Wednesday, September 21, 2011

गरीबी हटाने की योजना-हिन्दी कविता (garibi hatane ki yojana-hindi kavita or poem

पोते ने पूछा दादाजी से
‘‘दादाजी आप यह बताओ
बड़े बड़े लोग उपवास क्यों रखते हैं,
छक कर खाते मलाई और मक्खन
फिर भी क्यों भूख का स्वाद चखते हैं।
दादाजी ने कहा
‘‘बेटा,
गरीबों का दिल जीतने के लिये
बड़े लोग उपवास इसलिये करते हैं
क्योंकि उनकी भूख शांत करने के लिये
रोटियां बांटने का जिम्मा लेकर मिली कमीशन से
अपनी तिजोरी भी वही भरते हैं,
देख लेना 32 रुपये खर्च करने वाला
अब गरीब नहीं माना जायेगा,
फिर भी गरीबों की संख्या
आंकड़ों में बढ़ती दिखेगी,
बड़ों की कलम मदद की रकम भी बड़ी लिखेगी,
उनको गरीबों से हमदर्दी नहीं है
फिर भी अपनी शौहरत और दौलत
बढ़ाने के लिये
वह गरीबी हटाने की योजना हमेशा साथ रखते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Sunday, September 11, 2011

हिन्दी दिवस पर कविता (hindi diwas or divas par kavita)

हिन्दी में अंग्रेजी के शब्द मिलाकर
मातृभाषा को वह विकास के पथ पर ले जायेंगे,
इसी तरह हर हिन्दी दिवस पर
नये नये तरीके ईजाद करेंगे,
मंच पर खड़े होकर अंग्रेजी में
हिन्दी के लिये सांत्वना संदेश पढ़ेंगे,
कुछ गीत भी संगीत के साथ गुनगुनायेंगे,
इस वादे के साथ
अगले वर्ष फिर हिन्दी दिवस मनायेंगे।
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रास्ते में तेजी से चलता
मिल गया फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू तुम्हारे पास ही आ रहा था
सुना है दस सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग लेखक
सम्मान पाने वाले हैं,
ऐसा लगता है हिन्दी के अंतर्जाल पर भी
अच्छे दिन आने वाले हैं,
हो सकता है तुमको भी
कहीं से सम्मान मिल जाये,
हमारा छोटा शहर भी
ऐसी किसी खबर से हिल जाये,
आठ साल अंतर्जाल पर हो गये लिखते,
पहल दिन से आज तक
तुम फ्लाप कवि ही दिखते,
मिल जाये तो मुझे जरूर याद करना
मैंने ही तुम्हारे अंदर हमेशा
उम्मीद जगाई,
सबसे पहले दूंगा आकर बधाई।

सुनकर हंसे दीपक बापू और बोले
‘‘अंतर्जाल पर लिखते हुए अध्यात्म विषय
हम भी हम निष्काम हो गये हैं,
कोई गलतफहमी मत रखना
हमसे बेहतर लिखने वाले
बहुत से नाम हो गये हैं,
हमारी मजबूरी है अंतर्जाल पर
हिन्दी में लिखते रहना,
शब्द हमारी सासें हैं
चलाते हैं जीवन रुक जाये वरना,
मना रहे हैं जिस तरह
टीवी चैनल हिन्दी दिवस
उससे ही हमने प्रसन्नता पाई,
नहीं मिलेगा हमें यह तय है
फिर भी देंगे
सम्मानीय ब्लॉग लेखको को हार्दिक बधाई,
हम तो इसी से ही प्रसन्न हैं
हिन्दी ब्लॉग लेखक शब्द
अब प्रचलन में आयेगा,
अपना परिचय देना
हमारे लिये सरल हो जायेगा,
सम्मान का बोझ
नहीं उठा सकते हम,
उंगलियां चलाते ज्यादा
कंधे उठाते कम,
इसी से संतुष्ट हैं कि
अंतर्जाल पर हिन्दी लिखकर
हमने अपने ब्लॉग लेखक होने की छवि
अपनी ही आंखों में बनाई।
------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Wednesday, August 31, 2011

अनशन खत्म हुआ जैसे बारात विदा हुई हो-हिन्दी व्यंग्य (anshan aur barat-hindi vyangya or satire)

            अन्ना हजारे साहब का अनशन कथित रूप से स्थगित हो गया है। उन्होंने देश की दूसरी आजादी की लड़ाई क्या प्रारंभ की प्रचार माध्यमों को अपने विज्ञापनों के साथ प्रकाशन और प्रसारण की सामग्री चलाने का अवसर मिल गया। इधर अन्ना साहेब ने अनशन खत्म करने की घोषणा की तो पूरे देश ने चैन की सांस ली होगी पर यकीनन प्रचार प्रबंधकों की चिंताऐं बढ़ा दीच होंगी। अन्ना साहेब को अपनी मांगों के अनुरूप चिट्ठी शनिवार रात को मिली पर उन्होंने सूर्यास्त के बाद अनशन खत्म न करनी अपनी परंपरा का जिक्र करते हुए अगली सुबह दस बजे वह भी रविवार के दिन अनशन समाप्त करने की घोषणा की। प्रचार प्रबंधकों के लिये यह समय अत्यंत कीमती है। इस दौरान मनोरंजन प्रिय लोग -छात्र, छात्रायें, शिक्षक, चिकित्सक और अन्य कर्मचारी- जो सरकारी अवकाश के कारण इस दौरान टीवी के सामने उपस्थित होना प्रारंभ करते हैं। रविवार को अन्ना ने अनशन समाप्त किया। उसमें पूरी तरह से राजनीतिक सिद्धांतों का पालन किया गया। फिर अन्ना अस्पताल रवाना हुए। सभी टीवी चैनलों की चलित वाहिनियां (मोबाईल वैन) उनके पीछे लग गयीं। पूरे दो घंटे की सामग्री मिल गयी। फिर बाद में तमाम चर्चा।
       चलिये साहब! रविवार का दिन निकल गया। सोमवार को भी इस आंदोलन की पाश्च सामग्री बहुत थी हालांकि पूरा दिन उसे नहीं दिया गया। मगर मंगलवार का दिन! यह संभव नही था कि अन्ना अनशन प्रसंग लंबा खींचा जाये। इधर दर्शक भी बोर हो गये थे। ऐसे में दूसरे प्रसंग प्रसारित हुए पर ऐसा लग रहा था कि टीवी चैनलों की स्थिति वही हो गयी थी जैसे दूल्हा दुल्हन के साथ बारातियों के जाने के बाद जनवासे की होती है। दर्शकों की स्थिति भी ऐसी ही थी जैसे कि अभी अभी बारात से लौटे हों और आराम करने का मन हो।
        आमतौर से पश्चिमी विकसित देशों के प्रचार माध्यम-टीवी चैनल और समाचार पत्र- शुद्ध रूप से प्रकाशन और प्रसारण के लिये जनरुचि सामग्री निर्माण के आधार पर चलते हैं और विज्ञापन प्रकाशन उनकी दूसरी प्राथमिकता होती है। वहां प्रकाशक और प्रसारणकर्ता का मुख्य उद्देश्य के रूप में अपने समाज के बीच अपनी छवि बनाने के लिये प्रचार व्यवसाय चुनते हैं। भारत के प्रचार माध्यम मूल रूप से पश्चिम का ही अनुसरण करते हैं पर यहां उनके लक्ष्य और उद्देश्यों का स्वरूप बदल जाता है। अधिकतर प्रसारक और प्रकाशन विज्ञापनों से आय करने का लक्ष्य लेकर अपना संस्थान प्रारंभ करते हैं। उनकी पहली प्राथमिकता विज्ञापनदाताओं के सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति करना होता है। दूसरी प्राथमिकता दर्शक और पाठकों की रुचि होती है। ऐसे में अगर किसी समाचार में जनता की रुचि अधिक हो तो उस प्रकाशन और प्रसारण की सामग्री लंबी हो जाती है। समाचार पत्र पत्रिकाओं में मुख्य समाचारों से संबद्ध छोटे समाचार अंदर के पृष्ठों में कतरनों की तरह छपते हैं। टीवी चैनल तो ऐसे घटनाक्रमों लगभग किसी क्रिकेट मैच के प्रसारण की तरह प्रसारित करते हैं जिससे दर्शक उसमें उतार चढ़ाव से बंधा रहता है।
            कहने को देश में हुए अनेक हादसों पर सीधी फिल्म प्रसारित होती है पर उसमें करुणा रस ही बना रहता है। जबकि ऐसी घटनाओं के सारे रसों का स्वाद दर्शक को कराया जा सकता है। पहले अन्ना हजारे फिर बाबा रामदेव और फिर अब अन्ना हजारे के आंदोलनों का प्रसारण तो ऐसे हुए जैसे कि दिन भर ही फिल्म चलती दिखाई दी जिसमें कभी हास्य तो कभी करुणा रस के साथ रची सामग्री देखने को मिली।

        सच बात तो यह है कि इधर दर्शकों और पाठकों की आदत खराब हो गयी है। एक दो दिन के महत्व वाले प्रकरण  उनके मन को अधिक अब नहीं लुभाते खासतौर से जब वह एकरस से सरोबोर हों। इस तरह के सीधे प्रसारण वाले फिल्मरूपी समाचार देखने की उनकी यह आदत बनती जा रही हैं। वैसे एक बात बता दें कि अन्ना अगर उस दिन अनशन नहीं तोड़ते तो यकीन मानिए दर्शक ऊब गये होते। भ्रष्टाचार विरोधी उनका आंदोलन और उसके मुद्दे तो रह गये एक तरफ, मूल मुद्दा बन गया था कि अन्ना साहेब का अनशन टूटेगा नहीं! अब यह संयोग है या प्रचार प्रबंधकों की योजना कि भ्रष्टाचार का मुद्दा अन्ना के जीवन के आगे गौण पड़ गया। इस देश में वैचारिक चिंत्तन वाले लोग कम नहीं है पर जो टीवी से चिपके थे उनमें उनकी संख्या कम रही होगी जबकि इसे फिल्म की तरह देखने वाले लोगों का झुंड अधिक था। अन्ना साहेब के गांव में तो लोगों ने यह कहते हुए जश्न मनाया कि उनके कहे अनुसार जन लोकपाल बिन अंततः बन गया और अब वह अनशन तोड़ रहे हैं।’
         पूरे देश में ही यही स्थिति थी। ऐसे में वैचारिक लोगों के लिये यही बेहतर था कि वह अपना मुख बंद रखें। प्रचार माध्यमों ने इस तरह का माहौल बना दिया कि सच्ची बात कहना उस समय जोखिम मोल लेना था।
इस प्रकरण के समय हमें तीन चार दिन ऐसे दौर से गुजरना पड़ा कि इस पर देखना और लिखना संभव नहीं था। होता भी तो नहीं लिखते। इस फिल्म का न तो सिर समझ में आ रहा था न पैर! बस एक जिज्ञासा थी कि देखें तो रचने वालों ने इस खेल को रचा कैसा है? मानना पड़ेगा कि इस देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो धर्म, देश, समाज, भाषा तथा जनकल्याण के विषयों में लोगों की भावनायें इस कदर उभारने में माहिर हैं जिससे उनके व्यवसायिक लाभ हों। बहरहाल जहां टीवी चैनल बारात विदा होने के बाद जनवासे की तरह लग रहे हैं तो समाचार पत्र ऐसे लगते हैं जैसे छात्रकाल के दौरान परीक्षा के बाद हल किये गये प्रश्न पत्र लगते थे।
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Saturday, August 20, 2011

आशिक का अनशन-हिन्दी हास्य कविता (ashik ka anshan-hindi hasya kavita or hindi comic poem)

आशिक ने कहा माशुका से
"तुम जल्दी से विवाह की तारीख
तय कर लो,
मेरा अभी तक दिल बहलाया है
अब खाली घर भी भर दो,
वरना तुम्हारे घर के बाहर
आमरण अनशन पर बैठ जाऊंगा,
भूखा प्यासा मरकर अमर आशिक का दर्जा पाऊँगा,
दुनिया मेरी याद में आँसू बहाएगी।"

सुनकर माशुका झल्लाई
और गरजते हुए बोली
"मुझे मालूम है
नौकरी से तुम्हारी होने वाली है छटनी,
बन जाएगी तुम्हारी जेब की चटनी,
अब तुम मेरे खर्चे नहीं उठा पाओगे,
घर पर ले जाकर चक्की पिसवाओगे,
पर मैं तुम्हारे झांसे में नहीं आऊँगी,
जब तक न बने तुम्हारा नया ठिकाना
तुमसे तब तक तुमसे दूरी बनाऊँगी,
वैसे तुम याद रखना
नारियों को परेशान करने के खिलाफ
ढेर सारे कानून बन गए हैं,
कई स्वयंसेवी संगठनों के
तंबू भी तन गए हैं,
नया काम मिलने पर ही
मेरे पास आना,
वरना पड़ेगा पछताना,
अनशन किया तो भूखे बाद में मरोगे,
पहले  मेरे मुहल्ले में  दोस्तों के  हाथ फँसोगे,
कारावास में पहरेदार बाद में जमाएँगे लट्ठ
पहले भीड़ तुम्हारी पीठ पर बरसाएगी।"
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Thursday, August 11, 2011

आरक्षण फिल्म पर हायतौबा फिक्सिंग लगती है-सामाजिक लेख (a film movie on resevetion aarakshan and fix discussion and dissput-a hindi social article)

               एक बात तय है कि चाहे जितनी बहसें   और प्रदर्शन हो जायें फिल्म आरक्षण का प्रदर्शन रुकेगा या बाधित होगा ऐसा नहीं लगता। वजह साफ है कि बाज़ार और प्रचार का संयुक्त उपक्रम इस तरह है कि वह टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में विभिन्न मुद्दे उठाकर इसी तरह अपने उत्पाद, सेवायें तथा पठनीय या दर्शनीय सामग्री का विक्रय करता है। फिल्म आरक्षण के निर्माता का तो पता नहीं पर उसके सभी अभिनेता निश्चित रूप से बाज़ार और प्रचार के नायक हैं। उनके पास न केवल फिल्मों का ढेर है बल्कि अनेक वस्तुओं के विज्ञापनो में उनके चेहरे प्रतिदिन देखे जा सकते हैं। मतलब यह फिल्म भी बाज़ार और प्रचार के उपक्रमों का ही एक सृजन है। जिस तरह उदारीकरण के चलते बाज़ार और प्रचार उपक्रमों ने समूचे विश्व पर अधिकार कर लिया है उसे देखकर नहीं लगता कि ‘आरक्षण’ फिल्म का प्रदर्शन रुक जायेगा। बल्कि ऐसा लगता है कि इसे प्रचार दिलानें के लिये विवाद खड़ा किया गया है । पहले भी किसी फिल्म के गाने या दृश्यों पर पर आपत्तियों  का प्रचार किया गया पर बाद में कुछ हुआ नहीं। उल्टे फिल्मों को प्रारंभ में ही अच्छी बढ़ता मिली यह अलग बात है कि बाद के दिनों में उनका प्रभाव एकदम घट गया। सीधी बात कहें तो फिल्म ‘आरक्षण’ पर यह हायतौबा फिक्सिंग लगती है।
            यह फिल्म देश की नौकरियों में जाति के आधार पर आरक्षण नीति पर आधारित है। हम यहां इस पर बहस नहीं करना चाहते कि यह नीति गलत है या सही। वैसे भी फिल्म के निर्माता का कहना है कि यह फिल्म आरक्षण नीति पर कोई तर्कसंगत दृष्टिकोण रखने के लिये नहीं बनी। फिल्म में क्या है यह तो पता चल ही जायेगा पर जिस तरह इस फिल्म पर बहस हो रही है और जो तर्क आ रहे हैं वह अधिक चर्चा लायक नहीं है क्योंकि उनमें कुछ नया नहीं है। अलबत्ता अभिव्यक्ति की स्वततंत्रा का मुद्दा जरूर चर्चा का विषय है। पहली बात तो यह है कि बाज़ार और प्रचार के शिखर पुरुषों की ताकत इतनी बड़ी है कि लगता नहीं है कि उनकी यह फिल्म रुकेगी या बाधित होगी। दूसरी बात यह है कि अभिव्यक्ति अब केवल संगठित क्षेत्रों की सपंत्ति बन गयी है। टीवी चैनल और समाचार पत्रों के विद्वान बड़े शहरों में रहने वाले व्यवसायिक प्रचारक होते हैं। उनके वही रटे रटाये तर्क सामने आते हैंे जो बरसों से सुन रहे हैं। इसलिये आम इंसान की अभिव्यक्ति के मुखर होने का तो प्रश्न ही नहीं है।
            दरअसल हम अगर देश की ‘आरक्षण’ नीति पर बहस करेंगे तो ऐसे कई सवाल हैं जो नये ंसदर्भों के उठते हैं जिनपर कथित समर्थक प्रचारक कभी ध्यान नहीं देते तो विरोधियों का भी यही हाल है। आरक्षण समर्थकों में कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने संगठन बनाये बैठे हैं और दावा करते हैं कि वह अपनी समाजों के रक्षक हैं। वह अपने रटे रटाये तर्क लाते हैं। ‘आरक्षण’ का विरोध सार्वजनिक रूप से कोई करता नहीं है क्योंकि ऐसा करने वालों को व्यवस्था से प्रतिरोध का भय रहता है। अगर हम पूरे विश्व के देशों की व्यवस्थाओं का देखें तो सच यह लगता है कि तो आरक्षण हो या न हो इस पर बहस करना ही व्यर्थ है। अभी हाल ही में ब्रिटेन में हुए दंगों में अश्वेतों की उपेक्षा का परिणाम मान गया। इस लिहाज से तो आरक्षण होना भी बुरा नहीं है।
         मुख्य बात यह है कि हम अपनी व्यवस्थाओं का स्वरूप कैसे चाहते हैं? हम उनको जनोन्मुखी बनाना चाहते हैं या उसमें भागीदारी का स्वरूप देखना चाहते हैं। अगर जनोन्मुखी बनाना चाहते हैं तो पूरी तरह से व्यवसायिक कौशल वाले लोगों को आगे रखना होगा और व्यवस्था में भागीदारी दिखाना चाहते हैं तो फिर हमें यह स्वीकार करना होगा कि उसमें कुछ समझौते तो करने ही पड़ेंगे। समस्या यह है कि भागीदारी के स्वरूप में कार्यकर्ता अपने पदों के अधिकार समझते हैं कर्तव्य नहीं जबकि जनोन्मुखी होने पर उनका रुख दायित्व निभाने वाला रहता है।
         हम बार बार देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर व्यथित होने का दावा तो करते हैं पर व्यवस्था में पनपी अकुशलता को अनदेखा कर देते हैं जबकि सारे संकट का कारण वही है। जहां तक कुशल लोगों का सवाल है तो हर जाति, धर्म, भाषा और हर क्षेत्र में हैं पर क्या हमने सभी को अवसर दिया है? क्या देश के सभी कुशल प्रबंधक सम्मानजजनक पदों पर पहुंचे हैं। हमने पद पाना कौशल मान लिया पर उसके कर्तव्यों के निर्वहन की कुशलता पर कभी विचार नहीं किया। हम यहां जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर विचार तो यह बात साफ दिखाई देगा कि आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र में व्यवस्था इस तरह हो गयी है कि निजी चतुराई के सहारे अपने स्वार्थ सिद्ध करने वाले पद हथिया लेते हैं पर व्यवसायिक कौशल वाले लोगों को कहीं स्थान नहीं मिल पाया।
      आरक्षण समर्थक एक बुद्धिजीवी ने सवाल किया कि ‘क्या फिल्म को प्रमाण पत्र देने वाले सैंसर बोर्ड में एक भी हमारे समाज का है?’
         इसका जवाब कोई क्या देगा? दरअसल अगर उनसे कहा जाये कि इस मसले पर बहस के लिये अपने समाज से वह आदमी ले आओ जिसके पूरे खानदान में किसी ने आरक्षण का किसी भी तरह लाभ नहीं लिया हो। एक बात बता दें कि जिन समाजों को आरक्षण है उसमें कई ऐसे परिवार हैं जिनकी किसी पीढ़ी को इसका लाभ नहीं मिला। ऐसे लोग आरक्षण को लेकर इतने संवेदनशील भी नहीं होते पर जब भावना की बात आती है तो उनकी संख्या का सहारा लेकर ऐसे अनेक आरक्षण समर्थक विद्वान अपनी बात वजनदार होने का दावा करते हैं। देश के निम्न जातियों के गरीब लोगों की हालत बद से बदतर होती गयी है। आरक्षण की सुविधा लेकर सफेद छवि बनाने वाले लोगों ने अपने समाज के गरीब तबके से कितना वास्ता रखा है यह इस सुविधा से परे उनके लोगों से पूछकर देखा जा सकता है। फिर अब निजीकरण बढ़ रहा है ऐसे में आरक्षण का मुद्दा कितना सार्थक है यह भी विचारणीय बात है। फिल्म की कहानी आरक्षण की असलियत के कितना करीब होगी यह कहना कठिन है पर ऐसी फिल्मों को प्रचार दिलाने के लिये विवाद खड़े किये गये हैं यह देखा गया है।
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Friday, August 5, 2011

पाँव उधार मांगने वालों पर भरोसा-हिन्दी शायरी

क्यों उम्मीद करते हो उन लोगों से
जो हुकूमत का पहाड़ चढ़ने के लिए
तुमसे पाँव उधार मांगने आते हैं,
बताओ ज़रा यह कि
जिनके सिर आसमान में टंगे हैं
चमकते सितारों की तरह
उनकी आँखों को नीचे के बदसूरत नज़ारे
कब नज़र आते हैं।
-----------
जब से सीखा है
कौवे से किसी दूसरे पर
कभी भरोसा न करना
ज़िंदगी अपने अमन और चैन रहने लगा है,
हो गया है इस बात का अहसास कि
वफा बाज़ार में बिकने वाली शय है
यहाँ हर कोई मतलब का सगा है।
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Tuesday, July 26, 2011

शांति संदेश और दर्द-हिन्दी कवितायें shanti sandesh aur dard-hindi kavitaen)

आसमान के उड़ते कबूतरों के झुंड को देखकर
ख्याल आया कि
इन शांति दूतों की हलचल पर
अब क्यों नहीं लोग नज़र डालते,
फिर जमीन पर देखा घूमते हुए
लोगों ने मिट्टी, लोहे और प्लास्टिक के बने
कबूतर सजा दिये हैं अल्मारी में
दूसरों को दिखाने के लिये
शोर मचाते हुए वह
अपने पक्षीपेमी होने का
सबूत देते हैं,
मगर छत पर दाना चुगते हुए
शांति संदेश के संवाहक कबूतरों को देखकर
मौन होकर कोई देखे
वह तभी जान पायेगा शांति की तलाश
बाहर नहीं अंदर होती है।
------
रोते, चिल्लाते और धमकाते
थक गये हम
किसी दूसरे का क्या
अपना दर्द भी अब नहीं सताता
नहीं रुला पाते अपने गम।
जिनके हाथ में खंजर है
वह कत्ल किये बिना नहीं रहेंगे,
जिनके पास दौलत है
वह गरीब का भला नहीं सहेंगे,
शौहरत का हिमालय पा लिया जिन्होंने
लोग उन शैतानों को फरिश्ता समझेंगे,
क्या कहें हम बेदर्द जमाने के
अपने ही दर्द पर अपनी आंखें नहीं होती नम।
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Monday, July 18, 2011

असली तस्वीर-हिन्दी शायरी (asli tasweer-hindi shayari)

ओहदा दर ओहदा
कितनी भी सीढ़ियां चढ़कर
पहाड़ जैसी हैसियत बना लो,
तुम्हारी गुलामी फिर भी छिप नहीं पायेगी।
आजाद होकर जिंदा रहने की
तुम्हारी कभी ललक नहीं दिखी,
दस्तखत केवल उसी कागज पर किये
जिस पर केवल दौलत की इबारत लिखी,
कमजोरों पर अजमाये हाथ
मगर ताकतवरों के तलुव चाटने वाली
तुम्हारी असली तस्वीर ज़माने से छिप नहीं पायेगी।
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Sunday, July 10, 2011

भूख का मतलब समझना चाहिए-हिन्दी शायरी (bhookh ka matalab-hindi shayari)

खजाना हाथ लग जाये
तो उसे ठिकाने लगाने की
अक्ल भी आना चाहिए,
दौलत सभी के पास आती है
मगर अक्ल कई लोगों से घबड़ाती है,
खर्च करने की तमीज भी चाहिए।

कहें दीपक बापू
कब नहीं भरे थे
खजाने इस देश में,
फिर भी गरीब रहे फटे वेश में,
जेब में रखी गिन्नियां
सेठों के सिर चढ़कर बोलती हैं
आकाश में ढूंढ रहे फरिश्तों के लिये
इंसान की आंखें अपनी नजर खोलती हैं,
जिस धरती पर खड़े हैं लोग
उसकी ताकत समझने की
तमीज होना चाहिए।
अमीर है देश है अपना,
सोना पाने का है सभी का सपना
मोटे पेट वालों को
भूख की मतलब समझना चाहिए।
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Sunday, July 3, 2011

सोने से बड़ा तत्वज्ञान का खजाना-हिन्दी लेख (sone se bada tatvagyan ka khazana-hindi lekh)

              केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में अभी तक एक लाख करोड़ का खजाना बरामद हुआ है। यह खजाना त्रावणकोर या ट्रावनकोर के राजाओं का है। जहां तक हमारी जानकारी है भारत में इस तरह खजाना मिलने का यह पहला प्रसंग है।
           अलबत्ता बचपन से अपने देश के लोगों को खजाने के पीछे पागल होते देखा हैं। कई लोग कहीं कोई खास जगह देख लेते हैं तो कहते हैं कि यहां गढ़ा खजाना होगा। अनेक लोग सिद्धों के यहां चक्कर भी इसी आशा से लगाते हैं कि शायद कहीं किसी जगह गढ़े खजाने का पता बता दे। कुछ सिद्ध तो जाने ही इसलिये जाते हैं कि उनके पास गढ़े खजाने का पता बताने की क्षमता या सिद्धि है।
        ऐसे भी किस्से देखे हैं कि किसी ने पुराना मकान खरीदा और उसे बनवाना शुरु किया। भाग्य कहें या परिश्रम वह अपने व्यवसाय में अमीर हो गया तो लोगों ने यह कहना शुरु कर दिया कि खुदाई में उनको खजाना मिला है।
बहरहाल केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में मिले सोने और हीरे जवाहरात ने भले ही किसी को चौंकाया हो पर इतिहासविद् और तत्वज्ञानियों ने लिये यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं हो सकता।
अभी हाल ही में पुट्टापर्थी के सत्य सांई बाबा के मंदिर में तो मात्र दो सौ ढाई करोड़ का खजाना मिला था तब अनेक लोगों की सांसें फूल गयी थी। अब केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में मिले खजाने ने उसके एतिहासिक महत्व पर धूल डाल दी है।
          बता रहे हैं कि केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में मिला यह खजाना तो मात्र एक कमरे का है और अभी ऐसे ही छह कमरे अन्य भी हैं। न हमने खजाना देखा है न देख पायेंगे। न पहुंचेंगे न पहुंच पायेंगे। इस खजाने का क्या होगा यह भी नहीं पता पर जिन्होंने उसका संग्रह किया उन पर तरस आता है। यह राजाओं का खजाना है और इसका मतलब यह है कि उन्होंने अपनी प्रजा के दम पर ही इसे बनाया होगा। नहीं भी बनाया होगा तो अपने उस राज्य के भौतिक या उसके नाम का ही उपयोग किया तो होगा जो बिना प्रजा की संख्या और क्षमता के संभव नहीं है।
             राजा हो या प्रजा सोना, हीरा, जवाहरात तथा अन्य कीमती धातुओं इस देश के लिये हमेशा कौतुक का विषय रही हैं। पेट की भूख शांत करने के लिये इसका प्रत्यक्ष कतई नहीं हो सकता अलबत्ता चूंकि लोगों के लिये आकर्षण का विषय है इसलिये उसका मोल अधिक ही रहता है। हमारे देश में सोना पैदा नहीं होता। इसे बाहर से ही मंगवाया जाता है। जब हम प्राचीन व्यापार की बात करते हैं तो यही बात सामने आती है कि जीवन उपयोगी वस्तुऐं-गेंहूं, चावल, दाल, कपास और उससे बना कपड़ा तथा अन्य आवश्यक वस्तुऐं-यहां से भेजी जाती थी जिनके बदले यह सोना और उससे बनी वस्तुओं जिनका जीवन में कोई उपयोग नहीं है यहां आता होंगी। कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने। सोना दूर पैदा होता है उससे देश का प्रेम है पर प्रकृति की जो अन्य देशों से अधिक कृपा है उसकी परवाह नहीं है। हम कई बार लिख चुके हैं और आज भी लिख रहे हैं कि विश्व के प्रकृतिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में जलस्तर सबसे बेहतर है। जी हां वह जल जो जीवन का आधार है हमारे यह अच्छा है इसलिये गेंहूं, चावल, दाल, कपास और सब्जियों की बहुतायत होने के कारण हम उनका महत्व नहीं समझते वैसे ही जैसे कहा जाता है कि घर का ब्राह्मण बैल बराबर। यह बात भी कह चुके हैं कि निरुपयोगी पर आकर्षक चीजों के मोह में हमारा समाज इस तरह भ्रमित रहता है कि उस पर हंसा ही जा सकता है। वैसे तो विश्व में सभी जगह अंधविश्वास फैला है पर हम भारतीय तो आंकठ उसमें डूबे रहे हैं। यहां इतना अज्ञान रहा है कि हमारे महान ऋषियों को सत्य का अनुसंधान करने के अच्छे अवसर मिले हैं। कहा जाता है कि कांटों में गुलाब खिलता है तो कीचड़ में कमल मिलता है। अगर यह समाज इतना अज्ञानी नहीं होता तो सत्य की खोज करने की सोचता कौन? मूर्खों पर शोध कर ही बुद्धिमता के तत्व खोजे जा सकते हैं। हम विश्व में अध्यात्मिक गुरु इसलिये बने क्योंकि सबसे ज्यादा मोहित समाज हमारा ही है। भौतिकता को पीछे इतना पागल हैं कि अध्यात्म का अर्थ भी अनेक लोग नहीं जानते। इनमें वह भी लोग शामिल हैं जो दावा करते हैं कि उन्होंने ग्रंथों का अध्ययन बहुत किया है।
           कहा जाता है कि सोमनाथ का मंदिर मोहम्मद गजनबी ने लूटा था। उसमें भी ढेर सारा सोना था। कहते हैं कि बाबर भी यहां लूटने ही आया था। यह अलग बात है कि वहां यहीं बस गया यह सोचकर कि यहां तो जीवन पर सोने की डाल पर बैठा जाये। बाद में उसके वंशज तो यहीं के होकर रह गये। यकीनन उस समय भारत में सोने के खजाने की चर्चा सभी जगह रही होगी। उस समय भगवान के बाद समाज में राजा का स्थान था तो राजा लोग मंदिरों में सोना रखते थे कि वहां प्रजा के असामाजिक तत्व दृष्टिपात नहीं करेंगे। उस समय मंदिरों में चोरी आदि होने की बात सामने भी नहीं आती।
इतना तय है कि अनेक राजाओं ने प्रजा को भारी शोषण किया। किसी की परवाह नहीं की। यही कारण कि कई राजाओं के पतन पर कहीं कोई प्रजा के दुःखी होने की बात सामने नहीं आती। यहां के अमीर, जमीदार, साहुकार और राजाओं ने प्रजा के छोटे लोगों को भगवान का एक अनावश्यक उत्पाद समझा। यही कारण है विदेशियों ने आकर यहां सभी का सफाया किया। राजा बदले पर प्रजा तो अपनी जगह रही। यही कारण है यहां कहा भी जाता है कि कोउ भी नृप हो हमें का हानि। कुछ लोग इस भाव यहां के लोगों की उदासीनता से उपजा समझते हैं पर हम इसे विद्रोह से पनपा मानते हैं। खासतौर से तत्वज्ञान के सदंर्भ में हमारा मानना है कि जब आप स्वयं नहीं लड़ सकते तो उपेक्षासन कर लीजिये।
जिसके पास कुछ नहीं रहा उसे लुटने का खतरा नहीं था और जिन्होंने सोने के ताज पहने गर्दने उनकी ही कटी। जिनकी जिंदगी में रोटी से अधिक कुछ नहीं आया उन्होंने सुरक्षित जिंदगी निकाली और जिन्होंने संग्रह किया वही लुटे।
          अब यह जो भी खजाना मिला है यह तब की प्रजा के काम नहीं आया तो राजाओं के भी किस काम आया? ऐसे में हमारा ध्यान श्रीमद्भागवत् गीता के संदेशों की तरफ जाता है। जिसमें गुण तथा कर्मविभाग का संक्षिप्त पर गुढ़ वर्णन किया गया है। उस समय के आम और खास लोग मिट गये पर खजाना वहीं बना रहा। अब यह उन लोगों के हाथ लगा है जिनका न इसके संग्रह में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई हाथ नहीं है। सच है माया अपना खेल खेलती है और आदमी समझता है मैं खेल रहा हूं। वह कभी व्यापक रूप लेती है और कभी सिकुड़ जाती है। कभी यहां तो कभी वहां प्रकट होती है। सत्य स्थिर और सूक्ष्म है। सच्चा धनी तो वही है जो तत्वज्ञान को धारण करता है। वह तत्वज्ञान जिसका खजाना हमारे ग्रंथों में है और लुटने को हमेशा तैयार है पर लूटने वाला कोई नहीं है। बहरहाल वह महान लोग धन्य हैं जो इसे संजोए रखने का काम करते रहे हैं इसलिये नहीं कि उसे छिपाना है बल्कि उनका उद्देश्य तो केवल इतना ही है कि आने वाली पीढ़ियों के वह काम आता रहे।
      इस विषय पर लिखे गये एक व्यंग्य को अवश्य पढ़ें
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भारत आज भी सोने की चिड़िया है-हास्य व्यंग्य(bharat aaj bhi sone di chidiya hai-hasya vyangya)
          कौन कहता है कि भारत कभी सोने की चिड़िया थी। अब यह क्यों नहीं कहते कि भारत सोने की चिड़िया है। कम से कम देश में जिस तरह महिलाओं और पुरुषों के गले से चैन लूटने की घटनायें हो रही हैं उसे तो प्रमाण मिल ही जाता है। हमें तो नहीं लगता कि शायद का देश कोई भी शहर हो जिसके समाचार पत्रों में चैन खिंचने या लुटने की घटना किसी दिन न छपती हो। अभी तक जिन शहरों के अखबार देखे हैं उनमें वहीं की दुर्घटना और लूट की वारदात जरूर शामिल होती है इसलिये यह मानते हैं कि दूसरी जगह भी यही होगा।
          खबरें तो चोरी की भी होती हैं पर यह एकदम मामूली अपराध तो है साथ ही परंपरागत भी है। मतलब उनकी उपस्थिति सामान्य मानी जाती है। वैसे तो लूट की घटनायें भी परंपरागत हैं पर एक तो वह आम नहीं होती थीं दूसरे वह किसी सुनसान इलाके में होने की बात ही सामने आती थी। अब सरेआम हो लूट की वारदात हो रही हैं। वह भी बाइक पर सवार होकर अपराधी आते हैं।
         हमारे देश मूर्धन्य व्यंग्यकार शरद जोशी ने एक व्यंग्य में लिखा था कि हम इसलिये जिंदा हैं क्योंकि हमें मारने की फुरसत नहीं है। उनका मानना था कि हमसे अधिक अमीर इतनी संख्या में हैं कि लुटने के लिये पहले उनका नंबर आयेगा और लुटेरे इतनी कम संख्या में है कि उनको समझ में नहीं आता कि किसे पहले लूंटें और किसे बाद में। इसलिये लूटने से पहले पूरी तरह मुखबिरी कर लेते हैं। यह बहुत पहले लिखा गया व्यंग्य था। आज भी कमोबेश यही स्थिति है। हम ख्वामख्वाह में कहते है  कि अपराध और अपराधियों की संख्या बढ़ गयी हैं। आंकड़ें गवाह है कि देश में अमीरों की संख्या बढ़ गयी है। अब यह तय करना मुश्किल है कि इन दोनों के बढ़ने का पैमाना कितना है। अनुपात क्या है? वैसे हमें नहीं लगता कि स्वर्गीय शरद जोशी के हाथ से व्यंग्य लिखने और आजतक के अनुपात में कोई अंतर आया होगा। साथ ही हमारी मान्यता है कि अपराधी और अमीरों की संख्या इसलिये बढ़ी है क्योंकि जनसंख्या बढ़ी है। विकास की बात हम करते जरूर है पर जनसंख्या में गरीबी बढ़ी है। मतलब अपराध, अमीरी और गरीबी तीनों समान अनुपात में ही बढ़ी होगी ऐसा हमारा अनुमान है।
          सीधी बात कहें तो चिंता की कोई बात नहीं है। सब ठीकठाक है। विकास बढ़ा, जनंसख्या बढ़ी, अमीर बढ़े तो अपराध भी बढ़े और गरीबी भी यथावत है। तब रोने की कोई बात नहीं है। फिर हम इस बात को इतिहास की बात क्यों मानते हैं  कि भारत कभी सोने की चिड़िया थी। हम यह क्यों गाते हैं कि कभी कभी डाल पर करती थी सोने की चिड़िया बसेरा, वह भारत देश है मेरा। हम थे की जगह हैं शब्द क्यों नहीं उपयोग करते। अभी हमारे देश के संत ने परमधाम गमन किया तो उनके यहां से 98 किलो सोना और 307 किलो चांदी बरामद हुई। टीवी और अखबारों के समाचारों के अनुसार कई ऐसे लोग पकड़े गये जिनके लाकरों से सोने की ईंटे मिली।
          वैसे तो सोना पूरे विश्व के लोगों की कमजोरी है पर भारत में इसे इतना महत्व दिया जाता है कि दस हजार रुपये गुम होने से अधिक गंभीर और अपशकुन का मामला उतने मूल्य का सोना खोना या छिन जाना माना जाता है। बहु अगर कहीं पर्स खोकर आये तो वह सास को न बताये कि उसमें चार पांच हजार रुपये थे। यह भी सोचे सास को क्या मालुम कि उसमें कितने रुपये थे पर अगर पांच हजार रुपये की चैन छिन जाये तो उसके लिये धर्म संकट उत्पन्न हो जाता है क्योंकि वह सास के सामने हमेशा दिखती है और यह बात छिपाना कठिन है।
           एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के अनुसार भारत के लोगों के पास सबसे अधिक सोना है। इसमें शक भी नहीं है। भारत में सोने का आभूषण विवाह के अवसर पर बनवाये जाते हैं। इतने सारे बरसों से इतनी शादिया हुई होंगी। उस समय सोना इस देश में आया होगा। फिर गया तो होगा नहीं। अब कितना सोना लापता है और कितना प्रचलन में यह शोध का विषय है पर इतना तय है कि भारत के लोगों के पास सबसे अधिक सोना होगा यह तर्क कुछ स्वाभाविक लगता है।
            भारत के लोग दूसरे तरीके से भी सबसे अधिक भाग्यशाली हैं क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ कहते हैं कि भूजल स्तर भारत में सबसे अधिक है। यही कारण है कि हमारा देश अन्न के लिये किसी का मुंह नहीं ताकता। हमारे ऋषि मुनि हमेशा ही इस बात को बताते आये हैं पर अज्ञान के अंधेरे में भटकने के आदी लोग इसे नहीं समझ पाते। कहा जाता है कि भारत का अध्यात्मिक ज्ञान सत्य के अधिक निकट है। हमें लगता है कि ऋषि मुनियों के लिये तत्व ज्ञान की खोज करना तथा सत्य तत्व को प्रतिष्ठित करना कोई कठिन काम नहीं रहा होगा क्योंकि मोह माया में फंसा इतना व्यापक समाज उनको यहां मिला जो शायद अन्यत्र कहीं नहीं होगा। अज्ञान के अंधेरे में ज्ञान का दीपक जलाना भला कौनसा कठिन काम रहा होगा?
             वैसे देखा जाये तो सोना तो केवल सुनार के लिये ही है। बनना हो या बेचना वही कमाता है। लोग सोने के गहने इसलिये बनवाते हैं वक्त पर काम आयेगा पर जब बाज़ार में बेचने जाते हैं तो सुनार तमाम तरह की कटौतियां तो काट ही लेता हैं। अगर आप आज जिस भाव कोई दूसरी चीज खरीदने की बजाय सोना खरीदें  और कुछ वर्ष बाद खरीदा सोना बेचें तो पायेंगे कि अन्य चीज भी उसी अनुपात में महंगी हो गयी है। मतलब वह सोना और अन्य चीज आज भी समान मूल्य की होती है। अंतर इतना है कि अन्य चीज पुरानी होने के कारण भाव खो देती है और सोना यथावत रहता है। हालांकि उसमें पहनने के कारण उसका कुछ भाग गल भी जाता है जिससे मूल्य कम होता है पर इतना नहीं जितना अन्य चीज का। संकट में सोने से सहारे की उम्मीद ही आदमी को उसे रखने पर विवश कर देती है।
          जब रोज टीवी पर दिख रहा है और अखबार में छप रहा है तब भी भला कोई सोना न पहनने का विचार कर रहा है? कतई नहीं! अगर महिला सोना नहीं पहनती उसे गरीब और घटिया समझा जाता है। सोना पहने है तो वह भले घर की मानी जाती है। भले घर की दिखने की खातिर महिलायें जान का जोखिम उठाये घूम रही है। धन के असमान वितरण ने कथित भले और गरीब घरों में अंतर बढ़ा दिया है। वैसे कुछ घर अधिक भले भी हो गये हैं क्योंकि उनकी महिलाऐं चैन छिन जाने के बाद फिर दूसरी खरीद कर पहनना शुरु देती हैं। बड़े जोश के साथ बताती हैं कि सोना चला गया तो क्या जान तो बच गयी।’
        भारत में वैभव प्रदर्शन बहुत है इसलिये अपराध भी बहुत है। वैभव प्रदर्शन करने वाले यह नहीं जानते कि उनके अहंकार से लोग नाखुश हैं और उनमें कोई अपराधी भी हो सकता है। पैसे, प्रतिष्ठा और पद के अहंकार में चूर लोग यही समझते हैं कि हम ही इस संसार में है। वैसे ही जैसे बाइक पर सवार लोग यह सोचकर सरपट दौड़ते हुए दुर्घटना का शिकार होते हैं कि हम ही इस सड़क पर चल रहे हैं या सड़क पर नहीं आसमान में उड़ रहे हैं वैसे ही वैभव के प्रदर्शन पर भी अपराध का सामना करने के लिये तैयार होना चाहिए। टीवी पर चैन छीनने की सीसीटीवी में कैद दृश्य देखकर अगर कुछ नहीं सीखा तो फिर कहना चाहिए कि पैसा अक्ल मार देता है।
        कुछ संस्थाओं ने सुझाव दिया है कि देश में अनाज की बरबादी रोकने के लिये शादी के अवसर पर बारातियों की संख्या सीमित रखने का कानून बनाया जाये। इस पर कुछ लोगों ने कहा कि अनाज की बर्बादी शादी से अधिक तो उसके भंडारण में हो रही है। अनेक जगह बरसात में हजारों टन अनाज होने के साथ कहीं ढूलाई में खराब होकर दुर्गति को प्राप्त होता है और उसकी मात्रा भी कम नहीं है। हम इस विवाद में न पड़कर शादियों में बारातियों की संख्या सीमित रखने के सुझाव पर सोच रहे हैं। अगर यह कानून बन गया तो फिर इस समाज का क्या होगा जो केवल विवाहों के अवसर के लिये अपने जीवन दांव पर लगा देता है। उस अवसर का उपयोग वह ऐसा करता है जैसे कि उसे पद्म श्री या पद्मविभूषण  मिलने का कार्यक्रम हो रहा है। बाराती कोई इसलिये बुलाता कि उसे उनसे कोई स्नेह या प्रेम है बल्कि अपने वैभव प्रदर्शन के लिये बुलाता है। यह वैभव प्रदर्शन कुछ लोगों को चिढ़ाता है तो कुछ लोगों को अपने अपराध के लिये उपयुक्त लगता है। ऐसा भी हुआ है कि शादी के लिये रखा गया पूरा सोना चोरी हो गया। सोने से जितना सामान्य आदमी का प्रेम है उतना ही डकैतों, लुटेरों और चोरों को भी है। सौ वैभव प्रदर्शन और चोरी, लूट और डकैती का रिश्ता चलता रहेगा। पहले बैलगाड़ी और घोड़े पर आदमी चलता था तो अपराधी भी उस पर चलते थे। अब वह पेट्रोल से चलने वाले वाहनों का उपयोग कर रहा है तो अपराधी भी वही कर रहे हैं। जो भले आदमी की जरूरत है वही बुरे आदमी का भी सहारा है। सोना तो बस सोना है। हम इन घटनाओं को देखते हुए तो यह कहते है कि भारत आज भी सोने की चिड़िया है।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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Saturday, June 25, 2011

कम्प्यूटर चलाने से होने वाली हानियाँ योग साधना से रोकना संभव-हिन्दी आलेख (copmuter and yoga-hindi article

      आजकल पूरे विश्व के साथ देश में भी कम्प्यूटर का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। यह अच्छा भी है और बुरा भी। चूंकि हम भारतीयों की आदत है की हम किसी भी साधन को सध्या समझ लेते हैं और उसका उपयोग चाहे जैसे करने लगते हैं। आजकल कंप्यूटर, मोबाइल तथा पेट्रोल चालित वाहों का उपयोग हम सुविधा के लिए कम विलासिता के लिए अधिक उपयोग कर रहे हैं। इससे शारीरिक और मानसिक विकारों में बढ़ोतरी होने से स्वास्थ विशेषज्ञ बहुत चिंतित हैं।
       ऐसे में पूरे विश्व में भारतीय योग विद्या के निरंतर लोकप्रिय होने का ऐक कारण यह भी है कि मानव जीवन धीरे-धीरे प्रकृति से दूर होता जा रहा है और ऎसी वस्तुओं का उपयोग बढ़ता जा रहा है जो हमारे शरीर के लिए तकलीफ देह होतीं है। हम यहाँ यहाँ किसी अन्य के बात न करते हुए सीधे कंप्यूटर की बात करेंगे। यह तो अलग से चर्चा का विषय है की कितने लोग इसे सुविधा की तरह और कितने विलासिता की तरह उपयोग कर रहे हैं पर इसकी वजह से जो भारी शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचती है उसकी चर्चा विशेषज्ञ अक्सर करते हैं। इधर हम कुछ दिनों से कुछ दिनों से कम्प्यूटर और इंटरनेट पर कम करने वाले लोगों की निराशाजनक अभिव्यक्ति को भी देख रहे हैं। इसलिये सोचा कि आज यह बात स्पष्ट कर दें की कि हम अच्छा या बुरा जैसे भी लिख पा रह हैं उसका कारण इस स्थूल शरीर से प्रतिदिन की जाने वाले योगासन और ध्यान से से मिलने वाली शारीरिक और मानसिक ऊर्जा ही है। हालांकि अनेक कारणों से कुछ आसन और प्राणायाम अवधि कम जरूर हुई है पर ऐक बात साफ दिखाई देती है कि इस कम अवधि में भी प्रतिदिन अपने उत्पन्न होने वाले विकारों को निकालने में सफलता मिल जाती है। जब कंप्यूटर पर आते हैं तो ऐसा लगता ही नहीं है कि कल हमने इस पर कुछ काम किया था। ऐसा नहीं है कि हमें कोई स्मृति दोष है जो भूल जाते हैं । हमारा आशय यह है कि जो थकावट कल प्राप्त हुई थी उसे भूल चुके होते हैं। आप में कई लोग होंगे जिन्हे याद होगा कि कल कितना थक गए होंगे, इसका मतलब है कि अब आपको योग साधना शुरू कर देना चाहिऐ। मनुष्य को प्रतिदिन मानसिक और शारीरिक रुप से ताजगी देने के लिए इसके अलावा और भी कोई उपाय है इस पर हम जैसे लोग यकीन नहीं करते।
        पहले हम यहाँ यहाँ स्पष्ट कर दें कि हम कोई योग शिक्षक नहीं हैं और इस स्थूल देह से यह योग साधना पिछले साढ़े साढ़े आठ वर्षों से की जा रहीं है। यह ब्लॉग योगसाधना चार वर्ष करने के बाद प्रारभ हुआ था और अब इसे भी चार वर्ष से ऊपर समय हो गया  है। हमारे गुरू एक सरकारी कर्मचारी हैं और बाकायदा पेंट शर्ट पहनकर घूमने वाले आदमी हैं। मतलब यह जरूरी नहीं है कि धार्मिक भगवा धारी संत ही योग साधना सिखाते हैं बल्कि कुछ लोग ऐसे हैं भी हैं जो सामान्य जीवन में रहते हुए भी योग साधना सिखा रहे हैं।
हमारे देश में इस समय बाबा रामदेव ने इसका बहुत प्रचार किया है और उनकी वजह से भारतीय योग को विश्व में बहुत प्रसिद्धि भी मिली है। उनके अलावा भी कई संत हैं जो इसमे अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं, इनमे श्री लाल जीं महाराज भी हैं।
       इसके अलावा भारतीय योग संस्थान भी इसमे बहुत सक्रिय है और इस लेखक ने उनके शिविर में ही योग साधना करना सीखा था। इसकी शाखाए देश में कई स्थानों पर लगतीं है और जो इस लेख को पढ़कर योग साधना करने के इच्छुक हौं वह अगर पता करेंगे तो उन्हें अपने आसपास इससे संबंधित शिविर जरूर मिल जायेंगे।
      हम टीवी पर संत बाबा रामदेव और श्री लाल महाराज तथा अन्य गुरुओं को  बहुत समय तक योग साधना कराते हुए देखते हैं तो यह वहम हो जाता है कि सारे आसन कर ही हम अपनी शारीरिक व्याधियों से छुटकारा पा सकते हैं पर दो घंटे का कार्यक्रम करना हमें मुशिकल लगता है। दूसरा यह भी लगता है कि योग केवल व्याधियों से छुटकारा पाने के लिए है और हम तो ठीकठाक हैं फिर क्यों करें? यहाँ हम स्पष्ट कर दें कि ऐक तो हम सुबह ज्यादा नहीं तो पन्द्रह मिनट ही प्राणायाम करें तो भी हमें बहुत राहत मिलती है। दूसरा यह कि यह कि योग साधना से शरीर की व्याधिया दूर होती हैं यह ऐक छोटी बात है। वास्तविकता तो यह है है जीवन में प्रसन्न रहने का इसके अलावा अन्य कोइ उपाय हम तो नहीं देखते। यह तो जीवन जीने की कला है।
      इस ब्लोग पर हम इसी विषय पर आगे भी लिखते रहेंगे पर अभी यहाँ बताना जरूरी हैं कि योगासन से शरीर, प्राणायाम से मन और ध्यान से विचारों के विकार दूर होते हैं। हमें सुबह उठकर खुली जगह पर कुछ बिछाकर उस पर बैठ जाना चाहिऐ और धीरे-धीरे पेट को पिचकना चाहिऐ और अनुलोम-विलोम प्राणायाम करना चाहिऐ। जिन लोगों को उच्च रक्तचाप या अन्य कोई बीमारी  न हो तो इसी दौरान अन्दर और बाहर कुछ क्षणों के लिए सांस रोक सकते हैं तो यही नाड़ी   शोधन प्राणायाम कहलायेगा। संस अंदर और बाहर रोकने कि प्रक्रिया को कुंभक लगाना भी कहा जाता है। जब हम थोडा पेट पिचकाएँगे तो ऐसा लगेगा कि हमारे शरीर में रक्तप्रवाह तेज हो रहा है और कुछ देर में आंखों को सुख की अनुभूति होने लगेगी ।
         कंप्यूटर पर काम करते हुए     हमारे मस्तिष्क और आंखों बहुत कष्ट उठाना पडता है, और केवल निद्रा से उसे राहत नहीं मिल सकती और न ही सुबह घूमने से कोई अधिक लाभ हो पाता है। इसके अलावा कम करते हुए कुछ देर ध्यान लगाएं तो भी थकावट दूर हो जाएगी। आखिर में हम यही कहना चाहेंगे कि अगर आप कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं तो खुश रहने के लिए योग साधना और ध्यान अवश्य करो -इससे ज्यादा और जल्द लाभ होगा। इसके अलावा प्रतिदिन नवीनता का अनुभव होगा। कभी बोरियत का अनुभव नहीं होगा। 
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप" ,ग्वालियर 
poet,writter and editor-Deepak "BharatDeep",Gwalior
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Monday, June 20, 2011

बस, हम सभी देख रहे हैं-हिन्दी व्यंग्य चिंतन (bus hum sabhi dekh rahe hain-hindi vyangya chinttan)


      सब चाहते हैं कि कोई भगतसिंह बनकर भ्रष्टाचार का सफाया करे पर हमारे कार्य और व्यापार निरंतर सामान्य गति के साथ अपनी यथास्थिति मे चलता रहे। माननीय शहीद भगतसिंह का पूरा देश सम्मान करता है पर सच यह है कि इस देश में लड़ने की ताकत अब उन लोगों में नहीं है जिनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वह भ्रष्टाचार से युद्ध करे। यहां हमारा युद्ध से आशय गोलीबारी चलाने से नहीं बल्कि अभियान, आंदोलन तथा अन्य अहिंसक प्रयासों से हैं। हम अगर शहीद भगतसिंह की बात करें तो उन्हें समाज से प्रोत्साहन होने के अलावा चंद्रशेखर आज़ाद जैसे अन्य महारथियों का सानिध्य प्राप्त था। शहीद भगतसिंह अकेले नहीं थे और समकालीनों में कई लोगों को उनके समक्ष रखा जा सकता है। ऐसे में अगर हम किसी एक व्यक्ति पर ही भरोसा करें तो वह हास्यास्पद लगता है। यहां सभी एक नायक देखना चाहते हैं पर उसके साथ नायकत्व की भूमिका निभाने में उनको डर लगता है।
       हम केवल सोच रहे हैं। हम केवल द्वंद्व देख रहे हैं। हम केवल भ्रष्टाचार और ईमानदार का संघर्ष देखना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि हम किसी फिल्म का सीधा प्रसारण देखना चाहते हैं। शायद हमें देश की समस्याओं से सरोकार नहीं है ऐसे ही जैसे किसी फिल्म के विषय से नहीं होता। अंग्रेजी शिक्षा ने या तो साहब पैदा किये या गुलाम! जो साहबी प्रवृत्ति के हैं उनके लिये भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक देखने लायक आंदोलन है जिसमें उनको भागीदारी नहीं करनी। जो गुलाम है वह भी केवल देखना चाहते हैं क्योंकि उनको तो अपनी गुलामी से ही फुरसत नहीं है। जब फुरसत मिले टीवी के सामने बैठकर वह द्वंद्व का मजा लेना चाहते हैं। इस पर हिन्दी फिल्मों की कहानियों ने पूरे समजा को कायर बना दिया है। सारी समस्यायें कोई नायक ही हल करेगा हमें तो केवल भीड़ के सहनायकों की भूमिका निभानी है।
       फिर भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलते आ रहे हैं। जिनको नायकत्व का मोह है वह नेतृत्व कर रहे हैं ओर जिनको यह भूमिका नहीं मिल सकती या लेना नहीं चाहते वह लोग उप नायक की भूमिका के लिये स्वयं को प्रस्तुत कर रहे हैं। दुनियां को दिखाने के लिये देश में हलचल होना जरूरी है। सभी जगह हलचल है और भ्रष्टाचार के लिये बदनाम होते जा रहे इसलिये विश्व के परिदृश्य में देश को चेतन साबित करने के लिये आंदोलन या अभियान जरूरी है। इसके दूसरे लाभ भी हैं जिससे समाज को फुरसत में टीवी के सामने चिपकाया जा सकता है। सुबह अखबार पढ़ने के लिये पाठकों को बाध्य किया जा सकता है। अनेक उत्पादों के विज्ञापन एक ही जगह दिखाने में भी इससे सहायता मिलती है। लोगों को मजबूर करना है कि वह सब देखें। प्रयोक्ताओं की संख्या बढ़े।
      यह तभी संभव है जब प्रकाशन और प्रसारण सामग्री द्वंद्वों से सजी हो। जो उत्पादक सामान बेचकर कमा रहे हैं वही फिल्म भी बना रहे हैं। टीवी भी चला रहे हैं। अखबार भी उनके सहारे चल रहा है। वही कहानी लिखवा रहे हैं तो वही अभिनय करने वालों पात्रों का चयन कर रहे हैं। अगर आपको समाज सेवक बनना है तो जरूरी नहीं है कि आपको समाज सेवा करना आये बल्कि बस कोई धनपति प्रायोजक मिलना चाहिए। उसी तरह अभिनय न आने अपन अभिनेता, लेखन में रुचि न होने पर भी लेखक, आढ़ी तिरछी रेखायें खींचना जानते हों तो चित्रकार और संगीन न भी आये तो भी अपने साथ चार पांच वाद यंत्र बजाने वाले रखकर संगीतकार बन सकते हैं बशर्ते कि धनपतियों की कृपा हो।
       कहीं हास्य तो कहीं सनसनी तो कहीं प्रेम से सजी कहानियां सीधे प्रस्तुत हो रही हैं। देश को मनोरंजन में व्यस्त रखना है इसलिये उसके लिये भिन्न प्रकार की कहानियां जरूरी हैं। काल्पनिक कथाओं से उकता गये तो कुछ सत्य कहानियों की सीधा प्रसारण भी हो रहा है। देश में ढेर सारे आंदोलन और अभियान हुए उनमें से किसका क्या परिणाम निकला किसी को नहीं पता! आगे भी होंगे।
      कहा भी जाता है कि जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है। यहां तो अब बची ही नहीं है। लोग कितनी कहानियेां को याद रखेंगे। याद रखने की जरूरत है क्या रोज नयी कहानी बन रही है। वैसे भी आचार्य रजनीश यानि ओशो ने कहा है कि स्मृति आदमी की सबसे बड़े शत्रु हैं। इसलिये हमें इस बात पर तो खुश होना चाहिए कि अब तो लोगों की याद्दाश्त लुप्त हो रही है। आम इंसान अधिक याद्दाश्त रखेगा तो रोटी से भी जायेगा। वह जानता है कि उसकी कोई भूमिका समाज निर्माण में नहीं हो सकते हैं। वह देख रहा है। अनेक फिल्मों को एक साथ देख रहा है। फिर अपने कड़वे सच को भी देख रहा है। बस, सभी देख रहे हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप" 
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Saturday, June 11, 2011

केवल प्राणायाम और आसन का अभ्यास ही पूर्ण योगी होने का प्रमाण नहीं-हिन्दी लेख(pranayam aur asan ke abhyas se poorn yogi nahin banta-hindi lekh

        पतंजलि योग सूत्रों में अनेक प्रकार की ऐसी व्याख्यायें हैं जिनको समझने के लिये सहज भाव और सामान्य बुद्धि के साथ विवेक की आवश्यकता होती है। उन्होंने अपने योग को आठ अंगों में बांटा है-यम, नियम, आसन, प्राणयाम, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें आसन और प्राणायाम में मनुष्य को न केवल अपनी सक्रियता दिखती है बल्कि दूसरों को उसका दर्शक होता देखकर वह प्रसन्न भी होता है। दरअसल यह दो भाग मनुष्य की देह और मन को शुद्ध करते हैं और वह यह मान लेता है कि व न केवल स्वस्थ है बल्कि शक्तिशाली है। यह उसके अल्पज्ञान को दर्शाता है। यह प्रवृत्ति उसे अहंकार की तरफ ले जाती है और अंततः वह पतन की तरफ भी बढ़ सकता है।
       जिस तरह भक्तों के चार प्रकार होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी-उसी तरह योगी भी होते हैं। एक तो वह लोग हैं जो दैहिक आपत्ति आने पर योग साधना इस वजह से करते हैं कि उनकी बीमारियां वगैरह दूर हो जाये, तो दूसरे इस आशय से पहले ही अभ्यास करते हैं कि बीमारियां तथा मानसिक तनाव उनकी देह का वरण न करें। तीसरे वह जो इस उद्देश्य से करते हैं कि देखें इससे क्या लाभ होते हैं। सबसे बड़े ज्ञानी योगसाधक हैं जो इसे जीवन का वैसे ही आवश्यक अंग मानते हुए करते हैं जैसे भोजन, पानी तथा हवा को ग्रहण करना। इसका आशय सीधा यही है कि हम जहां योग साधकों का समूह देखते हैं वहां सभी को सात्विक नहीं मानना चाहिये। उनमे राजस और तामस प्रवृत्ति के लोग भी हो सकते हैं। ऐसे में कुछ लोगों के मन में यह बात आ सकती है कि आखिर पूर्ण योगी की पहचान कैसे करें? कुछ योग साधक यह भी विचार कर सकते हैं कि आखिर कैसे पूर्ण योग की स्थिति प्राप्त करें। वैसे पतंजलि योग विज्ञान का मार्ग अपनाने वाले स्वतः ही श्रीमद्भागवत गीता और कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन करते हैं। उनके अंदर स्वतः ही भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के अध्ययन की प्रेरणा जाग्रत होती है।
            योग साधना से जब देह में स्फूर्ति आती है तब मनुष्य के सामने कोई ऐसा काम करने की इच्छा बलवती होती है जो कि अनोखा हो। अब यहां अनोखा काम करने से आशय यही माना जा सकता है जिससे कि योग साधक की समाज में चर्चा हो। ऐसे में हमें श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना अत्यंत लाभदायक हो सकता है। बिना श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान को धारण किये बिना कोई पूर्ण योगी बन सकता है यह बात संभव नहीं लग सकती। अध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण गीता के सिद्धांत न केवल सांसरिक संघर्षों के जीतने का मार्ग बताते हैं बल्कि संकटों के निवारण तथा दूसरों के जाल में न फंसने की कला भी सिखाते हैं। एक बात निश्चित यह है कि पूर्ण योगी अपना मार्ग और लक्ष्य अपनी शक्ति और काल के अनुसार निर्धारित करते हैं। वह दूसरे के विषयों का अनुकरण न करते हुए अपने ही विषयों का चयन कर कार्य आरंभ करते हैं। जिन योगसाधकों को श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान नहीं है वह अपनी देह की स्फूर्ति के कारण कोई अनोखा काम ढूंढते है ऐसे में सांसरिक चालाकियों में सक्रिय लोग उनको अपने लिये उपयोग कर सकते हैं जो कि कालांतर में योगियों के लिये कष्ट का कारण बन सकता है।
          श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को संबोधित करते हुए कहा है कि
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        अशासत्रविहितं घोरं त्पयंन्ते ये तपो जनाः।
         दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।
        कर्शयन्तः शरीररथं भूतग्राममचेतसः।
        मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यसुरनिश्चयान्।।
    ‘‘जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप करते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त कामना, आसक्ति के साथ बल के अभिमान से भी युक्त है। जो शरीर में स्थित भूतसमुदाय के साथ ही अंतःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाला ही समझो।’
           वर्तमान युग में राजनीति, फिल्म, पत्रकारिता, टीवी, तथा कला के क्षेत्र में न केवल धन है बल्कि प्रतिष्ठा भी मिलती है। ऐसे में अनेक लोग उसमें सक्रिय होने के लिये मोहित हो रहे हैं। राजनीति शब्द तो स्पष्टतः राजस भाव से ओतप्रोत है और उसमें सात्विकता की आशा बहुत करनी चाहिए मगर कला, फिल्म, पत्रकारिता और टीवी में सक्रिय होना भी करीब करीब वैसा ही है। राजस भाव का मतलब केवल राजनीति ही नहीं वरन् जीवन में भी स्वार्थ भाव रखने से है। किसी भले काम को करने के बाद उसके फल में इच्छा रखना तथा अपने हाथ से किये गये दान के पुण्य मिलने की आशा करना मनुष्य मन के राजस्व भाव को ही दर्शाता है। तय बात है कि ऐसे भाव वाले लोग केवल अपने मतलब से ही दूसरों से संपर्क करते हैं। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान रखने वाले लोग जानते हैं कि सांसरिक कर्मों में फल मिलता है पर वह अनिश्चित भी होता है। इतना ही नहीं उनको मनुष्य की पहचान भी होती है पर वह किसी के सामने व्यक्त कर उसे दुःख नहीं देते और यथासंभव बिना किसी भेदभाव और स्वार्थ के दूसरे की सहायता के लिये तत्पर रहते हैं। ज्ञानी लोग किसी भी काम को करते समय उससे संबंधित शास्त्रों का अध्ययन अवश्यक करते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि बिना सोचे समझे कोई काम करना तामस बुद्धि का परिचायक है।
         योग साधकों को श्रीमद्भागवत गीता के साथ कौटिल्य अर्थशास्त्र का भी अध्ययन करना चाहिये। कौटिल्य का अर्थशास्त्र न केवल राजनीति बल्कि जीवन और संसार के कर्म करने के सिद्धांतों का प्रतिपादक है।
          कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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        दुरारोहं पदं राज्ञां सर्वलोकनमस्कृतम्।
        अल्पेनाप्यपचारेण ब्राह्मण्यमिव दुष्यति।
       ‘‘सब लोकों में नमस्कार करने योग्य राजपद पर आरूढ़ होना बड़ा कठिन काम है। थोड़े से ही दुष्कर्म से      ब्राह्मणत्व दुषित हो जाता है।
        आत्मानंच परांश्चैव ज्ञात्वा धीरः समुत्पतेत्।
       एतदेव हि विज्ञानं यदात्मपरवेदनम्।।
        ‘निर्मल बुद्धि से फल के निमित्त प्रयत्न करना चाहिए और यदि वह कुसमय भंग हो जाये तो उसमें देव ही कारण है।
          निष्फलं क्लेशबहुलं सन्वितगधफलमेव च।
        न कर्म कुर्यान्मतिमान्मह्यवैरानुबन्धि च।।
     ‘जो निष्फल, बहुत क्लेश संपन्न, संदिग्ध फल और विशेष वैर का अनुबंध हो बुद्धिमान को वह कर्म कभी नहीं करना चाहिए।
        उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदयायच्छते महान्।
       नचैर्नीचैस्तरां याति निपातभ्यशशकया।।
       ‘‘ऊंचे पद की इच्छा करता हुआ मनुष्य महान हो जाता है पर अपने महापद से गिरने के भय की आशंकासे नीचे आने लगता है। अंततः उसका पतन हो जाता है।
       प्रकृतिव्यसनं यस्मात्तत्प्रशाभ्य समुत्पतेत्।
       अनयापनयाश्चयांच जायते दैवतोऽपि वा।।
      ‘‘प्रकृति के व्यसन को शांत होने के बाद ही आक्रमण करें। प्रकृति की रुष्टता, अनीति, अनादर और दैव के कोप से होती है।’’
      एक बात सत्य है कि योगसाधक न उत्तेजित होते हैं न किसी की चाल में फंसते हैं। उनके अपने उद्देश्य और अभियान होते हैं। जिसमें वह प्राणप्रण से शामिल होकर भी कोई प्रचार नहीं करते। ढेर सारे लोगों की वाहवाही से वह प्रभावित होते हैं न आलोचना से विचलित होते हैं। इस पर अगर वह श्रीमद्भागवत गीता और कौटिल्य का अर्थशास्त्र का ज्ञान प्राप्त करें तो उनको सांसरिक कर्म की समझ आती है और वह अपने अभियान में दृढ़ होते हैं।
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Monday, May 30, 2011

आनंद उठाना भी एक कला है-हिन्दी अध्यात्मिक चिंत्तन लेख (anand uthana bhee ek kala hai-hindi adhyamik chittan)

     सुख की तलाश सभी लोग करते रहते हैं पर उसकी अनुभूति कभी नहीं कर पाते। सुख या आनंद उठाना भी एक कला है जो हरेक सभी को नहीं आती। किसी चीज के मिल जाने से सुख मिल जायेगा यह सोचकर उसके पीछे लोग चल पड़ते है पर जब वह मिल जाती है तब उसके उपभोग से होने वाले सुख की अनुभूति उनको नहीं हो पाती । इसका कारण यह है कि जब मनुष्य किसी वस्तु को पाने या खरीदने का उपक्रम करता है तब उसकी समस्त इंद्रियां सक्रिय हो जाती हैं और इससे होने वाले उसके कर्म से उसे सुख मिलता है वही मनुष्य में सक्रियता और उत्साह बनाये रखता है। जब अभीष्ट वस्तु मिलती है उसके उपभोग में सक्रियता नहीं के बराबर रह जाती है। दूसरी बात यह कि उपभोग से हम अपने अंदर जो तत्व ग्रहण करते हैं वह अंततः विकार बन जाता है। जब हम अपने कर्म में सक्रिय होते हैं तब हमारी देह से विकार निकलते हैं। मन में कर्म करने के उत्साह का संचार होता है। इससे देह और मन में हल्कापन आता है वस्तु के उपभोग से तत्व अंदर जाता है जिससे देह पर बोझ बढ़ता है। उससे निवृत्त होने की कला को समझना जरूरी है।
     हम फ्रिज घर में लाना चाहते हैं। इसके लिये पैसा लेकर उसे खरीदने बाज़ार जाते हैं। इससे देह में और मन में सक्रियता आ जाती है जो कि आंनद प्रदान करने वाली होती है। पैसे नहीं हों तो फ्रिज खरीदने लायक पैसा कमाने के लिये हम प्रयास करते हैं। अपने खर्च में कटौती कर धन का संचय करने पर भी विचार करते हैं। इसमें एक आनंद है मगर जब फ्रिज घर में आ जाता है तो उससे कितना आनंद मिल पाता है? ठंडा पानी पीने के लिये सभी लालायित होते हैं पर यह काम तो मटका भी करता है। सब्जी आदि ताजा रखने का अच्छा यह विकल्प भी है कि प्रतिदिन खरीदी जायें।

     उसी तरह कार खरीदने में आनंद है पर जब देह का चलना फिरना कम होता है तो वह विकारों का शिकार होती है। ऐसी और कूलर से ठंडी हवा लेना अच्छा लगता है पर इससे देह की गर्मी से लड़ने की प्रतिरोकधक क्षमता कम होती है। कहने का अभिप्राय यह है कि वस्तुओं के पाने के लिये किये गये उपक्रम में क्षणिक आनंद मिलता है पर अभीष्ट वस्तुओं का उपभोग ऐसा आंनद नहीं प्रदान करता क्योंकि अंततः उपभोग कभी भी आनंद का तत्व नहीं बन सकता। अधिक से अधिक इतना कि हम उसके होने की निरर्थक चर्चा दूसरों से करते है।
       उपभोग की प्रवृत्ति में आनंद अधिक नहीं है या कहें की बिलकुल नहीं है। उसका आनंद हम तभी उठा सकते हैं जब उपभोग से पैदा विकार से बचने के लिये निवृत्ति करना जानते हों। निवृत्ति तत्व से आशय उस ज्ञान से है जिससे से बात समझ में आती है कि उपभोग में लाई वस्तु का उपयोग हम भौतिक सुविधा के लिये करते हैं पर वह आध्यात्मिक सुख का कारण नहीं बन सकती। जबकि वास्तविक सुख अध्यत्मिक शांति से है।
     यह ज्ञान विरलों को ही होता है। वरना तो लोग शोर में शांति, भीड़ में आत्मीय साथी और व्यवसाय के वफादार मित्र ढूंढते हैं। जब मौन रहना हो तब वार्तालाप करते हैं। आंखें बंद कर ध्यान लगाना हो तब खोलकर चिल्लाते आनंद ढूंढते हैं। जब नहीं मिलता तो निराशा में हाथ पांव पटकने लगते हैं। लोग जानते ही नहीं कि शरीर की सक्रियता का आनंद तभी लिया जा सकता है जब हमें उसे शिथिल करना आता हो। यह शिथिलता ध्यान से अनुभव की जा सकती है। इसके अलावा जब हम सोते हैं तो पहले अपने अंगों को शिथिल होते देखें। जब तनाव में हों चिल्लायें नहीं बल्कि आंखें बंद कर ध्यान लगायें। चलने का आनंद तभी उठाया जा सकता है जब हम रुकना जानते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि सुख या आनंद उठाना एक कला है और इसे केवल ज्ञानी ही जानते हैं।
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Tuesday, May 17, 2011

असली दर्द-हिन्दी हाइकु (real pain-hindi hiq or poem)

भ्रष्टाचार
जिंदगी का हिस्सा
बन गया है,

उठता दर्द
जब मौका न होता
अपने पास,

दुख यह है
कोई धनी होकर
तन गया है।
--------
गैरों ने लूटा
परवाह नहीं थी
गुलाम जो थे,

यह आजादी
अपनों ने पाई है
लूट वास्ते

नये कातिल
रचते इतिहास
हाथ खुले हैं,

कब्र में दर्ज
लगते है पुराने
यूं नाम जो थे।

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Thursday, May 12, 2011

कतरनों के चैनल-हिन्दी हास्य कविता (kataranon ke chainal-hindi hasya kavita)

टीवी चैनल के प्रबंधक से कहा संपादक ने
‘‘आप हमारे कर्मचारियों का
मेहनताना बढ़ा दें,
अपना चैनल उनकी दम पर
लोकप्रिय हो रहा है,
सभी जगह अपने विज्ञापनदाताओं के लिये
ग्राहक बो रहा है,,
कभी किसी खास आदमी के यहां शादी की खबर हो
चाहे किसी के मरने की स्टोरी करना कवर हो,
वहां हमारे लोग अपना पराक्रम दिखाते हैं,
लोगों के दिल में अपने चैनल का नाम लिखाते हैं,
सनसनी फैलाते वक खुद अभिनय कर सन्न रह जाते हैं,
देशभक्ति का भाव बेचते हुए
भावुक भी हो जाते हैं,
समाचारों के चलते फिरते उनके साथ
अभिनय का का कौशल सभी दिखाते हैं।

सुनकर बोले संपादक जी
‘क्या खाक पराक्रम दिखाते हैं,
हम तो जानते हैं असलियत
हमें क्या आप
सिखाते हैं,
किसी की शादी हो तो
उसके घर पर लगे कैमरों से ही
हो जाता है सीधा प्रसारण
अपने कैमर रखे रहते हैं आफिस में
तो संवाददाता आमंत्रण पत्र मिलने से
कर लेते हैं बाराती का वेश धारण,
उसमें भी बस एक ही दिन
विज्ञापन चलता है
दर्शक होते हैं दूसरे दिन निराश
क्योंकि नये जोड़े की सुहागरात देखने का मन
मचलता है
फायदे तो खास आदमी के मरने पर होता है,
जब चैनल चार दिन विज्ञापन ढोता है
एक दिन मरने का
दूसरे दिन अर्थी सजने का
तीसरे होता है रोने का
तो चौथा दिन मृतक के चरित्र की चर्चा होने का
देश में हो तो स्थानीच चैनलों से काम चलाते हैं
विदेश में तो वहीं के चैलनों के चलते कैमरों को
अपने नाम से बताते हैं।
नहीं बढ़ेगा एक पैसा भी
हम तो सोच रहे हैं कि कुछ कर्मचारी ही कर दें
क्योंकि हमारे स्वामी व्यस्त रहते हैं
बाहर घूमने में
बढ़ती महंगाई में उनके बैंक खाते में
रकम कम जमा होती दिख रही है,
कहीं चैनल न बंद कर दें,
या फिर प्रबंधक ही नया धर लें,
हम अपने खर्च कम कर
उनकी आय बड़ी करने की कोशिश कर दिखाते हैं।
अपनी तनख्वाह बढ़ने का विचार छोड़ दो
वरना हम नये प्रशिक्षु लाकर
कतरनों से चैनल चलाना उनको सिखाते हैं।
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Saturday, April 30, 2011

मजदूर दिवसः श्रीमदभागवत गीता से लिया जा सकता है समाजवाद का ज्ञान-हिन्दी लेख (shri madbhagwat geeta and socialism-special hindi article on mazdoor diwas. divas or may day)

           भारत में मजदूर दिवस मनाने की कोई परंपरा नहीं है, अलबत्ता यहां विश्वकर्मा जयंती मानी जाती है जिसे करीब करीब इसी तरह का ही माना जा सकता है।  हमारे देश  में  विश्वकर्मा जी को ही श्रम शक्ति का देवता मन जाता है।  हमारा  अध्यात्मिक दर्शन   पाश्चात्य सभ्यता द्वारा प्रदाय अधिकतर दिवसों को खारिज करता है यथा माता दिवस, पिता दिवस, मैत्री दिवस, प्र्रेम दिवस तथा नारी दिवस। मजदूर दिवस भी पश्चिम से ही आयातित विचारधारा से जुड़ा है पर इसे मनाने का समर्थन करना चाहिये। दरअसल इसे तो बहुत शिद्दत से मनाना चाहिए हालाँकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में निष्काम दान तथा निष्प्रयोजन दया में हमेशा लिप्त रहने के प्रेरित किया जाता है न की एक दिन के लिए ।
           आधुनिक युग में कार्ल मार्क्स को मजदूरों का मसीहा कहा जाता है। उनके नाम पर मजदूर दिवस मनाया जाता है तो इसमें मजदूर या श्रम शब्द जुड़ा होने से संवेदनायें स्वभाविक रूप जाग्रत हो उठती हैं। एक बात याद रखिये आज भारत में जो हम नैतिक, अध्यात्म, तथा तथा देशप्रेम की भावना का अभाव लोगों में देख रहे हैं वह शारीरिक श्रम को निकृष्ट मानने की वजह से है। हर कोई सफेद कालर वाली नौकरी चाहता है और शारीरिक श्रम करने से शरीर में से पसीना निकलने से घबड़ा रहे हैं। भारतीय तथा पाश्चात्य दोनों ही   प्रकार के स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि शरीर को जितना चलायेंगे उतना ही स्वस्थ रहेगा तथा जितना सुविधाभोगी बनेंगे उतनी ही तकलीफ होगी।
           सबसे बड़ी बात यह है कि गरीब और श्रमिक को तो एक तरह से मुख्यधारा से अलग मान लिया गया है। वह दया योग्य समझा जाता है न की साथ बिठाने लायक।  संगठित प्रचार माध्यमो में-टीवी चैनल, रेडियो तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं-इस तरह के प्रसारण तथा प्रकाशन देखने को मिलते हैं जैसे कि श्रम करना एक तरह से घटिया लोगों का काम है। संगठित प्रचार माध्यमों को इसके लिये दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह आधुनिक बाज़ार के विज्ञापनों पर ही अपना साम्राज्य खड़े किये हुए  हैं। यह बाजार सुविधाभोगी पदार्थों का निर्माता तथा विक्रेता है। स्थिति यह है कि फिल्म और टीवी चैनलों के अधिकतर कथानक अमीर घरानों पर आधारित होते हैं जिसमें नायक तथा नायिकाओं को मालिक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। उनमें नौकर के पात्र भी होते हैं पर नगण्य भूमिका में। क्हीं नायक या नायिका मज़दूर या नौकर की भूमिका में दिखते हैं तो उनका पहनावा अमीर जेसा ही होता है। फिर अगर नायक या नायिका का पात्र मजदूर या नौकर है तो कहानी के अंत में वह अमीर बन ही जाता है। जबकि जीवन में यह सच नज़र नहीं आता। ऐसे अनेक उदाहरण समाज में देखे जा सकते हैं कि जो मजदूर रहे तो उनके बच्चे भी मज़दूर बने। आम आदमी इस सच्चाई के साथ जीता भी है कि उसकी स्थिति में गुणात्मक विकास भाग्य से ही आता है
         कार्ल मार्क्स मजदूरों का मसीहा मानने पर विवाद हो सकता है पर पर देश के बुद्धिमान लोगों को अब इस बात के प्रयास करना चाहिये कि हमारी आने वाली पीढ़ी में श्रम के प्रति रूझान बढ़े। यहां श्रम से हमारा स्पष्ट आशय अकुशल श्रम से है-जिसे छोटा काम भी कहा जा सकता है। कुशल श्रम से आशय इंजीनियरिंग, चिकित्सकीय तथा लिपिकीय सेवाओं से है जिनको करने के लिये आजकल हर कोई लालायित है। इसी अकुशल श्रम को सम्मान की तरह देखने का प्रयास करना चाहिये। यह नहीं समझना चाहिए कि जो लोग अकुशल श्रम करते हैं वह भी इंसान है कोइ यन्त्र  या पालतू पशु नहीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने पास या साथ काम करने वाले श्रमजीवी को कभी असम्मानित या हेय दृष्टि से नहीं देखना चाहिये। मनुष्य मन की यह कमजोरी है कि वह धन न होते हुूए भी सम्मान चाहता है। दूसरी बात यह है कि श्रमजीवी मजदूरों के प्रति असम्माजनक व्यवहार से उनमें असंतोष और विद्रोह पनपता है जो कालांतर में समाज के लिये खतरनाक होता है। यही श्रमजीवी और मजदूरी ही धर्म की रक्षा में प्रत्यक्ष सहायक होता है। यही कारण है कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में सभी को समान दृष्टि से देखने की बात कही जाती है। इस विषय पर दो वर्ष पूर्व एक लेख यहां प्रस्तुत है। इसी लेख को कल सैकंड़ों पाठकों द्वारा देखने का प्रयास किया इसलिये इसे इस पाठ के नीचे भी प्रस्तुत किया जा रहा है।
        आज मजदूर दिवस है और कई जगह मजदूरों के झुंड एकत्रित कर रैलियाँ निकालीं जायेंगी। ऐसा नहीं है कि हमारे दर्शन में मजदूरों के लिए कोई सन्देश नहीं है पर उसमें मनुष्य में वर्गवाद के वह मन्त्र नहीं है जो समाज में संघर्ष को प्रेरित करते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन द्वारा प्रवर्तित जीवनशैली पर दृष्टिपात करें तो उसमें पूंजीपति मजदूर और गरीब अमीर को आपस में सामंजस्य स्थापित करने का सन्देश है। भारत में एक समय संगठित और अनुशासित समाज था जो कालांतर में बिखर गया। इस समाज में अमीर और गरीब में कोई सामाजिक तौर से कोई अन्तर नहीं था।
           श्री मद्भागवत गीता में कहा गया है कि
             -----------------------------------------
            न द्वेष्टयकुशर्ल कर्म कुशले नातुषज्जजते।
           त्यागी सत्तसमाष्टिी मेघावी छिन्नसंशयः।।
            “जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्वगुण से युक्त पुरुष संशय रहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है।”
            श्रीमदभागवत गीता के १८वे अध्याय के दसवें श्लोक में इस श्लोक में उस असली समाजवादी विचारधारा की ओर संकेत किया गया है जो हमारे देश के लिए उपयुक्त है । जैसा कि सभी जानते हैं कि हमारे इस ज्ञान सहित विज्ञानं से सुसज्जित ग्रंथ में कोई भी संदेश विस्तार से नहीं दिया क्योंकि ज्ञान के मूल तत्व सूक्ष्म होते हैं और उन पर विस्तार करने पर भ्रम की स्थिति निमित हो जाती है, जैसा कि अन्य विचारधाराओं के साथ होता है। श्री मद्भागवत गीता में अनेक जगह हेतु रहित दया का भी संदेश दिया गया है जिसमें अपने अधीनस्थ और निकटस्थ व्यक्तियों की सदैव सहायता करने के प्रेरित किया गया है।
              श्री मद्भागवत गीता में भी कहा गया है कि 
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              स्वै स्वै कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः।
              सव्कर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।
          "अपने अपने स्वाभाविक कार्ये में तत्परता से लगा मनुष्य भक्ति प्राप्त करते हुए उसमें सिद्धि प्राप्त लेता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परम सिद्धि प्राप्त करता है उस विधि को सुन।"
          यतः प्रवृत्तिभूंतानां वेन सर्वमिद्र ततम्।
          स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।
        "जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्तपति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।"
             श्रीमदभागवत गीता में ऊपर लिखे दोनों  श्लोक को  तो यह साफ लगता है अकुशल श्रम से आशय मजदूर के कार्य से ही है । आशय साफ है कि अगर आप शरीर से श्रम करे हैं तो उसे छोटा न समझें और अगर कोई कर रहा है तो उसे भी सम्मान दे। यह मजदूरों के लिए संदेश भी है तो पूंजीपतियों के लिए भी है ।
श्री गीता में ही हेतु रहित दया का सन्देश तो स्पष्ट रुप से धनिक वर्ग के लोगों के लिए ही कहा गया है-ताकि समाज में समरसता का भाव बना रहे। कार्ल मार्क्स एक बहुत बडे अर्थशास्त्री माने जाते है जिन के विचारों पर गरीबों और शोषितों के लिए अनेक विचारधाराओं का निर्माण हुआ और जिनका नारा था “दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ”।
              शुरू में नये नारों के चलते लोग इसमें बह गये पर अब लोगों को लगने लगा है कि अमीर आदमी भी कोई ग़ैर नहीं वह भी इस समाज का हिस्सा है-और जो उनके खिलाफ उकसाते हैं वही उसने हाथ भी मिलाते हैं । जब आप किसी व्यक्ति या उनके समूह को किसी विशेष संज्ञा से पुकारते हैं तो उसे बाकी लोगों से अलग करते हैं तो कहीं न कहीं समाज में विघटन के बीज बोते हैं।
               दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि श्रीगीता में अपने स्वाभाविक कर्मों में अरुचि न दिखाने का संदेश दिया गया है। सीधा आशय यह है कि कोई भी काम छोटा नहीं है और न तो अपने काम को छोटा और न किसी भी छोटा काम करने वाले व्यक्ति को हेय समझना चाहिये। ऐसा करना बुद्धिमान व्यक्ति का काम नहीं करना चाहियैं। कई बार एसा होता है कि अनेक धनी लोग किसी गरीब व्यक्ति को हेय समझ कर उसकी उपेक्षा करते हैं-यह तामस प्रवृत्ति है। उसी तरह किसी की मजदूरी कम देना या उसका अपमान केवल इसलिये करना कि वह गरीब है, अपराध और पाप है। हमेशा दूसरे के गुणों और व्यवहार के आधार पर उसकी कोटि तय करना चाहिये।
भारतीय समाज में व्यक्ति की भूमिका उसके गुणों, कर्म और व्यक्तित्व के आधार पर तय होती है उसके व्यवसाय और आर्थिक शक्ति पर नहीं। अगर ऐसा नहीं होता तो संत शिरोमणि श्री कबीरदास, श्री रैदास तथा अन्य अनेक ऎसी विभूतियाँ हैं जिनके पास कोई आर्थिक आधार नहीं था पर वे आज हिंदू विचारधारा के आधार स्तम्भ माने जाते हैं।
           कुल मिलाकर हमारे देश में अपनी विचारधाराएँ और व्यक्तित्व रहे हैं जिन्होंने इस समाज को एकजुट रखने में अपना योगदान दिया है और इसीलिये वर्गसंघर्ष के भाव को यहां कभी भी लोगों के मन में स्थान नहीं मिल पाया-जो गरीबो और शोषितों के उद्धार के लिए बनी विचारधाराओं का मूल तत्व है। परिश्रम करने वालों ने रूखी सूखी खाकर भगवान का भजन कर अपना जीवन गुजारा तो सेठ लोगों ने स्वयं चिकनी चुपडी खाई तो घी और सोने के दान किये और धार्मिक स्थानों पर धर्म शालाएं बनवाईं । मतलब समाज कल्याण को कोई अलग विषय न मानकर एक सामान्य दायित्व माना गया-बल्कि इसे मनुष्य समुदाय के लिए एक धर्म माना गया वह अपने से कमजोर व्यक्ति की सहायता करे। आज के दिन अकुशल काम करने वाले मजदूरों के लिए एक ही संदेश मैं देना चाहता हूँ कि अपने को हेय न समझो । सेठ साहूकारों और पूंजीपतियों के लिए भी यह कहने में कोइ संकोच नहीं है अपने साथ जुडे मजदूरों और कर्मचारियों पर हेतु रहित दया करें ।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप" 
poet,writter and editor-Deepak "BharatDeep"
http://rajlekh-hindi.blogspot.com
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