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Friday, January 23, 2015

बहार के लिये तरसायेंगे-बसंत पंचमी पर हिन्दी कविता(bahaar ke liye tarsayeng-basant panchami par hindi poem)



बसंत में भी वह
बहार के लिये
ज़माने को तरसायेंगे।

कर ली दुनियां मुट्ठी में
फिर भी बैचेन हैं
यह सोचकर कि
बहती प्राकृतिक हवा पर
कब नियंत्रण पायेंगे।

कहें दीपक बापू उनकी जुबां से
खूबसूरत शब्द
बहते चले आते ,
हर बार कोई
नया वादा साथ लातें,
रोज का यह चलन हो गया है
हम भी हर बार ताली बजायेंगे।
-------------------

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Sunday, January 4, 2015

विरोधी की सेवा कर चुके व्यक्ति पर नज़र रखना चाहिये-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन लेख(A Hindu hindi article based on kautilya economics)





            पोरंबदर के जलक्षेत्र में भारतीय समुद्री रक्षकों ने एक नाव को रोकने का प्रयास किया तो उसमें बैठे सवारों ने आत्मघाती कदम उठाते हुए अपना ही जलयान उड़ा दिया। कहा जा रहा है कि यह घटना पड़ौसी देश का भारत के विरुद्ध छद्मयुद्ध के रूप में आतंकवादी गतिविधियां चलाने का एक भाग थी।  अभी इस घटना की जांच चल ही रही है पर कुछ भारतीय पत्रकारों ने अपनी ही सेना पर शंका जाहिर करते हुए इस नाव पर तस्करों या मछुआरों के सवार होने और उनके  मारे जाने की बात कही जा रही है। पड़ौसी देश तो पहले ही नहीं मान रहा था कि उसने कोई कोई आतंकी नाव भेजी है पर कुछ भारतीय बुद्धिमानों भी एक तरह से उसकी हां में हां मिलाकर विश्व जनमानस में संदेह फैला दिया।  एक बुद्धिमान तो इतना आगे बढ़ गया कि उसने कहा कि कहीं इस पर मछुआरे हुए तो पड़ौसी देश भी हमारे ही मछुआरों पर हमला कर सकता है।  उसके बयान के 12 घंटे बाद ही पड़ौसी देश ने दो भारतीय नावें पकड़ ली जिसमें 24 मछुआरे शामिल थे।  ऐसे में यह सवाल किसी के मन में आ सकता है कि क्या उस बुद्धिमान ने इस तरह का संदेश कहीं पड़ौसी देश तक तो नहीं पहुंचाया कि वह इस तरह बदले की कार्यवाही करे।  हम उस बुद्धिमान पर आक्षेप नहीं कर रहे पर कभी कभी यह लगता है कि बौद्धिक क्षेत्र में अनेक लोग ऐसे हैं जो अपने ही देश के विरुद्ध सक्रिय दिखते हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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अकारणादेव हि कारणद्वा व एव कश्वित्पुरुषोऽरिसेवी।
निजश्वविशिलष्टउपेतशस्त्र आयाति यस्तस्य गर्ति प्रपश्येत्।।
            हिन्दी में भावार्थ-अकारण या किसी कारण से जो शत्रु की सेवा कर चुका हो अगर वह फिर से वापस आकर अपने साथ मिले तो उस नज़र रखना ही चाहिये।

            हमारे देश में लोकतंत्र है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का देश की प्रतिष्ठा धूल में मिलाने के लिये में उसका उपयोग किया जाये। निष्पक्ष दिखने की ख्वाहिश भी इस तरह के समाचारों पर आपत्तियां उठाने की प्रेरक हो सकती है पर इससे देश की सेना के मनोबल पर पड़ सकता है इस पर ध्यान देना चाहिये।  सबसे बड़ी बात जो बुद्धिमान जलीय क्षेत्र में हुई इस घटना पर जिस तरह विश्लेषण कर रहे हैं उससे यह प्रश्न उठता है कि उनके पास सैन्य विषयों का अनुभव कितना है? प्रथ्वी और जल क्षेत्र में अंतर होता है। जल और थल सेना के काम करने के तरीके में भी अंतर होता है। प्रथ्वी के नियम जल क्षेत्र में नहीं चलतें। हमारे देश के बुद्धिमान इस घटना पर ऐसे बोल रहे हैं जैसे जमीन पर यह सब हुआ है।
            बहरहाल ऐसे लोग पर अन्य बुद्धिमान लोगों को नज़र रखना चाहिये।  हमारी जलसेना ने पहली बार आतंकवादी के विरुद्ध ऐसी कार्यवाही की है।  ऐसा माना जाता है कि भारत में समुद्री क्षेत्र से ही आतंकवादियों के अस्त्र शस्त्र और देश के युवाओं को तबाह करने के लिये मादक पदार्थ आते हैं।  इसलिये कहीं इस तरह के प्रचार से भारतीय जलसेना का मनोबल गिराने या उत्साहवर्द्धक सक्रियता की जगह भयवश निष्क्रियता में लगाने का प्रयास तो नहीं हो रहा-यह देखते रहना चाहिये।

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
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Monday, November 24, 2014

सच्चे भक्त बेपरवाह होते-हिन्दी कविता(sachche bhakta beparavah hote-hindi kavita)



संत के वेश में

ज्ञान के व्यापारी भी

भक्ति के बाज़ार में आते हैं,



दोहे श्लोक और गीत

निकलते वाणी से मधुर स्वर में

शब्द दान में बिक जाते हैं।



कहें दीपक बापू आम भक्त

तलाश करते संसार में

आंनद की तलाश,

ढोंगी हो या सिद्ध

झांकते नहीं किसी के  अंदर जाकर

जानते हैं जो सत्य पथ

अपनायेगा वही योगी

भोगी का होगा नाश,

पेशेवर चिंत्तकों की

परवाह नहीं

जो उनको मूर्ख समझते

कभी कभी बहस में

शुल्क लेकर सस्ते में बिक जाते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
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Thursday, November 6, 2014

पैसे का हिसाब कौन पूछता है-हिन्दी कविता(paise ka hisab kaun poochhta hai-hindi kavita)



कौन पूछता है उनसे
दिन में पैसे कमाने का हिसाब
जो रात को दोस्तों के लिये
जाम के साथ जश्न मनाते हैं।

बहकते लोग
मदहोश होकर भी
होशहवास के साथ
मेजबान की तारीफों के
श्रृंगार रस में नहाये
शब्द बरसाते हैं।

भूख और गरीबी की
चर्चा में व्यस्त हैं वह लोग
जिन्होंने कभी बदहाली देखी नहीं
पूछो सवाल तो
बताते उन इलाकों के नाम
जहां स्वयं कभी नहीं जाते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
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Thursday, October 30, 2014

जिंदगी में संकल्प का महत्व-हिन्दी कविता(zindagi mein sankalpa ka mahatva-hindi poem)



धरती पर गिरने का भय
आकाश में उड़ने का
संकल्प नहीं देता।

व्यवहार में निरंतरता का अभाव
रिश्ते से जुड़े रहने का
संकल्प नहीं देता।

कहें दीपक बापू संवेदनाओं से
शून्य हो चुके मनुष्य समाज में
जीवन के मार्ग पर
साथ चल रहे पथिक
लक्ष्य पर आते ही
मुंह फेर जाते हैं,
एकांत में खट्टी मीठी
स्मृतियों का ढेर ही
 पास लगा पाते हैं,
अपनी ही बाधाओं का दौर
किसी के मोह से जुड़ने का
संकल्प नहीं देता।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
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Friday, October 24, 2014

विदेश में क्रिकेट श्रृंखलां से पाक की संप्रभुता पर सवाल-हिन्दी लेख(test cricket series in dubai between australia and pakistan, a quition on pak natinal integraty)




            पाकिस्तान अपने यहां खेली जाने वाले किक्रेट के परस्पर परीक्षण द्वंद्व श्रृंखला अपनी भूमि की बजाय दुबई तथा शारजाह में खेलता है।  इस समय आस्ट्रेलिया  के साथ उसका परस्पर परीक्षण द्वंद्व चल रहा है।  हमारे देश में इस पर ज्यादा चर्चा नहीं होती पर जिन लोगों को पाकिस्तान के आंतरिक विषयों में रुचि है उनके लिये यह कतई आश्चर्यजनक नहीं है।  पाकिस्तान वास्तव में भारत विरोधियों के मुखौटे से अधिक नहीं है। शायद भारत के रणनीतिकार इसे समझते हैं, इसलिये उसकी गीदड़ भभकियों  से विचलित नहीं होते।
            अनेक भारतीय नागरिक पकड़े तो मध्य एशिया देशों में जाते हैं पर उन्हें स्वदेश न भेजकर पाकिस्तान को सौंपा जाता है, ताकि वहां के शासक अपने भारत विरोध की भूख शांत कर सकें। ऐसा प्रचार माध्यमों से ही पढ़ा था।  इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय विरोधियों की पंक्ति का अग्रभाग है।  वास्तव में पाकिस्तान एक उपनिवेश ही है।  भारत से कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान मे मंत्रिमंडल की बैठक सऊदी अरब में हुई थी।  इससे यह भी साफ हो जाता है कि पाकिस्तान के शिखर पुरुष अपनी प्रजा को अपना नहीं समझते। उनका शासन न्यायपूर्ण नहीं है इसलिये अपने लोगों से ही भय खाते हैं।  अक्सर कहा जाता है कि पाकिस्तान के नेता जब अपने देश में डांवाडोल होते हैं तो भारत विरोधी बयान देते हैं ताकि जनता का क्रोध थमा रहे।  हम ऐसा नहीं मानते। लगता है कि पाकिस्तान के नेता संकट काल में अपनी पंक्ति के पीछे खड़े भारत विरोधी देशों को संदेश देते हैं कि अगर वह टूटे तो पूरी पंक्ति भारत के कोपभाजन का शिकार होगी।  अब तो भारतीय चैनलों पर पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों के विचार भी सामने आने लगे हैं।  वह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हम अपने धर्म का पूर्ण समर्थक न होने के कारण भारत का अस्तित्व सहजता से स्वीकार नहीं कर सकते।  यह अलग बात है कि भारतीय बुद्धिजीवी भी अपने देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप की बात कहकर चुप हो जाते हैं।  अपने देश के मूल धर्म के श्रेष्ठ होने की बात कहने का साहस किसी में नहीं है। पाकिस्तान को धर्म की वजह से ढेर सारे लाभ हैं इसलिये उसे सहजता से सहायता मिल रही है।
            पाकिस्तानी जनता को जो इतिहास पढ़ाया जाता है उसमें भारतीय धर्मों के प्रति घृणा पैदा करने वाली  जानकारी दी जाती है। बचपन से ही उनमें भारत विरोधी भावना भरी जाती है।  पाकिस्तान मध्य तथा पश्चिमी देशों का उपनिवेश रहा है यह अलग बात है कि आतंकवाद ने उसकी छवि खराब कर दी है।  उसके सहायक देश  भी उससे डरने लगे हैं पर भारत विरोधी की धुरी होने के कारण पाकिस्तान का अस्तित्व बनाये रखना चाहते हैं।  हालांकि पाकिस्तान नाम का देश है जिसकी सीमा पंजाब से बाहर नहीं है।  सिंध, बलूचिस्तान तथा सीमा प्रांत के निवासियों की पहचान पंजाब के प्रभाव के कारण खो गयी लगती है। ऐसे में पाकिस्तान के नेता अपने राष्ट्र की संप्रभुता की बात करते हैं तो हंसी ही आती है।  कम से कम उनके पास क्रिकेट के परस्पर परीक्षण द्वंद्व श्रृंखला दुबई में होने की बात कोई जवाब तो हो ही नहीं सकता।  कोई संप्रभु राष्ट्र कभी ऐसा कर ही नहीं सकता।
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Saturday, October 18, 2014

सफेद हाथी-हिन्दी कविता(safed hathi-hindi kavita, white elphant-hindi poem's)

सहज संबंध
बनाती है प्रकृति
लोग तो स्वार्थ से
साथी बन जाते हैं।

निकल जाता है काम
वही लोग फिर सामने
सफेद हाथी की तरह तन जाते हैं।

कहें दीपक बापू वफादारी अनमोल है
मगर बाज़ार में मिल जाती हैं,
निभाने वाले की औकात के हिसाब से
कीमत भी दिलाती है,
झूठ सस्ती शय है
उसके ग्राहक बहुत हैं,
ढोने वाले पाखंडी वाहक भी बहुत हैं,
सत्य का नाम लेकर
भ्रम बेचने के लिये
बाज़ार में सौदागर जम जाते हैं।
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Saturday, September 27, 2014

बीमारी में ज़माना रोज जिये-हिन्दी कविता(bimari mein zamana roj jiye-hindi poem)



अपने लिये ढूंढते हैं
फुर्सत के क्षण
ताकि दिल बहला सकें।

जिंदगी की जंग में
रोज होते लोग घायल
नहीं मिलता समय किसी को
ताकि दोस्तों के जख्म पर
हाथ फिराकर सहला सकें।

कहें दीपक बापू ढूंढ रहे दवा
सभी अपनी बीमारी के
इलाज के लिये,
मधुमेह, वायुविकार और
उच्च रक्तचाप के चंगुल में
ज़माना रोज जिये,
कोई नहीं मिलता
जिसकी मस्तिष्क की
धमनियों मे बचा हो
ताजेपन का अहसास
ताकि उसे उद्यानों में टहला सकें।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
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Sunday, September 21, 2014

ज्ञान किताबें और सत्य-हिन्दी कविता(gyan ke kitaben aur satya-hindi vyangya kavita)




उनके घर में
ज्ञान की बड़ी बड़ी किताबें
कीमती सामान की तरह पड़ी हैं।

भक्त का चोला ओढ़ा कभी
अब उनकी तस्वीर
शिष्यों के घर में दीवारों पर जड़ी हैं।

कभी वह स्वयं झुकाते थे
सर्वशक्तिमान के दरबार में
अब उनके दरवाजे पर
भक्तों की भीड़ खड़ी है।

कहें दीपक बापू अप्रकट ब्रह्म
अपने भक्त के हृदय में ही
प्रकट हो जाता है,
छद्म भक्ति में लगे पाखंडियों को
स्वयं ही सर्वशक्तिमान का
अवतार होने का मोह हो जाता है,
सत्य की दिखाते रूप
जपाते अपना सभी से
घर में माया बड़े रूप में
हमेशा उनके साथ
सहचरिणी की तरह खड़ी है।
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Monday, August 18, 2014

श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान और विज्ञान को समझना जरूरी-श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष हिन्दी लेख(shri madbhagwat geeta ke gyan aur vigyan ja samajhna jaroori-special hindi article on shri krishna janamashtami)



            आज पूरे देश में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनायी जा रही है। हमारे धार्मिक परंपराओं में भगवान श्रीराम तथा श्रीकृष्ण के चरित्र का बहुत बड़ा स्थान है। हमारे देश में इन दोनों की मान्यता का क्षेत्र इतना व्यापक है कि देश की भूगौलिक तथा एतिहासिक विभिन्नता का कोई प्रभाव इनकी लोकप्रियता पर नहीं पड़ता। हर जगह भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के नाम पर अनेक पर्व मनाये जाते हैं। उनका रूप भिन्न हो सकता है पर भक्तों की  आस्था या विश्वास में कोई अंतर नहीं रहता।  महाराष्ट्र में लोग हांडी फोड़ने के सामूहिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं तो वृंदावन में मंदिरों की उत्कृष्ट सजावट का दर्शन करने भक्तगण एकतित्र होते हैं। उत्तर भारत में कहीं भगवान के मंदिरों में छप्पन भोग सजते हैं तो कहीं भजन संगीत के कार्यक्रम होते हैं।
            जैसा कि श्रीमद्भागवत गीता में भक्तों के चार प्रकार -आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी-बताये गये हैं। जहां अन्य भक्त भगवान के रूप का चित्त में स्मरण करते हैं वहीं ज्ञानी और साधक उनके संदेशों पर चिंत्तन करते हैं। वृंदावन में उनकी बाल लीलाओं पर भक्त चर्चा करते हैं पर ज्ञान साधकों के लिये कुरुक्षेत्र के महाभारत युद्ध के दौरान उनकी भूमिका का चिंत्तन रोमांच पैदा करता है। जहां उन्होंने गीता के माध्यम से उस अध्यात्मिक ज्ञान की स्थापना की जो आज भी विद्वानों को आकर्षित करता है वही ज्ञान साधकों में जीवन में आत्मविश्वास से रहने की कला प्रदान की।  यह अलग बात है कि जिस श्रीमद्भावगत गीता के ज्ञान की शक्ति पर हमारा देश जिस श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान की वजह से विश्व का अध्यात्मिक गुरु कहलाया उसे पवित्र मानकर लोगों ने सजा तो लिया पर उसके ज्ञान को समझने का प्रयास कितने करते हैं यह अलग से सर्वेक्षण करने का विषय है।
            श्रीमद्भागवत् गीता में ज्ञान के साथ विज्ञान को भी अपनाने की बात कही गयी है। इसका मतलब साफ है कि व्यक्ति को संसार में होने वाले भौतिक परिवर्तनों तथा उत्पादित सामानों के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिये।  उसमें यह स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य यदि योगाभ्यास करे तो वह अत्यंत शक्तिशाली हो जाता है।  जैसा कि हम जानते हैं कि शक्तिशाली व्यक्ति में ही संयम और आत्मविश्वास होता है। जिस व्यक्ति में भय, संशय, और अज्ञान है वह स्वयं ही संकट में रहने के साथ ही दूसरों के लिये भी समस्या खड़ी करता है।
            हमने देखा है कि अक्सर कथित रूप से विभिन्न धर्मों की रक्षा करने वाले ठेकेदार अनेक प्रकार के खतरनाक उपाय करते हैं। इतना ही नहीं ऐसे लोग अपने समूहों को पहनावे, खान पान, रहन सहन और मनोरंजन के नाम पर कथित रूप से अश्लीलता, व्यसन, तथा अपराध से बचने के लिये प्रतिबंध के दायरे में लाने का प्रयास करते हैं।  उन्हें लगता है कि वह लोगों को पहनावे और खानपान के विषयों पर दबाव डालकर धर्म को बचा सकते हैं।  यकीनन वह अज्ञानी है। अज्ञान से भय और भय से क्रूरता पैदा होती है।   हम पूरे विश्व में धर्म के नाम पर जो हिंसक संघर्ष देख रहे हैं वह अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव का परिणाम है। इसका मतलब यह कथित धर्म रक्षक यह मानते हैं कि वह उनके समुदाय के लोग केवल देह से ही मनुष्य हैं और बुद्धि से उनको प्रशिक्षित करने का माद्दा धर्म के शाब्दिक प्रचार में हो ही नहीं सकता। वह इस संसार के गुण, कर्म और फल के आपसी संबंध को नहीं देख पाते।  उनके लगता है कि उनके धर्म समूह पर निंयत्रण केवल अस्त्र शस्त्र और दैहिक दंड से ही हो सकता है। सामान्य मनुष्य सीमित क्षेत्र में अपने परिवार के हितों तक ही सक्रिय रहता है जबकि  अतिवाद अपना क्षेत्र व्यापक कर प्रचार कर समाज सेवक की स्वयंभू की उपाधि धारण करते  जो अंततः उनको धन भी दिलाने का काम भी करती है।
            धर्म के नाम पर संघर्ष होने पर उनसे जुड़े समूहों के सामान्य लोगों को सबसे अधिक हानि होती है।  हमने देखा है कि मध्य एशिया में धर्मों के उपसमूहों के बीच भी भारी संघर्ष चल रहा है।  वहां के हिंसक दृश्य जब टीवी या समाचार पत्रों में देखने को मिलते हैं तब देह में सिहरन पैदा होती है।  हम अपने पड़ौस में देख रहे हैं जहां धर्म के नाम पर देश की नीति अपनायी गयी है। वहां भी भारी हिंसा होती रहती है।  हमारे देश में हालांकि उस तरह का वातावरण नहीं है पर फिर भी कुछ लोग धर्म के नाम पर वाचाल कर ऐसी बातें कहते हैं जिनसे विवाद खड़े  होते हैं।  खासतौर से जिनके पास पद, पैसा और प्रचार शक्ति है वह तो इस तरह मानते हैं कि वह एक तरह से धर्म विशेषज्ञ हैं और चाहे जैसी बात कह देते हैं।  खासतौर से श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान पर कुछ विद्वान बोलते हैं तो यह देखकर आश्चर्य होता है उनकी भाव भंगिमा कभी यह प्रमाणित नहीं करती कि वह उसके संदेशा के मार्ग का अनुसरण भी कर रहे हैं।
            श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करने पर अनेक रोचक अनुभव होते हैं। एक तो यह कि इस संसार चक्र के मूल तत्व समझ में आने लगते हैं तो दूसरा यह कि हर बार कोई न कोई श्लोक इस तरह सामने आता है जैसे कि वह पहली बार आया हो। निष्कार्म कर्म और निष्प्रयोजन दया का अर्थ भी समझना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि होती है। कर्म, अकर्म, और विकर्म का भेद अत्यंत रुचिकर है।  हम यहां श्रीमद्भागवत गीता पर चर्चा करने बैठें तो कई पृष्ट कम पड़ जायें और उसका ज्ञान आत्मसात हो जाये चंद पंक्तियों में अपनी कही जा सकती है।  गीता के ज्ञान का भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों में ही प्रचार करने का आदेश दिया है।  यह बात भारतीय विचारधारा को श्रेष्ठ बनाती है  जबकि पाश्चात्य विचाराधाराओं के ग्रंथों के  सृजक अपने अनुयायियों को अभक्तों को भी भक्त बनाकर उनमें अपनी सामग्री का प्रचार करने का आदेश देते हैं।
            यह आश्चर्य ही है कि आज भी पूरे विश्व में श्रीमद्भागवत गीता ऐसे होती है जैसे कि नवीनतमत रचना है। हम जैसे ज्ञान साधकों के लिये श्रीमद्भागवत गीता ऐसा बौद्धिक आधार है जिस पर जीवन सहजभाव से टिकाया जा सकता है। ऐसे ग्रंथ के सृजक भगवान श्रीकृष्ण को हृदय से नमन।  इस पर ब्लॉग लेखकों तथा पाठ के पाठकों को हार्दिक बधाई। जय श्रीकृष्ण।
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