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Friday, November 4, 2016

अमर शब्द-लोकतंत्र में सेवक स्वामी-दो कवितायें (Amar Shabd And boss of Democracy-Two Hindi Poems)

अमर शब्द-हिन्दी कविता
--
मरना मारना
सदियों से चल रहा है

शिकारी के घर चिराग
शिकार के खून से ही
जल रहा है।

कहें दीपकबापू जीवन में
किसी के जन्म पर जश्न कैसा
मरने पर सियापा कैसा
वही कवि हुए अमर
जिनका शब्द
राम नाम के साथ
अब भी मचल रहा है।
--
लोकतंत्र में सेवक स्वामी-हिन्दी व्यंग्य कविता
--------------
लोकतंत्र के पर्दे पर कलाकार
कभी नायक 
कभी खलनायक की
भूमिका निभाते हैं।

कभी परस्पर मित्र
कभी शत्रुता निभाते हैं।

कहें दीपकबापू यह खेल है
पैसा फैंकने वाले
बन जाते निदेशक
लेने वाले इशारा मिलते ही
कभी सेवक 
कभी स्वामी की भूमिका निभाते हैं।
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Friday, May 20, 2016

सोफे पर चिंत्तन-हिन्दी कविता (Thoughts on Sofa-Hindi Poem)

धूप की तपिश से दूर
जिन्होंने बैठक पायी
पानी की प्यास नहीं जाने।

सोफे पर पांव पसारे
करते हैं चिंत्तन
गरीबी दूर करने की ठाने।

कहें दीपकबापू भीड़ में
भाषण करने की कला
सभी को नहीं आती
हो गये जो महारथी
शब्द तीर की तरह बरसाते
भाषा का धनुष ताने।
-----------
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Thursday, May 5, 2016

मशहूरी का खेल-हिन्दी कविता(Play of Popularty-Hindi Poem)

अपना दिल साफ नहीं
परायों पर बदनीयती का
इल्जाम लगाते।

योग्यता के अभाव में
भला काम होता नहीं
ज़माने में कसूर जताते।

कहें दीपकबापू मशहूरी के
खेल में जीतने वाले गरियाते
हारने वाले भी
कभी नहीं पछताते।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Tuesday, April 19, 2016

धर्म का खेल-हिन्दी कविता (Play Of Religion-HindiPoem)

धर्म को खेल समझें
गेंद की तरह
लोग बदल देते हैं।

एक इष्ट से न मिले फल
दिल में जगह
उसकी बदल देते हैं।

कहें दीपकबापू न लें साथ
उनका जिनकी नीयत में
बदलने की आदत शामिल है
काम क्रोध व लोभ की आंच में
वह जनक जननी भी बदल देते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Saturday, April 9, 2016

बिकने की शय-हिन्दी कविता (Bikne ki Shay-Hindi Kavita)

जिंदा रहने की शर्तें
हम स्वयं ही
दिल में तय कर देते हैं।

जिंदगी के खेल में
जीत की चिंता
हार का भय भर देते हैं।

कहें दीपकबापू सद्भावना से
जीने की चाहत सभी की होती
मगर अहंकार के बाज़ार में
बिकने की शय कर देते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Tuesday, March 22, 2016

विज्ञापन के नायक-हिन्दी कविता (Vigyapan ke Nayak-Hindi Kavita Hero Of Add-HindiPoem)

विज्ञापन के प्रभाव में
कभी कभी
तुच्छ इंसान भी
नायक बन जाते हैं।

संगीत के शोर में
बुरे स्वर के स्वामी भी
महान गायक बन जाते हैं।

कहें दीपकबापू दौलत से
गुण नहीं मिलते
पर खर्च करने से
नाकाम भी लायक बन जाते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Saturday, March 12, 2016

प्रकाशपुंज अंधेरे से हारते लग रहे हैं-हिन्दी कविता(Prakashpunj Andhere se harte lag rahe hain-HindiKavita)

शहर में खड़ी
आकर्षक इमारतों में
घर टूटे लग रहे हैं।

सड़क पर चलती
रंगबिरंगी कारों में
सवार सोते से जग रहे हैं।

कहें दीपकबापू आराम से
जीना भूल गया ज़माना
ढूंढ रहा सुख का खजाना
बृहद प्रकाशपुंज भी
अंधेरे से हारते लग रहे हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Wednesday, March 2, 2016

सवाल बवाल-हिन्दी कविता(Sawal Bawal-Hindi Kavita)

खामोश रहें तो
करते शिकायत 
हम नहीं सवाल करते हैं।

अपने शब्द कहें तो
अपने अर्थ लगाकर
बवाल करते हैं।

कहें दीपकबापू हृदय में
जिनके छाया अंधेरा 
प्रकाश मांगते उधार में
आदर्श की बातें करते
घर में ज़माने भर का
माल भरते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Saturday, February 20, 2016

पतझड़ की नयी सुगंध-हिन्दी कविता (Patjhad ki nayi sugandh-Hindi Kavita)

उपवन में फूल के साथ कांटे
कमल के साथ कीचड़ भी है
दोनों का नाता देख
अपनी जिंदगी के 
हसीन पलों से जुड़े
गम के दर्द का
अहसास कम हो जाता है
बसंत के पीछे
पतझड़ यूं ही नहीं आता
ऋतु परिवर्तन से
नयी सुगंध भी साथ लाता है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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