Saturday, May 30, 2015

कंपनी दैत्य का प्रसाद-हिन्दी कविता(kanpany daitya ka prasad-hindi poem)


भोजन जल्दी खाना है
या पकाना
पता नहीं
मगर जहर तो न पकाओ।

दुनियां में अधिक खाकर
आहत होते हैं लोग
भूख से मरने का
भय दिल में न लाओ।

कहें दीपक बापू जिंदगी में
पेट भरना जरूरी है
जहर खायेंगे
यह भी क्या मजबूरी है
घर की नारी के हाथ से बने
भोजन के मुकाबले
कंपनी दैत्य के विषैले
चमकदार लिफाफे में रखे
प्रसाद को कभी अच्छा न बताओ।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Sunday, May 24, 2015

स्वर्ग का सपना-हिन्दी व्यंग्य कविता(swarga ka sapana-hindi satire poem)

जमीन पर पैदा
फरिश्तों का समूह
पिछड़ेपन का अंधेरा छांटेगा।


विकास के बादल
साथ लिये
दौलत पानी की तरह
गरीबों में बांटेगा।

कहें दीपक बापू सपनों का स्वर्ग
धरती पर उतर आयेगा,
रौशनी इतनी होगी
आंखों में अंधेरा छायेगा,
हर कसूर माफ होगा
गलती पर कोई नहीं डांटेगा।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Monday, May 18, 2015

ज़माने के अंतद्वंद्व-हिन्दी कविता(zamane ke antardwandwa-hindi poem)


कुछ लोगों के घर
अन्न और धन के भंडार से
इसलिये भर जाते क्योंकि
धरती पर कुछ लोग भूखे हैं।

अमीर लोग नहा रहे
रोज शाम इसलिये शराब में
क्योंकि कुछ लोगों  के गले
हमेशा प्यास से सूखे हैं।

कहें दीपक बापू प्रेम की धारा
इसलिये प्रवाहित कर रहे हैं
पेशेवर समाज सेवक
क्योंकि अपनी हालातों से
जूझते लोग दिल से रूखे हैं।
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Sunday, May 10, 2015

जज़्बातों कातिल बन जाते पहरेदार-हिन्दी कविता(jazbaton ke quatil ban jate paharedar-hindi poem)


सपना सभी का होता है
मगर राज सिंहासन तक
चतुर ही पहुंच पाते हैं।

बादशाहों की काबलियत पर
सवाल उठाना बेकार हैं
दरबार में उनकी
अक्लमंद भी धन के गुलाम होकर
सलाम बजाने पहुंच जाते हैं।

कहें दीपक बापू इंसानों ने
अपनी जिंदगी के कायदे
कुदरत से अलग बनाये,
ताकतवरों ने लेकर उनका सहारा
कमजोरों पर जुल्म ढहाये,
हुकुमतों के गलियारों में
जज़्बातों के कातिल भी पहरेदारी
करने पहुंच जाते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Monday, May 4, 2015

हिन्दी के पतन की आशा या आशंका-हिन्दी लघु व्यंग्य(hindi ka patan ki asha ya ashanka-hindi short satire)

एक टीवी चैनल पर एक उद्घोषक ने कहा-‘‘नेपाल में उम्मीद से कहीं अधिक नुक्सान हुआ है।’’
नुक्सान की कभी उम्मीद या आशा नहीं होती वरन् डर या आशंका होती है। किसी घटना के होने की संभावना या अनुमान होता है। इस संभावना को भी आशा या उम्मीद नहीं कहा जा सकता।  ऐसा लगता है कि टीवी चैनलों ने हिन्दी भाषियों पर विज्ञापन थोपकर पैसा कमाने की ऐसी प्रवृत्ति घर कर गयी है कि उन्हें भाषा के मूल शब्दों का अर्थ और भाव ही नहीं मालुम। हमें उन पर तरस नहीं आता क्योंकि वह तो पैसा कमा रहे हैं। हमारे यहां कमाने के हजार खून माफ हैं। अफसोस इस बात का है कि बहसों के समय ऐसे शब्द आते हैं और कोई विद्वान उन्हें टोकता नहीं है-शायद डरते हैं कि कहीं उन्हें बुलाना न बंद कर दिया जाये।
मुश्किल यह है कि हमें समाचार सुनने की बीमारी बचपन से लगी है। उस पर भाषा ज्ञान लकवाग्रस्त है। कहीं से कोई ऐसा शब्द जो भाव के विपरीत हो सहन नहीं हो पाता। हिन्दी भाषा का श्रवण हो या पाठन धारा प्रवाह में जब कोई शब्द भाव से विपरीत होता है तो मस्तिष्क ठहर जाता है। हमें तो हिन्दी से कमाने वालों से यह आशंका लगने लगी है कि कहीं वह ऐसा हाल न कर दें कि कहीं ऐसी घटनायें सामने न आने लगें जो अर्थ का अनर्थ कर दें। कैसे?
कहीं किसी अस्पताल में किसी सामूहिक दुर्घटटना पर घायल भर्ती हों और उद्घोषक पूछें कि-अस्पताल में भर्ती घायलों के  क्या हाल है?’’
जवाब मिले-‘‘ठीक है, कई गंभीर हैं। उनका इलाज चल रहा है अब उनमें से किसी के भी  परमधाम गमन की कोई आशा नहीं है।’’
संभव है कि आगे चलकर समाज से आशंका और डर शब्द ही गायब हो जायें और अपने घर के बीमार लोगों पर लोग ऐसी बातें कहने लगें। यह सोचकर हमें हिन्दी के पतन की आशंकायें लगती हैं। उन्नति की आशा समाप्त होती नज़र आती है।
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Tuesday, April 28, 2015

वही जीते जिंदगी-हिन्दी कविता(vahi jeete zindagi-hindi poem)


जिंदगी की सासें
कब तक उखड़ेंगी
तय नहीं है

कभी हादसे कभी खुशियां
समय की चाल में
लय नहीं है।

कहें दीपक बापू जिंदा दिली से
वही जीते जिंदगी
जिनके दिल में कोई भी
भय नहीं है।
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Wednesday, April 22, 2015

कोई दिल टूट न जाये-हिन्दी व्यंग्य कविता(koyee dil toot n jaye-hindi satire poem)

पूछते है लोग
तुम दिल पर कोई
रचना क्यों नहीं लिखते।

इश्क के अफसाने
इतने होते जहां में
क्या वह तुम्हें नहीं दिखते।

कहें दीपक बापू दिल ठहरा सौदागर
कभी किसी के जिस्म पर
जज़्बात छिड़कता है,
किसी सामान की किस्म पर
लात थिरकता है,
सर्वशक्तिमान के रूप भी
विज्ञापन के प्रचलन से
चुनता है,
चाहिये जहां भंवर से
पार होने के लिये सत्य की नाव
वह भ्रम के जाल बुनता है,
लोगों के जिस्म का
सबसे ताकतवर अंग दिल
कमजोरी का शिकार होता
कोई टूट न जाये
इसलिये उस पर कोई
व्यंग्य हम नहीं लिखते।

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Wednesday, April 8, 2015

नकल मार्ग का राहगीर तो नहीं-हिन्दी कविता(nakal marga ka rahgir to nahin-hindi poem)


अब तो काबिल इंसान पर भी
यह सोचकर शक होता है कि
वह नकली तो नहीं।

नकली उपाधियां भी
शिक्षा के बाज़ार मे बिकतीं
गुरु बदल देते
परीक्षा के समय
चेले की शक्ल भी कहीं।

कहें दीपक बापू समस्याओं से
नहीं लगता लोगों को अब डर
घबड़ाते हैं यह सोचकर
इलाज के लिये चिकित्सक
पढ़ाने के लिये शिक्षक
बचाने के लिये रक्षक
नकली मार्ग से
गुजरकर आया राहगीर तो नहीं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Friday, April 3, 2015

गम भुलाने के बहाने भी लूट लेते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता(gam bhulane ke bahane bhi dhoondh lete hain-hindi satire poem)


अपने अपने भाग्य का
हिस्सा  सभी बड़े मजे से
लूट लेते हैं।

सर्वशक्तिमान की कृपा हो तो
अपने काम से बचने की भी
छूट लेते हैं।

कहें दीपक बापू अधिकार पर
सभी दावा करते हैं,
अपने कर्तव्य की बात से
बेहद डरते हैं,
अमीरों का दबदबा ऐसा
सर्वशक्तिमान के दरबार में दर्शन
मयखानों में मय पीने के लिये
गरीबों के गम भुलाने के बहाने भी
लूट लेते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Sunday, March 29, 2015

आप और हम-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(aap aur hum-hindi satire poem's)

सड़क से राजमहल में
जिन्होंने पहुंचा दिया
उनकी शिकायत
अब वह कर रहे हैं।

कहार बनकर
उठाये थे दर्द का बोझ
उनसे ही हिकारत
अब वह कर रहे हैं।

कहें दीपक बापू जिंदगी के खेल में
मतलब के हिसाब से
रिश्त बनते और बिगड़ते
साथी सिंहासन तक के होते
कारिंदों पर नज़रे इनायत
अब वह कर रहे हैं।
------------
गम क्यों करते हो
तुमने अगर मंजिल तक
जिन्हें पहुंचाया
अब वह मुंह फेर रहे हैं।

पहले अपना दर्द
तुम्हें भेंट कर
उन्होंने हमदर्दी बटोर ली
अब तो पेशेवर कारिंदे
 उनको घेर रहे है।

कहें दीपक बापू ज़माने पर
रोना बेकार है
सड़क पर क्यों कोई
आराम पायेगा
राजमहल में पहुंचे
लोगों के पास भी
बेचने के लिये दर्द के
सौदे ढेर रहे हैं।

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Tuesday, March 24, 2015

खिलौनो का खिलवाड़-हिन्दी कविता(khilono ka khilwad-hindi poem)




अब पुराने मकान
नयी इमारत में
अपना रूप बदल रहे हैं।

धरती से निकली गैस
आकाश में करती छेद
सूरज की आग से गर्माते शहर
अपना रूप बदल रहे हैं।

कहें दीपक बापू इंसानों पर
पत्थर और लोहे के
रंगबिरंगे टुकड़ों से
खेलने का नशा छाया
दिल बहलाने वाले खिलौने
खिलवाड़ करने के लिये
अपना रूप बदल रहे हैं।
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Wednesday, March 18, 2015

आधुनिक वीर-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(adhunik veer-hindi satire poem's)



सेवक बनकर आते

बड़े घर पर कर कब्जा

स्वामी जैसा रखते अहंकार।



कहें दीपक बापू आज के वीर

अपनी आवाज के शोर

 बिना धनुष बाण करते टंकार।।

-----------



बातें बड़ी करने वाले

सभी जगह मिल जाते

काम का समय आये

अपनी जगह से हिल जाते हैं।



कहें दीपक बापू परिश्रम की

प्रशंसा करता ज़माना

मगर मुफ्त के माल से

सभी के चेहरे खिल जाते हैं।
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Thursday, March 5, 2015

ज़माने से कब तक छिपाओगे-हिन्दी कविता(zamane se kab tak chhipaoge-hindi kavita)



कपड़े साबुन से धो लोगे

मगर नीयत के काले दाग

ज़माने से कब तक छिपाओगे।



अपना दर्द भुला दोगे

मगर जिस अपने ही

कसूर से खाये जख्म

ज़माने से कब तक छिपाओगे।



कहें दीपक बापू निर्भयता की

बातें करते हो

अपने कारनामों का

भय तुम्हारे मन दिल में है

ज़माने से कम तक छिपाओगे।
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Sunday, February 22, 2015

धुऐं में मद और दर्द उड़ाते-हिन्दी कविता(dhuen mein mad aur dard udate-hindi poem)




धन का मद सिगरेट
निर्धनता का दर्द बीड़ी के
धूऐं में लोग यूं ही उड़ाते हैं।


मिटते नहीं मस्तिष्क के तनाव
धूऐं के साथ
फिर इंसान की तरफ
मुड़ आते हैं।

कहें दीपक बापू ताजी हवा में
सांस लेना भूल गया ज़माना,
ख्वाहिशों की आग में
जल रहा अब भी परवाना,
स्वर्ग की चाहत में
आकाश में उड़ते लोग
गिरते जमीन पर
नरक से जुड़ जाते हैं।
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