Sunday, August 5, 2007

झुग्गी-झौंपडी की जगह महल का चित्र

स्कूल में बच्चों को प्रोत्साहन देने के लिए ड्राइंग के शिक्षक ने चित्रकार प्रतियोगिता का आयोजन किया। उन्होने सब विधार्थियों को झुग्गी-झौंपडी का चित्र बनाने का निर्देश दिया।

सब बच्चे बडे उत्साह से अपने कार्य में जुट गये, पर एक बच्चा परेशान चुपचाप बैठा था और चित्र नहीं बना पा रहा था। टीचर ने जब उसे डांटा तो वह रुआंसा हो गया और बोला-''सर, मुझे चित्र नहीं बनाना आता।

टीचर ने कहा-''कोशिश करो, अभी नहीं तो बाद में बन जाएगा।"

वह बच्चा बोला-''आप मुझे मारेंगे तो नहीं।"

टीचर ने कहा-"नहीं!तुम जैसा भी बनाओ। मैं तुम्हें नहीं मारूंगा।"

उस बच्चे ने चित्र बना दिया। प्रतियोगिता समाप्त हो गयी। सबने अपनी कापी टीचर को सौंप दीं। सबने अच्छे चित्र बनाए थे। रंग-बिरंगी कलम से उन चित्रों में उनके निवासी भी चित्रित किये गये थे। पर उस बच्चे ने आडी-तिरछी लाइनें खींचकर एक मकान बना दिया और उस पर लिख दिया 'मेरा आलीशान महल' और उससे बहुत दूर गड्ढेनुमा गोला खींचकर लिख दिया 'झुग्गी-झौंपडी'।

टीचर ने प्रसन्न होकर उसे ही पुरस्कार दिया। अन्य टीचरों ने जब यह देखा -सूना तो उनसे आपति जताई। तब उन्होने उत्तर दिया -" तुम जानते हो न! पूत के पाँव पलने में ही नजर आते हैं। उसने झुग्गी-झौपडी को गड्ढे में डालकर किसी तरह अपना आलीशान महल बना लिया। आख़िर उसमें वह सभी गुण दिख रहे हैं जिससे लगता है कि आगे वह ऐसा ही करेगा। अगर कहीं झुग्गी-झौंपडी बनाने वाला ठेकेदार बन गया तो......अपने लिए कितना बडा महल बनाएगा और कितनी तो इसके पास गाडियां होंगी। और कुछ नहीं तो तब इसकी वजह से समाज में कितना सम्मान होगा कि मैंने कितने बडे ठेकेदार को पढ़ाया है।

बाकी टीचर उनका मुहँ ताक रहे थे । कुछ ने तो उनकी दूरदर्शिता की सराहना भी की।

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