Tuesday, February 4, 2014

बसंत पंचमी पर बधाई लेख-योगाभ्यासी अधिक आंनद अनुभव करते हैं(basant panchmi par badhai lekh-yagabhyasi adhik anand anubhav karte hain)



         आज पूरे देश में बसंत पंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस अवसर पर बुद्धि की देवी श्री सरस्वती का पूजन किया जाता है। हमारे देश में दिपावली के अवसर पर लक्ष्मी और बसंत पंचमी पर सरस्वती की आराधना करना इस बात का प्रमाण है कि हमारे देश के लोग धन तथा बुद्धि के सामंजस्य से भरा जीवन जीना चाहते हैं। उनमें सांसरिक विषयों के प्रति रुचि स्वाभाविक रूप से वि़द्यमान होने के साथ ही  अपने अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति भी चेतना यथावत है।  आमतौर से अध्यात्मिक दर्शन के प्रति झुकाव रखने वालों के लिये सरस्वती की आराधना अत्यंत महत्व रखती है। जो लोग नियमित रूप से योग साधना तथा हªदय में स्थित ज्ञानार्जन के प्रति जिज्ञासा भाव को शांत करने के लिये अध्ययन के साथ अभ्यास करते हैं उनके लिये श्रीसरस्वती की उपासना हर्ष प्रदान करती है।
      बसंत पंचमी के साथ ही मौसम परिवर्तित होता है।  शीत लहर थमने लगती है और समशीतोष्ण वायु देह तथा मन को प्रफुल्लित करते हुए प्रवाहित होती है। इतना अवश्य है कि इस सुखद वातावरण की अनुभूति में व्यक्तियों की दृष्टि से भिन्नता हो सकती है-कोई इसका अधिक आनंद उठाता है तो कोई कम! जो लोग नियमित रूप से योगाभ्यास करते हैं उनको इसकी सहज पर व्यापक सुखानुभूति अनुभव होती है। उनके रक्त की हर बूंद प्रसन्नता के साथ देह में विचरण करते हुए स्फूर्ति प्रदान करती है।  सामान्य मनुष्य को भी कहीं न कहीं सुखद अनुभव तो होता है पर वह उसे समझ नहीं आता।  उसका मन तथा शरीर कहीं न कहीं अज्ञात भाव से इस वातावरण का लाभ तो उठाता है पर उसे अधिक देर तक साथ नहीं रख पाता। उसमें हार्दिक सुखानुभूति उतनी नहीं दिखाई देती जितनी योगाभ्यासी में दिखती है।
      इस संसार में अनेक विषय है जिनमें मनुष्य का मन इस कदर लिप्त रहता है कि उसे सुख दुःख के साथ जीने का अभ्यास हो ही जाता है। वह जैसी स्थिति होती है उसके अनुरूप ही भाव ग्रहण करता है।  एक तरह से वह बाहरी दबाव से प्रभावित रहता है।  अपनी बुद्धि से मनुष्य कोई सृजन कर उसका आनंद उठाने की बजाय दूसरे के अविष्कार का लाभ उठाना चाहता है।  इसके विपरीत योगाभ्यासी तथा अध्यात्मिक दर्शन साधक अपनी देह की आंतरिक सरंचना में ही सुख का साधन ढूंढता है। कहा जाता है कि अपनी घोल तो नशा होय।  दूसरे के सृजन का लाभ उठाते हुए मन उकता जाता है जबकि अपने प्रयासों से जुटाये गये आनंद के क्षण का भाव स्थायी होता है। नियमित सृजन करने वाला मनुष्य नित्य नये प्रयोग करता है और यह प्रक्रिया उसे अपनी देह की सार्थकता का आनंद देने वाली होती है।
      यही कारण है कि विद्वान तथा ज्ञान साधक लक्ष्मी की बजाय सरस्वती की आराधना करती है। कहा जाता है कि सरस्वती और लक्ष्मी देवी का आपस में बैर है और दोनों कभी साथ नहीं रहती। यह एक भ्रम है क्योंकि दोनों की उपस्थिति प्रथक हो ही नहीं सकती।  यह अलग बात है कि किसी के पास लक्ष्मी देवी तो किसी पर सरस्वती की कृपा की प्रधानता होती है। दोनों की एक साथ प्रधानता हो ही नहीं सकती और होना भी नहीं चाहिए।  जिनके पास धन है उनका अज्ञानी होना ही श्रेयस्कर है क्योंकि वह तब मदांध होकर उसका अपव्यय नहीं कर पायेंगे जिससे कुछ लोगों की रोजी रोटी प्रभावित हो सकती है।  जिनके पास धन अधिक नहीं है उनको सरस्वती माता की ही आराधना करना चाहिए ताकि सांसरिक विषयों से मिली निराशा से मुक्ति पायी जा सके। अंततः सुख और दुःख, आशा तथा निराशा और संदेह और विश्वास मन के भाव हैं जिनका निर्माण बुद्धि ही करती है।  अगर बुद्धि शुद्ध हो तो फिर इस संसार में किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। सरस्वती माता को नमन।
      बसंत पंचमी के इस पावन पर्व पर समस्त ब्लॉग पाठकों, लेखक मित्रों तथा स्नेहजनों को बधाई। हमारी कामना है कि यह पर्व सभी लोगों को प्रसन्नता प्रदान करे।


लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Wednesday, January 29, 2014

पेट सबका बड़ा है-हिन्दी व्यंग्य कविता(pet sabka badha hai-hindi vyangya kavita)



बेचैन जमाना आसमान से फरिश्ता आने के इंतजार में खड़ा है,
दर्द बढ़ा रहा खुद इंसान अपना, हमदर्दी के लिये अड़ा है।
कदम कदम पर खड़े हैं भलाई करने वाले दलाल
अपने लाभ के लिये दिल तोड़ते नहीं होता उनको मलाल।
आला दर्ज के अदाकार हैं अपनी हाथ की सफाई दिखाते,
बचने के लिये अपने बयान में हमेशा दो अर्थ छिपाते।
उनकी हंसी हो या रुदन छिपी रहती है चालाकी,
दूसरे की मदद का सामान समेटत नहीं छोड़ते बाकी।
कहें दीपक बापू करो खुद पर या सर्वशक्त्मिान पर भरोसा,
यहां उदार चेहरे बहुत हैं  पर पेट सबका बहुत बड़ा है।
---------------------


लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Thursday, January 23, 2014

बाज़ार में भलाई की तिजारत-हिन्दी क्षणिकायें(bazar mein bhalai ki tizarat-hindi short poem)





सिंहासन पर बैठने की ख्वाहिश किसे नही होती,

दरबारियों से मुजरा कराने मे खुशी किसे नहीं होती।

कहें दीपक बापू सबका भला करने का पाखंड आसान है,

राजसुख के भोगते हुए त्याग की नीयत किसमें होती।

----------------

उन पर भरोसा कभी न करना जो नारे लगाते हैं,

धरती पर स्वर्ग लाने का वादा मु्फ्त में बरसाते हैं।

कहें दीपक बापू, तिजारत हो गयी है इंसान की भलाई का काम,

बेदर्द बुत दाम लेकर सौदागरों के लिये ईमानदार बन जाते हैं ।

----------

भलाई की तिजारत करते हुए बाज़ार में रोज नये चेहरे आयेंगे,

अपने लफ्जों में भरेंगे नये अंदाज, धोखा पुराना सजायेंगे।
कहें दीपक बापू सिंहासन पर बैठते ही नीयत बदल जाती है
सौदागरों के हाथ में जिनकी डोर, वह बुत क्या तरक्की लायेंगे।


लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Wednesday, January 15, 2014

धार्मिक आस्थाओं पर चोट पहुंचाने का सवाल-हिन्दी अध्यात्मिक चिंत्तन (dharmik aasthaon par chot pahunchane ka sawal-hindi adhyatmik chinntan)



      हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ऐसे कानून बनाये गये हैं जिसमें किसी धर्म के प्रतीक पुरुषों की आलोचना पर अपराध  का प्रकरण कायम किया जाता है।  हम यहां बता दें कि हम किसी भी धर्म के-चाहे जिसे यह लेखक जुड़ा या नहीं  है-प्रतीक पुरुष की आलोचना करना अच्छा नहीं समझते।  इस लेखक का मानना है कि किसी भी धर्म के प्रतीक पुरुष की निंदा करना मूर्खता ही नहीं वरन् तामस प्रवृत्ति या कहें आसुरी प्रवृत्ति की परिचायक है।  कम से कम श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान साधक होने के कारण इस लेखक को यह लगता है कि जब तक कोई दूसरा इच्छुक न हो उसे धर्म का उपदेश भी नहीं देना चाहिये। इतना ही नहीं अपने धर्म सिद्ध और दूसरे को अज्ञानी कहना महान अहंकार का प्रमाण है।
      अब इसका दूसरा पक्ष भी है। यह लेखक धर्म प्रचार को भी एक पाखंड मानता है।  देखा जाये तो धर्म पथ वह है जिसमें अध्यात्म का ज्ञान होने पर जीवन सहजता से चले।  यह नितांत एकांत विषय है। अगर हम अपने धर्म के पथ पर चल रहे हैं तो अपने एक अंदर आत्मविश्वास होता है ऐसे में कोई दूसरा आक्षेप भी करे तो उसकी परवाह नहीं होती।  अगर अपने धार्मिक पुरुष, चिन्ह या संस्कार पर कोई आक्षेप करता है और उसे मन में पीड़ा हो तो वह उसकी मानसिक कमजोरी का ही प्रमाण है।  अगर इस लेखक से कोई कहे कि आप अपने धर्म का प्रचार करो तो वह उसे ठुकरा देगा।  धर्म प्रचार करने का आशय है कि हमने सिद्धि हासिल कर ली है और अब दूसरे को सिखा सकते हैं, यह प्रवृत्ति अहंकार का परिचायक है। चाहे किसी भी धर्म का प्रचारक हो वह कहीं न कहीं अपने समाज का विस्तार किसी धनी, राजकीय, या व्यक्तिगत प्रभाव को बढ़ाने का काम करता है।  उसे कहीं न कहीं से धन मिलता है।  सीधी बात यह है कि कहीं न कहीं उसे अपने लिये कमाने का साधन बनाता है।  सच्चा धर्मभीरु तो वह जो अपना सांसरिक काम करते हुए अपने प्रतीक पुरुष का ध्यान करे।  ऐसे में धर्म प्रचारकों को लेकर यह सवाल उठता है कि उनकी रोजी रोटी कैसे चलती है? तय बात है कि वह कोई अन्य सांसरिक काम नहीं करते।
      भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में अपना संदेश दिया था पर वह अपने सांसरिक कर्म से कभी वह लिप्त नहीं हुए। उन्होंने तो सन्यास को एक कठिन विधा बताया है।  इसलिये उन्होंने कर्मयोग का श्रेष्ठ बताया।  सभी धर्म के प्रचारक कथित रूप से सांसरिक कर्म से लिप्त होकर लोगों को सिखाने चल पड़ते हैं।  यह प्रचार अपनी छवि उज्जवल रखते हैं पर जब कोई उनका विरोध करे तो उनके पीछे से हिंसक तत्व सामने प्रकट हो ही जाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि यह धर्म प्रचारक एक तरह से उस व्यवसायी की तरह होते हैं जो अपना सामान अच्छा बताते हैं।  हमारा मानना है कि जिस तरह किसी व्यवसायी की वस्तु को दोषपूर्ण बताया जा सकता है तो इन व्यवसायी धर्म के ठेकेदारों की वाणी से जब अपने प्रतीक पुरुष की प्रशंसा करते हैं तो कोई व्यक्ति सामने या पीछे प्रतिकूल बात भी कह सकता है।  ऐसे में उस पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाना अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाने जैसा अमानवीय आचरण है।
      आपत्ति हमें इस बात पर भी है कि किसी धार्मिक पुरुष की आलोचना करना गलत है तो सवाल यह है कि आखिर समाज में धर्म के नाम पर अंधविश्वास दूर कैसे किया जाये। हर धर्म प्रचारक अपने प्रतीक पुरुष की प्रशंसा कर लोगों को बहलाते हैं तो दूसरे को भी यह हम होना चाहिये कि वह प्रतिवाद करे। इसे रोकना समाज में धर्म के नाम यथास्थितिवादी बने रहने की वह इच्छा है जिससे शिखर पुरुष अपना नियंत्रण बना रहें।
      दूसरी बात यह कि किसी धार्मिक पुरुष की निजी या उसके संदेश की आलोचना पर धार्मिक भावना भड़कने की बात कहकर किसी एक व्यक्ति पर अपराध कायम करना एक डरपोक कार्यवाही है क्योंकि हर राज्य के पास सामूहिक हिंसा रोकने की शक्ति होती है। लोग अपने धर्म को मानते हैं इसका मतलब यह नहीं है कि वह सब ज्ञानी हैं।  सच बात तो यह है कि हर धर्म के मानने वालों की संख्या बहुत हैं पर उस पर चलते कितने हैं यह सभी जानते हैं।  दरअसल इस तरह के धर्म समूह लोगों में असुरक्षा के भाव से बने हुए हैं जो समय समय सामूहिक हिंसक घटनाओं के कारण भर जाते हैं।  पूरे विश्व में ऐसी अनेक घटनायें हुईं हैं जिस कारण लोग किसी धार्मिक समूह का सदस्य बना रहना ही अच्छा समझते हैं। विश्व के अनेक देश तो कथित धार्मिक राज्य होने का स्वांग करते हैं ताकि लोगों को राजा और सर्वशक्तिमान दोनों के प्रभाव से नियंत्रित रखा जा सके।  यही कारण है कि धार्मिक प्रतीकों या संस्कारों पर टिप्पणियां करना हर कानून में वर्जित किया गया है ताकि समाज में कोई ऐसा बदलावा न आये जिससे शिखर पुरुषों का पतन हो।
      इसलिये कम से कम धर्म के नाम पर आस्थाओं को चोट पहुंचाने जैसे नारे तो अब बंद होना चाहिये।  साथ ही हम यह भी कहना चाहते हैं कि किसी भी धार्मिक प्रतीक पुरुष, चिन्ह या संस्कार पर टिप्पणी कर अपनी श्रेष्ठता दिखाने की बजाय अपने धर्म पथ पर चलकर स्वयं आनंद उठाना चाहिये।  हम अपने स्वयं के धार्मिक आचरण को देखें। यह दूसरे के धर्म पर आक्षेप करने ज्यादा बेहतर स्थिति है।


लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, January 5, 2014

दूसरों का दर्द, अपनी ख्वाहिशें-हिन्दी व्यंग्य कविता(doosron ka dard,apni khwahishen-hindi vyangya kavita



ज़माने को दिखाने के लिये
नये नये स्वांग रचना होता है जरूरी,
नारे लगाते रहो भीड़ में
तख्त पर बैठते ही बना लो वादों से दूरी।
कहें दीपक बापू
नयी नयी अदायें दिखाओ,
पुराने शब्दों की पंक्तियां
नई कहकर सिखाओ,
मुखौटा बदलकर
नया चेहरा दिखाओ,
दौलत चाहे जितनी हो पास
गरीब के बने रहो हमदर्द,
दिल में चाहे अपने सुंदर सपने बसे हो
बेचो बाज़ार में दूसरों का दर्द,
ऊंचाई पर महल भले ही बना लो,
रहने के लिये जमीन पर झौंपड़ी भी तना लो,
दूसरों को आसरे देते रहो
ख्वाहिशें अपनी करते रहो यूं ही पूरी।
 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Thursday, December 26, 2013

चाणक्य नीति दर्शन-नकारा आदमी दूसरों की निंदा कर अपनी श्रेष्ठता जताता है(nikamma aadmo doosron ki ninda kar apani shreshta jataataa hai)



     हमारे देश में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने लोगों की चिंत्तन क्षमता को सीमित कर दिया है। सच बात तो यह है कि लोग मानव जन्म को श्रेष्ठ तो मानते हैं पर उसके फलितार्थ नहीं समझ पाते। पश्चिम की उपभोग संस्कृति से सराबोर समाज में सुविधाओं की वस्तुओं के नये तथा परिवर्तित वस्तुओं को विज्ञान की उन्नति तथा बाज़ार में उनकी उपलब्धता को विकास मान लिया गया है। इस भौतिक विकास से जो दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक विकार  युक्त लोगों के लिये जीवन का संघर्ष अत्यंत कठिन होता है यही कारण है कि वह किसी के सपने दिखाने पर ही उसके वश में हो जाते हैं। स्थिति यह है कि लोग अपनी रोजमर्रा की परेशानियों से निजात पाने के लिये सर्वशक्तिमान की दरबार में जाते हैं या फिर किसी चालाक मनुष्य को ही सिद्ध मानकर उसके इर्दगिर्द अपनी समस्याओं का रोना रोते हैं।
            सर्वशक्तिमान ने इंसान को हाथ, पांव, नाक, कान तथा आंखों के साथ अन्य जीवों से अधिक बुद्धि दी है पर अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के कारण समाज अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गया है।  यही कारण है कि प्रकृत्ति के उपहार होते हुए भी अनेक लोग लाचारी का जीवन बिता रहे हैं। इससे उन चालाक तथा विलासी लोगों की चांदी हो रही है जिनके पास बेचने के लिये सपने हैं।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
-------------------
धर्मार्थकाममीक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते।
अजागलस्तनास्येव तस्य जन्म निरर्थकम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-जिस व्यक्ति के पास धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष इन चारों में से कोई पुरुषार्थ नहीं है उसका जन्म बकरे के गले में लटके थनों के समान व्यर्थ आर निष्फल है।
दह्यमानाः सुतीव्रेण नीचाः पर-यशोऽगिना।
अशक्तास्तत्पद्र गन्तुं ततो निन्दां प्रकृर्वते।।
            हिन्दी में भावार्थ-दुष्ट आदमी दूसरों की कीर्ति को देखकर जलता है और जब स्वयं उन्नति नहीं कर पाता तो वह दूसरे का विकास देखकर उसकी निंदा करने लगता है।
आजकल यह भी देखा जा रहा है कि समाज के हित के लिये कोई काम करने की योजना तो बनाता नहीं है। न ही कोई सार्वजनिक हित के लिये काम करने को इच्छुक है पर कमजोर और लाचार लोगों का भला करने के नाम पर अनेक चालाक लोग अपनी दुकान लगा ही लेते हैं।  ऐसे लोग एक दूसरे की निंदा करते हैं।  अमुक ऐसा है हम भले हैं-जैसी बातें कहते हैं।  दूसरे के काम में दोष निकालते हैं पर स्वयं कुछ नहीं करे।  इस प्रचार के युग में निंदा करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। भौतिकता ने लोगों के निजी स्वाभिमान को नष्ट कर दिया है। अपनी समस्याओं पर दूसरे पर आश्रित रहने की सामान्य प्रवृत्ति ने समाज में अनेक ऐसे लोगों तथा उनके समूहों का निर्माण कर दिया है जो भलाई का व्यापार समाज सेवा के नाम पर करते हैं।
इस संसार में समस्यायें सभी के सामने होती हैं पर योग तथा ज्ञान साधक अपने प्रयासों से उनका निपटारा करते हैं। परिणाम के लिये प्रतीक्षा करने का उनमें धैर्य होता है।  दूसरे उनकी बुद्धि का हरण नहीं कर सकते। इस प्रकार का गुण अपने अंदर लाने का एकमात्र उपाय यही है कि हम अपने अध्यात्मिक दर्शन के ग्रंथों का अध्ययन करें।

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Monday, December 9, 2013

भ्रष्टाचार मुक्त समाज की कल्पना-हिन्दी व्यंग्य कविता(bhrashtachar mukt samaj ki kalpana-hindi vyangya kavita)

भ्रष्टाचार मुक्त समाज की कल्पना
कितनी सुखद लगती है,
मगर इसके लिये जरूरी है कि
भगवान अवतार लेकर
स्वयं राजा बन जायें,
हम सारे सुख भोगते हुए
केवल उनका नाम गायें।
कहें दीपक बापू
हम बंदे इंसानों में देवता
क्यों तलाशते हैं,
यकीन कर लेते हैं
खूबसूरत चेहरों पर
स्वर्ग धरती पर लाने का वादा
करते हुए जो नाचते हैं,
कुछ लोग महापुरुष बनने के लिये
सतयुग जैसा वातावरण
लाने का का स्वांग रचते हैं,
आम आदमी  की भलाई काम हाथ में लिये
अपनी सारी समस्याओं से बचते हैं,
हम सुनकर उनकी बातें
कभी अपने दिल में न ले जायें।
------------------

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Tuesday, November 12, 2013

मय का वहम-हिन्दी व्यंग्य कविता(may ka vaham-hindi vyangya kavita)



मयखानों में भीड़ लगी है,

जैसे भीड़ अभी नींद से जगी है,

लगता है सारा जहान ही

बोतल में खुशियां तलाश रहा है,

एकता की मिसाल मिलती वहां

किसी ने खूब कहा है।

कहें दीपक बापू

कतरा कतरा हलक से उतरती मय

ऐसा शैतान पैदा करती

बात करता  जो फरिश्तों जैसी

मगर  दिल में जिसके

बदनीयती जगह बना लेती है,

नशेड़ी सच बोलता है

किस मूर्ख ने कहा है,

वहम है कि मय पीने से

गम दूर होता है

सच यह है

उतरती शराब से

बढ़ जाता है वह दर्द

जो होशहवास में सहा है,

जिसे कोई करना नहीं आता

पीने लग जाता है

कोई गम कोई खुशी की

वजह झूठी बता रहा है।

--------------


लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Tuesday, October 29, 2013

लोकतंत्र और गरीब-हिन्दी क्षणिकायें(loktantra aur garib-hindi short poem's)



तंगहाल लोगों को

खूबसूरत सपने दिखाकर

बरगलाना आसान है,

यही सिद्धांत लोकतंत्र की जान है।

कहें दीपक बापू

किसी की निंदा जितना ही खतरा

किसी की तारीफ करने में है

इसलिये मौन रहने से  ही बढ़ती शान है।

---------------

गरीब का स्तर कमतर रहना जरूरी है,

अमीर के नखरे उठाये उसकी मजबूरी हैं।

कहें दीपक बापू

गरीब के पसीने से लोकतंत्र नहीं चलता,

अमीर के पैसे से अंधेरे में खड़ी भेड़ों की भीड़ के लिये

सपनों का  चिराग जलता,

गरीब के भले के लिये

चलते रहेंगे बड़े बड़े अभियान

तख्त पर बैठेगा वही

जिसकी गरीबी से दूरी है।

--------------
 
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Thursday, October 17, 2013

एकांतवास की तरफ बढ़ता समाज-हिन्दी चिंत्तन लेख(ekantwas ki taraf badhta samaj-hindi chinttan lekh,thought article)



                                                मनुष्य के मन में किसके प्रति क्या है, यह सहजता से पता नहीं लगाया जा सकता है।  रक्त संबंधों में माता और पिता अपने बेटे और बेटी  का विकास चाहते हैं इसमें कोई संदेह नहीं है।  वह किसी भी प्रकार से अपनी संतान का अहित होने का विचार तक मन में नहीं लाते, इसके लिये उनको किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अन्य रिश्तों में यह बात लागू नहीं होती।  अधिकतर लोग मुंह पर तो शुभकामनायें देते हैं पर मन में वाकई उसका स्थान है या नहीं यह कहना कठिन है।  मनुष्यों के बीच रिश्तों  में समय, स्थिति और स्वार्थों के अनुसार उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं। गैर आदमी से असंतुष्ट होने पर उससे दूर रहा जा सकता है पर जिनके साथ पारिवारिक संबंध है उनकी उपेक्षा करना सहज नहीं होता।  यही कारण है कि जब किसी रिश्तेदार से कोई स्वार्थ पूरा नहीं होता तो उसे सामने तो कोई आदमी कुछ नहीं कहता पर मन ही मन अमंगल कामना तो करने ही लगता है। इसलिये जहां तक हो सके अपने लोगों से वाद विवाद करने से बचना चाहिये।
                        दो रिश्तेदारों में झगड़ा हुआ। एक रिश्तेदार ने दूसरे से कहा-‘‘अभी तो तू मेरी उपेक्षा कर रहा है पर जिस दिन कोई बीमारी आदि का संकट आया तो मैं ही तेरी सेवा करने वाला हूं, इसलिये सोच समझकर व्यवहार कर।’’
                        दूसरे ने कहा-‘‘तू मेरी चिंता छोड़ अपनी कर।  तेरा परिवार जिस तरह डांवाडोल है उसके चलते तुझे मेरी ही आवश्यकता पड़नी है।’’
                        बात का बतंगड़ बन गया।  दोनों के बीच संवाद ही समाप्त हो गया।  हमारे देश में जिन रिश्तों की वजह से कथित संस्कारवान् होने का दावा किया जाता रहा है अब वह आधुनिक समय में स्वार्थपूर्ति तक ही सीमित रह गये हैं।  देश में सामान्य परिवारों की आर्थिक स्थितियां ज्यादा मजबूत नहीं रही इसके बावजूद परंपराओं को को केवल रिश्ते के दबावों में ढोया जा रहा है।  रिश्तों में मिठास की बात तो दूर शुष्कता का भाव हो तो ठीक है पर अब तो खटास जैसी प्रवृत्ति उसमें मिश्रित होती दिखने लगी है।  अभी तक हमने सुना था कि चीन में एक बच्चे का नियम कानूनी रूप से लागू होने के कारण वहां का सामाजिक तानाबना गड़बड़ा गया है पर भारत में तो सभ्रांत वर्ग ने कम संतान सुखी इंसान और हम दो हमारे दो की नीति स्वेच्छा से अपनायी इस कारण अब शहरी समाज में बृहद संयुक्त परिवारों का स्वरूप देखने को नहीं मिलता।  यह दावा भी खोखला हो गया है कि कम संतान से इंसान सुखी रहेगा। हमने तो यहां तक देखा है कि माता पिता को इकलौता पुत्र है पर वह बाहर चला गया है तो अब बड़ी आयु के दंपत्ति एकांतवास कर रहे हैं।  उसकी बचपन की यादें उनके सीने में है पर आंखों से जीवन की चमक गायब हैै। उनकी शुष्क आंखों को कोई भी पढ़ सकता है।
                        उस दिन एक सज्जन बता रहे थे कि उनकी कालोनी तो एक तरह से वृद्धाश्रम या कालोनी बन गयी है। अधिकतर दंपत्ति वृद्ध हैं।  बेटा बाहर गया तो बेटी भी पराये शहर चली गयी। नाती और पोते हैं पर उनकी यादें ही उनके पास है मिलने के लिये उनको दो तीन साल का इंतजार करना पड़ता है।  मकान बड़ा है, किरायेदार रखना नहीं चाहते क्योंकि बाहर से बच्चे आयेंगे तो रहेंगे कहां? घर के काम के लिये नौकर पर निर्भर हैं। किसी दिन वह न आये तो वृद्ध दंपति निराश हो जाते हैं। ऐसे दंपत्ति तो प्रतीक्षा करते हैं कि कोई गैर इंसान मिले तो उनसे अपने परिवार की भव्य गाथा सुनाये। कभी पार्क में तो कभी मुहल्ले में दूसरे के घर जाकर वह अपनी वाणी से शब्दों का विसर्जन करने का अवसर ढूंढते हैं। बृहद परिवार में हम आपसी वैमनस्य का भाव देखते थे तो सीमित परिवारों में एकांत का दुःख भी कम नहीं दिखता।
                        जब हम समाज की बात  बात करते हैं तो पुराने स्वरूप का ही विचार रहता है। नये विघटित समाज की समझ अभी स्थाई नहीं बन पायी। हम देखते हैं कि पेशेवर संतों के पास भीड़ बढ़ रही है तो उसका कारण लोगों के मन  में  धर्म के प्रति अधिक झुकाव नहीं वरन् एकांत से भीड़ में जाकर भाव परिवर्तन की चाह पाने के प्रयास से अधिक कुछ नहीं हैै।
                        बात करें हम अध्यात्मिक दर्शन की तो सच्चाई यह है कि जिसमें  यह इसके प्रति रुचि  गुण बचपन से पड़ गया वह कभी एकांत में कष्ट नहीं उठायेगा।  योग साधना, ध्यान, नाम और मंत्र जाप तथा अन्य रचनात्मक प्रवृत्तियों के चलते साधक अपना समय बेहतर व्यतीत करते हैं।  उन्हें यह भय नहीं सताता कि समाज उन्हें एकांत में धकेलकर आनंद उठायेगा। हां, यह भी सच है कि हमारे समाज में एक वर्ग ऐसा भी है जो इसी प्रयास में रहता है कि अपने पास एकत्रित भीड़ में वह अकेले आदमी का मजाक बनाये।  ज्ञान और योग साधकों को ऐसे लोगों की परवाह नहीं रहती।                    
  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Wednesday, October 9, 2013

अपने शुद्ध संकल्प से अनुकूल वातावरण का निर्माण करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(apne shuddh sankalp se anukul vatavaran ka niraman karen-hindi chinntan lekh)



                        हम अपने समाज में रामराज्य की कल्पना कर सकते हैं पर उसे धरातल पर लाना लगभग असंभव है।  कम से कम श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन करने पर तो कोई साधक इस तरह का विचार व्यक्त कर सकता है। उसमें कहा गया है कि इस संसार में दैवीय तथा आसुरीय तो प्रकार के मनुष्य होते हैं। इससे हम यूं भी मान सकते हैं कि इस संसार में दोनों प्रकार के लोग सदैव उपस्थित रहेंगे ही चाहे कोई माने या माने।  इतना ही नहीं दैवीय प्रकृत्ति के लोगों में भी सात्विक, राजस तथा तामस प्रकृत्ति के लोग हमेशा ही अपने स्वभाव के अनुसार सक्रिय पाये जायेंगे।  इस आधार हम कह सकते हैं कि समूची मानव जाति एक ही रंग में रंगी जाये यह संभव नहीं है।
                        समाज में कथित लोग समाज में  सुधार लाने के प्रयासों में लगे बुद्धिमान लोग इस विचार को निराशाजनक विचार मान सकते हैं पर ज्ञान साधकों के लिये यही संसार का सत्य है। यह सत्य उनमें स्वयं को ही सुधारने के लिये प्रेरित करता है।  ज्ञान साधकों को जब यह आभास होने लगता है कि इस संसार का निर्माण जिस तरह परामात्मा के संकल्प के आधार पर हुआ है उसी तरह वह भी अपने देहकाल में संकल्प के आधार अपने आसपास शुद्ध वातावरण का निर्माण करें। वह संसार में दूसरे लोगों  को सुधार कर उन्हें अपने अनुकूल लाने की अपेक्षा अपने अंदर ऐसी शक्ति पैदा करते हैं कि प्रतिकूल व्यक्ति और स्थिति उनके अनुकूल हो जाये।  वह किसी के लिये मन में द्वेष, ईर्ष्या और घृणा का भाव नहीं पालते। कोई दूसरा उनके प्रति कुविचार रखता है तो उसे आसुरीय प्रवृत्तियों के वशीभूत मानकर क्षमा कर देते हैं।  किसी का परोपकार करें या नहीं पर किसी का अपकार करने का विचार हृदय में भी नहीं लाते।  किसी के कठोर वचनों के उत्तर में भी मधुर वचन में बात करते हैं।  प्रमाद या आलस्य से परे होकर सदैव सकारात्मक कार्यों में लगे रहते हैं।  इससे उनके व्यक्तित्व की धवल छवि का निर्माण होता है जिससे कालांतर में उनको सम्मान मिलता है।
                        इसके विपरीत जो अज्ञानी हैं वह बिना कुछ किए ही सम्मान पाना चाहते हैं। कुछ लोग धन, मित्र और सहायकों का समुदाय एकत्रित कर यह समझते हैं कि उनका तो स्वतः ही समाज में सम्मान होगा तो यह उनका भ्रम है।  ऐसे लोगों को सम्मान पाने की भावना अंध कर देती है और किसी से प्रतिकूल व्यवहार मिलने पर वह हिंसा पर उतर आते हैं। हम आज समाज में जो हिंसक वातावरण देख रहे हैं वह राजसी लोगों की आक्रामकता और तामसी प्रवृत्ति लोगों के बौद्धिक आलस्य का परिणाम है।  सात्विक लोगों की संख्या कम है पर आज के भौतिकतावादी युग में कोई उन्हें साथ रखना नहीं चाहता।  सात्विक लोगों का ध्येय वैसे भी समाज में हर विषय पर टांग फंसाकर प्रतिष्ठा अर्जित  करना नहीं होता। वह जानते हैं कि हमारे समाज में समस्या विचारों के संकट की नहीं वरन्् उसे धारण करने की प्रवृत्ति का अभाव है।  ज्ञान चर्चा बहुत होती है पर उसे धारण करने की न लोगों में शक्ति है न उनके पास ऐसा संकल्प है। निकट भविष्य में लोग ज्ञान के आचरण की तरफ प्रवृत्त होंगे इसकी संभावना लगती भी नहीं है। समाज अपने साथ विध्वसंक तत्व लेकर चल रहा है और हम मानते हैं कि आगे हालात अधिक खराब होने वाले हैं।  यह अलग बात है कि समाज में पेशेवर समाज सेवक के सुधार का  नाटक भी जमकर चल रहा है।  हमने देखा है कि अनेक कथित सुधारक समाज में व्याप्त अंधविश्वास का विरोध करते हैं पर मनुष्य में मन में कोई विश्वास का बीज कैसे बोया जाये इस विषय पर खामोश रहते हैं। 
                        बहरहाल समाज की समस्याओं को दूर करने की बजाय अपने सुधार पर अधिक ध्यान देना चाहिये। सबसे बड़ी बात यह है कि हमें अपने शुद्ध विचार रखने और  सुखद कल्पनायें करने के साथ ही अपने अंदर एक दृढ़ संकल्प स्थापित करना चाहिये। हम बाहर जैसा वातावरण देखना चाहते हैं उसे पहले अपने अंतर्मन में संकल्प कर स्थापित करना होगा।  आजकल के तनावपूर्ण वातावरण से प्रथक होकर एकांत में शुद्ध स्थान पर ध्यान करते हुए इस बात पर विचार करना चाहिये कि हम किस तरह अपना जीवन सफल करें।


  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकाऐं

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर