।

कहें दीपक बापू जिंदा दिली से
वही जीते जिंदगी
जिनके दिल में कोई भी
भय नहीं है।
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Wednesday, April 22, 2015

कोई दिल टूट न जाये-हिन्दी व्यंग्य कविता(koyee dil toot n jaye-hindi satire poem)

पूछते है लोग
तुम दिल पर कोई
रचना क्यों नहीं लिखते।

इश्क के अफसाने
इतने होते जहां में
क्या वह तुम्हें नहीं दिखते।

कहें दीपक बापू दिल ठहरा सौदागर
कभी किसी के जिस्म पर
जज़्बात छिड़कता है,
किसी सामान की किस्म पर
लात थिरकता है,
सर्वशक्तिमान के रूप भी
विज्ञापन के प्रचलन से
चुनता है,
चाहिये जहां भंवर से
पार होने के लिये सत्य की नाव
वह भ्रम के जाल बुनता है,
लोगों के जिस्म का
सबसे ताकतवर अंग दिल
कमजोरी का शिकार होता
कोई टूट न जाये
इसलिये उस पर कोई
व्यंग्य हम नहीं लिखते।

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Wednesday, April 8, 2015

नकल मार्ग का राहगीर तो नहीं-हिन्दी कविता(nakal marga ka rahgir to nahin-hindi poem)


अब तो काबिल इंसान पर भी
यह सोचकर शक होता है कि
वह नकली तो नहीं।

नकली उपाधियां भी
शिक्षा के बाज़ार मे बिकतीं
गुरु बदल देते
परीक्षा के समय
चेले की शक्ल भी कहीं।

कहें दीपक बापू समस्याओं से
नहीं लगता लोगों को अब डर
घबड़ाते हैं यह सोचकर
इलाज के लिये चिकित्सक
पढ़ाने के लिये शिक्षक
बचाने के लिये रक्षक
नकली मार्ग से
गुजरकर आया राहगीर तो नहीं।
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Friday, April 3, 2015

गम भुलाने के बहाने भी लूट लेते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता(gam bhulane ke bahane bhi dhoondh lete hain-hindi satire poem)


अपने अपने भाग्य का
हिस्सा  सभी बड़े मजे से
लूट लेते हैं।

सर्वशक्तिमान की कृपा हो तो
अपने काम से बचने की भी
छूट लेते हैं।

कहें दीपक बापू अधिकार पर
सभी दावा करते हैं,
अपने कर्तव्य की बात से
बेहद डरते हैं,
अमीरों का दबदबा ऐसा
सर्वशक्तिमान के दरबार में दर्शन
मयखानों में मय पीने के लिये
गरीबों के गम भुलाने के बहाने भी
लूट लेते हैं।
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Sunday, March 29, 2015

आप और हम-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(aap aur hum-hindi satire poem's)

सड़क से राजमहल में
जिन्होंने पहुंचा दिया
उनकी शिकायत
अब वह कर रहे हैं।

कहार बनकर
उठाये थे दर्द का बोझ
उनसे ही हिकारत
अब वह कर रहे हैं।

कहें दीपक बापू जिंदगी के खेल में
मतलब के हिसाब से
रिश्त बनते और बिगड़ते
साथी सिंहासन तक के होते
कारिंदों पर नज़रे इनायत
अब वह कर रहे हैं।
------------
गम क्यों करते हो
तुमने अगर मंजिल तक
जिन्हें पहुंचाया
अब वह मुंह फेर रहे हैं।

पहले अपना दर्द
तुम्हें भेंट कर
उन्होंने हमदर्दी बटोर ली
अब तो पेशेवर कारिंदे
 उनको घेर रहे है।

कहें दीपक बापू ज़माने पर
रोना बेकार है
सड़क पर क्यों कोई
आराम पायेगा
राजमहल में पहुंचे
लोगों के पास भी
बेचने के लिये दर्द के
सौदे ढेर रहे हैं।

------------
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Tuesday, March 24, 2015

खिलौनो का खिलवाड़-हिन्दी कविता(khilono ka khilwad-hindi poem)




अब पुराने मकान
नयी इमारत में
अपना रूप बदल रहे हैं।

धरती से निकली गैस
आकाश में करती छेद
सूरज की आग से गर्माते शहर
अपना रूप बदल रहे हैं।

कहें दीपक बापू इंसानों पर
पत्थर और लोहे के
रंगबिरंगे टुकड़ों से
खेलने का नशा छाया
दिल बहलाने वाले खिलौने
खिलवाड़ करने के लिये
अपना रूप बदल रहे हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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