Tuesday, February 10, 2015

एक चेहरे के पीछे भीड़-हिन्दी कविता(ek chehare ke peechhe bheed-hindi poem)



एक चेहरा आगे

दिखता है

पीछे नरमुंडों की

भीड़ चली आती है।



एक चरित्र के पीछे छिपे

बहुत से लोगों की

नीयत की पहचान

भला किसे हो पाती है।



कहें दीपक बापू खूबसूरत मुखौटों पर

ज़माना फिदा हो जाता है,

सपनों की मस्ती में खो जाता है,

काले बाज़ार के सौदागर

अपने खेल के लिये

इंसानों के रूप में मुखौटे

बाज़ार में सजा लेते हैं

दिखते हैं वह लोगों के

भले करने के लिये तत्पर

यह अलग बात है

वफा आकाओं के पास

हमेशा गिरवी नज़र आती है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Monday, February 2, 2015

खंबे पर कभी रौशनी कभी अंधेरा-हिन्दी कविता(khambe par kabhi roshni kabhi andhera-hindi poem)



सड़क पर खड़ा
बिजली क   खंबा
कभी बल्ब की रौशनी से
राहगीरों का बनता सहारा
कभी स्वयं ही अंधेरे में
डूब जाता है।

लगता है कभी
रौशनी के लिये हुआ दीवाना
कभी जैसे उससे ऊब जाता है।

कहें दीपक बापू नरमुंडों के जंगल में
जिसके हाथ में प्रबंध की
बागडोर होती
चतुर कहलाता है,
शिकायतकर्ता को
मूर्ख बताता है,
कोई कोई ज्ञानी भी है
जो खंबे की जिंदगी की
पहेली बूझ जाता है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Friday, January 23, 2015

बहार के लिये तरसायेंगे-बसंत पंचमी पर हिन्दी कविता(bahaar ke liye tarsayeng-basant panchami par hindi poem)



बसंत में भी वह
बहार के लिये
ज़माने को तरसायेंगे।

कर ली दुनियां मुट्ठी में
फिर भी बैचेन हैं
यह सोचकर कि
बहती प्राकृतिक हवा पर
कब नियंत्रण पायेंगे।

कहें दीपक बापू उनकी जुबां से
खूबसूरत शब्द
बहते चले आते ,
हर बार कोई
नया वादा साथ लातें,
रोज का यह चलन हो गया है
हम भी हर बार ताली बजायेंगे।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Wednesday, January 14, 2015

आकाश के फरिश्तों के नाम पर-हिन्दी कविता(akash ke farostone ke naam par-hindi poem)



आदर्श चालचलन के

कायदे ज़माने को

सर्वशक्तिमान के दलाल

चालाकी से समझाते हैं।





आकाश में फरिश्तों के नाम पर

जो जुटा रहे दो जून की रोटी

ताकत दिखाने के लिये

चेलों का जमघट लगाते हैं।



कहें दीपक बापू तर्क की बात

किसी से करना बेकार है

जिनकी खिचड़ी बन रही

प्रचार की आग पर

चमकने के लिये

बकवादी भी बन जाते हैं।
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Sunday, January 4, 2015

विरोधी की सेवा कर चुके व्यक्ति पर नज़र रखना चाहिये-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन लेख(A Hindu hindi article based on kautilya economics)





            पोरंबदर के जलक्षेत्र में भारतीय समुद्री रक्षकों ने एक नाव को रोकने का प्रयास किया तो उसमें बैठे सवारों ने आत्मघाती कदम उठाते हुए अपना ही जलयान उड़ा दिया। कहा जा रहा है कि यह घटना पड़ौसी देश का भारत के विरुद्ध छद्मयुद्ध के रूप में आतंकवादी गतिविधियां चलाने का एक भाग थी।  अभी इस घटना की जांच चल ही रही है पर कुछ भारतीय पत्रकारों ने अपनी ही सेना पर शंका जाहिर करते हुए इस नाव पर तस्करों या मछुआरों के सवार होने और उनके  मारे जाने की बात कही जा रही है। पड़ौसी देश तो पहले ही नहीं मान रहा था कि उसने कोई कोई आतंकी नाव भेजी है पर कुछ भारतीय बुद्धिमानों भी एक तरह से उसकी हां में हां मिलाकर विश्व जनमानस में संदेह फैला दिया।  एक बुद्धिमान तो इतना आगे बढ़ गया कि उसने कहा कि कहीं इस पर मछुआरे हुए तो पड़ौसी देश भी हमारे ही मछुआरों पर हमला कर सकता है।  उसके बयान के 12 घंटे बाद ही पड़ौसी देश ने दो भारतीय नावें पकड़ ली जिसमें 24 मछुआरे शामिल थे।  ऐसे में यह सवाल किसी के मन में आ सकता है कि क्या उस बुद्धिमान ने इस तरह का संदेश कहीं पड़ौसी देश तक तो नहीं पहुंचाया कि वह इस तरह बदले की कार्यवाही करे।  हम उस बुद्धिमान पर आक्षेप नहीं कर रहे पर कभी कभी यह लगता है कि बौद्धिक क्षेत्र में अनेक लोग ऐसे हैं जो अपने ही देश के विरुद्ध सक्रिय दिखते हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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अकारणादेव हि कारणद्वा व एव कश्वित्पुरुषोऽरिसेवी।
निजश्वविशिलष्टउपेतशस्त्र आयाति यस्तस्य गर्ति प्रपश्येत्।।
            हिन्दी में भावार्थ-अकारण या किसी कारण से जो शत्रु की सेवा कर चुका हो अगर वह फिर से वापस आकर अपने साथ मिले तो उस नज़र रखना ही चाहिये।

            हमारे देश में लोकतंत्र है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का देश की प्रतिष्ठा धूल में मिलाने के लिये में उसका उपयोग किया जाये। निष्पक्ष दिखने की ख्वाहिश भी इस तरह के समाचारों पर आपत्तियां उठाने की प्रेरक हो सकती है पर इससे देश की सेना के मनोबल पर पड़ सकता है इस पर ध्यान देना चाहिये।  सबसे बड़ी बात जो बुद्धिमान जलीय क्षेत्र में हुई इस घटना पर जिस तरह विश्लेषण कर रहे हैं उससे यह प्रश्न उठता है कि उनके पास सैन्य विषयों का अनुभव कितना है? प्रथ्वी और जल क्षेत्र में अंतर होता है। जल और थल सेना के काम करने के तरीके में भी अंतर होता है। प्रथ्वी के नियम जल क्षेत्र में नहीं चलतें। हमारे देश के बुद्धिमान इस घटना पर ऐसे बोल रहे हैं जैसे जमीन पर यह सब हुआ है।
            बहरहाल ऐसे लोग पर अन्य बुद्धिमान लोगों को नज़र रखना चाहिये।  हमारी जलसेना ने पहली बार आतंकवादी के विरुद्ध ऐसी कार्यवाही की है।  ऐसा माना जाता है कि भारत में समुद्री क्षेत्र से ही आतंकवादियों के अस्त्र शस्त्र और देश के युवाओं को तबाह करने के लिये मादक पदार्थ आते हैं।  इसलिये कहीं इस तरह के प्रचार से भारतीय जलसेना का मनोबल गिराने या उत्साहवर्द्धक सक्रियता की जगह भयवश निष्क्रियता में लगाने का प्रयास तो नहीं हो रहा-यह देखते रहना चाहिये।

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Monday, December 29, 2014

मन और बुद्धि के ज्ञान बिना जीवन विज्ञान अधूरा-हिन्दी चिंत्तन लेख(man air buddhi ke gyan bina jivan vigyan ahdura-hindi thought article)



            हमारे देश में अंग्रेजी विद्वान लार्ड मैकाले की उस शिक्षा पद्धति से छात्रों को अध्ययन कराया जा रहा है जो केवल पूंजीस्वामियों के बंधुआ बनने की योग्यता प्रदान करती है।  उपलब्धि के नाम पर सुविधाओं का उपभोग ही जीवन का लक्ष्य सुझाती है।  इस समय शिक्षा पद्धति में बदलाव बहस चल रही है तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के तत्वों का उसमें समावेश करने का यह कहते हुए विरोध हो रहा है कि इसमें केवल भारतीय धर्म का प्रचार है जिससे देश में रह रहे अन्य विचारधाराओं को मानने वाले आहत हो सकते हैं।
            एक विद्वान ने पाश्चात्य जीव विज्ञान की सीमा बताते हुए कहा था कि उसमें केवल जीव की देह निर्माण और संचालन के सिद्धांत हैं पर मन के साथ बुद्धि तत्वों के सूत्रों का उसमें वर्णन नहीं होता। मन और बुद्धि के ज्ञान के  बिना पाश्चात्य जीव विज्ञान अधूरा है। इसी मन और विज्ञान के सूत्रों पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में विस्तृत प्रकाश डाला गया है जिसके बिना कोई भी शिक्षार्थी पाश्चात्य संस्कारों से पैदा अंधेरे से बाहर निकल नहीं सकता।  भोग का कोई अंत नहीं है। एक वस्तु प्रयास करने पर पाओ दूसरे की आवश्यकता अनुभव होने लगती है। एक बार सुबह खाना खाओ तो दोपहर और उसके बाद शाम के खाने की चिंता भी साथ लग जाती है। भोजन, वस्त्र और भवन के संग्रह को ही श्रेष्ठ व्यक्ति होने का प्रमाण मान लेना अज्ञान के अंधेरे में ही भटकना है।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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सहस्त्रोपृलुत्य दुष्टेभ्यो दुष्करं सम्पदाजर्जनाम्।
उपायेन पदं मूर्धिन न्यास्यतो मतहास्तिनाम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-हजारों दुष्टो से उपद्रव को प्राप्त होने से उन पर आक्रमण कर संपत्ति का अर्जन करना कठिन है पर उपाय से तो मतवाले हाथियों के मस्तक पर भी पांव रख दिया जाता है।
वाह्यमानमयःखण्डं स्कन्धनैवापि कृन्ताति।
तदल्पमपि धारावद्धवर्तीप्सितसिद्धये।।
            हिन्दी में भावार्थ-कंधे पर भार के रूप में लदा लोहस नहीं काटता पर उससे बना तीखी धारा वाला हथियार कम भारी होने पर भी कष्ट देता है।

            हम अक्सर भारतीय धर्म की रक्षा की बात करते हैं। इतना ही नहीं अनेक उत्साही तो शस्त्र और धन के सामर्थ्य से धर्म के विस्तार की बात करते हैं। उन्हें यह बात समझ लेना चाहिये कि किसी भी समाज की शक्ति उसके सदस्यों की बृहद संख्या नहीं वरन् उनकी कार्य करने की क्षमता है। इस मामले में यहूदियों से सीखा जा सकता है। हिटलर के अनाचारों के बाद वह फिर संगठित हुए और आज इजरायल नाम का एक छोटा राष्ट्र बनाकर पूरे विश्व में प्रभाव रखते हैं।  अपने पड़ौसी देशों की उग्रवादी निर्ममता के विरुद्ध न केवल संघर्षरत हैं वरन् अन्य देशों को भी आतंकवाद से लड़ने में इजरायल सहयोग कर रहा है। वहां की प्रशासन व्यवस्था जनहित के अनुकूल है इसलिये वहां के नागरिक अपने देश के प्रति अत्यंत संवेदनशील रहते हैं।
            हम जब धर्म रक्षा की बात करते हैं तो एक बात याद रखना चाहिये कि मनुष्य अपनी दैहिक आवश्यकताओ के पूर्ण होने के बाद ही मानसिक रूप से दृढ़ हो सकता है। इसके लिये यह जरूरी है कि उसके पास अध्यात्मिक ज्ञान हो।  यह ज्ञान हमारे प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से ही मिल सकता है।


लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Monday, December 22, 2014

नाटकीयता से संवदेना मर जाती है-हिन्दी कविता(natkiyata se sanvedna mar jati hain-hindi poem)



सभ्य इंसानों की
शायद कायरता से
पहचान होती हैं।

स्त्री पर होता
आक्रमण सड़क पर
दृश्य देख रहे नरमुंडों की
खामोशी में जान होती है।

कहें दीपक बापू नाटकीयता से
सतत नाता रखने पर
हृदय की संवेदनायें
मर जाती हैं,
ख्वाबी नायकों के प्रशंसक सभी
खूनखराबे के सच
जब भी सामने आये
अक्ल और आंखें डर जाती हैं,

मनोरंजक कहानियां सच लगती,
अपढ़ों से ज्यादा
पढ़े लिखे लोगों को ठगती,
चालाकी के पैसे से भरी
उनमें जान होती है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Monday, December 15, 2014

दौलत पंख नहीं होती-हिन्दी कविता(daulat pankh nahin hoti-hindi poem)



दौलत वह पंख नहीं है
जिसे लगाकर इंसान
आकाश में उड़ जाये।

कितनी भी महंगी हो एय्याशी
इतनी नहीं कि ओहदे की तरह
नाम के साथ जुड़ जाये।

कहें दीपक बापू यह खुशफहमी
बड़े लोगों में रहती है,
उनके बोल भी बड़े हैं
नहीं जानते
जनता उनको कैसे सहती है,
हट जाती है भीड़ उनके सामने से
जब वक्त दूसरी तरफ मुड़ जाये।
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Tuesday, December 9, 2014

शिखर पर वाणी का अलंकरण-हिन्दी कविता(shikhar par wani ka alankaran-hindi poem)



पद पैसे और प्रतिष्ठा के
शिखर पर आकर
हर कोई वाणी के नियम से
मुक्त हो जाता है।

चला न जाता
स्वयं जिस पथ पर
उसके प्रदर्शक बनने की
योग्यता से युक्त हो जाता है।

कहें दीपक बापू रबड़ की जीभ
धरा पर  तलवार की तरह चलती
 तब कोई नहीं देखता
चढ़ जाये सफलता के सिर पर
हर किसी की नज़र में
इंसान का मुख वाक्य
अलंकार से संयुक्त हो जाता है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Tuesday, December 2, 2014

शब्दों के अर्थ और मायाजाल-हिन्दी कविता(shabdon ke arth aur mayajal-hindi poem)



बाहर हंसने की
नाकाम कोशिश करते लोग
मगर उनके दिल टूटे हैं।

शब्दों का मायाजाल
बुनने में सभी माहिर होते
अनुमान नहीं लगता कि
अर्थ कितने सत्य कितने झूठे हैं।

कहें दीपक बापू सभी के दिल
लगे हैं माया जोडने में,
कुछ उड़ाते
वफा का वादा हवा में
कुछ लगे रिश्ते तोड़ने में,
कमाई के जरिये पर
कोई सवाल नहीं करता
जानना चाहते हैं कि
किसने कितने सिक्के लूटे हैं।
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