Sunday, April 9, 2017

आशिकों का रूप शोहदों में देखते-दीपकबापूवाणी (ashikon ka Roop shohdon mein dekhte-DeepakBapuWani)

खुशी कभी बाज़ार में नहीं मिलती, खूबसूरती कभी राख से नहीं खिलती।
दीपकबापूतंगदिल सूखी आंखों से देखते, आग में ताजी हवा नहीं मिलती।।
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वह कमजोर कायदे के रास्ते चल रहे हैं, दबंग फायदे के रास्ते पल रहे हैं।
दीपकबापूहिसाब गड़बड़ करना सीखा नहीं, वह रोटी के वास्ते जल रहे हैं।
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महलों के रहवासी मगर दिल बंद हैं, भरी जेब मगर दान में मंद हैं।
दीपकबापूमहफिलों में करें मसखरी, बड़े बहुत मगर बड़प्पन में चंद हैं।
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परेशानी में सबका दर कौन खटखटाता है, हालातों में कौन पांव भटकाता है।।
दीपकबापूबेबस पर कभी हंसते नहीं, आह का वार लोहा भी चटकाता है।।
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आशिकों का रूप शोहदों में देखते, सच की परछाई ऊंचे ओहदों में देखते।
दीपकबापूइश्क से बनाते फूल, मुर्दा कली का मान दर्दीले सौदों में देखते।।


असुरों के आक्रमण कभी बंद नहीं होते, देवों के द्वारा भी सदा बंद नहीं होते।
दीपकबापूजिंदगी के समर में बहुत वीर, शत्रु ज्यादा मित्र भी चंद नहीं होते।।
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ठगी से तो कंगाल भी अमीर बन जाते, धोखे से ही ऊंचे महल तन पाते।
दीपकबापूबेकार आजमाते सारे नुस्खे, सत्य साधना से ही नाम रतन पाते।
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चंद जिंदा इंसानी बुत पर्दे पर सजा लेते, ख्वाबों का सच में मजा देते।
दीपकबापूदिल बहलाने का करें सौदा, दर्द पर भी तालियां बजा लेते।
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विकृत भाव की पहचान के डर हैं, चोरी से बने शायद शीशे के घर हैं।
दीपकबापूबदनाम हुए ईमानदारी से, मेहमान के इंतजार में उनके दर हैं।
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शब्दों को दर्द से सजाते, अर्थ में चीख बजाते।
दीपकबापूहमदर्द बने, चंदा लेकर भीख सजाते।।
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जिंदगी सभी ढोते बैल कहें या पुकारें शेर, खाते भी सभी मलाई पायें या बेर।
दीपकबापूनज़र का खेल देखा मजेदार, फूल चाहें पर उगाते गंदगी का ढेर।।
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सरकार बनने से पहले वादों पर चलाते, फिर सरकार यादों पर चलाते।
दीपकबापूलालफीते में बंद कायदे हैं, वही राजकाज प्यादों पर चलाते।।
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Monday, March 27, 2017

रोमियो को न रोईये मुंह ढंककर सोईये-छोटीकविताये एवं क्षणिकायें(Romeo ko n roiye munh dhankkar soeeye-HindoShrotPoem)

रोमियो को न रोईये
मुंह ढंककर सोईये।
शायरी बड़ी चीज है
लिख लिखकर बोईये।
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भोगी ने बेहाल किया
रोग ने दर्द दिया।
जे कौन जोगी आया
जिसने नया फर्ज दिया।
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तस्वीरों से ऊब जाओ
तब शब्द भी बोल दिया करो।
आंखें थकी हों दिल की सोच भी
तब खोल दिया करो।
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सबका भला कठिन है
हमने इसलिये तख्त नहीं मांगा है।
हैरान है यह देख
लालचियों ने अपने घर में टांगा है।
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दिल के कद्रदान
कभी ऊबते नहीं है।
मतलबपरस्त कभी जज़्बातों में
डूबते नहीं है।
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अपनी हंसी संभालकर रखना
हमारे दर्द में
दवा के काम आयेगी।
अपनी खुशी बनाये रखना
हमारा यकीन
बचाने में काम आयेगी।
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सर्वशक्तिमान का नाम का भी
व्यापार हो जाता है।
वहम के दरिया में 
कोई बंदा डूबता
कोई पार हो जाता है।
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Friday, February 24, 2017

काबिल इश्तहार नहीं करते-हिन्दी व्यंग्य कविता (Qabil ishtaha nahin karate-Hindi Satire Poem)

मुखौट लगे चेहरे
पहचाने नहीं जाते।
‘दीपकबापू’ सस्ते चरित्र
महंगा दाम लेकर भी
चैन नहीं पाते।
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काबिल इंसान
अपनी कामयाबी के
इश्तहार नहीं दिया करते।

दिल से ज़माने में
भलाई बांटने वाले
लफ्जो में बयान नहीं किया करते।

कहें दीपकबापू नाकाबिलों से
सज गये सिंहासन
नाकामी के ढूंढते बहाने
कमअक्ली जाहिर होने के डर में
सयानों से राय नहीं लिया करते।
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Saturday, February 4, 2017

बेशरमी हमेशा बेहद होती है-हिन्दी कविता (Besharmi hmesha Behad hoti hai-Hindi Poem)


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हद होती शर्म की
बेशरमी हमेशा बेहद होती है।

याचक खड़ा द्वार पर
हाथ फैलाये
वाणी उसकी कातर
शब्द के पद ढोती है।

कहें दीपकबापू सेवक से
तब तक वफा की आशा करें
जब तक स्वामी न बना
फिर तो सोने की पालकी
उसमें मद बोती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश

Wednesday, January 18, 2017

पेट जिनके भरे सीने उनके तने हैं, मत पूछो उनके महल कैसे बने हैं-दीपकबापूवाणी (Pet jinke Bhare seene Unke tane hain-DeepakBapuWani)

सिंहासन के लिये होता दंगल, घावों से रिसते खून में दिखाते मंगल।
‘दीपकबापू’ भावनाहीन हो गये, शहर भी डराते अब जैसे सूने जंगल।।
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संवेदनहीन शहर में घृणा बढ़ गयी, प्रेम की कीमत यूं ही चढ़ गयी।
‘दीपकबापू’ विश्वास की तलाश छोड़कर, आंख पत्थर में गढ़ गयी।।
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दौलत की चमक बढ़ा देती करचोरी, खर्च करें निर्बाध साथ सीनाजोरी।
‘दीपकबापू’ ईमानदारी का फंदा डाले, देशभक्ति में हाथ से सीते बोरी।।
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मत करना यकीन बात के बंदर हैं, देव दिखें बाहर राक्षस अंदर हैं।
‘दीपकबापू’ शब्दों पर चलाते व्यापार, वह केवल सपनों का समंदर हैं।।
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आम के दर्द की शिकायत खास दरबार में कौन सुने।
चापलूस सजे रत्न की तरह, जनकल्याण पर मौन बुने।।
मन का हाल आंख में छप जाता, शब्द सहमे बाहर आते,
‘दीपकबापू’ भौपूओं की महफिल में मधुर स्वर कौन चुने।।
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पेट जिनके भरे सीने उनके तने हैं, मत पूछो उनके महल कैसे बने हैं।
‘दीपकबापू’ दान दया का लगाते नारा, मन में लोभ के बादल घने हैं।।
अन्ना के चेले वोट की राजनीति में व्यापार में उनका नाम तक नहीं लेते। क्या दिलचस्प है?
भयातुर कभी भ्रष्ट से नहीं लड़ पाते, कातर कभी कष्ट से नहीं लड़ पाते।
‘दीपकबापू’ स्वार्थ के जाल में फंसे, परमार्थ में पत्ता भी नहीं जड़ पाते।।
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सपनों के व्यापार में सभी लगे, दौलत को निरंतर ताड़ते सभी जगे।
‘दीपकबापू’ स्मृतियां रहती क्षीण, खाली रहे ग्राहक फिर भी सदा भगे।।
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पत्तल छोड़कर सब थाली में खाने लगे, संगीत में शोर अब बजाने लगे।
‘दीपकबापू’ कोयल का सुर पहचाने नहीं, तालियों पर मेंढक टर्राने लगे।।


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Tuesday, January 10, 2017

बहते जाना आसान नहीं है-हिन्दी कविता (Bahate jana asan nahin hai-Hindi Poem)

हृदय की धड़कनों के साथ
बहते जाना आसान नहीं है
संवेदना की नाव में
सवार होना भी जरूरी है।

जुबान के शब्दों की लहर के साथ
बहना आसान नहीं है
सामने सवालों के झौंके
आना भी जरूरी है।

‘दीपकबापू’ पत्थरों पर
रंगीन स्याही से लिखना
बहुत आसान नहीं है
विचारों के जंगल में
घुसना भी जरूरी है।
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Friday, November 4, 2016

अमर शब्द-लोकतंत्र में सेवक स्वामी-दो कवितायें (Amar Shabd And boss of Democracy-Two Hindi Poems)

अमर शब्द-हिन्दी कविता
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मरना मारना
सदियों से चल रहा है

शिकारी के घर चिराग
शिकार के खून से ही
जल रहा है।

कहें दीपकबापू जीवन में
किसी के जन्म पर जश्न कैसा
मरने पर सियापा कैसा
वही कवि हुए अमर
जिनका शब्द
राम नाम के साथ
अब भी मचल रहा है।
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लोकतंत्र में सेवक स्वामी-हिन्दी व्यंग्य कविता
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लोकतंत्र के पर्दे पर कलाकार
कभी नायक 
कभी खलनायक की
भूमिका निभाते हैं।

कभी परस्पर मित्र
कभी शत्रुता निभाते हैं।

कहें दीपकबापू यह खेल है
पैसा फैंकने वाले
बन जाते निदेशक
लेने वाले इशारा मिलते ही
कभी सेवक 
कभी स्वामी की भूमिका निभाते हैं।
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Wednesday, October 19, 2016

पतंजलि नाम की छाप अगर व्यापार से जुड़ेगा तो उसका मजाक भी जरूर बनेगा-हिन्दीसंपादकीय (Patanjali Name when Linkd with Brand for Tread than would cartoon-Hindi Editorial)

                     देशी हो या विदेशी व्यापार उसमें ऊंच नीच होता ही है।  अनेक छाप लगाकर विभिन्न वस्तुयें बाज़ार में बेची जाती हैं।  इन्हीं छाप में कहीं कहीं धर्मिक प्रतीकों का उपयोग होता है।  हमने बचपन में बीड़ी और साबुन पर हिन्दू प्रतीकों का उपयोग होते देखा है-तब कोई विरोध नहीं करता था। फिर अचानक पूरे विश्व में धर्म के प्रति जनजागरण हुआ।  भारत में राममंदिर आंदोलन ने भारी जनजागरण किया।  इसके बावजूद धार्मिक प्रतीकों की छाप उपयोग में लायी जाती रही है-इतना जरूर है कि बीड़ी या सिगरेट पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती पर कहीं चप्पल या जूते पर छाप आ जाये तो हाहाकार मच जाता है।  प्रश्न यह है कि बीड़ी पर धार्मिक प्रतीक छपता है तब यह धार्मिक ठेकेदार कहां जाते हैं जबकि चप्पल या जूते से यह बुरी चीज है! हमारा तो मानना है कि धार्मिक प्रतीक या नाम का उपयोग किसी तरह की वस्तु के साथ जोड़ना वर्जित होना चाहिये-इसके लिये भी सरकार से हस्तक्षेप की बजाय हम धर्म के ठेकेदारों से यह कहेंगे कि वह इसका विरोध कर जनता में धार्मिक प्रतीक या नाम के छाप वाली वस्तु के बहिष्कार की प्रेरणा उत्पन्न करें।
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                    नोट-इस विचार का संबंध उस कार्टून से कतई नहीं है जोहमने पंतजलि क्रीम को लेकर बनाया गया।  हम जैसे अध्यात्मिक साधक पंतजलि को योग साधना का प्रवर्तक ़या कहें भगवान ही मानते हैं।  उस कार्टून में पतंजलि का नाम देखकर पीड़ा हुई पर यह उनकी प्रेरणा है कि जल्दी उससे उबर भी गये। तब एक प्रश्न दिमाग में भी आया कि क्या कोई पतंजलि के नाम का उपयोग अपनी वस्तुओं केवल इसलिये कर सकता है कि वह स्वदेशी विचाराधारा का पोषक है।  वैसे भी पतंजलि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित नाम हो चुका है अतः देश की सीमाओं में उन्हें बांधना ठीक नहीं है।  बात यह भी आई कि जब आप किसी का नाम छाप के रूप में अपनी वस्तुओं में उपयोग करते हैं तो उसका मजाक उड़ाने का विरोध यह कहकर नहीं कर सकते कि इससे हमारी धार्मिक भावनाओं पर ठेस लगती है।  बहरहाल हम पहले ही लिख चुके कि ऊपर लिखे गये विचार से हमारे नोट का कोई संबंध नहीं है। लिखते लिखते कहां पहुंच जाते हैं यह हमें बाद में पता चलता है जब पाठ पूरा हो जाता है।
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                         तिहरे तलाक पर अंग्रेजी  और हिन्दी समाचार चैनल इतना समय बर्बाद कर चुके हैं कि उन्हें यह समझाना जरूरी है कि भईये तुम केवल हिन्दूओं की समस्याओं पर ही ध्यान दो।  मूल रूप से पहले तो यह तय करो कि हिन्दू धर्म या जीवन शैली-हमारा मानना है कि यह जीवन शैली है जिसका यहां की भूमि, भाषा तथा भावना से संबंध है। यहां विदेशी विचाराधारायें अपनी जगह स्थाई रूप से नहीं बना सकती है क्योंकि उनका उद्गम स्थल कहीं अन्यत्र है।  भारतीय या हिन्दू जीवन शैली सभी जगह चल सकती है क्योंकि उसमें अध्यात्मिक ज्ञान समाया हुआ है। दरअसल हमारे हिसाब से तो धर्म का संबंध कर्म तथा आचरण से है उसका कोई नाम नहीं हो सकता। धर्मनिरपेक्ष तो वही लोग होते हैं जिनका संबंध कदाचरण से है-ऐसे लोगों की संख्या कम होती है। इसलिये कोई भला आदमी यह कह ही नहीं सकता कि ‘मैं धर्म निरपेक्ष हूं।’ ट्रंप से हिन्दूओं की जीवन शैली, व्यवहार और व्यवसाय से प्रभावित होकर प्रशंसा की है जिसका सीधा संबंध हमारे क्षेत्र में उत्पन्न एक ऐसी अध्यात्मिक विचाराधारा से है जो सदाबहार है।

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